शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

उठो, साथी !

जो  अधमरा  शरीर
सड़क  पर  पड़ा  है
वही  है  महान  भारत  का
भिखमंगा गण !
और जो खड़ा है
उस अधमरे  शरीर के  सीने  पर
पांव  रख  कर
वही  है  तंत्र !

हास्यास्पद  कहें  या  वीभत्स
मगर  सत्य  यही  है
कि  हर  अधिनायक  इस  देश  का
चुना  जाता  है
तथाकथित  रूप  से
इसी  'गण'  से  मत  ले  कर !

यह  समय  शोक  मनाने  का  नहीं  है
जैसे  मरते  हुए  केंचुए  में  रह-रह  कर  उठती  है
जीवन  की  लहर
जैसे  पारंपरिक  युद्धों  में
सिर  कट  जाने  के  बाद  भी
लड़ते  रहते  थे  रुंड
ठीक  उसी  तरह  अचानक
न  जाने  कब  उठ  खड़े  होंगे
सड़क  पर  पड़े  हुए  गण
अपनी  घायल  देह  लिए ...

सारा  संसार  जानता  है
कि  यही  गण  है
जो  भयंकरतम  शस्त्रास्त्र  को
अपनी  दुर्बल  काया  पर  झेल  कर
किसी  भी  महानायक
किसी  भी  अधिनायक  की  सत्ता  को
मिट्टी  में  मिला  देता  है
समय  आते  ही  !

समय  कब  आएगा  मगर
अगली  बार  ?

उठ  जाओ,  महान  भारत  के  महा-मनुष्य
बहुत  हो  चुकी  हिंसा-प्रतिहिंसा
बहुत  हो  चुके  भ्रम-विभ्रम
एक  लक्ष्य
एक  मार्ग
गण  की  क्रांति
जन-जन  की  क्रांति  !

उठो,  साथी  !
मृत्यु  का  डर  जिसे  हो
वह  योद्धा  नहीं
और  'जन-गण-मन'  तो
कदापि  नहीं ! 

                                                                 ( 2014 )

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

...


शनिवार, 18 जनवरी 2014

सामंत की बकरी ...!

च्च च्च च्च च्च !
बहुत  बुरा  हुआ  सचमुच
सामंत  की  बकरी  मर  गई  !

सामंत  का  दुःख  बहुत  बड़ा  होता  है
शोक  मनाओ,  मूर्खों  !
अपनी  बकरियों  की  चिंता  करो, 
हानि  उठाने  के  लिए  नहीं  होता
सामंत  का  जन्म  !
आज  नहीं  तो  कल
आ  ही  धमकेंगी
सामंत  की  सेनाएं
क्या  पता  किसकी  बकरी  पर
मन  आ  जाए
सैनिकों  का  !

मीडिया  से  सबक़  सीखो

अपने  चेहरों  पर  कालिख़  पोत  लो
मातम  मनाओ
और  अपनी  बकरियों  को
बांध  कर  रखो  बाड़े  में  …

मज़ाक़  नहीं  है
सामंत  की  बकरी  का  मरना  !

                                                         ( 2014 )

                                                    -सुरेश  स्वप्निल

…

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

हत्प्रभ है पुराना जादूगर !

बहुत  परेशान  है  जादूगर
आजकल !

सारे  मंत्र  निर्जीव  होते  जा  रहे  हैं
सारी  युक्तियां  निष्प्राण
दर्शक-दीर्घा  सूनी  हो  रही  है
निरंतर...

जादूगर  को  काठ-सा  मारता  जा  रहा  है
कुछ  समय  से
जब  से  एक  नया  जादूगर  आ  गया  है
शहर  में
मंत्र  पुराना  जादूगर  पढ़ता  है
प्रभाव  प्रकट  होता  है
नए  जादूगर  के  मंच  पर ...

पुराना  जादूगर  हत्प्रभ  है
कि  कैसे  उसकी  जादुई  शक्तियां
काम  करने  लगी  हैं
उसके  शत्रु  के  पक्ष  में  !

सरासर  यह  शक्तियों  की  चोरी  का
षड्यंत्र  है
पता  नहीं  किसका  मस्तिष्क 
काम  कर  रहा  है
इस  सबके  पीछे

दुर्भाग्य  यह  है  कि
विधि  की  पुस्तकों  में 
अपराध  की  श्रेणी  में  नहीं  आता
यह  कृत्य  !

उसकी  शक्तियां  यदि  काम  कर  रही  होतीं
पूर्ववत
तो  पता  नहीं,  कब  का
ठिकाने  लगा  चुका  होता  वह
नए  जादूगर  को...
जैसे  अपने  हज़ारों  तथाकथित 
शत्रुओं  को  लगा  चुका  है  अभी  तक !

यहां  तक  भी  ठीक  था
किंतु  उसके  अपने  प्रशंसक  भी
न्याय-अन्याय  की  बात  करने  लगे  हैं
नए  जादूगर  के  प्रभाव  में  आ  कर !

यद्यपि  अनावश्यक  है  यह  कथन
कि  सबको  देना  पड़ता  है
अपने  कर्मों  का  हिसाब
इसी  जन्म  में
परंतु  मन  नहीं  मानता
पुराने  जादूगर  का ...

क्या  ईश्वरत्व  को  प्राप्त  कर  चुका
कोई  मनुष्य
फिर  से
प्राप्त  हो  सकता  है
साधारण  मनुष्यत्व  को  ?

इस  प्रश्न  का  उत्तर
केवल  वही  जानते  हैं
जो  विश्वास  करते  हैं  
दैवीय  शक्तियों  में  

हम  तो  दर्शक-मात्र  हैं 
इस  खेल  के...!


                                          ( 2014 )

                                     -सुरेश  स्वप्निल 

...



बुधवार, 15 जनवरी 2014

भेड़ों का उत्तरदायित्व !

फिर  एक  बार
सौंप  दिया  गया  है
रेवड़ों  का  उत्तरदायित्व
अन्धों  के  हाथों  में
इस  गहन  विश्वास  के  साथ 
कि  हर  शाम  आ  जाएंगी  सुरक्षित
सभी  भेड़ें
अपने  बाड़े  में !

काश !  सारे  मांसाहारी  वन्य-जीव
इस  'सदाशयता'  को  समझ  पाते !

समय  हालांकि  फिर  उपस्थित  है
रेवड़ों  के  चरवाहों  के  चुनाव  का

सबसे  अधिक  उत्कंठित  हैं
मांसाहारी  जीव
यदि  किसी  दृष्टिवान  के  हाथ 
सौंप  दी  गई  भेड़ों  की  कमान,  तो  ?

कुछ  उत्तरदायित्व  भेड़ों  का  भी  है
शायद
अपने  प्राण  बचाने  का !!!

                                                            ( 2014 )

                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

...



रविवार, 12 जनवरी 2014

बदलाव का उत्तरदायित्व...

दुःख-भरी  कविताओं  से
कहीं  अधिक  भयंकर  है
आधुनिक  समय  का  यथार्थ

दुर्भाग्य  यह  है
कि  यथार्थ  को  बदलने  का 
उत्तर-दायित्व
जिन  शक्तियों  पर  है
वे  सब  की  सब 
विरोधी  हैं  जनता  की
और  केवल  जन-शत्रु  ही  हैं
जो  सुखी  हैं
इस  क्र्रूर  समय  में...

उस  जनता  को 
कोई  अधिकार  नहीं  शिकायत  करने का
जो  खड़ी  नहीं  होती
अन्याय  के  प्रतिकार  के  लिए
और  चुपचाप  सहती  रहती  है
हर  अत्याचार...

लोकतंत्र  है
तो  व्यवस्था  बदलने  का  जिम्मा
तंत्र  से  अधिक  है
लोक  पर !

अब  समय  बहाने  बनाने  का  नहीं
व्यवस्था  बदलने  का  है
और  सरकार  बदलने  का भी  !

                                                              ( 2014 )

                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

...
 

शनिवार, 11 जनवरी 2014

संकट की इस घड़ी में...

रक्त  के   दबाव  से
फटने  लगी  हैं
धमनियां  और  शिराएं

मौसम  इतना  क्रूर  कैसे
होने  लगा  है  आजकल  ?

