सोमवार, 20 मई 2013

मनुष्य होने के बारे में

देश  है
तो  नागरिक  भी  होंगे

नागरिक  होंगे

तो  सरकार  भी  होगी

सरकार  होगी
तो  सेना  भी  होगी
और  पुलिस  भी

सवाल  यह  है  कि
नागरिक,  सरकार, सेना
और  पुलिस  के  अंतर्संबंध
कौन  परिभाषित  करता  है ?

यदि  ये  सम्बंध  पूँजी  निर्धारित  करती  है
तो  समझ  लें,  जनता  की  ख़ैर  नहीं
यदि  पूँजी  विदेशी  भी  है
तो  जनता  के  साथ-साथ
प्राकृतिक  संसाधनों  की  भी  ख़ैर  नहीं

और  यदि  किसी  देश  में  लोकतंत्र  है
और  नागरिक,  सरकार,  सेना  और  पुलिस  के
अंतर्संबंध  पूँजी  निर्धारित  करती  है
और  वह  पूँजी  अमेरिकी  है

तो  समझ  लें,
उस  देश  की  ही  ख़ैर  नहीं
और  साथ-साथ
पास-पड़ोस  के  देशों  की  भी  ख़ैर नहीं !

अमेरिकी  पूँजी  के  आक़ाओं  के  इशारों  पर
आपकी-अपनी  सरकार
आपकी-अपनी  सरकार  की  सेनाएं
और  पुलिस
कब  आप  पर  गोलियां  चलवा  दे
कुछ  नहीं  कहा   जा  सकता ,,,,

यदि  आप  एक  लोकतांत्रिक  देश  के  नागरिक  हैं
जिसकी  सरकार  अमेरिकी  आक़ाओं  के  इशारों  पर 
काम  करती  है
और  अपने  ही  नागरिकों  पर  दमन-चक्र  चलाती  है
आप  दमन  के  शिकार  होते  रहते  हैं
निरंतर
और  कभी  विरोध  में  उठ  कर
खड़े  नहीं  होते
तो  क्षमा  करें  श्रीमान

अपने  मनुष्य  होने  के  बारे  में
फिर  सोचें  एक  बार…. !

                                                                      ( 2013 )

                                                              -सुरेश  स्वप्निल

                                                                          

रविवार, 19 मई 2013

मौसम क्या इसीलिए आते-जाते हैं ?

सिर्फ  किसानों, मजदूरों
और  ग़रीबों  के  बस  की  है
यह  प्रचण्ड  धूप  !
यह  तन  झुलसाती  लू
और  गर्म  हवाएं ...!
क्योंकि  वे  जानते  हैं
धूप  का  तीखापन  संकेत  है
भरपूर  बारिश  का ....

बारिश  का  पर्याप्त  होना  जगा  देता  है
किसान, मज़दूर और  ग़रीब   के  मन  में  नई  आशाएं
अच्छे  समय  की
और  भर  देती  है  धरती  के  कण-कण  में  नया  उछाह
हालांकि  कभी  बाढ़  बहा  ले  जाती  है
सारे  स्वप्न ...और  डरा  देती  है
हर  किसान  और  मज़दूर  और  ग़रीब  को

हर  किसान
हर  मज़दूर
हर  ग़रीब  सहन  कर  ले  जाता  है
धूप , लू  और  गर्मी  के  तीखेपन  को
न  करे
तो  खाएंगे  क्या  बेचारे !

हर  अफ़सर
हर  शासक
डरता  है  मौसम  की  मार  से
और  ख़ुश  भी  होता  है
मौसम  के  बदलते  मिज़ाज  के  साथ
बढ़ती  महंगाई  की  संभावनाओं  के  साथ

मौसम  और  जीवनोपयोगी  वस्तुओं के  भावों  का 
हर  परिवर्त्तन
बढ़ा  देता  है  आर्थिक  असमानता
अमीर  और  ग़रीब  के  बीच !

मौसम  क्या  इसीलिए  आते-जाते  हैं
साल  दर  साल ?

                                                                     ( 2013 )

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

                                                               

शुक्रवार, 17 मई 2013

सुबह मेरी मुट्ठी में !

आम  का  एक  धीर-गंभीर  पेड़/ उसके  नीचे/ बेतरतीब-से
बिखरे  हुए/ सूर्यमुखी  के  अनगिनत  पौधे
और  एक  खिले  हुए  सूर्यमुखी  के / चेहरे  को  छूता /
अपने  कंधे  पर / बकरे  के  बच्चे  को / लादे  हुए /
माली  का  लड़का !

यह  दृश्य  है  मेरे  घर  के  सामने  वाले / बंगले  की  एक  ख़ुशनुमां  सुबह  का !

मैंने  चाहा, सुबह  को  अपनी  मुट्ठी  में / क़ैद  कर  लूं !/ यह  नहीं  हो  सका ....
तब  मैंने / अपना  कैमरा  टटोला / उसमें / फ़िल्म  नहीं  थी !
मैंने  फिर  सोचा,  मुझे  क्या  करना  चाहिए ?...

सामने  की  सड़क  पर / अपनी  यूनिफ़ॉर्म  शरीर  पर  लादे / कुछ  बच्चे /
बस्ते  उठाए / स्कूल  जाने  को / खड़े  थे  तैयार ....
मैंने  देखा- उनकी  तरफ़, माली  के  लड़के  की  तरफ़ /
पूछना  चाहा  उससे- " तुम / स्कूल  नहीं  जाते  क्या ?"
फिर,  अपने  इस  अनपूछे  प्रश्न  की  निरर्थकता  पर /
मैं  स्वयं  लज्जित  हो  गया / सोचता  रहा  कुछ  क्षण / कि  मुझे /
क्या  करना  चाहिए ?

" मैं /  माली के  इस  लड़के  को  स्कूल  भेज  कर  ही  रहूंगा"-मैंने  संकल्प  लिया !

लड़का / मेरी  ही  ओर  देख  रहा  था / मुस्कुराता  हुआ !
मैंने / उसे / अपने  पास  बुला  लिया ...
अब / मुझे  लग  रहा  था / सुबह  मेरी  मुट्ठी  में  है !

                                                                                                                   ( 1978 )

                                                                                                             -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन : 'इंदौर बैंक परिवार', 1978, 'अंतर्यात्रा'-13, 1983।

गुरुवार, 16 मई 2013

हमारे हाथ की चोट

न,  हाथ  मत  उठाना  मालिक !
यह  अधिकार  नहीं  बेचा  है  हमने
और  बेचेंगे  भी  नहीं

यह  चेतावनी  है,  मालिक
एक  दम  खुली  हुई
अगली  बार  किसी  मज़दूर  की  तरफ़
आंख  भी  मत  उठाना
न  ही  काम  से  बाहर  करने  की  धमकी  देना
तनख़्वाह  काटने  की  हिम्मत  तो  करना  ही  मत

मालिक,  यही  बहुत  है  तुम्हारे  लिए
कि  हम
सवाल  नहीं  उठाते  तुम्हारे  आसमान  से  भी  ऊंचे  मुनाफ़े  पर
नहीं  देखते  तुम्हारे  बही-खाते
नहीं  ईर्ष्या  करते  स्वर्ग नुमा  साम्राज्य  पर

लेकिन  इसका  मतलब  यह  न  लिया  जाए
कि  हम  हमेशा  तुम्हारे  'वफ़ादार'  ही  रहेंगे
कि  हम  अपने  आत्म-सम्मान  को  भी  बेच  देंगे
चंद  रुपयों  की  ख़ातिर !

