सोमवार, 22 जुलाई 2013

यह कैसा संविधान ?

देश  में  अब
भेड़िया-तंत्र  चाहते  हैं
सियार !

वर्ण-संकर  कुत्तों  की  सरकार
बहुत  चल  चुकी
शेर  विलुप्त  हो  चुके
वन-प्रांतर  से
हाथी  शाकाहारी  हैं  अब  भी

विकट  समय  है  !
समस्या  यह
कि  सुरक्षा  कौन  करेगा
देश  की  ?

मुर्दाख़ोर  कबरबिज्जू
लाशें  खोद-खोद  कर
ख़ाली  कर  चुके
क़ब्रस्तान
और  अब
दृष्टि  लगाए  बैठे  हैं
जीवित  मनुष्यों  पर  !

विडम्बना  यह  कि
सारी  समृद्धि  लूट  कर
बैंक-खातों  में  जमा  कर  चुके
यही  मुर्दाख़ोर  कबरबिज्जू
वित्त  जुटा  रहे  हैं
भेड़िये  के  राज्यारोहण  के  लिए...

उफ़ !  यह  कैसा  संविधान  है
इस  देश  का
जहां  केवल  मनुष्यभक्षी  ही
पा  सकते  हैं  सत्ता !!!!! ?????

                                        ( 2013 )

                                  -सुरेश  स्वप्निल




गुरुवार, 18 जुलाई 2013

तुम्हारे बच्चे नहीं थे न !

वे  जो  मार   डाले  गए
ज़हर  मिला  खाना  खिला  कर
वे  तुम्हारे  बच्चे  नहीं  थे  न  !

वे  तो  मनुष्य  भी  नहीं  थे  शायद
सड़े-गले  जानवरों  का  मांस
और  तुम्हारी  जूठन  पर
जीवित  रहने  वाले
चूहे  खाने  वाले
मुसहर  कहीं  के  !

तुम्हारी  कृपा  न  होती
तो  जान  पाते  क्या  वे
गेहूं  की  रोटी
और  अरहर  की  दाल  का  स्वाद  ?

हम  भी  कितने  कृतघ्न  हैं
कि  संदेह  कर  रहे  हैं
तुम्हारी  दयालुता  पर  !

अच्छा,  जो  बच्चे  मर  गए
एक  समय  के  भोजन  के  लालच  में
वे  जीवित  रहते  तो  क्या  करते  ?
अंततः,  बंधुआ  ही  तो  बनते  तुम्हारे  !

अच्छा  हुआ
जो  मार डाला  तुमने
ज़हर  खिला  कर
मुक्त  तो  हुए
जीवन-भर  की  दरिद्रता
और  रोज़ी-रोटी  की  चिंता  से  !

जो  कुछ  भी  हुआ
अच्छा  ही  हुआ
वे  क्या  पढ़-लिख  कर
प्रधानमंत्री  बन  जाते  !

मत  रोओ  उनके  नाम  पर
महा मूर्खों !

                                           ( 2013 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल


बुधवार, 17 जुलाई 2013

दो-टके के भिखारी !

हम  'प्रजा'  नहीं  किसी  की
न  तुम  राजा  या  सम्राट  हमारे
हम  हैं  'लोक'
संप्रभु,  स्वायत्त  नागरिक  !

हम  पर  'राज'  करने  के  सपने
मत  देखो,  मूर्खाधिराज !
सिर्फ़  'सेवक'  हो  तुम  हमारे
वेतन-प्राप्त  करने  वाले
पांच  वर्ष  की संविदा  पर  नियुक्त
साधारण  कर्मचारी  !

संविदा  समाप्त
तुम्हारी  नौकरी  भी  समाप्त  !

अगली  बार
हमारा  'मत'  मांगने  आओ
तो  ध्यान  रखना
अगली  बार  तुम्हारे  वचन-भंग
तो  तुम्हारा  छत्र  भी  भंग !

जाओ,  ज़्यादा  शोर  मत  करो
दो  टके  के  भिखारी
मक्कारों !
बहुत-से  काम  करने  हैं  हमें
तुम्हारा  दोज़ख़  भरने  को  भी  !

                                           ( 2013 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल






मंगलवार, 16 जुलाई 2013

क्या कर लेंगे आप ?