हां,  यह  सत्य  है  कि  इसकी  पृष्ठभूमि
तैयार  की  है
कुछ  जाति-द्रोही  मनुष्यों  ने
जो  नहीं  चाहते  कि  प्रकृति
एक  समान  व्यवहार  करती  रहे
संसार  के  सभी  मनुष्यों 
और  अन्य  प्राणियों  के  साथ
कि  जो  मानते  हैं  अपने  को
संसार  का  नियंता
अपनी  गोरी  चमड़ी  के  दम्भ  में
और  बुद्धि  के  अतिरेक  में
बिना  यह  समझे
कि  प्रकृति  ने 
समान  ही  जन्म  दिया  है
तमाम  नस्लों  को

वे  अन्यायी  यह  भी  नहीं  जानते
कि  जब प्रकृति  प्रतिशोध  लेती  है
तो  नहीं  देखती
काली  और  गोरी  त्वचा  का  फ़र्क़

यद्यपि  हम  समर्थन  करते  हैं
प्रकृति  के  प्रतिशोध  का
किंतु  निर्दोष  प्रजातियों  पर  
उचित  नहीं  अकारण  इतना  अत्याचार

यदि  प्रकृति  ही  भूल  जाए
दोषी  और  निर्दोष  का  अंतर...
तो  मुश्किल  नहीं  होगा  क्या
पृथ्वी  के  समय-चक्र  का  चलना ?

प्रकृति  स्वयं  बताए
कि  निर्दोष  मनुष्य  क्या  करें
संकट  की  इस  घड़ी  में  ? 

                                                            ( 2014 )

                                                      -सुरेश  स्वप्निल 

...

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

यथार्थ की धरा पर...!

मन  के  किसी  अज्ञात
नन्हे-से  कोटर  में
दुबक  कर  बैठी  रहती  हैं
अच्छे  दिनों  की  स्मृतियां…

बचपन  के  बिखरे  पन्नों  में
यहां-वहां
अक्सर  अधूरे  छूट  गए  चित्र
छोटी-छोटी  बातों  पर
मित्रों  का  रूठना-मनाना
भाई-बहनों  की  छेड़ छाड़…
किशोरावस्था  में
शरीर  का  धीरे-धीरे  वयस्क  होते  जाना
अचानक  किसी  का
अच्छा  लगने  लगना
अक्सर  बिना  किसी  ठोस  कारण  के…

यथार्थ  की  धरा  पर
पहला  क़दम  पड़ते  ही
न  जाने  कहां  बिला  जाते  हैं
सारे  स्वप्न...

यहां  तक  कि
किराने  का  हिसाब  भी
डराने  लगता  है  किसी प्रेत-जैसा !

कितना  भयंकर  होता  है
वयस्क  हो  जाने  का  एहसास
और  उससे  भी  अधिक
बचपन  के  बिछुड़ जाने  का !

                                                        ( 2014 )
                                                 
                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

...

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

मां को याद करना !

जीवन-साथी  की  अनुपस्थिति  में
दो  समय  का  भोजन 
तैयार  करते  समय
अक्सर  पूछा है  मैंने 
स्वयं  से
कि  आख़िर  क्या  ज़रूरी  है
जीवन  के  अंतिम  क्षण  तक 
साम्यवादी  बने  रहना
और  किसी  को  नौकर  न  रखना ...
मात्र  आधा घंटे के  काम  के  लिए
दो-दो  घंटे  जूझते  रहना
और  कच्ची-पक्की  रोटियां
खा  कर
संतुष्ट  हो  रहना  ?

जब-जब  मैं  इस  विचार  तक
धकेला  जाता  हूं
स्वयं  अपने  ही  मस्तिष्क   के  द्वारा
मेरी  चेतना 
मेरे  सोच  को  धिक्कारना 
शुरू  कर  देती है  !


मैं  जानता  हूं 
कि  मैं 
कभी  भी  नौकर  शब्द  को 
स्वीकार  नहीं  कर  पाउंगा
कम से कम अपने  घर  में
और  मेरी  जीवन-संगिनी  ?
वह  तो  किसी  भी  मूल्य  पर  नहीं !

एक  सीधा-सरल  उपाय  है
जो  मेरी  जीवन-संगिनी  याद  दिलाती  रहती  है
बाज़ार  का  खाना....

किंतु,  अकेला  होते  ही
जब  भी  मैं
भोजन  और  बाज़ार  के  अंतर्सम्बंधों  पर
सोचता  हूं
फिर  मुझे  मेरी  अंतश्चेतना  धिक्कारने  लगती  है !

ज़रा  सी  देर  की  असुविधा,
ज़रा  सा  समय
अपने  ऊपर  ख़र्च  नहीं  कर  सकते
और  अपने-आप  को
'साम्यवादी',  'प्रगतिशील'  और  पता  नहीं
क्या-क्या  कहते  हो !

इस  अत्यंत  सुखद  प्रसंग  का
अंत  हमेशा  एक  ही  तरह  से  होता  है
-अपने  हाथ  से  बना  कच्चा-पक्का
किंतु  श्रम-गंध  से  सुगंधित
स्वादिष्ट  भोजन
खाते-खाते
मां  को  याद  करना  !

                                                      ( 2014 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल 

...









रविवार, 5 जनवरी 2014

क्या सोचा आपने ?

इतना  सरल  भी  नहीं
समय  की  दिशा  और  रफ़्तार
बदल  पाना
कि  चंद  नारे  उछाले
और  हो  गया !

बहुत-कुछ  झेलना
और  भोगना  पड़ता  है
समय  बदलने  के  लिए
बहुत-से  अन्याय  और  अत्याचारों  से
निबटना
शासक-वर्ग  के  निशाने  पर  आना
और  घर-बार  भूल  कर
पूरी  चेतना  और  ऊर्जा
संघर्ष  में  झोंक  देना  …

यदि  आपको
कपड़े  मैले  हो  जाने  का
भय  न  सताता  हो
दूसरों  के  दुःख-दर्द  को
अपना  बना  लेना  आता  हो
यदि  आपको  शोषण  का  वास्तविक  अर्थ
समझ  आता  हो
यदि  आपको  इतिहास  की  सही-सही
जानकारी  हो
यदि  आपको  अपने  पूर्वजों  पर  हुए
अत्याचारों  से
अपनी  और  अपनी  भावी  पीढ़ी  को
बचाना  कर्त्तव्य  लगता  हो
तो  स्वागत  है  आपका
उन  योध्याओं  की  जमात  में
जो  लगे  हैं  समय  को
मनुष्य  के  अनुकूल  दिशा
और  गति  देने  में  …

तो
क्या  सोचा  आपने
समय  को  बदलने  के  बारे  में ???

                                                 ( 2014 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल 

 …

शनिवार, 4 जनवरी 2014

खरे सोने का रंग !

सिर्फ़  किसान  ही  जानते  हैं
पूस  की  रात  का  अर्थ !

सिर्फ़  किसान  ही  जानते  हैं
कोहरे, पाले  और  बरसते  मेह  के  बीच
प्राण  लेने  पर  उतारू
हवाओं  से  बच  कर
खेत  में 
पानी  लगाने  की  कला

सिर्फ़  किसान  ही  जानते  हैं
गेहूं  की  बालियों  में
रस  भरने  का  सुख

सिर्फ़  किसान  ही  जानते  हैं
कैसा  होता  है
खरे  सोने  का  रंग !

किसान  नहीं
तो  और  किसे  तय
करना  चाहिए 
अपनी  उपज  का  मूल्य ?

                                            ( 2014 )
            
                                     -सुरेश  स्वप्निल 

...

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

नक़ली प्रधानमंत्री !

उफ़ ! कितना-कुछ  नक़ली
दिखाई  देने  लगा  है
आजकल  !


नक़ली    नायक
नक़ली  समर्थक
नक़ली  देश
नक़ली  लोकतंत्र 
नक़ली  चुनाव


नक़ली  लाल  क़िला
नक़ली  संसद
नक़ली सरकार
नक़ली  प्रधानमंत्री  !

तुम्हारी  झाड़ू  कहां  है ?
आओ,  मिल  कर  साफ़  करें
सारा  नक़ली  कचरा  !

