सोमवार, 18 नवंबर 2013

तुम्हारे हाथ के पत्थर ...!

चलो  बस  भी  करो
बातें  बहुत-सी  हो  चुकीं
आ  जाओ  अब
मैदान  में  ....

देखो
तुम्हारे  शत्रुओं  के  पास
क्या-क्या  है
नए  हथियार  हैं
तकनीक  है
रणनीतियां  हैं
सब  तरफ़  से  घेरने  को
ड्रोन  हैं
बम  हैं
रसायन  हैं
तुम्हें  अंधा  बनाने  को
तुम्हारे  घर  जलाने  को
तुम्हारे  हाथ-पांव  तोड़  कर
लाचार  करने  को
भयानक  सर्दियों  में
बर्फ़-सा  पानी
तुम्हारी  चेतना  का  सर  झुकाने  को ....

तुम्हारे  पास  भी  तो  है
बहुत-कुछ
स्वप्न  हैं  आकांक्षाएं  हैं
जलन  है  क्रोध  है
बेचैनियां  हैं  भावनाएं  हैं
सड़क  पर  ढेर  से  पत्थर  पड़े  हैं
हाथ  ख़ाली  हैं …

तुम्हारे  हाथ  के  पत्थर  बहुत  हैं
शत्रु-सेना  का
मनोबल  तोड़ने  को …!

                                                   ( 2013 )

                                             -सुरेश  स्वप्निल

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शनिवार, 16 नवंबर 2013

मरना ही चाहो !

बहुत  शौक़  है  न  तुम्हें
सच  बोलने
जानने  और  समझने  का
तो  तय  कर  लो
कि  कब  और  कैसे  मारे  जाना
पसंद  करोगे....

जीने  कौन  देगा  तुम्हें
न  सरकार,  न  पूंजीपति
न  ग़ुंडे-बदमाश

अदालत  भी  क्या  करेगी
दो  सिपाही  तैनात  करवा  देगी
सुरक्षा  के  नाम  पर
जो  मौक़ा  मिलते  ही  बिक  जाएंगे
तुम्हारे  दुश्मनों  के  हाथों !

पढ़े-लिखे  हो
बेहतर  है  नौकरी  कर  लो
किसी  पूंजीपति  के  यहां
कहो  तो  चपरासी  बनवा  दें
नगर-पालिका  में

कहां  पड़े  हो
सच-झूठ  के  चक्कर  में
भविष्य  देखो  अपना
और  अपनी  संतानों  का  !

अब  अगर  मरना  ही  चाहो
तो  तुम्हारी  मर्ज़ी !

                                        ( 2013 )

                                 -सुरेश  स्वप्निल 

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कठपुतलियों के इरादे !

ये  कठपुतलियां  कौन  हैं
जिनकी  न  डोर  दिखाई  देती  है
न  डोर  थामने  वाली  उंगलियां
मगर
जिनकी  एक-एक  गति  पर
उथल-पुथल  हो  उठता  है
पूरा  देश  ?!

बहुत  भयंकर  हैं
इन  कठपुतलियों  के  इरादे
और  उनसे  भी  भयानक  हैं
इन्हें  नचाने  वाली  उंगलियों  की  गतियां
वे  हिलती  हैं  तो  कहीं  न  कहीं
गिरने  लगती  हैं
लाशें !
लोग  जैसे  भूल  ही  जाते  हैं
कि  वे 
जीते-जागते,  बुद्धिमान  मनुष्य  हैं
कठपुतलियां  नहीं  हैं  महज़....

वे  अपना  नाम-पता,
धर्म-संस्कृति,  इतिहास  और  वर्त्तमान
सब  कुछ  भूल  जाते  हैं
और  तब्दील  होते  चले  जाते  हैं
मानव-बमों  में !




नहीं,  सिर्फ़  सपने  देखने

और  सपने  में  डर  जाने  से  नहीं  चलेगा
अब  तलाशने  ही  होंगे 
इन  कठपुतलियों  को  नचाने  वाले  धागे
और  वे  बदनीयत  हाथ
तोड़  देनी  होंगी  वे  उंगलियां
जिनके  वीभत्स  संकेतों  पर
नष्ट  होती  जा  रही  है
संसार  के  श्रेष्ठतम्  युवाओं  की
पूरी  की  पूरी  पीढ़ी  !