ख़रीदना-बेचना  तुम्हारा  शौक़  है
तुम  पुलिस  ख़रीद  सकते  हो
सरकारी  अफ़सर  और  बे-ईमान  नेता
यहां  तक  कि  पूरी  की  पूरी  सरकारें  भी

मगर  मज़दूर  का  ईमान  है,  मालिक
किसी  और  ही  मिट्टी  का  बना  हुआ

हम  तुम्हारे  अंगरक्षकों  से  नहीं  डरते
हम  तुम्हारी  ज़र-ख़रीद  पुलिस, सरकारी  अफ़सर, बे-ईमान  नेता
और  बिकाऊ  सरकारों  से  भी  नहीं  डरते
क्योंकि  हम  जानते  हैं  कि  हमारे  बिना
चार  दिन  भी  नहीं  टिक  पाएगा  तुम्हारा  साम्राज्य !

समय  बदल  चुका  है,  मालिक
हमें  चुनौती  मत  देना
हमारा  हाथ  जब  तक  श्रम  तक  उठे   तभी  तक  ठीक  है
बदला  लेने  के  लिए  उठा  तो  सह  नहीं  पाओगे  तुम !

हमारे  हाथ  की  चोट  कितनी  भारी  है
यह  अपने  आस-पास  पड़े  पत्थरों  से  पूछो !

                                                                                        ( 2013 )

                                                                                   -सुरेश  स्वप्निल 

*सद्यः रचित/ मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित। पूर्वानुमति पर प्रकाशनार्थ उपलब्ध।

बुधवार, 15 मई 2013

हम/ चल रहे हैं ...

हम/ चल  रहे  हैं
चलते  जा  रहे  हैं
बावजूद  इसके/ कि
हमारे  शरीर  थक  गए  हैं
और  मन/  हार  गए  हैं !

घिसटना/ लंगड़ा  कर  चलना
या/  चलने  की  सिर्फ़-कोशिश  भर  कर  पाना
क्या  सचमुच/  कोई  अर्थ  रखता  है ?
शायद  हां .../  या  शायद  नहीं ...
यह  सोचना/  या  सोचने  की  इच्छा  तक/  किए  बिना
हम  चल  रहे  हैं/  चलते  जा  रहे  हैं/  बावजूद  इसके/  कि
हमारे  शरीर  थक  गए  हैं/  और  मन/  हार  गए  हैं !

शायद/  पाण्डवों  का  महाप्रस्थान  भी/  कुछ  ऐसा  ही  रहा  होगा !
भीम,  अर्जुन,  नकुल,  सहदेव/  और  अबला  द्रौपदी
सबके-सब/  मार्ग-पतित
और  वह  एक मात्र  स्वर्गारोही - युधिष्ठिर !
और  उसका  सहयात्री  वह  श्वान !

अपने  आपको/  युधिष्ठिर  ( या  कहो  कि  उसका  श्वान  ही )
सिद्ध  करने  के  प्रयास  में
ख़ून-रिसते  तलुए/  और  कांटे-चुभे  पांव  लिए
हम  चल  रहे  हैं/  चलते  जा  रहे  हैं/  बावजूद  इसके/  कि /
हमारे  शरीर  थक  गए  हैं/  और  मन ....हार  गए  हैं  !

                                                                               ( 1976 )

                                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'देशबंधु', भोपाल, 1976 एवं  'अंतर्यात्रा', 1983। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

मंगलवार, 14 मई 2013

श्रद्धांजलि: डॉ . असग़र अली इंजीनियर

श्रद्धांजलि: डॉ . असग़र  अली  इंजीनियर

नहीं रहे बोहरा समाज के सामाजिक अभियंता असगर अली इंजीनियर

नहीं रहे बोहरा समाज के सामाजिक अभियंता असगर अली इंजीनियर

प्रख्यात विचारक असगर अली इंजीनियर का निधन


सुधारवादी बोहरा समुदाय के नेता, समाजकर्मी और चिंतक डॉ. असगर अली इंजीनियर का आज मुंबई में सुबह 8 बजे इंतकाल हो गया. 10 मार्च 1939 को जन्मे असगर अली इंजीनियर उदयपुर (राजस्थान) के सलुंबर तहसील के रहने वाले थे और उनका परिवार दाउदी बोहरा संप्रदाय का अनुयायी था. सत्तर के दशक में दाउदी बोहरा की कट्टरता और दकियानुसी परंपराओं के खिलाफ जो सुधारवादी आंदोलन शुरू हुआ इंजीनियर उसके एक प्रमुख स्तंभ थे. इस वैचारिक और खूनी संघर्ष के बाद ही बोहरा संप्रदाय दो भागों में विभाजित हुआ. सुधारवादी गुट ने खुद को प्रगतिशील बोहरा समुदाय कहा.

इस संघर्ष और विभाजन के बाद ही उदयपुर और मुंबई में बोहरा समुदाय, जहां कि उनकी सबसे ज्यादा आबादी है, ने खुल कर सांस ली, स्कूल-कॉलेज व अस्पताल खुले, लड़कियां स्कूल गई और कई सुधारवादी कार्यक्रम शुरू हुए.

असगर अली इंजीनियर भारत के उन प्रमुख लोगों में से थे जो देश में धार्मिक कट्टरता के खिलाफ थे और एक धर्मनिरपेक्ष देश का सपना रखते थे.

मुंबई। प्रख्यात मुस्लिम विद्वान, प्रतिशील चिंतक, लेखक और दाऊदी बोहरा समुदाय के सुधारवादी नेता, असगर अली इंजीनियर का लंबी बीमारी के बाद मंगलवार को निधन हो गया। वह 74 साल के थे। असगर की पत्नी का पहले ही निधन हो गया था। वह अपने पीछे पुत्र इरफान और बेटी सीमा इंदौरवाला को छोड़ गए हैं। असगर लंबे समय से बीमार चल रहे थे और मंगलवार सुबह आठ बजे के करीब मुंबई के सांताक्रूज पूर्व स्थित आवास पर उन्होंने आखिरी सांस ली। इरफान ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार बुधवार को हो सकता है।
राजस्थान के सलंबर में एक दाऊदी बोहरा आमिल परिवार में 10 मार्च 1939 को जन्मे असगर ने कम उम्र में ही कुरान की तफसीर, ताविल, फिक और हदीथ की शिक्षा पूरी कर ली थी। उन्होंने अपने पिता शेख कुरबान हुसैन आमिल थे। असगर ने अपने पिता से अरबी सीखी। बाद में उन्होंने प्रमुख विद्वानों की सभी प्रमुख धार्मिक रचनाओं और शास्त्रों का अध्ययन किया।
मध्य प्रदेश के इंदौर से सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा ग्रहण करने के बाद असगर ने लगभग 20 सालों तक बृहन्मुम्बई नगर निगम (बीएमसी) में अपनी सेवाएं दी। 1970 के दशक में बीएमसी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद वह दाऊद बोहरा समुदाय के सुधारवादी आंदोलन से जुड़ गए। उन्होंने आगे चलकर इंस्टीट्यूट ऑफ इस्लामिक स्टडीज (1980) और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म (1993) की स्थापना की। उन्होंने विभिन्न विषयों पर लगभग 50 पुस्तकें लिखी। वह सभी धर्मो को बराबर का सम्मान देने में विश्वास रखते थे।
सुधारवादियों के अनुसार, असगर कभी भी पहले से चली आ रही परंपरा और संस्कृति का अंधानुकरण करने में विश्वास नहीं रखते थे, बल्कि विभिन्न मुद्दों पर फिर से विचार करने और वर्तमान समय की जरूरतों के अनुसार इस्लाम की व्याख्या करने की कोशिश करते थे।
( पलाश बिस्वास, in ambedkaraction.com )

सोमवार, 13 मई 2013

तो मत कहिएगा,,,

संसार  में
सबसे  कम  गति  से
बढ़ता  है  श्रम  का  मूल्य
वह  भी 
न  जाने  कितनी  क़ुर्बानियां  दे  कर !