                                                       ( 2014 )

                                               -सुरेश  स्वप्निल 

  …

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

आख़िर किस आशा में ...?

भविष्य  के  गर्त्त  में
छिपे  हैं
न  जाने  कितने  गहन  अंधकार
अनगिनत झंझावात
भूकम्प
और  जल-प्लावन …

समय  निर्मम  हो  रहा  है
मनुष्यता  के  प्रति
जैसे  कि  प्रतिशोध  ले  रहा  हो
मनुष्य  से
महान  धरा  और  प्रकृति  के
अपमान  का 

जिन्हें  चिंता  होनी  चाहिए
वे  ही  उत्तरदायी  हैं
वर्त्तमान  और  भावी
महाविनाश  के

कहने  को
सारी  सभ्यताएं
सारी  संस्कृतियां
और  सारे  देश
स्वतंत्र  और  संप्रभु
लगे  हुए  हैं
इनी-गिनी  महाशक्तियों  की
चाटुकारी  में....

आख़िर  किस  आशा  में
जी  रहे  हैं  देश
किस  क्रांति  या  प्रति-क्रांति  की
प्रतीक्षा  में  ???

                                                   ( 2013 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल 

  …

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

अंतिम पराजय के लिए !

जैसा  ठीक  समझें  हुज़ूर !
आप  चाहेंगे  तो  फिर  लड़  लेंगे
आप  तो  विशेषज्ञ  हैं
युद्ध-कला  के

आप  इतने  उत्कंठित  क्यों  हैं
लेकिन  ?
आप  सोच  रहे  हैं  संभवतः
असावधानी  और  अति-आत्म-विश्वास
ले  डूबा  आपको
किंतु  अर्द्ध-सत्य  है  यह
वस्तुतः 
आप  जब  तक  उत्कंठित  हैं
तब  तक
कभी  समझ  नहीं  पाएंगे
अपनी  पराजय  के  वास्तविक  कारणों  को !

वास्तविकता  तो  यह  है
कि  आपका  चरित्र
आपकी  नीतियां
आपकी  विचारधारा
और  आपकी  रण-नीति
इतने  अधिक  प्रदूषित  हो  चुके  हैं
कि  जब  भी
सत्य,  ईमानदारी  और  न्याय  के  पक्षधर
उतरेंगे  आपके  विरुद्ध
मैदान  में
तब-तब 
केवल  पराजय  ही  हाथ  आनी  है  आपके

बेकार  की  ज़िद  छोड़िये,  हुज़ूर !
हम  जनता  हैं
आपकी  सारी  सम्मिलित  सेनाओं  से
सैकड़ों-हज़ार  गुना

हम  तो  ख़ाली  हाथ  ही  बहुत  हैं
सरकार  !

चुनौती  आपने  दी  है
युद्ध  तो  लड़ना  ही  होगा  आपको

तैयार  हो  जाइए,  महाशय
अपनी  अवश्यंभावी 
अंतिम  पराजय  के  लिए  !

                                                           ( 2013 )

                                                      -सुरेश  स्वप्निल 

 …

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

गिद्ध लौट आए हैं : तीन

               । तीन।
गिद्ध  लौट  आए  हैं
इस  सूचना  और  आशा  पर
कि  फिर  एक  बार
कोई  रक्त-पिपासु,  कोई  नर-पिशाच
उतर  आया  है
भारत  की  महान  युद्ध-प्रेमी  धरा  पर
फिर  दोहराया  जाए  संभवतः
कोई  कलिंग,  कोई  कुरुक्षेत्र  …

आपका  क्या  विचार  है ?
जीतेगी  मनुष्यता
या  जीतेंगे  नर-पिशाच ??? 

युद्ध  बहुत  कठिन  है  इस  बार
मनुष्यता  के  लिए
जीत  और  हार  दोनों  ही  स्थितियों  में
मानेंगे  नहीं  नर-पिशाच
संभव  है,  युद्ध  के  पूर्व  ही
गिरने  लगें  शव
निर्दोष  मनुष्यों  के …
मनुष्यता  विजयी  हो  तो  भी
हार  की  खीझ  भी  पर्याप्त  है
पृथ्वी  को  रक्त-रंजित  करने  के  लिए
और  यदि  हार  गए  मनुष्य
नर-पिशाच  की  सेनाओं  से…

कहते  हैं,  गिद्ध  बहुत  पहले  ही  जान  लेते  हैं
आगामी  रक्त-पात  का  समय…

हां,  गिद्ध  लौट  आए  हैं  फिर  एक  बार
अभूतपूर्व  रक्त-पात  की  संभावनाओं  के  मद्दे-नज़र  ....

                                                                                ( 2013 )
                                                                  
                                                                         -सुरेश  स्वप्निल

..

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

गिद्ध लौट आए हैं !

            । एक।

गिद्ध  लौट  आए  हैं
बस्तियों  के  आस-पास
बहुत-से  सूखे  हुए  पेड़ों  पर
नज़र  आने  लगे  हैं
आजकल

गौरइयें  भी  आएंगी  क्या
अपने  छूटे  हुए  घोंसलों  में ?

घर  बहुत  सूना  लगता  है
सचमुच
गौरेयों  के  बिना  !

और  कौवे ?
क्या  सचमुच  आएंगे  लौट  कर
पूर्वजों  का  भोग
जुठारने  ?

                     । दो।

गिद्ध  लौट  आए  हैं
तमाम  आशंकाओं  को
दरकिनार  करते 
तमाम  असंभावनाओं  के  विरुद्ध
आगामी  पांच  वर्ष  तक
ताजो-तख़्त  सम्हालने  के  लिए

सम्भवतः 
अन्य  कोई  और  विकल्प   हो
अगली  बार 
चुनने  के  लिए … ।

                                            ( 2013 )

                                     -सुरेश  स्वप्निल

.

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

मैं नियंता हूं ...!

लो,  मैंने  धो  दिए
सारे  चरित्र
और  डाल  दिया  है  उन्हें
अलगनी  पर
सूखने  के  लिए

तुम  इस  बार
स्वयं  चुन  सकते  हो
अपना  चरित्र
अपनी  इच्छा,  सुविधा
और  स्वभाव  के  अनुरूप

लेकिन  ध्यान  रहे
अंतिम  निर्णय  मेरा  ही  होगा
मैं  नियंता  हूं  इस  कहानी  का
और  तुम 
एक  चरित्र  मात्र

यह  भी  ध्यान  रखना
कि  हर  बार  केंद्रीय  भूमिका
आवश्यक  नहीं  होती !

तुम  निश्चय  ही  स्वतंत्र  हो
चरित्र  चुनने  के  लिए
किंतु  कहानी  और  संवादों  में
परिवर्त्तन  के  लिए  नहीं

जब  तक  तुम  इस  कहानी  में  हो
किसी  भी  भूमिका  में
तुम्हें  मानने  ही  होंगे  मेरे  निर्देश
इस  से  अधिक  की  आशा  मत  करो

यदि  तुम  अब  भी  असंतुष्ट  हो
तो  लिख  सकते  हो
स्वयं  अपनी  कहानी
तुम  चाहो  तो
बाहर  निकल  सकते  हो
इस  कहानी  से…

जो  भी  निर्णय  हो  तुम्हारा
सूचित  कर  देना  मुझे
चरित्रों  के  सूखने  से  पहले !

                                             ( 2013 )

                                        -सुरेश  स्वप्निल 

  …

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

पा सकूं एक नाम...!

मैं  जब  समुद्र  था
बहुत-से  आकाश  थे
मेरे  भीतर
अजेय,  अपरिमेय
असीम…
स्वयं  मेरे  अपने  विस्तार  से
कहीं  बहुत  अधिक  विशाल
अक्सर  मेरे  मनोबल  को
चुनौती  देते !

जब  मैं  सूर्य  था
तब
अनगिनत  नदियां  प्रवाहित  थीं
मेरे  अंतर्मन  की  अग्नि  को
शांत  करती
अपनी  शिशु-सहज  अठखेलियों  से
बहलाती  हुई   मुझे

मैं  जब  मनुष्य  था
मेरे  भीतर
सारे  समुद्र  थे
सारे  आकाश
और  सारी  नदियां
करोड़ों  आकाश-गंगाएं
तरह-तरह  की  संस्कृतियां
अबूझ,  अविस्मरणीय,
एक-दूसरे  से   जूझते  इतिहास
बनती-मिटती   सभ्यताएं ....