सिर्फ़  सच्चे  देशभक्त  ही
बचा  सकते  हैं  अब  इस  देश  को !

                                                     ( 2013 )

                                               -सुरेश  स्वप्निल 

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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

सेठ की जूठन चाटे बिना ...!

सब  खाते  हैं
सेठ  का  दिया  हुआ

ज़ार  भी
ज़ार  के  दुश्मन
और  उनके  भी  दुश्मन....

लगता  ऐसा  है
कि  सेठ  की  जूठन  चाटे  बिना
भूखे  न  मर  जाएं
देश  के  सियासतदां !

बहुत  थोड़े  ही  हैं
हालांकि
सेठ  का  दिया  खाने  वाले
कोई  1000-1200
या  शायद  12000  या  120000 …
मगर  इतने  ही  भिखारियों  के  दम  पर
सेठ  1200000000   मेहनतकश  इंसानों  के  गले
छुरी  फेरता  रहता  है
साल  दर  साल  !

मगर  इस  बार
मेहनतकश  भी  तैयार  हैं
सेठ 
और  उसके  दलाल
भिखारियों  के  अरमानों  पर
पानी  फेरने  के  लिए !

जो  भी  हो
इस  बार  चूक  जाने  वाला
हारेगा  तो  जीवन-भर  के  लिए

और  जनता  बिल्कुल  तैयार  नहीं  है
इस  बार
सेठ  और  उसके  दलालों  को
बख्शने   के  लिए !

                                                         (  2013 )

                                                    -सुरेश  स्वप्निल

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सोमवार, 11 नवंबर 2013

अपनी सेनाएं ले आओ !

शत्रुओं  के  रक्त  की  प्यास
क्या  इतनी  अमानवीय  होती  है
कि  पीढ़ी-दर-पीढ़ी
खोखला  करती  चली  जाए
मनुष्य  के  गुण-सूत्रों  को
और  फिर  भी
अतृप्त  ही  रह  जाए  ???

मुझे  विश्वास  है
कि  मेरी  ही  भांति
आपमें  से  अधिकांश
जूझ  रहे  होंगे  इसी  प्रश्न  से....

यहीं  कहीं  है  वह
पवित्र  बोधि-वृक्ष
जिसकी  छाँह  में  बैठ  कर
सिद्धार्थ  गौतम  बन  जाते  हैं
गौतम  बुद्ध
यहीं  कहीं  है
वह  लिच्छवियों  की  राजधानी
जिसका  भावी  शासक
सर्वस्व  त्याग  कर
हो  जाता  है  दिगंबर
यहीं  है  वह  कलिंग  का  युद्ध-क्षेत्र
जहां  शत्रुओं  के  शव  देख  कर
सम्राट  अपना  राज-पाट  छोड़  कर
धर्म  का  शरणागत  हो  जाता  है…

अरे  हां,
पवित्र  साबरमती  तो
तुम्हारे  घर  के  आसपास  ही
बहती  है  न  कहीं ???

यदि  इतने  उदाहरण  सामने  होते  हुए  भी
अतृप्त  है
तुम्हारी  मानव-रक्त  की  तृष्णा
तो  मैं  तैयार  नहीं  हूं
यह  मानने  को
कि  तुम  और  मैं
एक  ही  देश
एक  ही  धर्म 
एक  ही  प्रजाति  के  जीव  हैं  !

तुम  अपनी  सेनाएं  ले  आओ
मैं  तुम्हें  अस्वीकार  करता  हूं
अपने  प्रतिनिधि  के  रूप  में  !!!

                                                      ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल 

शनिवार, 9 नवंबर 2013

किस क़दर झूठ...!


एक  चम्मच  से  दूध  पीने  वाला
दूसरे  को  शौक़  है  नस्ल  के  आधार  पर
जनसाधारण  के  नरसंहार  का....