मैं / जली-कटी  सुनाने  का  आदी  हूं !
चीखूंगा-चिल्लाऊंगा / सबको  दूंगा  अभिशाप
मेरा  क्या  कर  लेंगे  आप ?
पहले  दीपक  को  गाली  दी  थी
अब  सूरज  को  दूंगा / आप  रोकेंगे  मुझे ?
हिम्मत  है  तो  आ  जाइए / अपनी  मर्दानगी  आज़माइए
कम  से  कम/ चुप  तो  नहीं  कर  सकेंगे  मुझे  आप !
यह  तो / आपकी  ही  नज़रों  में  अवैध  है
बोलने  की  आज़ादी / दी  है  हमें / शायद / आपको  इसका  खेद  है
तो  छीन  लीजिए  यह  आज़ादी  भी /-
और  अपनी  मां  के  गटर  में / डाल  आइए  !
लेकिन / खाने-पीने  और  कमाने  से  वञ्चित  आदमी  का /
खुला  हुआ  मुंह
गालियां नहीं / तो  क्या / तुलसी  के  भजन  सुनाएगा ?

ग़रीबों  का  सूखता  लहू / एक  दिन / रंग  लाएगा।
क्या  तुम / क़यामत  के  उस  दिन  के  लिए / तैयार  हो ?

नफ़रत  की  आग / बुरी  होती  है / मेरे  यार ! / जल  जाओगे।
हमें  छुओ / हमें  जानो / हमारे  क़रीब  आओ
हमारे  दुःख-सुख  में / हाथ  बंटाओ / तो  जी  सकोगे।
वरना / याद  रखना- यार / वक़्त  के  सर  से / जब  पानी  गुज़र  जाएगा
तुम्हारे  अस्तित्व  का / कोई  भी  चिह्न / नहीं  नज़र  आएगा।

मेरी  आवाज़ / वक़्त  की  तरफ़  से / चेतावनी  है  तुम्हें
सुनो  न  सुनो / तुम्हारी  मर्ज़ी !
फिर  भी / मैं/ चीखूंगा-चिल्लाऊंगा / सबको  दूंगा  अभिशाप
मेरा  क्या  कर  लेंगे  आप ?

                                                                                                ( 1976 )

                                                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'देशबंधु', भोपाल, 1976, 'अंतर्यात्रा'-13, 1983 एवं अन्यत्र। पुनः प्रकाशन  हेतु उपलब्ध।

सोमवार, 15 जुलाई 2013

तुम्हारा भावी राजाधिराज !

नमो-नमो !

इस  चेहरे  को  ध्यान  से  देखो
इसके  काया-कल्प  में
एक  सौ  पचास  करोड़  रुपये
ख़र्च  हो  गए
पूंजीपतियों  के  !

नमो-नमो  !

इस  चेहरे  को  और  ध्यान  से  देखो
सो  कर  उठने  से  लेकर
दर्शकों  के  सामने  लाने  तक
दर्ज़न-भर  दास-दासियां
लगे  रहते  हैं
घंटों  तक !

नमो-नमो  !

कुछ  और  ध्यान  से  देखो
इस  चेहरे  को
अभी  कुछ  देर  में
रक्त  छलकने  लगेगा  इसकी  आंखों  में
मुंह  से  बाहर  निकल  आएंगे
कुछ  दांत
निर्दोष  मनुष्यों  के
रक्त  से  सने

नमो-नमो  !

यह  मनुष्य  है  या  भेड़िया
या  आधा  मनुष्य  है
और  आधा  भेड़िया ...
यह  जो  कुछ  भी  है
यह  तुम  तय  करो
मगर  यह  तुम्हें  कुत्ते  का  पिल्ला
कहता  है !

नमो-नमो  !

इसे  स्वीकार  करो
मूर्ख  जनता !
यह  मनुष्य  हो  या  पशु
देव  हो  या  दानव
यही  है  तुम्हारा  मुक्तिदाता
तुम्हारा  भावी  राजाधिराज  !

नमो-नमो
नमो-नमो !

                                      ( 2013 )

                              -सुरेश  स्वप्निल 

 


शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

क्रांति के बाद !