आख़िर  कौन  है
जो  तय  कर  रहा  है
लागत-लाभ-पारिश्रमिक  के  समीकरण ?

कल  यदि  विद्रोह  पर  उतर  आएं  मज़दूर
तो  मत  कहिएगा  कि  सूचना  नहीं  थी

क्या  कभी  अनाज  का  मूल्य
पूर्व-सूचना  दे  कर  बढ़ाता  है  व्यापारी ?
क्या  कभी  कोई  सरकार सोचती है
कि  पारिश्रमिक  की  हर  वृद्धि  से  पहले  ही
कितनी  और  कैसे  बढ़  जाती  है  मंहगाई ?

एक  सीमा  तो  हो
जहां  समंजित  हो  सकें  स्वप्न,
शिक्षा, स्वास्थ्य  और  भविष्य  की  योजनाएं
जहां  बनी  रहें  तलवारें  म्यान  में ....

परिस्थितियां  बनाने  वाले
सोच  कर  देख  लें
पूंजी  और  श्रम  के  अवश्यंभावी  युद्ध  के  परिणाम

इसके  आगे  कुछ  नहीं  कहना  है  हमें।

                                                                       ( 2013 )

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

*सद्यः  रचित/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। पूर्व-सूचना पर प्रकाशनार्थ उपलब्ध।

रविवार, 12 मई 2013

विश्व मातृ-दिवस पर, अम्मां के लिए

मेरे  आस-पास  ही  रहना,  अम्मां  !

जैसे-जैसे बुढ़ा  रहा  हूं ,
तुम्हारी  ज़रूरत  भी बुढ़ा रही  है, अम्मां !

बेहद  कमज़ोर, असहाय  और  बीमार  हो  गया  हूं 
तुम्हारे  बिना 
बहुत  भुलक्कड़  भी 
अब  तो  यह  भी  याद  नहीं  रहता 
कि  तुम  तो  हो  ही  नहीं  संसार  में !

हर  छोटी-बड़ी  बात  पर  याद  आ  जाती  हो  तुम 
सशरीर, जैसे  एकदम  सामने  हो 
अभी  हाल  खींच  लोगी  अपने  पास 
सर  पर  हाथ  फेरोगी 
और  मिट  जाएंगी  मेरी  सारी  तकलीफ़ें 
सारी  ज़रूरतें 
अपने-आप !

ऐसा  जादू  सिर्फ़  तुम  ही  कर  सकती  हो 
अम्मां !
सिर्फ़  तुम  ही  हो  जो  आज  भी  समझ  लेती  हो 
कि  कहां  दर्द  है  मुझे 
और  क्या  दवा  काम  करेगी ?
वह  भी  तब 
जब  तुम  हो  ही  नहीं  संसार  में !

अम्मां,  मुझे  छोड़  कर  मत  जाना  कभी 
भले  ही  स्मृतियों  में  रहो ...

मेरे  आस-पास  ही  रहना,  अम्मां !
तब  भी, जब  मैं  आ  रहा  होऊं  
तुम्हारे पास  !

                                                               ( 2013 )

                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

*सद्यः रचित/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु मात्र  सूचना पर उपलब्ध।

शनिवार, 11 मई 2013

अपने ही लोग ...

आज  फिर  जेब  कट  गई
बस  में  चढ़ते
या  शायद
उतरते  समय

कुछ  कहा  नहीं  जा  सकता
कि  कौन  हो  सकता  है
मुझ  से  भी  ज़्यादा
ज़रूरतमंद !

समय  भी  तो  ऐसा  हो  गया  है
कि  ज़िंदा  रहने  के  सारे  विकल्प
ख़त्म  होते  जा  रहे  हैं
एक-एक  कर

क़तई  अस्वाभाविक  नहीं  है
मेरा
या  मेरी  तरह  किसी  का  भी
यूं  लुट-पिट  जाना
इस  शहर  में
तो  मैं  ही  क्यूं  इतना  चिंतित  हो  रहूं
कि  शाम  का  खाना
या  रात  की  नींद  छोड़  दूं  ?

हां,  अभी  भी  कुछ  दोस्त  हैं
शहर  में
जिनके  यहां  खाना  खाया  जा  सकता  है
बिना  किसी  संकोच  के…

पैसा  फिर  कमाया  जा  सकता  है
उतना,  जितना  निकल  गया  है  जेब  से
शायद  उतना  भी,  जितने  में
सारी  ज़रूरतें  पूरी  हो  सकें ...!

नहीं,  मैं  तैयार  नहीं  हूं
इतनी  सी  बात  पर  शहर  छोड़  देने  को

आख़िर  अपना  शहर  है
अपने  ही  लोग
बिना  मजबूर  हुए
कोई चोरी   करता  है  भला ?

कम  से  कम  मनुष्य  तो  नहीं !

                                               ( 2013 )

                                        -सुरेश  स्वप्निल 

* सद्य: रचित/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु  उपलब्ध।

शुक्रवार, 10 मई 2013

मित्रों की थाती से: छह

घर  से  दूर

कौन  जानता  है  मुझे 
पर  फिर  भी 
जाऊंगा  जब  इस  शहर  से 
कुछ  हैं 
जो  मुझे  याद  करेंगे 
एक  आम  का  पेड़ 
उस  पर  रहने  वाली  तीन  चिड़ियाँ 
और  उनके  दो  छोटे  बच्चे 

घर  में 
घर  की  शक्ल  का  आकाश 
छत  के  दरवाज़े  से  
टकराने  वाली  हवा 
बार-बार  खटकाएगी  कुण्डी 
इक  खिड़की 
जो  बेवजह  खुलती  है 
सामने  की  छत  पर,  वो 
कुछ  तारे 
जिनकी  शक्लें  भले  ही  हों  एक-सी 
पर  मैं  उन्हें  नाम  से  जानता  हूँ 

दरवाज़े  के  पास  की  ज़मीन 
बजा कर  घण्टी 
रस्ता  देखेगी 
पर  छत,  मेरे  बिना 
नीचे  कहाँ  आ  पाएगी 

मेरे  घर  से  दूर  
रहने  पर 
इन  सबको  रंज  होगा 
याद  करेंगे  मुझे   
ये  सब  मिल  कर 
मुश्किल  तो  मुझे  होगी 
जब  करनी  पड़ेगी 
मुझे  याद  इन  सबकी 
अकेले  ही !