सोच  कर  बताइए  अच्छी  तरह  से
कि  ऐसे  ही  शासनाध्यक्ष  चाहिए  क्या
आपको ???

पहले  को  यह  भी  नहीं  पता
कि  कहां  होता  है
बेर  का  मुंह
दूसरा  दावे  के  साथ  कहता  है
कि  आलू, टमाटर  सारे  देश  में  जाते  हैं
उसके  राज्य  से  !

पहला  शान  से  बताता  है
कि  उसकी  सरकार  ने
सबको  अधिकार  दे  दिया  है
भरपेट  भोजन  का !
दूसरा  उससे  भी  चार  क़दम  आगे
अपने  दल  की  सरकारों  के
गुणगान  में

आप  सब  जानते  हैं
कि  किस  क़दर  झूठ  बोलते  हैं  दोनों

प्याज़  क्या  भाव  मिल  रही  है
आजकल
आपके  शहर  में  ?
आपको  याद  है  कि  अमूल  के  दूध  का  भाव
क्या  था
आज  से  दस  साल  पहले ????

                                                                ( 2013 )

                                                          -सुरेश  स्वप्निल 

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शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

डोर खींचने वाले ...!

वहां  बैठे  हैं
डोर  खींचने  वाले
वॉशिंग्टन
नागपुर
और  मुम्बई  में....

सब  जानते  हैं
कि  अपनी  मर्ज़ी  से
हिल  भी  नहीं  सकतीं
कठपुतलियां…!

डोर  खींचने  वाले
तय  करते  हैं
कठपुतलियों  की  हर  गतिविधि
यह  भी
कि  कुल  कितनी  जानें  ली  जाएंगी
लोकतंत्र  के  महा-उत्सव  में
कैसे  नियंत्रण  में  रखी  जाएंगी
कठपुतली-सेनाएं
कितनी  ख़ुराक़  ज़रूरी  है
इन  मनुष्य-भक्षी  कठपुतलियों  के  लिए !

सवाल  यह  भी  है
कि  अपने  ख़ून-पसीने  से
देश  का  भाग्य  गढ़ने  वाले
क्या  सचमुच  इतने  बेचारे  हैं
कि  तोड़  न  सकें
कठपुतलियों 
और  उनकी  डोर  हाथ  में  रखने  वालों  के
देश-द्रोही  कुचक्र ???

                                                           ( 2013 )

                                                      -सुरेश  स्वप्निल

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गुरुवार, 7 नवंबर 2013

कोई हथियार रख लो !

घर  से   बाहर  निकलो
तो  जांचते  जाना
कि  कहीं  कैमरे  तो  नहीं  लगे
 आबादी  से  दूर  आते  ही
ध्यान  रखना
कि  पांव
ज़मीन  में  दबी  सुरंगों  पर
न  पड़   जाए

जहां  कहीं  भी  भीड़  जमा  देखो

चुपचाप  गुज़र  जाना

इस  दुर्द्धर्ष  समय  में
कोई  भरोसा  नहीं
कि  पुलिस
कहां  'एनकाउंटर'  कर  दे
यह  भी  भरोसा  नहीं
कि  पकड़  कर  जेल  में
न  डाल  दिए  जाओ  …

कोई  भी  ग़ुंडा-बदमाश
कहां  गोली  मार  दे
या  अगर  तुम  खाते-पीते  घर  के
नज़र  आते  हो
तो  अपहरण  न  कर  लिया  जाए
तुम्हारा  !

देखो,  समय  सचमुच  अच्छा नहीं  है
आम  आदमी  के  लिए  !
बेहतर  है,  अपने  साथ
कोई  हथियार  रख  लो
सुरक्षा  के  लिए  !

                                                                   ( 2013 )

                                                             -सुरेश  स्वप्निल

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रविवार, 3 नवंबर 2013

कैसा यह परिवर्त्तन ?

