सोमवार, 21 अप्रैल 2014

कौन-सा कुरुक्षेत्र ?

यह  कौन-सा  कुरुक्षेत्र  है
जहां  दर्जनों  धृतराष्ट्र  खड़े  हैं
हर  किसी  के  सामने

असंख्य,  अक्षौहिणी  सेनाएं
आधुनिकतम  शस्त्रास्त्र  से  लैस
सारे  सेनानायक,  सारे  सैनिक
सब  के  सब
आंखों  पर  पट्टियां  बांधे
लड़ते  चले  जा  रहे  हैं
न  जाने  किसके  विरुद्ध
किसके  पक्ष  में

वे  कौन  शकुनि  हैं
जो  विवश  कर  रहे  हैं  भाई-भाई  को
एक-दूसरे  के  विरुद्ध
युद्ध  के  लिए  ?

कोई  नियम  नहीं
कोई  सिद्धान्त  नहीं
केवल  युद्ध
विश्व  के   समृद्धतम  प्राकृतिक  संसाधनों
और  मूक -तम  जनसंख्याओं  में  से  एक  पर
विजय  के  लिए ...

यह  युद्ध
दृष्टिहीनों  का  है
अथवा 
दृष्टिहीनता  का ?

                                                                              (2014)

                                                                       -सुरेश  स्वप्निल

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रविवार, 20 अप्रैल 2014

जमी हुई धूल

क्या  होगा 
अबकी  बार ?
कोई  है  तैयार
यह  सुनने,  समझने 
और  मानने  को
कि  सब  प्रयास  हो जाएंगे 
बेकार
पिछली  बार  की ही  भांति

परिवर्त्तन  क्या  इस  तरह
इतनी  सरलता  से  हो  जाते  हैं ?

न  कोई  भूकंप  आया
न  ज्वालामुखी  फूटा
न  कोई  ऐसा  जन-उभार
जो  उलट-पलट  दे  सारे  ताज-तख़्त

न  हो  सकी  साफ़
समाज  के  दिल-दिमाग़  पर
शताब्दियों  की  जमी  हुई  धूल 

अगर  कुछ  बदला  भी
तो  सिर्फ़  नज़र  आने  वाले 
कुछ-एक  चेहरे

क्या  इसी  परिवर्त्तन  के  लिए
उतावले  हो  रहे थे  सब ???

                                                                (2014)

                                                       -सुरेश  स्वप्निल

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मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

चुनना किसे है ?!!

शब्द  कभी-कभी 
छोटे  पड़  जाते  हैं
व्यक्तित्वों  की  व्याख्या  करने  में
जैसे  हिटलर,  मुसोलिनी, तोज़ो ...

इतिहास  देखता  रह  जाता  है
हर  क्रूर,  वीभत्स  मनुष्य  को
आंखें  फाड़  कर
प्रकृति  भी
समझ  नहीं  पाती  कि  कैसे
कोई  मनुष्य
बदल  जाता  है  
हिंस्र  पशु  में

कहां  से  पाते  हैं  लोग
इतने  अमानवीय  संस्कार
जो  दूसरे  मनुष्य  को 
तब्दील  कर  देते  हैं
कीड़े-मकोड़ों  में ?

देखिए,  आपके  आसपास  भी 
मिल  जाएंगे  ऐसे  कुछ  अमनुष्य
जो  सत्ता  के  लिए 
गिर  सकते  हैं 
किसी  भी  सीमा  तक  !

ऐसे  हाथों  में  मत  सौंपिए
स्वर्ग-जैसे  सुंदर  देश  को  !

अपने  विवेक  को 
टटोलिए,  छू  कर  देखिए
और  तय  कीजिए
कि  चुनना  किसे  है  ?!!

                                                      (2014)

                                             -सुरेश  स्वप्निल

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रविवार, 13 अप्रैल 2014

आप मुकर नहीं सकते...