दुर्भाग्य  यह  है  कि  जनता
सब  कुछ  याद  रखती  है
कई-कई  शताब्दियों
और  पीढ़ियों  के
गुज़र  जाने  के  बाद  भी

दुर्भाग्य  यह  भी  है
कि  जनता
अक्सर  विरोध  नहीं  करती
शासकों  का

मगर  सबसे  बड़ा  दुर्भाग्य
यह  है  कि
जनता  जब  उठ  खड़ी  होती  है
विद्रोह  के  लिए
तो  बड़े  से  बड़े  साम्राज्य  भी
मिल  जाते  हैं
धूल  में !

और  शासकों  को  यह  समझ  में
आता  तो  है,
मगर  क्रांति  के  बाद !

                                                     ( 2013 )


                                            -सुरेश  स्वप्निल


गुरुवार, 11 जुलाई 2013

शब्दों का समुचित मूल्य !

बहुत-से  शब्द  थे
स्मृति  की  पोटली  में
लगभग  अनगिनत
एक-एक  कर  झिर  गए
जीवन  के  पथ  पर ...

जाने  कब-कहां  छेद  हो  गया !

मैंने  तो
बहुत  सावधानी  से  सहेज  रखी  थी
शब्दों  की  पोटली
अपने  कंधे  पर !

मुझे  पता  नहीं
कि  संसार  के  किस  बाज़ार  में
बिकते  हैं  शब्द
कौन  चोर  ऐसा  हो  सकता  है
जिसे
दूसरे  के  शब्द  चाहिए
जीवन-यापन  के  लिए !
कौन  ग्राहक  होगा  इतना  समृद्ध
कि  चुका  सके
शब्दों  का  समुचित  मूल्य !

यह  भी  संभव  है
कि  सचमुच
मेरी  ही  असावधानी  से
फट  गई  हो  पोटली !


मेरे  शब्द
किसी  के  भी  काम  के  नहीं  हैं
यथार्थतः
और  वस्तुतः
केवल  अपने  ही  शब्द  हैं
जो  पार  करा  सकते  हैं
वैतरणी  जीवन  की !

जो  भी  हो
यदि  आप  में  से  किसी  को
मिले  हों  मेरे  शब्द
तो  लौटा  दें,  कृपया !
मेरा  पता  है ......

                                                ( 2013 )

                                        -सुरेश  स्वप्निल


शनिवार, 6 जुलाई 2013

सभ्य-जनों, सुनो !

अपने-अपने  घरौंदों  में  दुबके  हुए
शांति-प्रेमी  देश-भक्त  नागरिकों,  सुनो
सुनो  सभी
सुसंस्कृत,  सुशिक्षित
सभ्य-जनों,  सुनो
सुनो  हे  जन-गण-मन  गायकों
क़ानून  के  पालनहारो,  सुनो

सुनो,  क्योंकि  तुम
केवल  सुनना  ही  जानते  हो
तुम  रेडियो  सुनते  हो
और  सच  मान  लेते  हो
टी . वी .  देखते  हो
और  सच  मान  लेते  हो
अख़बार  पढ़ते  हो  और  छपे  हुए
हर  शब्द  को 
अकाट्य  प्रमाण  मान  लेते  हो ....

तुम्हें  केवल  मानना  ही  आता  है
प्रश्न  करना  तो  कब  का  भूल  चुके  हो  तुम
हर  कोई  ईश्वर  बन  जाता  है  तुम्हारा
यहां  तक  कि  नून-तेल-लकड़ी  बेचने  वाला  भी
और  शक्कर  से  मधुमेह  का
उपचार  करने  वाला  भी ....

जब  तुम्हारी  आंखों  के  आगे
सड़क  पर  पड़ी
घायल  महिला 
दम  तोड़  रही  होती  है
तब  तुम  बहरे  हो  जाते  हो
जब  तुम्हारे  विधर्मी  पड़ोसी  का  घर
आग  के  हवाले  कर  दिया  जाता  है
तुम  आंखों  पर  हाथ  रख  कर
अंधे  बन  जाते  हो
जब  कोई  अत्याचार  का  शिकार
न्याय  की  लड़ाई  में
तुम्हें  गवाह  बनाना  चाहता  है
तुम  गूंगे  हो  जाते  हो

जब  सत्ताधीश  और  पूंजीपतियों  की  सम्मिलित  सेनाएं
तुम्हारी  आने  वाली  पीढ़ियों  के  लिए
जीवित  रहने  के  सारे  मार्ग  बंद  कर  रही  होती  हैं
तुम  अंधे-बहरे-गूंगे
और  लंगड़े-लूले  बन  कर
समर्पण  कर  देते  हो ....