शोर  उठा  है  इस  नगरी  में  फिर  दीवाली  आई  है
कुछ  दीवाने  चीख़  रहे  हैं  लो  ख़ुशहाली  छाई  है

समय  बांसुरी  मौन  पड़ी  है  देख  टूटती  हर  आशा
कौन  कुबेर  भला  समझेगा  आहत  स्वरलिपि  की  भाषा

विद्युत् -मणियों  की  मालाएं  चूम  रहीं  तारों  के  मुख
माटी  के  दीपक  रोते  हैं  देख-देख  कुटियों  के  दुःख

दरबारों  में  गीत  सुनाते  हैं  चारण  आंखें  मींचे
भूख  भूख  का  आर्त्तनाद  है  विरुदावलियों  के  पीछे

जलें  झोंपड़े  मज़दूरों  के  धरती  मां  के  भाग  जले
लोकतंत्र  यह  कैसा  जिसमें  मजबूरों  पर  आग  चले

बने  सारथी  जो  प्रकाश  के  काले  उनके  भाग  हुए
विश्वासों  के  उजले  मोती  पल  में  जल  कर  राख़  हुए

राजमहल  की  जगमग-जगमग  लूट  रही  सारा  गौरव
और  झोंपड़ी   गुमसुम-गुमसुम  झेल  रही  सारा  रौरव

यह  प्रकाश  का  न्याय  नहीं  है  अंधियारे  का  नर्त्तन  है
हाय ! रौशनी  भूल  गई  सब  कैसा  यह  परिवर्त्तन  है  !

नहीं  नहीं  मत  कहो  रौशनी  यह  पागल  अंधियारा  है
सूरज  के  बेटों  को  इसने  गला  घोंट  कर  मारा  है

सदियों  से  जारी  शोषण  का  बदला  तो  लेना  होगा
अब  बलिदान  ज़रूरी  है  आगे  आ  कर  देना   होगा !

                                                                         ( दीवाली, 1975 )

                                                                         -सुरेश  स्वप्निल

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शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

जब तक जीवित है संविधान !

'भारत  एक  सार्वभौम, लोकतांत्रिक,
धर्म-निरपेक्ष, समाजवादी  देश है…!'

सुन  रहे  हो
पूंजीवाद  के  झंडाबरदारों ?
ओ  नीली  पगड़ी  वालों,  सुन  रहे  हो ?
'समाजवादी'… 'पूंजीवादी'  नहीं। …

और  तुम  सुन  रहे  हो  या  नहीं
हिटलर  के  चेलों
काली  टोपी  वालों !
'धर्म-निरपेक्ष' … 'हिन्दू  राष्ट्र'  नहीं  !

जब  तक  संविधान  जीवित  है
भारत  का
तब  तक
या  तो  संविधान  का  पालन  करो
या  देश  छोड़  दो !

चार  पूंजीपतियों  के  वोटों  से
नहीं  बनती  सरकार
किसी  भी  लोकतांत्रिक  देश  में
न  ही  कोई  अमरीकी  आने  वाला  है
तुम्हारी  सहायता  को !

ओ  महामूर्खों !
ज़रा  अपनी  स्मरण-शक्ति  को  टटोलो
और  याद  करो
1977, 1996, 2004 को

सरकार  तो
आम  आदमी  ही  बनाएगा
भारत  में
जब  तक  जीवित  है  हमारा  संविधान !

जिसे  मुग़ालता  हो
अपने  महानायकत्व का
वह  आ  जाए  नीचे
यथार्थ  के  धरातल  पर !

                                                                   ( 2013 )

                                                             -सुरेश  स्वप्निल

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बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

अति-नायक के हाथ सत्ता

कोई  नहीं  जानता
कि  क्या  है
अति-नायक  के  मन  में
जैसे  लोग
नहीं  जानते  कि
कब-किस  करवट  बैठ  जाए
ऊंट  !

जैसे  कोई  नहीं  जानता
कि  पागल  कुत्ता
किसको  काटेगा  अंतत:

कोई  यह  भी  नहीं  जानता
कि  तक्षक  सांप
किस  कोने  में  छिपा  बैठा  है
और  कब  हमला  कर  देगा
किसान  के  शरीर  पर....

शेर,  भालू ,  मगरमच्छ
और  शार्क  के  इरादों  को  भी
नहीं  जानता  कोई  भी....