इतना  अंधविश्वास 
मत  कीजिए  किसी  पर
कि  वास्तविकता  प्रकट  होने  पर
लज्जित  होना  पड़े
अपने-आप  पर  !

प्रचार  का  अर्थ  ही  है
उन  'गुणों'  का  दावा  करना
जो  व्यक्ति/वस्तु  में 
कभी  न  थे,  न  होंगे 
और  जिनको  लेकर 
कोई  मुक़दमा  भी  न  चलाया  जा  सके

सरासर  धोखे  का  व्यापार  है
प्रचार  का  विचार 

लोग  तो 
सब्ज़ी-भाजी  भी  ख़रीदते  हैं
तो  दर्ज़नों  तर्कों  के  बाद
आप  क्या  ऐसे  ही  सौंप  देंगे
देश  की  सत्ता  किसी  भी  अपात्र  को  ?
मात्र  प्रचार  से  प्रभावित  हो कर  ? ?

आप  भाग्य-विधाता  हैं  देश  के
आपकी  नैतिक  ज़िम्मेदारी  है
भावी  पीढ़ियों  के  लिए
कि  सत्ता 
सदैव  सही  हाथों  तक  पहुंचे
आप  मुकर  नहीं  सकते
इस  उत्तरदायित्व  से

सही  निर्णय  लीजिए
सही  समय  पर 
ताकि  भावी  पीढ़ियां 
गर्व  कर  सकें
आपके  विवेक  पर  ! 

                                                                  (2014)

                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

....



मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

ख़तरनाक प्रयोग ...

कुछ  बातें 
कुछ  चीज़ें 
कुछ  सिद्धान्त 
कभी  नहीं  बदलते
मसलन,  कुत्ते  की  पूंछ
बंदर  की  गुलाटियां
सियारों  की  हुआं-हुआं  

मसलन,  ख़ाकी  नेकर 
और  काली  टोपियों  का  चरित्र

किसी  नरभक्षी  अहंकारी  की  आदतें
तो
कभी  भी  नहीं  बदल  सकतीं
किसी  भी  मूल्य  पर  !

जब  आप  सांप  पर  विश्वास  करते  हैं
कि  वह 
नहीं  डसेगा  आपको
ठीक  उसी  समय  वह 
तोड़  देता  है  आपका  विश्वास ...

आख़िर  क्यों  करते  हैं  आप
इतने  ख़तरनाक  प्रयोग 
बार-बार  ?

                                                               (2014)

                                                        -सुरेश  स्वप्निल

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शनिवार, 5 अप्रैल 2014

चुनना है कुछ और भी ...

न  जाने  कितने  मुखौटे  हैं
एक-एक  मुखौटे  के  नीचे ...
क्या  कभी  सामने  आ  सकता  है
इन  मुखौटों  का  सत्य
इनका  असली  चेहरा ?

मनुष्य  इतना  ढोंगी
इतना  पाखंडी  कैसे  हो  गया
इतने  कम  समय  में  ?

अभी  बहुत  अधिक  दिन  नहीं  हुए
जब  गांधी-नेहरू
और  भगत  सिंह  जैसे  मनुष्य  भी 
जन्म  लेते  थे  इसी  देश  की  मिट्टी  में
और  लोकतंत्र  की  तथाकथित  अवधारणाओं  को
चुनौती  देते
चारु  मजूमदार  और  अवतार  सिंह  पाश  जैसे
दुर्दम्य  योद्धा  भी

हम  कहां  जा  रहे  हैं,  अंततः  ?
क्या  यह  अंत  है 
महान  भारतीय  सभ्यता  और  संस्कृति  का  ?
क्या  हम  उसी  राह  पर  तो  नहीं
जिस  पर  चल  कर 
नष्ट  हो  गई  थी  मया  संस्कृति
या  अफ़ग़ानिस्तान  या  इराक़ 
या  मिस्र  महान  की  सभ्यताएं  ???

प्रश्न  केवल  एक  लोकसभा-चुनाव  तक 
सीमित  नहीं  रह  गया  है  अब
हमें  चुनना  है  कुछ  और  भी
मसलन,  सौ  साल  बाद  के 
हमारे  वंशजों  का  भविष्य  भी  ! 

काश !  हमारा  विवेक  हमारे  साथ  ही  रहे
अपने  प्रतिनिधि  चुनते  समय ...

                                                                     (2014)

                                                              -सुरेश  स्वप्निल 

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शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

आम आदमी के लिए ...!

कुछ  दिन  रह  आए  वे  भी
सत्ता  के  अंत: गृह  में
जो  हमेशा  भगा  दिए  जाते  थे  पहले
उस  गली  में  घुसने  से  पहले  !

दलित, वंचित  और  समाज  से  बहिष्कृत
सभी  को 
मिल  ही  गया  एक  अवसर
एक  नई  कर्म-संस्कृति  को 
जन्म  देने  का  !

कभी-कभी
लोकतंत्र  सचमुच  लगने  लगता  है
बड़े  काम  का  !
कभी-कभी
तंत्र  का  एक  न  एक  अंग
अचानक  जाग  उठता  है
अपने  कर्त्तव्यों  को  लेकर  !

लेकिन  जो  कुछ  भी  सार्थक 
नज़र  आता  है
वह  चार  दिन  का  तमाशा  ही  हो  कर
क्यों  रह  जाता  है ?

आख़िर  क्यों  नहीं  होता  ऐसा
लोकतंत्र  में
कि  संविधान  में  शामिल 
सारी  अच्छी  बातें 
सामान्य  लगने  लगें 
रोज़मर्रा  के  कामों  की तरह  ?

मिथक  तोड़  दिए  गए  हैं
और  द्वार  खोल  दिए  गए  हैं
सारी  लोकतांत्रिक  संभावनाओं  के
आम  आदमी  के  लिए
आम  आदमी  द्वारा  ! 

                                                       ( 2014 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल 

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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

मौसम की अनुशासनहीनता ...

सूर्य  ठगा-सा  रह  जाता  है
हर  बार
जब  मौसम  इन्कार  कर  देता  है
बदलने  से  !

आख़िर  हंसी-मज़ाक़   है  क्या
बार-बार  गर्म  कपड़े  तह  कर  रखना
और  फिर निकालना ...

जो  भी  हो,
यह  लगभग  तय  होता  जा  रहा  है
कि  मौसम
अनुशासन-विहीन  हो  गया  है  आजकल
अब  तो  वह
भू-गतिकी  के  नियम  भी  नहीं  मानता  !

सच  कहा  जाए
तो  अशुभ-संकेत  हैं  ये  लक्षण
पृथ्वी  के  स्वास्थ्य  के  लिए 
नितांत  घातक  !

सूर्य  की  सत्ता  का  निर्बल  होना
हमारे  पक्ष  में  नहीं  है
मगर  मौसम  की  अनुशासनहीनता  का  कारण
कौन  है  और
हमारे  सिवा ???

                                                                              ( 2014 )

                                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

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सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

ज़रूरत से ज़्यादा कमाने वाले

ज़रूरत  से  ज़्यादा  कमाते  हैं
कुछ  लोग
अपनी  वास्तविक  ज़रूरतों  से
बहुत  ज़्यादा
अपने  घर-परिवार  और  क़ुनबे  की
ज़रूरतों
स्वयं  अपनी  आशाओं
माता-पिता  के  स्वप्नों  
और  अपनी  तनख़्वाह  से  भी
कई  गुना  ज़्यादा  !

वे  जितना  कमाते  हैं
उससे  ज़्यादा  ख़र्च  करते  हैं
ऋण  ले-ले  कर
फिर  चुकाने  के  लिए 
और  ज़्यादा  कमाते  हैं 

कभी  रिश्वत  से 
कभी  कमीशन  से

उनके  दफ़्तर  में  पोस्टर  लगा  होता  है
'रिश्वत  लेना  और  देना
दोनों  अपराध  हैं !'

वे  नहीं  मानते  क़ानूनों  को
वे  नहीं  डरते  समाज  की  निंदा  से
वे  पकड़े  भी  जाते  हैं  रंगे  हाथ
तो  उनका  बाज़ार-मूल्य  बढ़  जाता  है  !

वे  अपनी  अतिरिक्त  कमाई  का
कुछ  हिस्सा
नियमित  रूप  से  चढ़ाते  हैं
तिरुपति  और  शिर्डी  के  भगवानों  को
और  अपने  से  ऊंचे अफ़सरों  को  !

उनके  बच्चे 
मंहगे  पब्लिक  स्कूलों  में  पढ़ते  हैं
देश  और  विदेश  में
और  बड़े  हो  कर 
अफ़सर,  उद्योगपति,
बड़े  व्यापारी  बनते  हैं  
अपने  माता-पिता  से  भी  ज़्यादा
कमाने  लगते  हैं....

न्याय-अन्याय,  उचित-अनुचित,  पाप-पुण्य,
अपराध  और  दण्ड
किसी  बात  का  भय  नहीं  होता
उन्हें  ...

वे  हमारे  महान  देश  की 
महान  प्रतिभाएं  हैं
संसार  के  योग्यतम  व्यक्ति...

यही  हैं  वे  लोग
जो  आम  आदमी  के 
ख़ून  के  प्यासे  हैं 
इन्हीं  का  राज  चलता  आया  है
कई  शताब्दियों  से !

यही  हैं  वे  लोग
जो  ज़रूरत  से  ज़्यादा  कमाते  हैं
और 
जिनकी  क़ौम  को  नष्ट  करने  की
क़सम  खाई  है  हमने  !

                                                          ( 2014 )

                                                    -सुरेश  स्वप्निल

....

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

मारा जाएगा तानाशाह...!

जिस  दिन
सच  बोलेगा  तानाशाह
मारा  जाएगा
उसी  दिन  !

सच  बोलना
चाहता  भी  नहीं  वह
भय  लगता  है  उसे
सच  को  स्वीकारने  में
कि  वह 
सच  बोलते  ही
शामिल  हो  जाएगा
आम  लोगों  की  भीड़  में  !

तानाशाह  मानता  है
कि  अति-मानव  है  वह
किसी  भी  अन्य  मानव  की  तुलना  में
यद्यपि  वह  स्वयं  जानता  है
कि  सच  नहीं  है  यह  …

क्या  सचमुच  इतना  डरता  है
तानाशाह
अपनी  मृत्यु  से  ??

वह  जीना  चाहता  है
किसी  भी  मूल्य  पर
चाहे  इसके  लिए
कितने  ही  मनुष्यों  कि  बलि
क्यों  न  लेना  पड़े  उसे  !

फिर  भी
कहीं  न  कहीं  अपने  अंतर्मन  में
अच्छी  तरह  से  जानता  है  वह
कि  मरना  ही  होगा  उसे  भी
एक  दिन  !

दरअसल,  हर  तानाशाह  डरता  है
अपनी  मृत्यु  से
क्योंकि  जानता  है  वह
कि  मृत्यु  से  बड़ा  सच
और  कुछ  नहीं  होता  …

जिस  दिन  वह
मृत्यु-भय  से  मुक्त  होगा
और  सच  बोलने  का  साहस  करेगा
उसी  दिन  मर  जाएगा

उसे  किसी  अन्य  शत्रु  की
ज़रूरत  नहीं  है
मरने  के  लिए
उसकी  अंतरात्मा  काफ़ी  है
और  उसके  पापों  का  बोझ  भी
उसे  मुक्ति  दिलाने  के  लिए  !

तानाशाह  से  मुक्ति  चाहिए
तो  प्रेरित  कीजिए  उसे
सच  बोलने  के  लिए  !!!

                                                         ( 2014 )

                                                   -सुरेश  स्वप्निल 

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

क्या करोगे अब ?

सावधान,  पक्षियों  !
बहेलिया  घूम  रहा  है
वन-प्रांतर  के  कोने-कोने  में
जाल  फैलाता
सब  पक्षियों  को
उनके  मनपसंद
दाने  डाल  कर  लुभाता  हुआ …

बहेलिए   की  मानसिक  प्रवृत्ति
तुम  से  बेहतर
और  कौन  जान  सकता  है  भला  ?

सारे  पशु-पक्षियों  को  भी
चेता  दो  ज़रा
कि  सारी  वन्य-प्रजातियां
सचमुच
बहुत  बड़े  संकट  में  हैं

केवल  एक  ही  अवसर  तो
चाहिए  होता  है
बहेलिए  को
वन  को  प्राणी-विहीन  बनाने  की
प्रक्रिया  शुरू  करने  के  लिए  !

बात  केवल  वन्य-प्राणियों  की
नहीं  है
इस  बार  दांव  पर  है
वन  का  सारे  का  सारा  पर्यावरण
पेड़-पौधे,  ज़मीन  और  जल
खनिज  और  शीतल  समीर  तक  …

बहेलिए  को  अवसर  मत  दो
बहेलिए  और  उसके  संगी-साथी
व्यापारियों  को …

क्या  करोगे  अब
बहेलिए  को  मार्ग  दोगे
वन  पर  राज  करने  का  ?

                                                ( 2014 )

                                         -सुरेश  स्वप्निल



मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

56 इंच का सीना...!

तलवार  कह  रही  है
मुझे  ख़ून  चाहिए ...

जब  तक  तलवार  का  होना  ही
अपने-आप  में 
पर्याप्त  कारण  है
तानाशाहों  के  जन्म  का
और  मनुष्यता  के  अवसान  का !

शायद  ही  कोई  अन्य  आविष्कार  हो
मनुष्य-जाति  का 
जो  इतना  बड़ा  शत्रु  हो
स्वयं  अपने  ही  जन्म-दाता  का  !

तानाशाह  चाहता  है 
अपनी  भोथरी  तलवार  के  दम  पर
सिकंदर  बन  जाना
यह  जानते  हुए  भी 
कि  अब 
देवी-देवता  भी  ए.के. 56  रखते  हैं
अपने  हाथ  में  !

लेकिन  तलवार  की  प्यास 
बुझती  नहीं 
इतनी  सरलता  से
चाहे  किसी  सैनिक  के  हाथ  में  हो
या  तानाशाह  के...

यदि  युद्धोन्माद  पूरा  नहीं  हुआ
तानाशाह  का 
तो  स्वयं  उसी  के  प्राण  भी 
मांग  सकती  है 
तलवार....

आख़िर  और  कहां  मिलेगा
56 इंच  का  सीना  तलवार  को
अपनी  प्यास  बुझाने  को  ?!!!

                                                             ( 2014 )

                                                      -सुरेश  स्वप्निल

...

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

दुर्भाग्य से, महाराज ...

हे  धर्म-इतिहास-संस्कृति  के
परम  ज्ञाता
महाराज …
आपको  स्मरण  नहीं  क्या
कि  तिल-भर  भूमि  के  लिए
लड़ा  गया  था
मनुष्यता  के  इतिहास  का
दुर्द्धर्ष-तम  युद्ध…

हां,  यह  सत्य  है
कि  उस  महाभारत  में  नहीं  थी
हम  किसानों  की  कोई
सक्रिय  भूमिका
किंतु  इस  बार
चैन  से  नहीं  जीने  देंगे  हम
अपने  खेतों  पर
कुदृष्टि  डालने  वालों  को

सत्य  यह  भी  है
कि  इस  बार  हर  महाभारत
राज-परिवारों  के  बीच  नहीं
होगा  किसान  और  हर  राजवंशी  के  बीच

हमारी  चुनौती  है
कि  इस  बार
हमारे  घर  का  कोई  अभिमन्यु,
कोई  घटोत्कच
या  कोई  भी  एकलव्य
प्राण  नहीं  देगा
अन्यों  की  राज-लिप्सा  के  कारण !

बस  करो,  महाराज
अनंत  उर्वरा कृषि-भूमि  का
मात्र  स्वार्थ  के  लिए  व्यापार !
मत  करो  पूंजीपतियों  की
अनुचित  दलाली
मत  बेचो  अपनी  आत्मा
क्षण-भंगुर  राज-सत्ता  के  लिए...

इस  समय  का  सबसे  बड़ा  सत्य
यही  है  महाराज
कि  हर  किसान  सन्नद्ध  है
अपने  और  अपनी  भावी  पीढ़ियों  के
हितों  की  रक्षा  के  लिए
और  तैयार  है
संसार  की  किसी  भी  महाशक्ति  के  विरुद्ध
युद्ध  के  लिए !

दुर्भाग्य  से,  महाराज
तुम्हारा  अंतिम  सत्य  यह  है
कि  तुम
जानते  ही  नहीं  कि  इस  बार
केवल  पराजय  ही  रह  गई  है
तुम्हारे  हाथ  में  !

                                                            ( 2014 )

                                                     -सुरेश  स्वप्निल 

...


बुधवार, 29 जनवरी 2014

क्या देंगे विरासत में ?

शब्द  बचे  ही  कहां  हैं
अब  गांठ  में
कि  ख़र्च  कर  दिए  जाएं
कविताई  में  !

बहुत  मुश्किल  से  सहेजी  थी
यह  पूंजी  पुरखों  ने
और  हमारे  समय  में
पता  नहीं  कहां-कहां  से  चले  आए
इसे  लूटने  वाले …
और  हमारी  पीढ़ी  इतनी  कृतघ्न
कि  ज़रा-से  प्रलोभन  पर
बिकते  रहे,  बेचते  रहे  अपनी  नैतिकता
ईमानदारी,  संस्कार,  विवेक…

किसी  ने  नहीं  सोचा  कभी
कि  क्या  देंगे  विरासत  में
अपने  बाल-बच्चों  को
यदि  शब्द  भी  नहीं  हाथ  में  !

                                                             ( 2014 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

रविवार, 26 जनवरी 2014

वह गणतंत्र हमारा है !

ख़ूनी  सरमायादारों  का
पूंजी  के  ताबेदारों  का
सारे  कुत्सित  व्यापारों  का
बिके  हुए  अख़बारों  का 
जो  मारा  है
वह  गणतंत्र  हमारा  है !

नेताओं  की  लूटमार  से
सरकारों  के  जन-संहार  से
जाति-धर्म  के  कार-बार  से
मंहगाई  की  तेज़  धार  से
बार-बार  जो  हारा  है
वह  गणतंत्र  हमारा  है  !

अमरीकी  घुड़की   के  आगे
घुटनों  के  बल  खड़ा  हुआ  है
विश्व-बैंक   के  दरवाज़े  पर
औंधे  मुंह  जो  पड़ा  हुआ  है
वॉलमार्ट  से  मोनसैंटो
सबका  एक  सहारा  है
वह  गणतंत्र  हमारा  है  !

                                                 ( 2014 )

                                           -सुरेश  स्वप्निल

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

उठो, साथी !

जो  अधमरा  शरीर
सड़क  पर  पड़ा  है
वही  है  महान  भारत  का
भिखमंगा गण !
और जो खड़ा है
उस अधमरे  शरीर के  सीने  पर
पांव  रख  कर
वही  है  तंत्र !

हास्यास्पद  कहें  या  वीभत्स
मगर  सत्य  यही  है
कि  हर  अधिनायक  इस  देश  का
चुना  जाता  है
तथाकथित  रूप  से
इसी  'गण'  से  मत  ले  कर !

यह  समय  शोक  मनाने  का  नहीं  है
जैसे  मरते  हुए  केंचुए  में  रह-रह  कर  उठती  है
जीवन  की  लहर
जैसे  पारंपरिक  युद्धों  में
सिर  कट  जाने  के  बाद  भी
लड़ते  रहते  थे  रुंड
ठीक  उसी  तरह  अचानक
न  जाने  कब  उठ  खड़े  होंगे
सड़क  पर  पड़े  हुए  गण
अपनी  घायल  देह  लिए ...

सारा  संसार  जानता  है
कि  यही  गण  है
जो  भयंकरतम  शस्त्रास्त्र  को
अपनी  दुर्बल  काया  पर  झेल  कर
किसी  भी  महानायक
किसी  भी  अधिनायक  की  सत्ता  को
मिट्टी  में  मिला  देता  है
समय  आते  ही  !

समय  कब  आएगा  मगर
अगली  बार  ?

उठ  जाओ,  महान  भारत  के  महा-मनुष्य
बहुत  हो  चुकी  हिंसा-प्रतिहिंसा
बहुत  हो  चुके  भ्रम-विभ्रम
एक  लक्ष्य
एक  मार्ग
गण  की  क्रांति
जन-जन  की  क्रांति  !

उठो,  साथी  !
मृत्यु  का  डर  जिसे  हो
वह  योद्धा  नहीं
और  'जन-गण-मन'  तो
कदापि  नहीं ! 

                                                                 ( 2014 )

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

...


शनिवार, 18 जनवरी 2014

सामंत की बकरी ...!

च्च च्च च्च च्च !
बहुत  बुरा  हुआ  सचमुच
सामंत  की  बकरी  मर  गई  !

सामंत  का  दुःख  बहुत  बड़ा  होता  है
शोक  मनाओ,  मूर्खों  !
अपनी  बकरियों  की  चिंता  करो, 
हानि  उठाने  के  लिए  नहीं  होता
सामंत  का  जन्म  !
आज  नहीं  तो  कल
आ  ही  धमकेंगी
सामंत  की  सेनाएं
क्या  पता  किसकी  बकरी  पर
मन  आ  जाए
सैनिकों  का  !

मीडिया  से  सबक़  सीखो

अपने  चेहरों  पर  कालिख़  पोत  लो
मातम  मनाओ
और  अपनी  बकरियों  को
बांध  कर  रखो  बाड़े  में  …

मज़ाक़  नहीं  है
सामंत  की  बकरी  का  मरना  !

                                                         ( 2014 )

                                                    -सुरेश  स्वप्निल

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

हत्प्रभ है पुराना जादूगर !

बहुत  परेशान  है  जादूगर
आजकल !

सारे  मंत्र  निर्जीव  होते  जा  रहे  हैं
सारी  युक्तियां  निष्प्राण
दर्शक-दीर्घा  सूनी  हो  रही  है
निरंतर...

जादूगर  को  काठ-सा  मारता  जा  रहा  है
कुछ  समय  से
जब  से  एक  नया  जादूगर  आ  गया  है
शहर  में
मंत्र  पुराना  जादूगर  पढ़ता  है
प्रभाव  प्रकट  होता  है
नए  जादूगर  के  मंच  पर ...

पुराना  जादूगर  हत्प्रभ  है
कि  कैसे  उसकी  जादुई  शक्तियां
काम  करने  लगी  हैं
उसके  शत्रु  के  पक्ष  में  !

सरासर  यह  शक्तियों  की  चोरी  का
षड्यंत्र  है
पता  नहीं  किसका  मस्तिष्क 
काम  कर  रहा  है
इस  सबके  पीछे

दुर्भाग्य  यह  है  कि
विधि  की  पुस्तकों  में 
अपराध  की  श्रेणी  में  नहीं  आता
यह  कृत्य  !

उसकी  शक्तियां  यदि  काम  कर  रही  होतीं
पूर्ववत
तो  पता  नहीं,  कब  का
ठिकाने  लगा  चुका  होता  वह
नए  जादूगर  को...
जैसे  अपने  हज़ारों  तथाकथित 
शत्रुओं  को  लगा  चुका  है  अभी  तक !

यहां  तक  भी  ठीक  था
किंतु  उसके  अपने  प्रशंसक  भी
न्याय-अन्याय  की  बात  करने  लगे  हैं
नए  जादूगर  के  प्रभाव  में  आ  कर !

यद्यपि  अनावश्यक  है  यह  कथन
कि  सबको  देना  पड़ता  है
अपने  कर्मों  का  हिसाब
इसी  जन्म  में
परंतु  मन  नहीं  मानता
पुराने  जादूगर  का ...

क्या  ईश्वरत्व  को  प्राप्त  कर  चुका
कोई  मनुष्य
फिर  से
प्राप्त  हो  सकता  है
साधारण  मनुष्यत्व  को  ?

इस  प्रश्न  का  उत्तर
केवल  वही  जानते  हैं
जो  विश्वास  करते  हैं  
दैवीय  शक्तियों  में  

हम  तो  दर्शक-मात्र  हैं 
इस  खेल  के...!


                                          ( 2014 )

                                     -सुरेश  स्वप्निल 

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बुधवार, 15 जनवरी 2014

भेड़ों का उत्तरदायित्व !

फिर  एक  बार
सौंप  दिया  गया  है
रेवड़ों  का  उत्तरदायित्व
अन्धों  के  हाथों  में
इस  गहन  विश्वास  के  साथ 
कि  हर  शाम  आ  जाएंगी  सुरक्षित
सभी  भेड़ें
अपने  बाड़े  में !

काश !  सारे  मांसाहारी  वन्य-जीव
इस  'सदाशयता'  को  समझ  पाते !

समय  हालांकि  फिर  उपस्थित  है
रेवड़ों  के  चरवाहों  के  चुनाव  का

सबसे  अधिक  उत्कंठित  हैं
मांसाहारी  जीव
यदि  किसी  दृष्टिवान  के  हाथ 
सौंप  दी  गई  भेड़ों  की  कमान,  तो  ?

कुछ  उत्तरदायित्व  भेड़ों  का  भी  है
शायद
अपने  प्राण  बचाने  का !!!

                                                            ( 2014 )

                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

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रविवार, 12 जनवरी 2014

बदलाव का उत्तरदायित्व...

दुःख-भरी  कविताओं  से
कहीं  अधिक  भयंकर  है
आधुनिक  समय  का  यथार्थ

दुर्भाग्य  यह  है
कि  यथार्थ  को  बदलने  का 
उत्तर-दायित्व
जिन  शक्तियों  पर  है
वे  सब  की  सब 
विरोधी  हैं  जनता  की
और  केवल  जन-शत्रु  ही  हैं
जो  सुखी  हैं
इस  क्र्रूर  समय  में...

उस  जनता  को 
कोई  अधिकार  नहीं  शिकायत  करने का
जो  खड़ी  नहीं  होती
अन्याय  के  प्रतिकार  के  लिए
और  चुपचाप  सहती  रहती  है
हर  अत्याचार...

लोकतंत्र  है
तो  व्यवस्था  बदलने  का  जिम्मा
तंत्र  से  अधिक  है
लोक  पर !

अब  समय  बहाने  बनाने  का  नहीं
व्यवस्था  बदलने  का  है
और  सरकार  बदलने  का भी  !

                                                              ( 2014 )

                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

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