तुम  इसी  योग्य  हो
कि  बीच  सड़क  पर  रौंद  दिए  जाओ
और  दफ़न  हो  जाओ  एक  मृत  राष्ट्र  की  भांति

अब  कभी  जनपथ  पर
मत  आना  न्याय  की  पुकार  लगाने !
                               
                                                                  ( 2013 )

                                                           -सुरेश  स्वप्निल


गुरुवार, 4 जुलाई 2013

भेदने होंगे सारे चक्रव्यूह

शासकों  का 
हृदय-परिवर्त्तन  नहीं  होता
परिवर्त्तन  चाहिए
तो  मौन  असंतोष  से
कुछ  नहीं  होगा
और  न  छिट-पुट  विप्लवों  से

उखाड़  कर  फेंकने  होंगे
साम्राज्यों  के  स्मृति-चिह्न
तोड़ने  होंगे  सत्ताधारियों  के 
सारे  तिलिस्म
ध्वस्त  करने  होंगे
शत्रुओं  के  सुरक्षा-कवच
भेदने  होंगे
सारे  चक्रव्यूह
फाड़  कर  फेंकनी  होंगी  ध्वजाएं
गढ़ने  होंगे  नए  प्रतीक
और  प्रतिमान
तत्पर  रहना  होगा
किसी  भी  क्षण
बलिदान  के  लिए ....

क्रांति
कोई  बच्चों  का  खेल  नहीं  है !

                                                      ( 2013 )

                                               -सुरेश  स्वप्निल


मंगलवार, 2 जुलाई 2013

पता नहीं कब...

आपदा  मेरी  नहीं  थी
मैंने  वे  हिमखण्ड  नहीं  देखे
जो  धरती  का  तापमान  बढ़ने  पर
पिघल  गए
वे  पर्वत  भी  नहीं  देखे  मैंने
जहां  मेघ  फटे
और  बहा  ले  गए  गांव  के  गांव

जो  लोग  अदृश्य  हो  गए
भागीरथी-अलकनंदा  के  प्रवाह  में
उनमें  संभवतः  कोई  भी
परिचित  नहीं  था  मेरा

मगर  मैं  क्या  करूं
इतने  सारे  शव
और  भय  से  कांपते  मनुष्य,
पशु-पक्षी  और  पेड़-पौधे  देख  कर
संभवतः  उन्मादी  हो  गया  हूं  मैं
कोई  तर्क,  कोई  धारणा  मेरे  काम  नहीं  आते
कोई  अदृश्य  शक्ति  मुझे
सांत्वना  नहीं  दे  पाती
कोई  ईश्वर  तैयार  नहीं  कारण  समझाने  को ....

मुझे  पता  नहीं  कि  कब  तक
नींद  नहीं  आएगी  मुझे
पता  नहीं  कब  तक
वे  अपरिचित  चेहरे
भय  और  दुःख   में  डूबे  हुए
रुलाते  रहेंगे  मुझे

पता  नहीं  कब
मैं  लिख  पाऊंगा
नई  कविता  !

                                                 ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल




रविवार, 23 जून 2013

बोलते क्यों नहीं ? !

त्रासदी  यदि  वैयक्तिक  हो
तो  स्वयं  भुक्त-भोगी  भी  भूल  जाता  है
थोड़े-बहुत  समय   के  बाद
किंतु  इतनी  बड़ी,
सामूहिक  त्रासदी  ....

असंभव  है  कि  कोई  भूल  पाए !

क्या  कोई  भूल  सकता  है
बंगाल  का  दुर्भिक्ष
या  बर्मा  का  प्लेग
या,  भोपाल  गैस-त्रासदी ?

निश्चय  ही,
कई  शताब्दियों  तक
कई-कई  पीढ़ियों  तक
दोहराती  रहेंगी  केदारनाथ  का  जल-प्रलय
प्रकृति  के  भयंकर  प्रतिशोध
और  इस  त्रासदी  के  लिए  उत्तरदायी
व्यक्तियों  और  अ-नीतियों  की  महा-गाथाएं ...