अति-नायक   कम  नहीं  है
किसी  भी  हिंसक  पशु  से
मौक़ा  मिलते  ही
किस  पर  टूटेगा  उसका  क़हर
यह  न  आप  जानते  हैं
न  हम …

कुछ  लोग  फिर  भी
चाहते  हैं
अति-नायक  के  हाथ  में
सत्ता  सौंपना 

जिसकी  मति  मारी  गई  हो
कौन  समझा  सकता  है
भला  उसे ?

हमने  तय  किया  है
कि  हम  नहीं  होंगे
किसी  भी  अति-नायक  के  समर्थन  में …

आप  भी  तय  कर  ही  लें
अपने  बारे  में !

                                                              ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

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मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

श्रद्धांजलि: श्री राजेंद्र यादव

कल रात लगभग 12 बजे 'हंस' के संपादक और प्रसिद्ध कहानीकार एवं विचारक, हिंदी साहित्य से सवर्ण इजारेदारी ख़त्म करने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अजेय योद्धा श्री राजेन्द्र यादव संसार से विदा हो गए !
मैं दुःखी हूं कि उन्हें लेकर जो ताज़ा विवाद उठा, उसमें मैं उनके विरोध में खड़ा रहा। वे मुझे कब और कैसे जानते थे, यह मैं उनसे कभी पूछ नहीं पाया। अनेक बार साम्प्रदायिकता विरोधी कार्यक्रमों में उनसे मेरा सामना होता रहा किंतु मेरे और उनके बीच सम्बंध नमस्कार-प्रति नमस्कार से आगे नहीं बढ़ पाया। उसका एक कारण यह रहा कि मैं इतना महत्वाकांक्षी कभी रहा ही नहीं कि 'हंस' में रचना प्रकाशित करवा कर चर्चित होना चाहूं। 1982 में 'हंस' का पुनर्प्रकाशन करने के पूर्व जो पत्र मुझे लिखा था, वह अभी भी सुरक्षित है मेरे पास। यही वह समय था जब मैं सृजनात्मक रूप से सर्वाधिक सक्रिय हुआ करता था तथा 'हंस' से एक रचनाकार के रूप में जुड़ कर मैं अपने 'कैरिअर' को बहुत आगे बढ़ा सकता था।
अस्तु। मेरे और राजेन्द्र जी के व्यक्तित्व में कभी कोई ऐसी समानता मुझे नज़र नहीं आई कि मैं उनके पास जाने की इच्छा कर पाता, यद्यपि, मैं जानता था कि मेरे आगे बढ़ते ही वे मुझे गले से लगा लेते, ठीक वैसे ही जैसे कि उन्होंने मेरे समकालीन अनेक कहानीकारों-कवियों को लगाया।
मैं वास्तव में बेहद हैरान हूं कि मैंने सुबह से अभी तक उन रचनाकार-मित्रों की ओर से राजेन्द्र जी के निधन पर श्रद्धांजलि-स्वरूप एक भी शब्द न सुना, न पढ़ा जिनका साहित्य में जन्म ही राजेन्द्र जी और 'हंस' के माध्यम से हुआ… कृतघ्नता की सीमा यदि यह नहीं तो और क्या हो सकती है ? जिन्हें  अपने साहित्यिक व्यक्तित्व के लिए राजेन्द्र जी का आपादमस्तक, आजीवन  ऋणी होना चाहिए, जिनके वे न केवल साहित्यिक बल्कि आध्यात्मिक गुरु भी थे, वे ऐसे चुप हैं जैसे कहीं कुछ हुआ ही नहीं !
बहरहाल, हिंदी साहित्य सदैव राजेन्द्र जी का ऋणी रहेगा भले ही उन्हें चाहे जितना नकारा जाए !
अलविदा, राजेन्द्र जी।

  ( 29/10/2013 )
                                                                                                                                 
-सुरेश  स्वप्निल

दूर रहें हमारे शहर से !

शेरों  को  हक़  नहीं
कि  वे 
खुले  आम  घूमें  शहर  में

उनकी  सत्ता  सीमित  है
अपने  वन  तक
वहीं  रहें
उन्हीं  का  शिकार  करें
जो  रियाया  है  उनकी !