यह  प्रश्न  पूछा  जा  सकता  है
सहज  ही
कि  मैं  इतना  कुछ  होते  हुए  भी
क्यों  कभी  बचा  नहीं  पाया
अपनी  अस्मिता....

सम्भवत: ,  मैं  मात्र  एक विचार  ही  था
अविकसित,  अपरिपक्व
एक  अपूर्ण  शरीर
एक  भ्रमित  मस्तिष्क  में
बार-बार  सिमटता-फैलता
जन्म  लेता  और  मरता  हुआ ....

नहीं,  कोई  कथा  नहीं  है  मेरी
जिसे  कहा-सुना  जा  सके

अगली  बार  जब  जन्म  लूं
प्रयास  करूंगा 
कि  पा  सकूं  एक  नाम
स्पष्ट  और  सुनिश्चित....!

                                                 ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल 

..


                                          

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

न्याय और अन्याय !

शोर  जब  जनहित  में  हो
तो  अपराध  नहीं  होता
जनहित  में  वस्तुत:  क्रांति  भी
अपराध  नहीं  होती
यहां  तक  कि  जन-विरोधी  शासक-वर्ग  को
नेस्त-नाबूद  कर  देना  भी …

जब  शासक-वर्ग  जनहित  के  विरुद्ध  हो
तो  दंड-संहिताएं  बदल  दी  जानी  चाहिए
बदल  दिए  जाने  चाहिए
न्यायाधीश  और  न्यायालय

न्याय  यदि  पीड़ित  को  स्वीकार  न  हो
तो  न्याय  कैसा ?

सन्दर्भों  से  परे
न्याय  और  अन्याय
हो  सकता  है
समानार्थक  लगें

किन्तु  समय-विशेष  पर
कौन  तय  करेगा
न्याय  और  अन्याय  की
परिभाषाएं ?

                                                 ( 2013 )
                             
                                          -सुरेश  स्वप्निल

..

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

नमो नारायण कबाड़ी !

लो,  आ  गया  गांव  में
नमो  नारायण  कबाड़ी !

ले  आओ  बाप-दादों  की
ज़ंग  खाई  तलवारें
चाक़ू-छुरियां,  भाले और त्रिशूल
अब  शायद  ज़रूरत  न  पड़े  इनकी
वैसे  भी  इसी  के   गुर्गों  की  देन  है
यह  कबाड़....

सुना  है  कि  जब
देश  का  शासक  बन  जाएगा
नमो  नारायण
तब  बीच  समुद्र  में
खड़ा  करेगा
संसार  का  सबसे  ऊंचा  बिजूका
जिसके  सर   पर  बीट  करने
आमंत्रित  किए  जाएंगे
दुनिया  भर  के  गिद्ध  और  कौए…

कहां  चक्कर  में  पड़  गया  बेचारा
सीधा-सच्चा  नमो  नारायण  कबाड़ी
ऐसी  अद्भुत  कल्पना-शक्ति  पा  कर  भी

समझाओ  यार  कोई !
कविताएं  लिख 
और  चाय  बेच,  चाय  !

                                                           ( 2013 )

                                                   -सुरेश  स्वप्निल 

..

रविवार, 15 दिसंबर 2013

...मगर बताएंगे नहीं !

बहुत  से  चमत्कार 
घटित  होते  हैं
लोकतंत्र  के  प्रांगण  में
मुख्य  प्रतिद्वंदियों  की 
आशाओं  के  विपरीत ....

अक्सर  मुक़ाबला  वे  जीतते  हैं
जो  सबसे  पीछे  दीखते  हैं !

न,  स्वप्न  देखना  अपराध  नहीं
संसार  के  किसी  भी  देश  में
किसी  भी  क़ानून  में
और  हो  भी  तो  क्या  ?

ऐसी  कोई  दवा  भी  तो  नहीं  बनी
आज तक
जो  बदल  दे
करोड़ों  मनुष्यों  की
जैविक  संरचना
एक  ही  ख़ुराक़  में  !

यही  तो  आनंद  है  लोकतंत्र  का
कि  लड़ते  हैं  वे
जिनके  हाथ  में
कोई  सूत्र  नहीं  होता !

हथियार  जिनके  पास  होते  हैं
वे  पता  नहीं  कब  और  कैसे
अपनी  रण-नीति  तय  करते  हैं
और  देखते  ही  देखते
खंडित  कर  देते  हैं
सारे  साम्राज्य  !

छत्र-भंग  तो  हो  कर  ही  रहेगा
इस  बार  भी
मगर  अगला  सिर  किसका  होगा
जिस  पर  सजेगा  छत्र
यह  सिर्फ़
हम  ही  जानते  हैं

जानते  हैं
मगर  बताएंगे  नहीं
किसी  को  भी  !

                                                  ( 2013 )

                                             -सुरेश  स्वप्निल 

. 


शनिवार, 14 दिसंबर 2013

क्या ज़रूरत थी...?

आ  रहा  है  विजय-रथ
लोकतंत्र  के  महा-रण   में
विजयी  महारथी  का
जीत  के  उन्माद  में  चूर
सिपाहियों  की  भीड़  के  साथ  …

गाजे-बाजे,  आतिशबाज़ी
और  जीत  की  सलामी  देती  बंदूकें
काफ़ी  हैं
दहशत  में  डालने  के  लिए
पराजित  प्रत्याशियों 
और  समर्थकों  को

कोई  नहीं  रोकेगा  इस  समय
इस  निर्लज्ज  प्रदर्शन  को
जो  ध्वस्त  करता  जा  रहा  है
तमाम  स्थापित  मूल्य
मान्यताएं  और  परम्पराएं

यदि  लोकतंत्र  का  महा संग्राम
इसी  तरह  संपन्न  होना  है
जहां  पराजितों  की  मनुष्यता
एक  ही  वार  में  नष्ट  कर  दी  जाए
और  उन्हें  गाजर-मूली  की  तरह
काट  डाला  जाए
और  विजेता  को
सरे  आम  लूट  का
अधिकार  दे  दिया  जाए
तो  क्या  ज़रूरत  थी
सामंतवाद  के  स्थान  पर
लोकतंत्र  लाने  की  ?

                                              ( 2013 )

                                       -सुरेश  स्वप्निल 

  …

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

बहुत फिसल चुके !

कितना  विचित्र  अंधकार  है
प्रकाश  की  संभावना
नज़र  ही  नहीं  आती
इस  देश  में !

हम  तो  सर्वज्ञात  थे
सारे  संसार  को
मार्ग  दिखाने  के  लिए…!

बहुत  फिसल  चुके  हम
नैतिक  और  आध्यात्मिक  रूप  से
स्वतंत्र  होते  ही
कई  शताब्दियों  की  परतंत्रता  से

आख़िर  क्या  हुआ  ऐसा
क्या  यह  परतंत्रता  का  संस्कार  है
या  हमारी  जैविक  दुर्बलता  ?

निर्णय   हमें  ही  करना  है
और  परिष्कार  भी !

                                                         ( 2013 )

                                                  -सुरेश  स्वप्निल 

.

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

तुम मनुष्य नहीं !

तुम्हारे  हाथ  में   चार  उंगलियां  हैं
तुम  मनुष्य  नहीं  हो

तुम  खाना  हाथ  से  खाते  हो
तुम  भी  मनुष्य  नहीं  हो

तुम  हमारी  तरह  नहीं  सोचते
तुम  तो  कभी  भी
नहीं  हो  सकते  मनुष्य  !

पेशकार,  ज़रा  आवाज़  लगाओ
उस  प्रकृति  को
जिसने  बनाया  है
इन  आधे-अधूरे  मनुष्यों  को  !

हम 
न्याय  के  सर्वोच्च  आसन  पर
बैठने  वाले
न्यायाधीश  निर्णय  देते  हैं
कि  ऐसे  हर अजूबे  को
बेदख़ल  कर  दो
मनुष्यता  से
जो  शरीर  या  रुचियों  से
ठीक  हमारे  जैसा  न  हो !