आप  सुन  रहे  हैं
समझ  रहे  हैं  न ?

तो  कुछ  बोलते  क्यों  नहीं ? !

                                                          ( 2013 )

                                                   -सुरेश  स्वप्निल 




शनिवार, 22 जून 2013

अगले रण में जीतेगी जनता !

एक  सीधा-सपाट  बयान  है  यह
तुम्हारे  तथाकथित 
लोकतंत्र  के  अंतिम  छोर  पर  बैठे
आम  आदमी  का
वही  जिसके  नाम  पर
तुम्हारी  निर्बाध, निरंकुश  सत्ता  का  जाल
फैला  हुआ  है
पृथ्वी  से  आकाश  तक…

सुनो,  तानाशाह  !
हमने  अगर  चुना  भी  था  तुम्हें
तो  इसलिए 
कि  तुम्हारे  शब्द  और  वस्त्र
मनुष्यों  की  भांति  दीखते  थे
कि  तुम  वही  भाषा  बोल  रहे  थे
जो  सुनना  चाहते  थे  हम,
इस  लोकतंत्रात्मक  देश  के  असली  मालिक
हम  जो  चाहते  थे  कि
हमारा  प्रतिनिधि  हमारी  बात  सुने,
समझे  और  उसके  अनुरूप
नीतियां  बना  सके
और  नीतियों  को  कार्य-रूप  में
परिणत  कर  सके

हम  छले  गए
तुम  और  तुम्हारे  क्रीत  प्रचार-तंत्र  के  हाथों

तुमने  अपने  हर  वचन  को  भंग  किया
हर  वादे  को  तोड़ा
हर  बात  से  मुकर  गए
और  सेवक  से  अचानक  मालिक  बन  गए !

तुम  यह  भूल  गए
अत्यंत  सुविधाजनक  रूप  से
कि  यह
संसार  की  सबसे  विशाल  जनसंख्या  है
जिसने  हर  उस  तानाशाह  को
शिकस्त  दी  है
जिसके  राज  में  किम्वदंती  थी
सूरज  के  नहीं  डूबने  की ....

तुम  यदि  नहीं  जानते  तो  सुन  लो
तुम्हारा  सूर्यास्त  होने  को  है
कुछ  ही  क्षण  बाद ....

कल 
जब  तुम्हारी  अजेय  सेना
थके-हारे  क़दमों  से  लौटेगी
अपने  शिविर  में
तो  किस  तरह  तैयार  करोगे  उसे
अगले  रण  के  लिए ?

तुम  हार  गए,  तानाशाह !
स्वयं  अपनी  ही  ग़लतियों  से !

अगले  रण  में
जीतेगी  जनता
सिर्फ़  और  सिर्फ़  जनता !

                                                    ( 2013 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल 





शुक्रवार, 21 जून 2013

बाढ़: कुछ दृश्य

           एक 

रात-दिन  चल  रहे  हैं 
राहत  और  बचाव  के  प्रयास 

उड़  रहे  हैं  हेलिकॉप्टर 
भोजन  और  पानी  के  पैकेट 
गिराते  हुए 
लाशों  के  ढेरों  पर… 

जीवित  बचे  हुए 
भटक  रहे  हैं 
अबूझ  जंगलों  में 
जीवन  और  मृत्यु  दोनों  को 
छलते  हुए ....!

पता  नहीं 
पहुंच  भी  पाएंगे  
या  नहीं 
राहत  शिविरों  तक  !


                दो

दिल्ली  में  सब  के  सब 
चिंता-मग्न  हैं  
बाढ़  से  निबटने  के  तरीक़े 
ढूंढने  में 

केदारनाथ  में  गिद्ध  मंडरा  रहे  हैं 
नई-नई  लाशों  के  प्रकट  होने  की 
प्रतीक्षा  में  !


            तीन

कौन  कह  सकता  है  कि  कल  गंगा 
प्रतिगामिनी  हो  कर 
रायसीना  हिल्स और  लुट्येंस  ज़ोन  तक 
नहीं  पहुंचेगी  ?