वैसे  भी 
डरता  कौन  है  शहर  में
जंगली  सूअरों  और  शेरों  से
चाहे  वे  गीर  से  आएं
चाहे  कान्हाकिसली  से  !

शेरों  से  गुज़ारिश  है
कि  यहां-वहां  न  घूमें
खुले  आम  शहर  में
एक  चेतावनी  भी  है
कि  शहर  के  बच्चे
बहुत  शैतान  हो  गए  हैं
आजकल
उन्हें  शौक़  लग  चुका  है
शेरों  के  गले  में
पट्टा  डाल  कर
कुत्तों  की  तरह  घुमाने
और  बंदर  की  तरह  नचाने  का !

अपनी  सत्ता  और  सम्मान  प्यारे  हैं
तो  दूर  रहें  हमारे  शहर  से
सारे  हिंस्र, वन्य  पशु  !

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

तैयारी के बिना ...

मौसम  बदल  रहा  है
बहुत  तेज़ी  से
गर्म  कपड़े  सहेज  कर
रखे  हैं  या  नहीं  ?

कोई  भरोसा  नहीं  इस  बार
कि  मौसम 
कहां  तक  दिखाएगा  अपने  तेवर…
कोशिश  करो  कि  स्वस्थ  रह  सको
इस  बार

चेताना  ज़रूरी  है
क्यूंकि  राजनीति  से  अछूता  नहीं  अब
जीवन  का  कोई  भी  पक्ष
यहां  तक  कि  मौसम  भी
और  जीवनोपयोगी  वस्तुओं  के  भाव  भी

सरकार  की  नीयत  का  भी  तो
कोई  भरोसा  नहीं
और  न  ही  विपक्ष  की
रणनीति  का  !

तैयारी  के  बिना
अब  जीवन  का  भी
क्या  भरोसा  ?

                                                              ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

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शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

नमो-नमो ????

चुनाव  आते  हैं  हमेशा
एक  दुर्भाग्य  की  तरह
और  साथ  ले  आते  हैं  अपने
चोर-लुटेरों  के  नए  गिरोह  !

संविधान  तो  कहता  है
कि  जन-प्रतिनिधि
सेवक  होते  हैं  जनता  के …

क्या  आपने  कभी  देखा  है
कि  आपके  चुने  हुए  प्रतिनिधि
पूछने  आए  हों  आपसे
आपके  दुःख-दर्द
चुनाव  के  बाद ?

क्या  महसूस  किया  है  आपने
कि  कभी  कम  हुई  हों
दैनिक  उपभोग  के  सामान
और  सेवाओं  की  क़ीमतें
नई  सरकार  आने  के  बाद ?

और  उन्हें
आप  कब  सीखेंगे
जन-प्रतिनिधियों  से  हिसाब  मांगना
और  कब  छोड़ेंगे
उन्हें 
देवता  मान  कर  पूजना ??

और  क्या  है  यह  मूर्खता
नमो-नमो,  नमो-नमो ????

                                                     (2013 )

                                             -सुरेश  स्वप्निल 

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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