कल  से  कोई  भी  ऐसा  अजूबा
सामने  आए
तो  उसे  डाल  दो  जेल  में
दस  साल  के  लिए
ज़्यादा  गंभीर  मामला  हो
तो  सारे  जीवन  के  लिए

पेशकार !
वह  प्रकृति  हाज़िर  हुई 
या  नहीं ?!

                                           (2011)

                                    -सुरेश  स्वप्निल 

..

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

क्षमा किया आपको !

स्पष्ट  बताइए
एक  भी  शब्द  व्यर्थ  किए  बिना
कि  यह  खेल  है
या  युद्ध....

नियम  तय  करना
और  उनका  पालन  करना
आवश्यक  है
दोनों  पक्षों  के  लिए
कहीं  कोई  छूट  नहीं
न  राहत
किसी  भी  वास्तविक  या  काल्पनिक
कारण  के  लिए

आप  हमें  मूर्ख  समझते  हैं
कि  हम  आपके  कहे  अनुसार
अपनी  रणनीति  बनाएं ?!

आपने  ही  की  थी  अभ्यर्थना
'युद्धं  देहि !'
अब 
हाथ  क्यों  कांप  रहे  हैं  आपके
प्रत्यंचा  चढ़ाते  ?

चलिए,  क्षमा  किया  आपको
अगली  बार  तय  करके  आइए
रणभूमि  में
अच्छी  तरह  से
अपने  गुरुजन  से  परामर्श  करके !

                                                  (2011)

                                            -सुरेश  स्वप्निल 

.

यही वक़्त है ....

वे दिन गए 
जब आम आदमी भागता था 
कुर्सियों के पीछे 
अब आम आदमी आगे 
और पीछे-पीछे दौड़ रही हैं कुर्सियां 
जैसे  आगे  हों बिल्लियां
और  चूहे  उन्हें  छकाते  हुए 
जैसे  शेर  कांपने  लगे  थर-थर 
बकरियों  को  देख  कर ... 

अद्भुत  दृश्य  है  न 
न  कभी  देखा  न  सुना 

इसे  सहेज  कर  रख  लीजिए 
अपनी  स्मृतियों  में 
2011  में  जनपथ  की  चेतावनी  वाले 
दृश्यों  के  साथ  जोड़  कर 
अपनी  भावी  पीढ़ियों  के  
सामाजिक  संस्कार  के  लिए …

हां,  यही  वक़्त  है 
सही  वक़्त

इसके  पहले  
कि  पूंजीवाद  नष्ट  कर  दे 
मानवता  की  बची-खुची  निशानियां 
और  छिन्न-भिन्न  कर  दे 
संबंधों  के  ताने-बाने 
कुछ  आदर्श  रख  लीजिए  बचा  कर 
ताकि  कुछ  बच  रहे 
दिन-प्रतिदिन  जर्जर  होती 
मनुष्यता  की  उम्र  !

                                                (2011) 

                                        -सुरेश  स्वप्निल  

. 

 

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

अबे ओ, मालिक !

न  मालिक !  बहुत  हुआ
मज़दूरी  तो  देनी  ही  होगी  तुम्हें
आज  और  अभी

बहुत  हाड़  तोड़  लिए,  मालिक
झंडे  उठा-उठा  कर
ख़ूब  दौड़  लिए  यहां-वहां
रात-रात  भर  जाग-जाग  कर
उठाते-धरते  रहे
तुम्हारी  सभाओं  के  ताम-झाम
गले  फाड़-फाड़  कर  नारे  लगाते
फेफड़े  तक  सुजा  लिए  अपने

किसलिए,  मालिक  ?
चार  पैसे  के  ही  लिए  न !

आपने  वादा  किया  था
कि  चुनाव  के  दिन  ही
मिल  जाएंगे  पैसे
अब  तो  परिणाम  भी  आ  चुका,  मालिक !

मालिक,  आपकी  हार-जीत  से
हमें  क्या  मतलब ?
हमने  अपना  काम  किया
पूरी  ईमानदारी  से
आप  हारे  या  जीते
हमें  इससे  क्या ?

मालिक,  घर  नहीं  गए  हैं  हम
पिछले  दो  महीने  से
हमारा  भी  घर-बार  है
बच्चे  हैं  छोटे-छोटे....

किस  बात  का  सब्र,  मालिक ?
भीख  नहीं,
अपने  काम  की  मज़दूरी
मांग  रहे  हैं  हम !

अबे  ओ,  मालिक !
मज़दूरी  देता  है  सीधे-सीधे
हमारी
या  उठाएं  झाड़ू  ?!!

                                                   (2013)

                                             -सुरेश  स्वप्निल

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

श्रद्धांजलि : कॉमरेड नेल्सन मंडेला

                                    ख़ेराजे-अक़ीदत

                                               ख़ेराजे-अक़ीदत
               
                                      जनाब  मरहूम  नेल्सन  मंडेला 


                         उसके  क़दमों  के  निशां  वक़्त  के  सीने  पे  हैं 

                         चला  ज़रूर  गया  है  वो:  शख़्स  दुनिया  से  …


                     कामरेड  नेल्सन  मंडेला  ज़िंदाबाद !  ज़िंदाबाद !
                     कामरेड  नेल्सन  मंडेला  अमर  रहें!  अमर  रहें !



                                                                                          6  दिसं  2013


                                                             -सुरेश  स्वप्निल  और  इंसानियत  के  तमाम  सिपाही



.
.
                                                                       

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

इस बार चूकने का अर्थ...

अंत  निकट  है
एक  जन-विरोधी  सरकार  का
तुम्हारी  तैयारियां  क्या  हैं
एक  वास्तविक 
और  जनोन्मुखी  विकल्प  के  लिए  ?

समय  कम  है
और  विकल्प  सीमित
उत्तरदायित्व  असीमित  हैं

अपना  लक्ष्य  सुनिश्चित  करो
और  इतना  संघर्ष  करो
कि  आने  वाली  कई  सरकारें
तुम्हारे  नाम  से  ही  भयभीत  रहें  ....

दो  दशक  से  अधिक  समय  तक
निरंतर  अपमान
भूख,  भय,  अत्याचार
भ्रष्टाचार,  मंहगाई,  बेरोज़गारी
क्या-क्या  नहीं  सहा  तुमने  ???

ऐसा  लोकतंत्र  मत  लादो
अपने  सिर  पर
कि  फिर  भुगतना  पड़े
सदियों  तक  ....

अभी  समय  है
जो  करना  है  अभी  ही  करना  होगा
इस  बार  चूकने  का  अर्थ  है
सारी  संभावनाएं  नष्ट  कर  लेना  !

कल  शिकायत  किससे  करोगे  ?
और  किस  बात  की
अपनी  कायरता  की  ???

                                                   (2013)

                                           -सुरेश  स्वप्निल 

.

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

वे मारे जाते हैं ...

असली  खेल  तो  अब  शुरू  होगा
जब  शिकार  के  मांस  से
पेट  भर  चुकने  के  बाद
वापस  लौट  जाएगा  शेर
अपनी  कंदरा  में

उसके  बाद  बारी  आएगी   परजीवियों  की
सबसे  पहले
शिकार  को  घेर  कर  लाने  वाले
जंगली  कुत्तों  की
फिर  सियार
फिर  लोमड़ियां
फिर  गिद्ध....
एक-दूसरे  पर  झपटते
एक-दूसरे  का  मांस  नोंचते
कोई  नहीं  चाहता
दूसरे  को खाने  देना

यद्यपि, बड़ी  विचित्र  बात  है
कि  अपनी  पसन्द  के  हिस्से
खा  चुकने  के  बाद
सब  लौट  जाते  हैं
दूसरी  जाति  के  पशुओं  को
बचा-ख़ुचा  खाने  के  लिए  छोड  कर

एक  अलिखित  समझौता  है
सारे  मांसाहारियों  के  बीच
सबकी  अपनी-अपनी  बारी
सबके   अपने-अपने  हिस्से

जो  मारे  जाते  हैं
वे  शिकायत  नहीं   करते

या  इसे  यूं  भी  कहा  जा  सकता  है
कि  वे  मारे  जाते  हैं
जो  शिकायत  नहीं  करते  !

                                                       (2013)

                                                -सुरेश स्वप्निल

.

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

श्रद्धांजलि: भोपाल गैस त्रासदी

बच्चा  डूबा   है  नींद  में
नींद  बहुत  गहरी  है
गहरा  है  नींद  का  रहस्य

बच्चे  की  मुंदी  हुई  आंखों  में
क़ैद  हैं  कई  सपने
फूलों  के,  परियों  के
रंगीन  तितलियों  के
डरे  और  सहमे  से

बच्चे  की  नींद  पर
बैठा  है  फन  खोले
ज़हरीला  नाग  एक
(विज्ञानं  की  पुस्तकों  में
मिथाइल  आइसो  सायनेट  के  नाम  से
पहचाना  गया)

नाग  की  हिफ़ाज़त  में
भारी  ख़ज़ाना  है
परदेसी  बंजारा
छोड़  गया  अपना  धन
लौटेगा
लौटेगा  एक  दिन…

छप्पर  की  दरारों  से
टुकुर-टुकुर  तकती  है
मटमैली  गौरैया
बच्चे  की  मुंदी  हुई  आंखों  में
नापती  है  नाग  की  आंखों  की  गहराई
तौलती  है  अपने  पंखों  की  ताक़त

लाएगी  गौरैया
छीन  कर  बंजारे  से
नींद  के  तालों  की  चाभियां
नागों  का  वशीकरण-मंत्र
खोलेगी  नींद  का  रहस्य !

                                                      (1985)

                                               -सुरेश  स्वप्निल 

. 


मंगलवार, 26 नवंबर 2013

क्रांति के लिए ...!

उस  शिकायत  का
कोई  अर्थ  नहीं
जिसे  शासक-वर्ग  सुन  कर  भी
अनसुना  कर  दे

एक  व्यक्ति  की  आवाज़  का
यही  परिणाम  होता  है
अक्सर

क्रांति  के  लिए
एक  क्रांतिकारी  पार्टी  चाहिए
जन-जन  के  हृदय  में  पैठी  हुई
जिसकी  आवाज़
किसी  भी  रण-दुन्दुभि  से  तेज़  हो
जो  जब  उठे
तो  दिल  दहल  जाएं
सत्ताधीशों  के....

समझौता-परस्तों  के
सिर्फ़  जमावड़े  होते  हैं
छोटे-मोटे 
हित-साधन  के  लिए  !

क्रांति  चाहिए
तो  पार्टी  बनानी  ही  होगी
आत्म-बलिदानियों  की  !

                                            (2013)

                                      -सुरेश  स्वप्निल 

.

सोमवार, 25 नवंबर 2013

झूठ के दम पर ...!

इतिहास
भूलने  की  चीज़  नहीं  होती
जब  तक  कोई  राष्ट्र
लज्जित  न  हो  अपने  अतीत  पर  !

ज़िंदा  राष्ट्र
नए  इतिहास  गढ़ते  हैं
अतीत  से  लज्जित  हुए  बिना
वर्त्तमान  से  मुंह  छिपाए  बिना
भविष्य  की  अनिश्चितता  से
डरे  बिना !

झूठ  के  दम  पर
न  राष्ट्र  बनते  हैं
न  संस्कृति

मिथक  नहीं
अध्याय  बनो
नए  इतिहास  का !

                                                  (2013)

                                            -सुरेश  स्वप्निल 

.

रविवार, 24 नवंबर 2013

मनुष्य का दख़ल ...

एक  अव्यक्त  भय 
फैला  हुआ  है
वातावरण  में
जैसे  समुद्र  के  जल  में
ज्वार-भाटे  तक  नहीं  आते
सही  समय  पर
शहर  और  गांवों  में
पक्षी  भी  दिखाई  नहीं  देते
वनों  में
हिंस्र  पशु  भी  चुपचाप  पड़े  रहते  हैं
अपनी  भूख  दबा  कर…

मनुष्य  का  दख़ल
बढ़ता  ही  जा  रहा  है
प्रकृति  के  हर  क्षेत्र  में
तथाकथित  विकास  के  नाम  पर
ध्वस्त  किए  जा  रहे  हैं
सारे  संतुलन    

पता  नहीं
कुछ  मनुष्य  अथवा  समूहों  की
समृद्धि  की  अतृप्त  आकांक्षाएं
कौन  से  दिन  दिखाएंगी
प्रकृति, पर्यावरण
और  स्वयं  मनुष्यता  को  !

                                                                   (2013)

                                                             -सुरेश  स्वप्निल 

.

शनिवार, 23 नवंबर 2013

शर्म आती है नागरिकों को ...

आंखों  की  आदत  बिगड़  गई  है
शायद
या  चश्मे  में  कुछ  ख़राबी
आ  गई  है
कुछ  भी  अच्छा,  शुभ
या  सुंदर  दिखाई  नहीं  देता
आजकल

या  सचमुच  हालात
इतने  ही  ख़राब  हो  गए  हैं
देश  के

हर  तरफ़ 
सूखे,  मुरझाए  चेहरे
गड्ढों   में  धंसी  आंखें
फटे-पुराने,  अपर्याप्त  कपड़े  पहने
सुबह  से 
दो  वक़्त  के  खाने  की  जुगत  में
लगे  हुए  बच्चे …

दूसरी  ओर
निर्लज्ज्ता  की  सीमाएं  लांघती
समृद्धि
स्वप्न  से  भी  बाहर  हो  चुके
ऊंचे,  वैभवशाली  मकान
फ़ुटपाथ  पर  सोते  हुए
अक्सर 
किसी  मदांध  रईस  की  गाड़ी  से
नींद  में  ही  मारे  जा  चुके
ग़रीब-मज़दूर....

और  विकास  के  झूठे  सपने
दिखाते  तथाकथित  जन-प्रतिनिधि
सीधे-सरल  जीवन  की
तमाम  संभावनाएं 
नष्ट  करती  हुई  सरकारी  नीतियां....

आख़िर  क्यों
इसी  देश  में  जन्म  लेना
ज़रूरी  था मुझे ???

यहां  तो  शर्म  आती  है
नागरिकों  को
अपने  अधिकार  की 
लड़ाई  लड़ते  हुए...!

                                               (2013)

                                         -सुरेश  स्वप्निल 

.

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

हर चुनाव में... !

शोर  थमा  नहीं  है  अभी
चुनाव  का
सुबह  होने   से  पहले  ही  आ  जाते  हैं
हर  दल  के  प्रत्याशियों  के  वाहन
अपने-अपने  नारे  और  फूहड़  गीतों  को
लाउडस्पीकर  पर  बजाते  हुए....

बहुत  से  क़ानून,  बहुत  से  नियम  हैं
आम  आदमी  को  शोर  से  बचाने   के
न  कोई  जानता  है  न  मानता  है
न  ही  किसी  की  रुचि  है
क़ानून  के  पालन  में ....

जब  पालन 
सुनिश्चित  नहीं  किया  जा  सकता
तो  बनाते  क्यों  हैं
तरह-तरह  के  नियम-क़ानून ?!!

किसी  को  नहीं  पता
कि  कुल  कितने  आम  आदमी
खो  देते  हैं  अपनी  श्रवण-शक्ति
हर  चुनाव  में !

                                                      (2013)

                                               -सुरेश  स्वप्निल 

.

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

सारा देश श्मशान ...!

यदि  जनता  के  मन  को
भांप  पाना 
इतना  आसान  होता
तो  कोई  भी  सरकार  कभी
सत्ता  से  बाहर  न  होती !

यदि  जनता  नृशंस  हत्यारों  के  इरादों  से
परिचित  न  होती
तो  सारा  देश
श्मशान  बन  गया  होता

यदि  जनता  के  ऊपर  राज  करने  का  सपना
देखने  वाले
ज़रा-से  मनुष्य  भी  होते
तो  सर-आंखों  पर  न  बिठा  लेती  जनता ?!!!

                                                                     ( 2013 )

                                                              -सुरेश  स्वप्निल 

.

बुधवार, 20 नवंबर 2013

किसलिए, जहांपनाह ?

क्या  कोई  बता  सकता  है
कि  बंदूक़  से  निकली  गोली
किसकी  जान  लेगी
खेत  में  छुपा  हुआ  सांप
किसको  डसेगा
खूंटे  से  छूटा  हुआ  पागल  सांड़
किसको  रौंदेगा
रैबीज़  से  परेशान
आवारा  पागल  कुत्ता
किसको  काटेगा
किसके  हिस्से  में  आएगी
ज़मीन   में  दबी  हुई  सुरंग ???

मौत  उसी  जगह
उसी  दिन
उसी  समय  आएगी
जहां  तय  होगी

तय  न  हो  तो
ठोकर  भी  नहीं  लगती  पांव  में !

फिर  यह  सुरक्षा  किसलिए,  जहांपनाह ?
किसका  भय  है  शाहे-आलम
किसके  नाम  से  थर-थर  कांप  रहे  हो
तुम,  ता  ना  शा  ह !!!!

                                                              ( 2013 )

                                                      -सुरेश  स्वप्निल 

.

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

सात आकाश भी कम...

वह  नृशंस  हत्यारा
जब  भी  खाना  खाने 
बैठता  है
अपने  कारनामों  का  वीडिओ
चला  लेता  है

उसे  अपने  गुर्ग़ों  के
काटो-मारो  के  स्वर
वैदिक  ऋचाओं  जैसे  लगते  हैं
और  वह
अपने-आप  को
देवासुर  संग्राम  का  महानायक
समझने  लगता  है

भय  से  थर-थर  कांपते
अंग-भंग  किए  जाते
ज़िंदा  जलाए  जाते
मनुष्यों  के  आर्त्तनाद
उसकी  भूख  बढ़ा  देते  हैं
और  वह  अपनी  रक्त  की  प्यास  बुझाने
नए  तरीक़े  सोचने  लगता  है …

वह  दिग्विजय  करने  निकला  है
सारे  देश  में
नए  गुर्ग़े  और  नए  शिकार
तलाश  करने…

वह  जहां-जहां  जाता  है
आस-पास  के  सारे  रक्त-पिपासु
इकट्ठे  हो  जाते  हैं
प्रेरणा  लेने

मनुष्यता  के  लिए
सबसे  बड़ा  संकट  है
एक  निर्लज्ज  तानाशाह
सात  आकाश  भी  कम  हैं
उसकी  निर्लज्ज्ता  ढंकने  के  लिए !

                                                 ( 2013 )

                                           -सुरेश  स्वप्निल

.

सोमवार, 18 नवंबर 2013

तुम्हारे हाथ के पत्थर ...!

चलो  बस  भी  करो
बातें  बहुत-सी  हो  चुकीं
आ  जाओ  अब
मैदान  में  ....

देखो
तुम्हारे  शत्रुओं  के  पास
क्या-क्या  है
नए  हथियार  हैं
तकनीक  है
रणनीतियां  हैं
सब  तरफ़  से  घेरने  को
ड्रोन  हैं
बम  हैं
रसायन  हैं
तुम्हें  अंधा  बनाने  को
तुम्हारे  घर  जलाने  को
तुम्हारे  हाथ-पांव  तोड़  कर
लाचार  करने  को
भयानक  सर्दियों  में
बर्फ़-सा  पानी
तुम्हारी  चेतना  का  सर  झुकाने  को ....

तुम्हारे  पास  भी  तो  है
बहुत-कुछ
स्वप्न  हैं  आकांक्षाएं  हैं
जलन  है  क्रोध  है
बेचैनियां  हैं  भावनाएं  हैं
सड़क  पर  ढेर  से  पत्थर  पड़े  हैं
हाथ  ख़ाली  हैं …

तुम्हारे  हाथ  के  पत्थर  बहुत  हैं
शत्रु-सेना  का
मनोबल  तोड़ने  को …!

                                                   ( 2013 )

                                             -सुरेश  स्वप्निल

.

शनिवार, 16 नवंबर 2013

मरना ही चाहो !

बहुत  शौक़  है  न  तुम्हें
सच  बोलने
जानने  और  समझने  का
तो  तय  कर  लो
कि  कब  और  कैसे  मारे  जाना
पसंद  करोगे....

जीने  कौन  देगा  तुम्हें
न  सरकार,  न  पूंजीपति
न  ग़ुंडे-बदमाश

अदालत  भी  क्या  करेगी
दो  सिपाही  तैनात  करवा  देगी
सुरक्षा  के  नाम  पर
जो  मौक़ा  मिलते  ही  बिक  जाएंगे
तुम्हारे  दुश्मनों  के  हाथों !

पढ़े-लिखे  हो
बेहतर  है  नौकरी  कर  लो
किसी  पूंजीपति  के  यहां
कहो  तो  चपरासी  बनवा  दें
नगर-पालिका  में

कहां  पड़े  हो
सच-झूठ  के  चक्कर  में
भविष्य  देखो  अपना
और  अपनी  संतानों  का  !

अब  अगर  मरना  ही  चाहो
तो  तुम्हारी  मर्ज़ी !

                                        ( 2013 )

                                 -सुरेश  स्वप्निल 

.

कठपुतलियों के इरादे !

ये  कठपुतलियां  कौन  हैं
जिनकी  न  डोर  दिखाई  देती  है
न  डोर  थामने  वाली  उंगलियां
मगर
जिनकी  एक-एक  गति  पर
उथल-पुथल  हो  उठता  है
पूरा  देश  ?!

बहुत  भयंकर  हैं
इन  कठपुतलियों  के  इरादे
और  उनसे  भी  भयानक  हैं
इन्हें  नचाने  वाली  उंगलियों  की  गतियां
वे  हिलती  हैं  तो  कहीं  न  कहीं
गिरने  लगती  हैं
लाशें !
लोग  जैसे  भूल  ही  जाते  हैं
कि  वे 
जीते-जागते,  बुद्धिमान  मनुष्य  हैं
कठपुतलियां  नहीं  हैं  महज़....

वे  अपना  नाम-पता,
धर्म-संस्कृति,  इतिहास  और  वर्त्तमान
सब  कुछ  भूल  जाते  हैं
और  तब्दील  होते  चले  जाते  हैं
मानव-बमों  में !




नहीं,  सिर्फ़  सपने  देखने

और  सपने  में  डर  जाने  से  नहीं  चलेगा
अब  तलाशने  ही  होंगे 
इन  कठपुतलियों  को  नचाने  वाले  धागे
और  वे  बदनीयत  हाथ
तोड़  देनी  होंगी  वे  उंगलियां
जिनके  वीभत्स  संकेतों  पर
नष्ट  होती  जा  रही  है
संसार  के  श्रेष्ठतम्  युवाओं  की
पूरी  की  पूरी  पीढ़ी  !

सिर्फ़  सच्चे  देशभक्त  ही
बचा  सकते  हैं  अब  इस  देश  को !

                                                     ( 2013 )

                                               -सुरेश  स्वप्निल 

.

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

सेठ की जूठन चाटे बिना ...!

सब  खाते  हैं
सेठ  का  दिया  हुआ

ज़ार  भी
ज़ार  के  दुश्मन
और  उनके  भी  दुश्मन....

लगता  ऐसा  है
कि  सेठ  की  जूठन  चाटे  बिना
भूखे  न  मर  जाएं
देश  के  सियासतदां !

बहुत  थोड़े  ही  हैं
हालांकि
सेठ  का  दिया  खाने  वाले
कोई  1000-1200
या  शायद  12000  या  120000 …
मगर  इतने  ही  भिखारियों  के  दम  पर
सेठ  1200000000   मेहनतकश  इंसानों  के  गले
छुरी  फेरता  रहता  है
साल  दर  साल  !

मगर  इस  बार
मेहनतकश  भी  तैयार  हैं
सेठ 
और  उसके  दलाल
भिखारियों  के  अरमानों  पर
पानी  फेरने  के  लिए !

जो  भी  हो
इस  बार  चूक  जाने  वाला
हारेगा  तो  जीवन-भर  के  लिए

और  जनता  बिल्कुल  तैयार  नहीं  है
इस  बार
सेठ  और  उसके  दलालों  को
बख्शने   के  लिए !

                                                         (  2013 )

                                                    -सुरेश  स्वप्निल

.

सोमवार, 11 नवंबर 2013

अपनी सेनाएं ले आओ !

शत्रुओं  के  रक्त  की  प्यास
क्या  इतनी  अमानवीय  होती  है
कि  पीढ़ी-दर-पीढ़ी
खोखला  करती  चली  जाए
मनुष्य  के  गुण-सूत्रों  को
और  फिर  भी
अतृप्त  ही  रह  जाए  ???

मुझे  विश्वास  है
कि  मेरी  ही  भांति
आपमें  से  अधिकांश
जूझ  रहे  होंगे  इसी  प्रश्न  से....

यहीं  कहीं  है  वह
पवित्र  बोधि-वृक्ष
जिसकी  छाँह  में  बैठ  कर
सिद्धार्थ  गौतम  बन  जाते  हैं
गौतम  बुद्ध
यहीं  कहीं  है
वह  लिच्छवियों  की  राजधानी
जिसका  भावी  शासक
सर्वस्व  त्याग  कर
हो  जाता  है  दिगंबर
यहीं  है  वह  कलिंग  का  युद्ध-क्षेत्र
जहां  शत्रुओं  के  शव  देख  कर
सम्राट  अपना  राज-पाट  छोड़  कर
धर्म  का  शरणागत  हो  जाता  है…

अरे  हां,
पवित्र  साबरमती  तो
तुम्हारे  घर  के  आसपास  ही
बहती  है  न  कहीं ???

यदि  इतने  उदाहरण  सामने  होते  हुए  भी
अतृप्त  है
तुम्हारी  मानव-रक्त  की  तृष्णा
तो  मैं  तैयार  नहीं  हूं
यह  मानने  को
कि  तुम  और  मैं
एक  ही  देश
एक  ही  धर्म 
एक  ही  प्रजाति  के  जीव  हैं  !

तुम  अपनी  सेनाएं  ले  आओ
मैं  तुम्हें  अस्वीकार  करता  हूं
अपने  प्रतिनिधि  के  रूप  में  !!!

                                                      ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल 

. 

शनिवार, 9 नवंबर 2013

किस क़दर झूठ...!


एक  चम्मच  से  दूध  पीने  वाला
दूसरे  को  शौक़  है  नस्ल  के  आधार  पर
जनसाधारण  के  नरसंहार  का....

सोच  कर  बताइए  अच्छी  तरह  से
कि  ऐसे  ही  शासनाध्यक्ष  चाहिए  क्या
आपको ???

पहले  को  यह  भी  नहीं  पता
कि  कहां  होता  है
बेर  का  मुंह
दूसरा  दावे  के  साथ  कहता  है
कि  आलू, टमाटर  सारे  देश  में  जाते  हैं
उसके  राज्य  से  !

पहला  शान  से  बताता  है
कि  उसकी  सरकार  ने
सबको  अधिकार  दे  दिया  है
भरपेट  भोजन  का !
दूसरा  उससे  भी  चार  क़दम  आगे
अपने  दल  की  सरकारों  के
गुणगान  में

आप  सब  जानते  हैं
कि  किस  क़दर  झूठ  बोलते  हैं  दोनों

प्याज़  क्या  भाव  मिल  रही  है
आजकल
आपके  शहर  में  ?
आपको  याद  है  कि  अमूल  के  दूध  का  भाव
क्या  था
आज  से  दस  साल  पहले ????

                                                                ( 2013 )

                                                          -सुरेश  स्वप्निल 

.

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

डोर खींचने वाले ...!

वहां  बैठे  हैं
डोर  खींचने  वाले
वॉशिंग्टन
नागपुर
और  मुम्बई  में....

सब  जानते  हैं
कि  अपनी  मर्ज़ी  से
हिल  भी  नहीं  सकतीं
कठपुतलियां…!

डोर  खींचने  वाले
तय  करते  हैं
कठपुतलियों  की  हर  गतिविधि
यह  भी
कि  कुल  कितनी  जानें  ली  जाएंगी
लोकतंत्र  के  महा-उत्सव  में
कैसे  नियंत्रण  में  रखी  जाएंगी
कठपुतली-सेनाएं
कितनी  ख़ुराक़  ज़रूरी  है
इन  मनुष्य-भक्षी  कठपुतलियों  के  लिए !

सवाल  यह  भी  है
कि  अपने  ख़ून-पसीने  से
देश  का  भाग्य  गढ़ने  वाले
क्या  सचमुच  इतने  बेचारे  हैं
कि  तोड़  न  सकें
कठपुतलियों 
और  उनकी  डोर  हाथ  में  रखने  वालों  के
देश-द्रोही  कुचक्र ???

                                                           ( 2013 )

                                                      -सुरेश  स्वप्निल

.

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

कोई हथियार रख लो !

घर  से   बाहर  निकलो
तो  जांचते  जाना
कि  कहीं  कैमरे  तो  नहीं  लगे
 आबादी  से  दूर  आते  ही
ध्यान  रखना
कि  पांव
ज़मीन  में  दबी  सुरंगों  पर
न  पड़   जाए

जहां  कहीं  भी  भीड़  जमा  देखो

चुपचाप  गुज़र  जाना

इस  दुर्द्धर्ष  समय  में
कोई  भरोसा  नहीं
कि  पुलिस
कहां  'एनकाउंटर'  कर  दे
यह  भी  भरोसा  नहीं
कि  पकड़  कर  जेल  में
न  डाल  दिए  जाओ  …

कोई  भी  ग़ुंडा-बदमाश
कहां  गोली  मार  दे
या  अगर  तुम  खाते-पीते  घर  के
नज़र  आते  हो
तो  अपहरण  न  कर  लिया  जाए
तुम्हारा  !

देखो,  समय  सचमुच  अच्छा नहीं  है
आम  आदमी  के  लिए  !
बेहतर  है,  अपने  साथ
कोई  हथियार  रख  लो
सुरक्षा  के  लिए  !

                                                                   ( 2013 )

                                                             -सुरेश  स्वप्निल

.

रविवार, 3 नवंबर 2013

कैसा यह परिवर्त्तन ?

शोर  उठा  है  इस  नगरी  में  फिर  दीवाली  आई  है
कुछ  दीवाने  चीख़  रहे  हैं  लो  ख़ुशहाली  छाई  है

समय  बांसुरी  मौन  पड़ी  है  देख  टूटती  हर  आशा
कौन  कुबेर  भला  समझेगा  आहत  स्वरलिपि  की  भाषा

विद्युत् -मणियों  की  मालाएं  चूम  रहीं  तारों  के  मुख
माटी  के  दीपक  रोते  हैं  देख-देख  कुटियों  के  दुःख

दरबारों  में  गीत  सुनाते  हैं  चारण  आंखें  मींचे
भूख  भूख  का  आर्त्तनाद  है  विरुदावलियों  के  पीछे

जलें  झोंपड़े  मज़दूरों  के  धरती  मां  के  भाग  जले
लोकतंत्र  यह  कैसा  जिसमें  मजबूरों  पर  आग  चले

बने  सारथी  जो  प्रकाश  के  काले  उनके  भाग  हुए
विश्वासों  के  उजले  मोती  पल  में  जल  कर  राख़  हुए

राजमहल  की  जगमग-जगमग  लूट  रही  सारा  गौरव
और  झोंपड़ी   गुमसुम-गुमसुम  झेल  रही  सारा  रौरव

यह  प्रकाश  का  न्याय  नहीं  है  अंधियारे  का  नर्त्तन  है
हाय ! रौशनी  भूल  गई  सब  कैसा  यह  परिवर्त्तन  है  !

नहीं  नहीं  मत  कहो  रौशनी  यह  पागल  अंधियारा  है
सूरज  के  बेटों  को  इसने  गला  घोंट  कर  मारा  है

सदियों  से  जारी  शोषण  का  बदला  तो  लेना  होगा
अब  बलिदान  ज़रूरी  है  आगे  आ  कर  देना   होगा !

                                                                         ( दीवाली, 1975 )

                                                                         -सुरेश  स्वप्निल

.