कौन  कह  सकता  है  कि  दिल्ली 
नहीं  उजड़ेगी  फिर  से 
दस  से  अधिक  तीव्रता  के  
भूकंप  से  ?

क्षण-क्षण  मृत्यु  की  ओर 
बढ़ती  हुई 
राजधानी  के  लोग 
इतने  निश्चिंत  कैसे  हो  सकते  हैं 
उत्तराखंड  की  हालत 
देखने  के  बाद ?


                    चार 

देखते-देखते  
श्मशान  में  बदल  गए 
चार  सौ  गांव 

देखते-देखते 
मृत्यु  का  ग्रास  बन  गए 
हज़ारों  जीवित  मनुष्य 
पशु-पक्षी  और  पेड़-पौधे 
निरंतर  चेतावनियों  के  बावजूद ....

शर्म  से  मरे  नहीं  अब  तक 
बाढ़  को 
बस्तियों  तक  
लाने  वाले  !

                                                   ( 2013 )

                                           -सुरेश  स्वप्निल


बुधवार, 19 जून 2013

इन डरावनी उपत्यकाओं में....

मिट्टी  के  इन  ढूहों  को
ध्यान  से  देखिए
इन्हीं  में  कहीं  दबा  है
एक  शहर !

विध्वंस  की  महागाथा  छिपी  है
इन्हीं  टीलों  में  कहीं
आत्म-विनाश  की  प्रवृत्ति  के  प्रमाण
आत्म-घाती  विकास  की  अवधारणाएं
मनुष्य  के  अ-मनुष्य  होते  जाने
और  मूल्यों  के  पतन  की  कहानियां ....

यहीं  कहीं  दबे  पड़े  हैं
गर्वोन्नत  सभ्यता 
और  तथाकथित  महानतम  संस्कृति  के
नष्टप्राय  अवशेष ....!

प्रकृति  तो  बार-बार  चेताती  थी
हम  ही  अनसुना  करते  रहे ....

अंततः,  क्या  ढूंढने  आए  हैं  हम
इन  डरावनी  उपत्यकाओं  में  ?

                                                       ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल 


मंगलवार, 18 जून 2013

नदी का मार्ग मत रोको !

नदी  का  मार्ग  मत  रोको
उसे  आता  है
मार्ग  की  हर  बाधा  को  हटाना
और  नए  मार्ग  की  खोज  करना

नदी  का  मार्ग  मत  रोको
उसे  पता  है  कहां-कहां  सूराख़  हैं
तुम्हारी  योजनाओं  में
और  कितना  मैल  जमा  है
तुम्हारे  मन-मस्तिष्क  की  तलहटी  में

नदी  यूं  ही  नहीं  बहती  आ  रही  सदियों  से
वह  तुम्हारी  हर  चाल  से  परिचित  है
और  जानती  है
जीतने  के  सारे  गुर

नदी  से  बैर  मत  लो
वह  बहुत  शक्तिशाली  है  तुमसे

नदी  का  मार्ग  मत  रोको
उसे  बहना  आता  है
और   बहा  ले  जाना  भी  !

                                                           ( 2013 )

                                                    -सुरेश  स्वप्निल


रविवार, 16 जून 2013

शाह कियो बदजात !

( जनाब कलीम 'अव्वल' साहब की ख़िदमत में, बेहद ख़ुलूस और एहतराम के साथ )

                             दोहे
अल्लह   दीन्ही    आतमा    नजर  नवाजी  पीर
औरन    कोऊ    होइये    अपनो    शाह    कबीर

अंतर  बिच   झगड़ा  भया   को  जेठौ  को  छोट
मन  मूरख  अड़ियल  भया  आतम  काढ़े  खोट

जग  को  का  समझाइये    सब  मूरख  के  यार
का   कहिबो   का   बूझिबो   भै   जूतम    पैजार

साहिब    मेरौ    बावरो    दीन्हो    ज्ञान   लुटाय
जाकी    जेती    गाठरी   बांधि-बांधि   लै   जाय

काटि   कलेजा   लै   चले   का  खंजर  का  बात
कौन पाप कीन्हो  मुलुक  शाह  कियो  बदजात

साहिब   हम   मुरदा   भए   ठटरी   बांधो  कोय
माटी   की   पुतली   मुई   धाड़-धाड़  जग  रोय !