श्रद्धांजलि : मन्ना दा

                          श्रद्धांजलि : मन्ना  दा

बात संभवत: 1977-'78 की है। मैं अपनी रोज़ी-रोटी से निवृत्त हो कर घर लौट कर आ रहा था। रास्ते में अचानक एक मर्म-भेदी चीत्कार जैसे कोई चातक अपने बिछुड़े हुए साथी को पुकार रहा हो, सुनाई पड़ी : 'पिया ssss ओ ओ ओ '… ! मैं जहां था वहीं ठिठक कर रह गया। रेडियो पर एक नया गीत बज रहा था। गीत ख़त्म होने पर ध्यान आया कि मैं बीच सड़क पर खड़ा फूट-फूट कर रो रहा हूं …
कोई अच्छा गीत सुन कर इस तरह रो पड़ना मेरे साथ न तो कोई अजीब बात थी और न नई बात। अक्सर मैं अपनी अम्मां के गीत सुन कर भी रो देता था। लेकिन यह एक अद्भुत संगीत-रचना, एक अद्भुत गायन था। मुखड़ा था 'पिया मैंने क्या किया, मोहे छोड़ के जइयो न', आवाज़ मन्ना दा की थी, यह तो ख़ैर समझ में आ गया किंतु अन्य विवरण मैं नहीं सुन पाया। मन पर इस गीत का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था, घर पहुंच कर सीधे अम्मां की गोद में सर रख कर काफ़ी देर तक सिसकता रहा। अम्मां मेरी आदत से परिचित थीं सो बिना कुछ पूछे मेरे बालों  में हाथ फेरती रहीं। ….
लगभग दो-तीन महीने तक वह गीत लाख चाहने पर भी मैं नहीं सुन पाया। एक दिन 'रंग महल थियेटर' के सामने से गुज़रते हुए फ़िल्म 'उस पार' के पोस्टर्स देखे, टिकिट खिड़की ख़ाली पड़ी थी सो आराम से टिकिट ले कर फ़िल्म देखने बैठ गया। यह फ़िल्म 19वीं सदी की एक फ़्रेंच कहानी पर आधारित अत्यंत भावपूर्ण प्रेम-त्रिकोण है। जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ी, पता नहीं कहां से मन में मन्ना दा का गाया वही गीत बार-बार गूंजने लगा। मध्यांतर में भी वही गीत याद आता रहा…. अंततः, कुछ ही समय बाद फ़िल्म में वह गीत आ ही गया !
जहां तक मेरी व्यक्तिगत रुचि का प्रश्न है, मुझे आज भी मन्ना दा के गाए हुए गीतों में यही सर्वश्रेष्ठ लगता है। वैसे मुझे मन्ना दा के गाए लगभग सभी गीत समान रूप से प्रिय हैं, विशेष रूप से उनके और रफ़ी साहब के साथ में गाए गीत, यथा, 'न तो कारवां की तलाश है' ( फ़िल्म 'बरसात की रात' ), 'वाक़िफ़ हूं ख़ूब इश्क़ के तर्ज़े-बयां से मैं' ( फ़िल्म 'बहू बेगम ), 'एक जानिब है शम्मे-महफ़िल, एक जानिब है रूहे-जाना', आदि-आदि।
यह भी मुझे लगता रहा है कि कम से कम हिंदी फ़िल्म-जगत ने उनके साथ न्याय नहीं किया, अन्यथा मन्ना दा के गाए गीतों की संख्या कई गुना अधिक होती….
आज दिन भर आकाशवाणी और समाचार-चैनल्स पर आप मन्ना दा के गीत सुनते रहेंगे, मैं चाह कर भी और आगे लिखने की मन:स्थिति में नहीं हूं, अतः आप से सम्प्रति क्षमा चाहूंगा। किसी दिन मन्ना दा के गायन पर विस्तार से लिखूंगा, यह वादा रहा !

अलविदा, मन्ना दा !

                                                                                                                       ( 24 अक्टू. 2013 )

                                                                                                                       -सुरेश  स्वप्निल

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बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

समय विपरीत हो तो पुलिस ...

'देश-भक्ति,  जनसेवा'
अच्छा  लगता  है  न
पढ़  कर,  सुन  कर…

और  देख  कर ???

रोंगटे  खड़े  हो  जाते  हैं
जब  कोई  लहीम-शहीम  लठैत
खड़ा  हो  जाता  है
आंखों  के  सामने !

सच  बताइए, 
डर  नहीं  लगता  क्या  आपको
पुलिस  के  नाम  से ?

बच्चा-बच्चा  जानता  है
कि  पुलिस  क्या  होती  है

पुलिस  यानी  डंडा
पुलिस  यानी  बंदूक
यानी  मशीन गन
यानी  'वॉटर कैनन'….

पुलिस  यानी  सरकार  का
सबसे  विश्वस्त  अनुचर
आम  आदमी  के  विरुद्ध…

भारत  में  सुरक्षित  रहना  है  तो
पुलिस  के  हत्थे  मत  चढ़ना  कभी !

समय  विपरीत  हो
तो  पुलिस 
ख़ुद  अपने  बाप  की  भी  नहीं  होती !

                                                           ( 2013 )

                                                      -सुरेश  स्वप्निल 

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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

व्यर्थ आशाएं ...

कुछ  आशाएं 
एकदम  व्यर्थ  होती  हैं
जैसे  राजनीति  में  आ  कर  भी
साफ़-सुथरे  बने  रहना…

जैसे  काजल  की  कोठरी  में
जा  कर
श्वेत  वस्त्र  काले  किए  बिना
लौट  पाना

जैसे  विकास  की  गति  बढ़ा  कर
मंहगाई  को
नियंत्रण  में  रख  पाना
और  समाज  के  सभी  वर्गों  से
न्याय  कर  पाना

जैसे  गुरुग्रंथ  साहिब  के  उपदेशों  को
ठीक  से  समझ  कर  भी
पूंजीवादी  बने  रहना  !

                                                        ( 2013 )

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

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रविवार, 20 अक्टूबर 2013

असमानता का लोकतंत्र

जब  कुत्तों  की  सरकार  हो
तो  कौन  रोकेगा
भेड़ियों  को  शिकार  से ?

असमानता  का  लोकतंत्र
ऐसे  ही  चलता  आया  है
ऐसे  ही  चलेगा
आगे  भी

लेकिन  बहुत  देर  तक
नहीं  चल  सकता  ऐसे

एक  ही  मार्ग  है
जंगल  में  लोकतंत्र  बचाने  का
कि  सारे  हिंस्र  पशुओं  के
नख-दन्त  तोड़  दिए  जाएं…

जीवित  रहना  है
तो  उठाने  ही  होंगे
सारे  ख़तरे !

                                              ( 2013 )
                                     -सुरेश  स्वप्निल

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न्याय की मांग

क़िले  के  अवशेषों  में
भटकती  हैं  आत्माएं
युध्द  में  मारे  गए  सैनिकों  की …

वे  शत्रुओं  के  वंशजों  के  साथ-साथ
अपने  ही  राजा  के  वंशजों  को  भी
ढूंढ  रही  हैं
कोई  दो-तीन  सौ  वर्ष  से

वे  आत्माएं 
न्याय  चाहती  हैं  अपने  वंशजों  के  लिए
अपने  राजा  के  वंशजों  से
और  क्षमा  चाहती  हैं
उन  शत्रुओं  के  वंशजों  से
जो  मारे  गए  थे
उनके  हाथों …

शरीर  की  मृत्यु  के  साथ  ही
जीवित  हो  उठती  है
मनुष्य  की  प्रज्ञा
प्रकट  हो  जाते  हैं  सारे  रहस्य
सत्य-असत्य 
और  उचित-अनुचित  के  भेद…

शरीर  की  मृत्यु  का  अर्थ
न्याय  और  अन्याय  के  बीच 
अंतर  की  मृत्यु
नहीं  होता
और  न  ही  अपराध  और  दण्ड  के
प्रतिमान  मर  जाते  हैं

दण्ड  तो  भोगना  ही  होगा
यदि  अपराधी  नहीं
तो  उसकी  तमाम  पीढ़ियों  को
अपराध  के  अंतिम  चिह्न
नष्ट  होने  तक….

मैं  जानता  हूं  कि   मुझे
'प्रतिक्रिया वादी',  'संशोधन वादी'
'भाग्य वादी'  ….
और  पता  नहीं  किन-किन  नामों  से
पुकारा  जाएगा 
हो  सकता  है  कि  मुझे
'पक्ष-द्रोही',  'वर्ग-द्रोही'
या  'धर्म-द्रोही',  'देश-द्रोही'  भी
मान  लिया  जाए ….

क्या  मृत्यु  का  भय
इतना  बड़ा  है
कि  मनुष्य 
न्याय  की  मांग  छोड़  दे… ?

क्या  शताब्दियां  बीतने  से
ख़त्म  हो  जाते  हैं
अपराध ????

                                            ( 2013 )

                                       -सुरेश  स्वप्निल

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