                                                  -सुशील  शुक्ल 

* यह कविता 2009 में प्रकाशित 'Original Edition' से, सा-स्नेह, साभार।

गुरुवार, 9 मई 2013

मित्रों की थाती से: पांच

गिद्ध जानते हैं

मुर्गे की बाँग से
निकलता हुआ सूरज
चूल्हे की आग से गुजरते हुए
बन्द हो जाता है
एल्यूमिनियम के टिफिन में
बाँटकर भरपूर प्रकाश
जीने के लिये ज़रूरी उष्मा
तकिये के पास रखकर
जिजीविषा के फूल
छोड़ जाता है
कल फिर आने का स्वप्न
यह शाश्वत सूरज
उस सूरज से भिन्न है
जो ऊगता है कभी-कभार
झोपडपट्टी को
महलों में तब्दील करने की
खोखली गर्माहट लिये हुए
भर लेता है वह
अपने पेट में
मुर्गे की बाँग क्या
समूचा मुर्गा ही
और चूल्हे की आग
रोटी का स्वप्न
नींद का चैन तक
वह छोड़ जाता है अपने पीछे
उसे आकाश की ऊँचाई तक पहुँचाने वाले गिद्धों को
जो जानते हैं
सूरज के संरक्षण में
जिस्मों से ही नहीं
कंकालों से भी
माँस नोचा जा सकता है ।

                        शरद कोकास 
 
*यह  कविता  शरद  के  1993 में प्रकाशित काव्य-संग्रह 'गुनगुनी धूप में बैठ कर' से, सप्रेम, साभार।
 
 


बुधवार, 8 मई 2013

मित्रों की थाती से: चार


आखेटकों  के  विरुद्ध

सागवानी  
सन्नाटे  को  तोड़  कर 
गूंजती  हैं  जब  बंदूकें 
गिर  पड़ता  है  हहराकर 
कोई  बेक़सूर  वनचर,

आखेटक  तब 
करते  हैं  अट्टहास 
बंदूकों  की  नलियों  से 
निकलते  धुएँ  को 
फूँक  मार  कर 
इत्मीनान  से।

ख़ुश  होते  हैं 
जीने  का  हक़  छीन  कर।

परंतु ...
देख  रहा  हूँ  मैं 
अब  जंगल  में 
माहौल  को  बदलते,
वनचरों  को 
अपने  सींग  पैने  करते ...

हाँ,  देख  रहा  हूँ  मैं 
उन्हें  एकजुट  होते 
आखेटकों  के  विरुद्ध !

                               -लक्ष्मी  नारायण  पयोधि 

*यह  कविता  श्री  पयोधि  के  'सोमारू' शीर्षक  से,  1997 में  राष्ट्रीय  प्रकाशन  मंदिर, भोपाल  द्वारा  प्रकाशित
कविता-संग्रह  से,  सादर, साभार।
 

मंगलवार, 7 मई 2013

मित्रों की थाती से: तीन

It  happened  slowly
this  conversion
angelic face  to  harlot  looks
the  lines  that  ravage  my  face
were  not  there  when  I  entered  the  temple

I  was  as  young  as  you
nimble  and  of  supple  linbs
gathering  flowers  of  trees
that  hung  their  branches  low

Today  as  you  go  in
eyes  averted
shrinking  to  circumvent  even  an  accidental  touch
of  me,  sitting  on  the  temple  steps
selling  garlands
for  men  to  drape  over  their  lord
I  speak  out  to  the  wind
" You  too  shall  become  a  whore  like  me
One,  will  play  with  you,  the  other  will  turn  you  to  stone.
Then,  The  Lord  will  release  you  with  his  touch.
And  you  will  be  condemned  to  redemption."

Its  not  a  curse  that  I  cast,
stung  though  I  am  by  your  revulsion
but  a  prophecy  that  I  state.
An  old  woman
sitting  on  the  temple  steps,  selling  garlands
for  men  to  drape  over  their  lord.

                                                                                     -Rinchin

*excerpts from the 'Original Edition', a joint collection of poems by different poets of Hindi, English, Urdu and Marathi languages; published by the 'Invisiblink', a non-profit motive publication, 2009.


शुक्रवार, 3 मई 2013

मित्रों की थाती से: दो

आकाश गंगा 

आकाश  गंगा 
दिव्य  श्मशान 
तुम्हारे  तट  पर/ आलोकित  अरण्य  से 
आता  होगा / पुरखों  का  पगपथ 
अंतिम  लोक  परमधाम  तक 

नक्षत्रों 
मुहूर्त्त  तुम्हारी  किरणें 
शकुन  तुम्हारा  वरदान 
नीचे  धरती  पर 
ऋतुएं  फिरती  हैं / उनके  आश्रय  में 
उग  आती  हैं 
खपरैलें  घास-फूस  के  छप्पर 
जिस  पर  पुरखों  का  श्राद्ध  पाने 
आते  हैं  काग 
आस्था-विश्वास  के  रिश्ते  बुनता 
लोक  संसार  परिवार 

ऋतुओं  की  फेरी  के / हर  मोड़  पर 
खड़े  हैं  उत्सव  तीज-त्यौहार 
सजी  फसलें  बागान  और  खलिहान 
घर  का  बूढ़ा 
पुरखा  होने  की  दहलीज  पर 
घर  आते  जाते 
कल्पता  है 
खूँटे  से  बँधी 
'गऊ  दान'  की।

                                                       -हरीश  वाढेर 

*यह कविता श्री हरीश वाढेर के काव्य संग्रह 'बनी है पगडंडी अपने आप' से, सादर, साभार।

गुरुवार, 2 मई 2013

मित्रों की थाती से: एक

पिता  की  मूंछें 

पिता  की  मूंछें  थीं  रौबदार 
पूरे  चेहरे  में 
तलवार-सी  तनी 

मूंछें  थीं  
तो  रौबीले  थे  पिता 
गर्वीले  थे  पिता 

हम  पांच  भाई-बहन 
पिता  की  तरह 
पिता  की  मूंछों  को  भी 
परिवार  का  सदस्य  मानते 
और  सेवा  करते 

एकाध  भी  दिखता  सफ़ेद  बाल 
तो  ऐसे  जुटते  निकालने 
जैसे  कोई  धब्बा 
पिता  के  चेहरे  पर 

जीवन-भर  पिता   ने  मूंछें  नहीं  काटीं 
जैसे  जीवन-भर  पिता 
झूठ  नहीं  बोले 

स्टालिन  की  तरह  थीं  पिता  की  मूंछें 
चौड़ी 
रौबीली 
अनुशासन  प्रिय।

                                                           -नासिर  अहमद  सिकन्दर 

*नासिर  के  संग्रह 'इस वक़्त मेरा कहा' से, सप्रेम।

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

विश्व मज़दूर दिवस : हमारा तराना

बोल  मजूरा  हल्ला  बोल
बोल  जवाना  हल्ला  बोल
बोल  किसाना  हल्ला  बोल
हल्ला  बोल  कि  हिल  जाए  धरती
डोले  आकाश ...

सदियों  से  तेरी  मेहनत  का  फल
औरों   ने  खाया  है
नहीं-नहीं  अब  सोना  कैसा
सूरज  सिर  पर  आया  है

हुआ  सबेरा  आँखें  खोल
बाज़ू  की  ताक़त  को  तौल
ले  अपनी  मेहनत  का  मोल
तू  सब-कुछ  है  अपने  मन  में
पैदा  कर  विश्वास ...

बोल  मजूरा  हल्ला  बोल

जाग  कि  दुनियां  को  बतला  दे
क्या  है  तेरी  क़ीमत
अपने  मेहनतकश  हाथों  से
लिख  दे  जग  की  क़िस्मत

तुझसे  आँख  मिलाए  कौन
आंधी  से  टकराए  कौन
अपनी  मौत  बुलाए  कौन
कब  तक  तुझसे  हार  न  मानेंगे
क़ातिल  एहसास ....

बोल  मजूरा  हल्ला  बोल
बोल  जवाना  हल्ला  बोल
बोल  किसाना  हल्ला  बोल  !

                                               (1 मई,1976 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल 


*मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु सर्वसुलभ, केवल सूचना आवश्यक।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

नमस्कार, मित्र गण !
मैं कुछ अत्यंत निजी कारणों से आपसे कुछ समय हेतु विदा ले रहा हूं। जैसे ही स्थितियां अनुकूल होंगी, पुनः आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊंगा। तब तक के लिए, मेरी शुभकामनाएं आपके साथ रहेंगी ही। संध्या-समय मैं अपने फ़ेस बुक पृष्ठ पर उपस्थित रहने का प्रयास करूंगा।
आप सब सुखी-स्वस्थ-सानंद रहें।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

गौरैयाएं और लड़कियां !

दो  ही  जीव  हैं  संसार  में
जो  विलुप्ति  की  कगार  पर  हैं
पहली  गौरैया, दूसरी  लड़कियां !

एक  समय  था  जब  दोनों घर-आंगन,
खेत-खलिहान, गांव-शहर…
हर  जगह  चहचहाती  नज़र  आ  जाती  थीं
यहां  तक  कि  स्वप्नों  और  कविताओं  में  भी !

अब  गौरैयाएं  केवल  गहरे  वनों  में
और  कभी-कभार  खेतों  में  ही  दिखती  हैं
और  लड़कियां ?
सिर्फ़  तस्वीरों  और  पुरातत्व  की  किताबों  में !

आख़िर  कौन  निगल  गया
दुनिया  की  आबादी  को ?

                                                                ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

*नवीनतम,पूर्णतः मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

वह/ और शब्द/ और खटमल !

"मैं/ मैं हूं/ एक  साधारण  शरीर !
एक  जोड़ी  आंखें/ और  एक-एक  जोड़ी/ हाथों  और  पांवों  के  अलावा
सञ्चित  है  जिसमें/ पांच-साढ़े  पांच  किलोग्राम/ गाढ़ा-लाल  रक्त
अपने  ढाई-ढाई  फ़ीट  के  पैरों  पर/ दिन  भर/ लुढ़कता-पुढ़कता  मैं
अपने  सञ्चित  रक्त-कोष  की  रक्षा की/ कोशिश  को/ रखे  हुए हूं  बरक़रार !

शब्द/ शब्द  हैं/ किसी  भी  व्यक्तित्व  पर  चिपक  कर/ संज्ञा  बन  जाने  को  आतुर
चारों  ओर  भटकते  हुए/ ढूंढते  फिरते  अपना  शिकार !
पतले,  धारदार  शब्द/ मोटे,  भोथरे  शब्द/ गंदे,  लिजलिजे  शब्द ....
बच्चों-जैसे  मासूम/ फूल-जैसे  सुंदर/ और  बकरियों-जैसे/ निरीह  शब्द ...
और  'समय'  और  'भाग्य'-जैसे/ निहायत  सड़े-बुसे  शब्द 
जैसे  इनके  बिना/ चल  ही  नहीं  सकता/ आदमी  का  कार-बार !

और  हैं  खटमल !
फूले-फूले,  गुलगुले/ संतृप्त  खटमल/ और  सूखे-सुखाए/ बेजान-से/ भूखे-प्यासे  खटमल
बिस्तरों  में/ अलमारियों  में/ दीवारों  पर  उभर  आई  दरारों  में/ और  किताबों  के  पन्नों  में/
दुबके  हुए/ अपने  न  कुछ-से  शरीर  की/ भूख  मिटाने को/
करते  हुए  रात  का  इंतज़ार !

अनपेक्षित  शब्दों  की  भीड़  से  बच  कर/ अपनी  फ़ैक्टरी  तक  पहुंचने  के  लिए/ मैंने  ढूंढ  ली  है/
एक  संकरी-सी,  गुमनाम-सी  गली/ जिससे  या  तो  मैं  गुज़रता  हूं/
या  नगर-निगम  के  सफ़ाई-कर्मचारी !
शब्दों  को/ मूर्ख  बना  कर/ इस  गली  से/ इत्मीनान  से/ बच  निकलता  हूं  मैं/ हर  बार !"

..............................................

यह  बयान  जिस  आदमी  का  है/ वह  मारा  गया/ मेरे  सामने !
न  जाने  उन्हें  किसने  दी  थी  ख़बर/ और  वे/ गली  में  उसके  घुसते  ही/
चेंट  गए  थे  उसके  शरीर  से/ मोटे-मोटे  होंठों/ फूली  हुई  तोंदों/ और  दरांतियों-जैसे  दांतों  वाले/
खूंख्वार  शब्द/ और  उसके  छटपटाने  पर/ मुंह  खोल  कर  हंसने  वाले  शब्द ....
धीरे-धीरे/ घुसते  गए  थे  वे/ उसके  शरीर  में/ और  निचुड़  कर  आता  रहा  बाहर
गाढ़ा-गर्म  और  लाल-सुर्ख़  ख़ून !

शब्दों  के  उस  शरीर  से/ अलग  हो  चुकने  के  बाद/ मैंने  छुआ  उसे/ और  सहलाता  रहा/ कुछ  देर
उसने  शायद/ मुझे  अपना  दोस्त  समझा/ और  सौंप  दी  मुझे/ अपनी  डायरी/
जिसमें  लिखा  था  यह  सब/ और  यह  भी/ कि/ उसे/ अपने  खटमलों  से  है  प्यार !

वह/ मेरे  हाथों  में  मर  कर/  छोड़  गया  है  एक  प्रश्न/ कि  रात  के  आने  पर/ क्या  होगा/
उन  खटमलों  का  ? ? ? !

                                                                                                       ( 1978 )

                                                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: 'अंतर्यात्रा', 1983

रविवार, 21 अप्रैल 2013

हम सूर्यत्व हैं !

हां,  हम  जिएंगे
जीते  रहेंगे
रचते  रहेंगे  अमरत्व  की
अपार  संभावनाएं

हम  विचार  हैं
विदेह

हम  न  दिन  में  मरते  हैं,  न  रात  में
और  न  संधि-काल  में
न  अस्त्र  से,  न  शस्त्र  से
न  किसी  ब्रह्मास्त्र  से

हम  सूर्यत्व  हैं,  हुज़ूर !

हम  मज़दूर  हैं
स्वतंत्र,  स्वायत्त,  संप्रभु
सरफ़रोश  सिरजनहार
हमें  क्या  देर  लगती  है
नई  दुनिया  रचने  में  !

                                                        ( 2004 )

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

*पूर्णतः मौलिक/अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु सानुमति  उपलब्ध।

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

सबसे उपयुक्त समय

कितना  भी  सम्हल  कर  चले  आदमी
हाथ  से  फिसल  कर
गिरता  है  समय
और  चूर-चूर  हो  जाता  है !

कितनी  सारी  किरचें  बिखरी  हुई  हैं
ज़मीन  पर !

समय  के  रेशे-रेशे  को  चुनना  होगा
अपनी   पलकों  से
कि  कोई  तस्वीर  बने

कोई  अक्स  मुकम्मल  नहीं
न  दुनिया,  न  समाज
न  एक  अकेला  आदमी
यहां  तक  कि  कोई  बाल  या  नाख़ून  तक  नहीं

अब
बहुत  मुमकिन  है  कि  बहुत  जल्द
पेड़,  नदी,  पहाड़
आस्थाएं  और  विचार
सब-कुछ
नाभिकों  में  बदल  जाएं

संक्षिप्ततः ,
यही,  यही  सबसे  उपयुक्त  समय  है
सारी  कायनात  को  एक  बाज़ार  में  बदलने  के  लिए !

कोई  बचा  सकता  है  समय  को
बिकाऊ  जिन्स  में  बदलने  से  ? !

                                                                         ( 1986 )

                                                                  -सुरेश  स्वप्निल 

*पूर्णतः मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु सानुमति उपलब्ध।

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

जब अमेरिका नहीं था !

ओह !  कितनी  सुखी  थीं
आकाशगंगाएं
जब  अमेरिका  नहीं  था  !
कितने  सुखी  थे  प्रकृति,  पृथ्वी
और  मनुष्य  !

तब
सारा  संसार  कितनी  आसानी  से
एकदम  सही  जगह  पर
सम  पर  आ  जाता  था  !

तब
नीली  छतरी  में  'ब्लैक  होल'  नहीं  था
ग्लेशियर  यूं  ही  नहीं  पिघलते  थे
मॉनसून 
कुसमय  नहीं  आते  थे
और  'काला  हांडी'  में  भी
चावल  पकते  थे
और  नदियां
अपना  रास्ता  नहीं  बदलती  थीं
अचानक  और  अकारण  !

बेशक़,  अख़बार  भी  नहीं  थे
उन  दिनों
न  पहाड़-जैसी  मशीनें
न  स्मार्ट-फ़ोन
न  'वेपन्स  ऑफ़  मॉस  डिस्ट्रक्शन'.....

किन्तु,  शब्द  थे,
स्वप्न  थे  भरपूर
और  ढेर-सारी  फ़ुर्सत
अनगिनत  स्वप्न  देखने  की
और  थे  संकल्प,  साहस,  ऊर्जाएं
एक-एक  स्वप्न  को  साकार  करते
सर्व-सामर्थ्यवान्  मानवीय  हाथ

तब  स्वप्न
एक  संस्कार  था
और  कोई  भी  आकाशगंगा
नि:स्वप्न  नहीं  थी।

सचमुच,  बेहद  सहज-सरल  था
सब-कुछ
जब  अमेरिका  नहीं  था  !

                                            ( 2002 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल 

* पूर्णतः मौलिक/ अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन  हेतु उपलब्ध।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

मेरी चुप्पी के साथ

हां ,  मैं  ख़ामोश  हूं
अपने  झरोखे  बैठ  कर
सबका  मुजरा  लेता  हुआ
बहुत  देर  से  !

मैं  जानता  हूं ,  खल  रही  है  तुम्हें
यह  चुप्पी
यह  धैर्य,  यह  संयम
दु:खी  कर  रही  हैं  घटनाएं
आस-पास  की
और  खीझ  हो  रही  है
नेपथ्य  में  खड़े  होने  से

किंतु ,  क्या  करे
बिना  किसी  भूमिका  के  ?

जब  कुछ  भी
न  सुनिश्चित  हो,  न  सुस्पष्ट
तो  क्या  बेहतर  है
तुम्हारी  दृष्टि  में
मेरे  लिए ?

हां,  मैं  ख़ामोश  हूं
क्योंकि  मेरा  नहीं  है  यह  रंगमंच
यह  रंग-समय  भी  नहीं  है  मेरा

बोलूंगा  अवश्य
जब  ज़रूरत  होगी
समय  को
जब  मिट  चुकेंगी  सारी  दूरियां
तुम्हारे  और  मेरे  बीच  की
जब  ख़त्म  हो  जाएगा
वैचारिक  ऊसरपन

उस  दिन  जब  मैं  बोलूंगा
तब  शब्द  नहीं
बरसेंगे  बीज  !


और  निभा  लो
कुछ  दिन
मेरी  चुप्पी  के  साथ  !

                                     ( 2013 )

                             -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम  रचना। पूर्णतः मौलिक/ अप्रकाशित/अप्रसारित। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

                                               

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

मोक्षयिष्यामि मा शुचः ...

बहुत  पहले
बहुsssत  पहले
गंगाधर  पंडित  के  द्वारे  पर
गूंजे  थे  सोहरे
बँटी  थीं  मिठाइयाँ
जी-भर  कर।

कथा  सत्यनारायण  की
भोज  कन्याओं  का
नेग  दाई-नाई  का
सभी  कुछ  हुआ  था

चाचा  ने, ताऊ  ने
चौधरी-पटेल  ने
गाँव-गली-गैल  ने
दी  थीं  बधाइयाँ

वेत्रवती  के  तट  पर
महकी  थी  मौलिश्री
बेला  की  नई-नई
कलियाँ  मुस्काई  थीं। 

दूध  और  केसर  के
मिश्रण-सा  गौर-वर्ण
कस्तूरी  हिरनी  के
छौने-से  चपल  अंग
पूनम-सी  छटा  थी
अमावस-से  गहन  भाव
पंडित  की  कन्या  थी
साक्षात्  पार्वती .....

दूध  में  ऋचाएं  मिलीं
घूंटी  में  चौपाई
वेद-शास्त्र-ज्ञान  मिला
पिता  के  स्नेह  में

क्वाँर  के  महीनों  में
सुअटा  के  गीत  गाए
अकती  पर  गुड़ियों  के
ब्याह  भी  रचा  डाले
कदम्ब  की  डालों  पर
श्रावण  के  झूलों  की 
पींगों-सी  पल-पल
बड़ी  हुई  पार्वती ...

पंडित  की  छाती  पर
जाने  कब  बोझ  हुई
चम्पे-सी  महक  भरी
बिटिया  सयानी  !

विन्ध्यगिरि  पर्वत-से
माथे  को  झुका  गई
किस-किस  की  देहरी
किस-किस  के  चरण  छुए ..
जोग  नहीं  बैठा
अभाव  का  समृद्धि  से
शीशम-सी  काया  भी
सूख  हुई  दुहरी  !

... सुना  एक  दिन  यूं  ही
पनघट  पर  बातों  में
मुंह  काला  कर  गई
कलंकिनी  किसी  के  संग ....

बात  क्या  हुई  आख़िर
किसी  को  नहीं  पता
कोई  कुछ  कहता  है
कोई  कुछ  कहता ....

वही  वेत्रवती  का  तट  है
वही  गाँव,  घर  वही
सुना  है  कि  मौलिश्री
अब  नहीं  महकती

बस, गंगाधर  पंडित
बौराया-सा  फिरता  है
"दीनबंधु, शरण  लो!"
गुहार  लगाता  हुआ

भूल  गए  गिरधारी
क्या  तुम  अपना  ही  स्वर
"अहं  त्वां  सर्व पापेभ्यम्
मोक्षयिष्यामि  मा  शुचः " ????? !!!

                                                ( 1979 )

                                       -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'साक्षात्कार', भोपाल, 1983 । पुनः प्रकाशन हेतु सानुमति उपलब्ध।




एक ग़ज़ल

क्या  करेगा  अब  किसी  का  आदमी
नाम    है    जब    बेबसी  का  आदमी

छल   रहे   हैं   आज   सारे  इस  तरह
हो   नहीं   पाता   किसी   का   आदमी

चक्रव्यूहों    में    उलझ    कर    रास्ता
ढूंढता      है     वापसी     का    आदमी

औपचारिकता      निभाना     शेष    है
बिक  चुका  तो  है  कभी  का   आदमी

आत्महत्या  की    बना  कर  भूमिका
मुन्तज़िर  है    ज़िंदगी  का     आदमी

आदमी     के    वेश   में     हैं    भेड़िये
हाथ  थामे   क्या   किसी  का   आदमी  ?

                                                   ( 1975 )

                                             -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: दैनिक 'देशबंधु', भोपाल, 1975 एवं  अन्यत्र।

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

पूंजीवाद को गरियाओ मत !

जितने  में  पोस्टर  छपे
उतने  में
घर-घर  में  नज़र  आने  लगती
गौरैया !

यही  कहानी  है  बाघ  की
और  लुप्त  होती  जानवरों
और  वनस्पतियों  की
तमाम  प्रजातियों  की  !

पूंजीवाद  पहले  नष्ट  करता  है
फिर  संरक्षित  करता  है
नमूने  के  लिए
प्रजातियों  को !

इस  नेक  काम  में  कुछ  व्यक्ति
और  संस्थाएं
तो  कमा  ही  लेती  हैं  पुण्य
और  पैसा  भी  !

पूंजीवाद  को  गरियाओ  मत
उसकी  मदद  करो
प्रकृति  को  संग्रहालय  बनाने  में  !

                                                 ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम/ मौलिक / अप्रकाशित / अप्रसारित रचना। प्रकाशनार्थ उपलब्ध।

रविवार, 14 अप्रैल 2013

जो कभी सो नहीं पाते

जो  सो  सकते  हैं  आराम  से
इतने  वाहियात  समय  में
उनसे  कुछ  नहीं  कहना  मुझे

मुझे  उनसे  भी
कुछ  नहीं  कहना
जो  कारण  हैं
दिनों  दिन  मंडराते  युद्ध  के
और  नाभिकीय  हथियारों  के
निर्माता  और  उनके  वित्तीय  मालिकों  के

मुझे  जो  भी  कहना  है
मैं  कहूंगा  उनसे
जो  कभी  सो  नहीं  पाते
अफ़ग़ानिस्तान  से  ज़ाम्बिया  तक  फैले
पूँजी  के  अभागे  शिकारों  से

मुझे  कहना  है  महमूद  अहमदीनेजाद  से

पीछे  मत  हटना  दोस्तों
इससे  पहले  कि
शत्रु  फिर  एक  नया  ईराक़  गढ़  दे
या  फिर  कोई  इज़राइल  तैयार  कर  दे
साबित  करना  ही  होगा
कि  ज़िंदा  हैं  हम
अपने  अस्तित्व  की  सुरक्षा  को
हर  तरह  से  चाक-चौबंद !

किसी  न  किसी  को  तो
मिटना  ही  होगा
मनुष्यता  के  सबसे  बड़े  शत्रुओं  को
या  मनुष्यता  को !

                                                 ( 2013 )

                                         -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम/ मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

                                                      

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

सिर्फ़ एक कोशिश ..

चलो,  एक  और  कोशिश
करके  देखते  हैं
ज़िंदा  रहने  की
इसी  दुनिया,  इसी  देश
और  इसी  शहर  में  !

करते  हैं  कोशिश
अपनी  खाने, सोने, पहनने,
पढ़ने-लिखने  और  बात-बात  पर
असंतुष्ट  होने  की  आदत
बदल  डालने  की

कोशिश  करते  हैं
दिन  पर  दिन  बढ़ती  मंहगाई  से
तालमेल  बैठाने  की
और  सब-कुछ  को
नियति  मान  कर  चुपचाप
स्वीकार  कर  लेने  की

या
सिर्फ़  एक  कोशिश  करते  हैं
अपनी  आवाज़  को
इतना  बुलंद  बनाने  की
कि  मनुष्य-विरोधी  व्यवस्थाओं  के  सूत्रधारों  के
कान  के  परदे  फटने  लगें
हमारे  एक-एक  शब्द  से

दुनिया  बदलनी  है
तो  अपने  को  बदलने  की  शुरुआत
करनी  ही  होगी।
                                                                 ( 2013 )

                                                          -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम/अप्रकाशित/अप्रसारित/मौलिक रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

बाज़ार के हवाले...

सदियों  से
एक  ही  खेल  चल  रहा  है
निरंतर ...

जो  डरता  है
उसे  इतना  डराओ
कि  डर  के  मारे  आत्म-हत्या  कर  ले

जिसे  दबाया  जा  सकता  है
उसे  इतना  दबाओ
कि  उसका  स्वाभिमान
चूर-चूर  हो  जाए

जो  असहाय  है
उसे  घेर  लो  हर  ओर  से
और  उसकी  ज़ुबान   काट  लो
कि  पुकार  भी  न  सके  किसी  को
मदद  के  लिए !

जो  डरता  नहीं  है  किसी  से
जिसे  दबाया  नहीं  जा  सकता  किसी  भी  तरह
जो  इतना  असहाय  नहीं  कि  प्रतिकार  न  कर  सके
उसे  खींच  कर  बाहर  ले  आओ  घर  से

और उसे

बाज़ार  के  हवाले  कर  दो  !

                                                                       ( 2013 )

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम, मौलिक / अप्रकाशित / अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

सुरक्षित जीना चाहते हो ,,,

कार  टकराती  है
दूसरी  कार  से
या  किसी ट्रक  या  किसी  पेड़  से
नेताजी  बच  जाते  हैं

ट्रेन  उतर  जाती  है
पटरी  से
नेता जी  बच  जाते  हैं

हवाई  जहाज़  गिर  जाता   है
ज़मीन  पर
नेताजी  फिर  बच  जाते  हैं

नेताजी  तो  तब  भी  बच  जाते  हैं
जब  उनकी  सभा  में  बम-विस्फोट  होता  है !

नेता  की  जान  है
इतनी  सरलता  से  निकलती  है  कहीं  ?

सुरक्षित  जीना  चाहते  हो  न ?
तो  नेताजी  के  आगे-पीछे  घूमो
यही  नियति  है
यही  प्रारब्ध  !

                                                                  ( 2013 )

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

तीन नन्हीं कविताएं

              1.

आप
किस  दिल  की  बात  करते  हैं  ?

वो, जिसे  दे  के
आप  ही  को  हम
रोज़  जीते  हैं
रोज़  मरते  हैं  !

             2.

छोड़िये  भी,
कहां  की  ले  बैठे  ?

हम  तो  अपने  ही  दिल  से
हैरां  हैं
आप  अपना  भी  हमें  दे  बैठे !

          3.
ख़त्म
हो  जाएगा  सफ़र  अपना

राह  में  रूठ  गए
आप  अगर,
चाक  कर  लेंगे  हम  जिगर  अपना !

                                                  ( 1978 )

                                           -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: दैनिक 'नव-भारत', रायपुर, रविवासरीय। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।


मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

अंधी आस्थाओं के नाम पर !

अच्छी  तरह  से  सोचिए
और  तय  कीजिए
कि  कितने  ईश्वर  हैं  हमारे  इर्द-गिर्द !

ऐसा  क्या  अपराध  करते  हैं  हम
कौन-सी  आवश्यकताएं  हैं  जो  केवल
ईश्वर  ही  पूरी  करते  हैं ?

कौन  हैं  वे  लोग
जो  ईश्वर  के  प्रतिनिधि  बने  हुए  हैं
क्या  कल  इन्हीं  में  से  कुछ  ईश्वर  के  अवतार
फिर  कुछ  समय  बाद  स्वयं  ये  ही
ईश्वर   नहीं  बन  जाएंगे ?

एक  सूची  बनाइये  इन  सब  की
और  उन  सामानों  की  जो  ये  आधुनिक  ईश्वर
बेच  रहे  हैं  आपको
बाज़ार  से  चौगुने  दामों  पर
और  तुलना  कीजिए  मूल्य  और  गुणवत्ता  की !

ठीक, अब  जवाब  ढूंढिए  उन  प्रश्नों  के
जो  इस  अभ्यास  से  उभरे  हैं
आपके  मन-मस्तिष्क  में

ईश्वर  ने  किस  को  नियुक्त  किया  है
अपने  प्रतिनिधि  के  रूप  में
किस  के  पास  है  ईश्वर  का  अनुमति-पत्र  ?
किस  ने  घोषित  किया  कि  अमुक  व्यक्ति  अवतार  है
ईश्वर  का ?
यदि  ये  लोग
जो अपने-आप को  ईश्वर का प्रतिनिधि,
अवतार  अथवा  स्वयं  ईश्वर  ही
मानते  और  मनवाते  हैं
ये  लोग जो  योग, भागवत-कथा से  लेकर
साबुन, तेल, दाल-दलिया  तक  बेच  रहे  हैं
क्या  अंतर  है  इनमें  और  आपके
किराना-व्यापारी  में ?

प्रश्न  हजारों  होने  चाहिए
आपके  मन-मस्तिष्क  में
और  हर  प्रश्न  के  उत्तर  की  आवश्यकता  भी ....

यदि  आपके  मन-मस्तिष्क  में
न  कोई  प्रश्न  ही  है
न  उत्तर  पाने  की  ललक
तो  आप  इसी  योग्य  हैं
कि  हर  व्यापारी  को  आप  ईश्वर  मानें
और  ठगे  जाते  रहें  अनंतकाल  तक
अंधी  आस्थाओं  के  नाम  पर !

                                                                  ( 2013 )

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

*नवीनतम रचना। पूर्णतः मौलिक, अप्रकाशित/अप्रसारित। प्रकाशन हेतु सभी के लिए उपलब्ध।

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

नई दिल्ली के कुत्ते

यदि  आप  कुत्ते  हैं
नई  दिल्ली  के  कुत्ते  हैं 

'लुट्येन्स  ज़ोन' में
रहते  हैं
अपने  गले  में  अपने  मालिक  के  नाम  का
पट्टा  पहनते  हैं
ख़ानदानी  'पेडिग्री'  हैं
सौ  फ़ीसद  विदेशी  नस्ल  के,
और  लाल  बत्ती  वाली  गाड़ियों  में
घूमते  हैं
अपने  मालिक  की  इच्छा  पर  ही  भौंकते  हैं 
तो  निश्चय  ही
आप  वी .वी .आई .पी . हैं
परम-सम्माननीय !
कहीं  भी  घूमिये
बेरोक-टोक
सारा  देश  आपका  है !

यदि  आप  कुत्ते  हैं
ख़ानदानी  'पेडिग्री'  हैं
सौ  फ़ीसद  विदेशी  नस्ल  के,
नई  दिल्ली  के
'लुट्येन्स  ज़ोन' में  भी
रहते  हैं
मगर  अपने  मालिक  के  नाम  का  पट्टा
नहीं  पहनते
न  ही  लाल  बत्ती  वाली  गाड़ियों  में
घूमते  हैं
आज़ाद ख़याल और आज़ाद ज़ुबान हैं
और  भौंकते  समय
अपने  मालिक  की  इच्छा  की
चिंता  नहीं  करते,
तब  भी  वी .आई .पी . हैं
और  कहीं  भी  घूम  सकते  हैं 
मगर  एक  हद  तक  ही !

दिल्ली  पुलिस
किसी  भी  दिन  आपको  अपनी  निगरानी  में
ले  सकती  है
और  बेहतर  क़ीमत  पर
आपको  नए  मालिक  को
सौंप  सकती  है !

यदि  आप  कुत्ते  हैं
अपने  गले  में  अपने  मालिक  के  नाम  का
पट्टा  नहीं  पहनते
ख़ानदानी आवारा   हैं
सौ  फ़ीसद  देसी  नस्ल  के,
मगर  तब  भी
नई  दिल्ली  के
'लुट्येन्स  ज़ोन' में
रहते  हैं
और  लाल  बत्ती  वाली  गाड़ियों  में
घूमते  की  कल्पना  भी
नहीं  कर  सकते 
भौंकना  आपका  संवैधानिक
और  मौलिक  अधिकार  तो  है
किंतु  क्षमा  कीजिये, श्रीमान !
आप  कभी  भी
नई  दिल्ली  महानगर  पालिका  के
कुत्ता-अतिथि  गृह  में
बलात् भेजे  जा  सकते  हैं
बधिया-करण  अथवा  ज़हर  के  इंजेक्शन  के  लिए !

यदि  आप  कुत्ते  नहीं  हैं
भारत  के  एक  सामान्य  नागरिक  हैं
सौ  फ़ीसद  खांटी  भारतीय
अभिव्यक्ति  की  आज़ादी  के
अपने  अधिकार  को
सार्वभौमिक  मान  कर
'लुट्येन्स ज़ोन'  में
भौंकने - माफ़  कीजिये  श्रीमान,
नारे  लगाने  की  जुर्रत  करते  हैं
तो  सावधान  !
किसी  भी  दिन, किसी  भी  समय
किसी  भी  जगह
आपका  'एनकाउंटर' हो  सकता  है  !

                                                  ( 2013 )

                                           -सुरेश  स्वप्निल 

* पूर्णतः मौलिक, अप्रकाशित/अप्रसारित, नवीनतम रचना। सभी के लिए, 
   पूर्वसूचना एवं यथासंभव पारिश्रमिक पर, प्रकाशन हेतु उपलब्ध।