                                                               ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल


जंगल: दो कविताएं

जंगल: एक 


टूट  गया
शेर  और  भेड़िये  का 
गठबंधन !

इसमें  ख़ुश  होने-जैसी
कोई  बात  नहीं
ख़रगोशों !

वे  हिंस्र  थे
और  हिंस्र  ही  रहेंगे

वे  तो  अकेले  भी  बहुत  हैं
निरीह  शाकाहारियों  के  लिए !

जंगल: दो 

 

 क्रांतियां  मनुष्यों  की  बस्तियों  में
होती  हैं
मूर्ख  खरगोशो !

यहां,  जंगल  में
शेर  ख़त्म  भी  हो  गए  तो  क्या ?
चीते,  भालू,  भेड़िये
लकड़बग्घे  कम  हैं  क्या ?

तुम  जब  तक
छिपते  रहोगे  अपनी  मांदों  में
मारे  जाते  रहोगे
यूं  ही  बेमौत  !

ज़िंदा  रहना  चाहते  हो
तो  लड़ना
और  जीतना  सीखो।

                                                      ( 2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल 




शनिवार, 15 जून 2013

समय के विरुद्ध

कुछ  लोग
सदा  समय  के  पीछे  चले
अत्यंत  विनम्र,  मौन
चींटियों  की  भांति  पंक्ति-बद्ध
समय  की  जूठन  पर
जीते  हुए
और  भुला  दिए  गए
मरी  हुई  चींटियों  की  भांति

कुछ  लोग  समय  के  आगे-आगे
दौड़  लगाते  रहे
और  थक  कर
सो  गए  बीच  राह  में
और  कुचले   गए
समय  के  पांवों  के  नीचे

कुछ  लोग  जो  अधिक  बुद्धिमान  थे
समय  के  साथ-साथ  चले
शरणागत  हो  कर
मिमियाते  हुए 
और  मारे  गए
क्रांति  के  प्रथम  शिकार  हो  कर

लेकिन  कुछ  लोग  थे
जो  समय  के  विरुद्ध
लोहा  ले  कर  खड़े  थे
चुनौती  बन  कर
वे  लड़े
अपनी  पूरी  चेतना  और  वीरता  के  साथ
कुछ  खेत  रहे
कुछ  जीत  गए
कुछ  हार  गए ....

वे  सब  के  सब
इतिहास  में  अपनी  जगह  बना  गए
नायकों  के  रूप  में !

                                                                 ( 2013 )

                                                          -सुरेश  स्वप्निल 


बुधवार, 12 जून 2013

बनी रहे शांति

हां, हम  जानते  हैं  कि  तुम
संकट  में  हो
और  ज़रूरत  है  तुम्हें
समर्थन  की ....

हम  भले  पुरुष
मिट्टी  के  माधव
और  तो  क्या  करें
आशीष  देते  हैं  तुम्हें
चाहे  जितनी  भी  सहनी  पड़ें
हमारी  ज़्यादतियां
हमारी  मजबूरियां
कि  बनी  रहे  शांति
घर  और  समाज  में

क्योंकि  सहना
सिर्फ़  तुम्हें  ही  आता  है
लड़कियों !

                                                       ( 2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल


सोमवार, 10 जून 2013

सपने डर गए हैं

सपनों  को  क्या  हो  गया  है  ?
आँखों  से  चलते  हैं
और  उड़  कर
मोबाइल  टॉवर  पर  बैठ  जाते  हैं

शायद  सपनों  की  दुनिया  सिकुड़  गई  है
वे  नहीं  चाहते
कि  पंखों  को  तकलीफ़  हो
वे  शायद  उड़ना  ही  नहीं  चाहते
या  उड़ें  भी  तो  वहीं  तक
जहां  से  घोंसला  दिखाई  पड़ता  हो ....

सपने  डर  गए  हैं
वैज्ञानिकों  के  बयानों  से
कहा  जाता  है  कि  सपनों  की
प्रजनन-क्षमता
कम  हो  गई  है
लगभग  शून्य  के  बराबर !

क्या  सपनों  की  सभी  प्रजातियां
नष्ट  हो  जाएंगी
गौरैयों  की  तरह  ?

                                                   ( 2013 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल