रविवार, 19 मई 2013

मौसम क्या इसीलिए आते-जाते हैं ?

सिर्फ  किसानों, मजदूरों
और  ग़रीबों  के  बस  की  है
यह  प्रचण्ड  धूप  !
यह  तन  झुलसाती  लू
और  गर्म  हवाएं ...!
क्योंकि  वे  जानते  हैं
धूप  का  तीखापन  संकेत  है
भरपूर  बारिश  का ....

बारिश  का  पर्याप्त  होना  जगा  देता  है
किसान, मज़दूर और  ग़रीब   के  मन  में  नई  आशाएं
अच्छे  समय  की
और  भर  देती  है  धरती  के  कण-कण  में  नया  उछाह
हालांकि  कभी  बाढ़  बहा  ले  जाती  है
सारे  स्वप्न ...और  डरा  देती  है
हर  किसान  और  मज़दूर  और  ग़रीब  को

हर  किसान
हर  मज़दूर
हर  ग़रीब  सहन  कर  ले  जाता  है
धूप , लू  और  गर्मी  के  तीखेपन  को
न  करे
तो  खाएंगे  क्या  बेचारे !

हर  अफ़सर
हर  शासक
डरता  है  मौसम  की  मार  से
और  ख़ुश  भी  होता  है
मौसम  के  बदलते  मिज़ाज  के  साथ
बढ़ती  महंगाई  की  संभावनाओं  के  साथ

मौसम  और  जीवनोपयोगी  वस्तुओं के  भावों  का 
हर  परिवर्त्तन
बढ़ा  देता  है  आर्थिक  असमानता
अमीर  और  ग़रीब  के  बीच !

मौसम  क्या  इसीलिए  आते-जाते  हैं
साल  दर  साल ?

                                                                     ( 2013 )

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

                                                               

शुक्रवार, 17 मई 2013

सुबह मेरी मुट्ठी में !

आम  का  एक  धीर-गंभीर  पेड़/ उसके  नीचे/ बेतरतीब-से
बिखरे  हुए/ सूर्यमुखी  के  अनगिनत  पौधे
और  एक  खिले  हुए  सूर्यमुखी  के / चेहरे  को  छूता /
अपने  कंधे  पर / बकरे  के  बच्चे  को / लादे  हुए /
माली  का  लड़का !

यह  दृश्य  है  मेरे  घर  के  सामने  वाले / बंगले  की  एक  ख़ुशनुमां  सुबह  का !

मैंने  चाहा, सुबह  को  अपनी  मुट्ठी  में / क़ैद  कर  लूं !/ यह  नहीं  हो  सका ....
तब  मैंने / अपना  कैमरा  टटोला / उसमें / फ़िल्म  नहीं  थी !
मैंने  फिर  सोचा,  मुझे  क्या  करना  चाहिए ?...

सामने  की  सड़क  पर / अपनी  यूनिफ़ॉर्म  शरीर  पर  लादे / कुछ  बच्चे /
बस्ते  उठाए / स्कूल  जाने  को / खड़े  थे  तैयार ....
मैंने  देखा- उनकी  तरफ़, माली  के  लड़के  की  तरफ़ /
पूछना  चाहा  उससे- " तुम / स्कूल  नहीं  जाते  क्या ?"
फिर,  अपने  इस  अनपूछे  प्रश्न  की  निरर्थकता  पर /
मैं  स्वयं  लज्जित  हो  गया / सोचता  रहा  कुछ  क्षण / कि  मुझे /
क्या  करना  चाहिए ?

" मैं /  माली के  इस  लड़के  को  स्कूल  भेज  कर  ही  रहूंगा"-मैंने  संकल्प  लिया !

लड़का / मेरी  ही  ओर  देख  रहा  था / मुस्कुराता  हुआ !
मैंने / उसे / अपने  पास  बुला  लिया ...
अब / मुझे  लग  रहा  था / सुबह  मेरी  मुट्ठी  में  है !

                                                                                                                   ( 1978 )

                                                                                                             -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन : 'इंदौर बैंक परिवार', 1978, 'अंतर्यात्रा'-13, 1983।

गुरुवार, 16 मई 2013

हमारे हाथ की चोट

न,  हाथ  मत  उठाना  मालिक !
यह  अधिकार  नहीं  बेचा  है  हमने
और  बेचेंगे  भी  नहीं

यह  चेतावनी  है,  मालिक
एक  दम  खुली  हुई
अगली  बार  किसी  मज़दूर  की  तरफ़
आंख  भी  मत  उठाना
न  ही  काम  से  बाहर  करने  की  धमकी  देना
तनख़्वाह  काटने  की  हिम्मत  तो  करना  ही  मत

मालिक,  यही  बहुत  है  तुम्हारे  लिए
कि  हम
सवाल  नहीं  उठाते  तुम्हारे  आसमान  से  भी  ऊंचे  मुनाफ़े  पर
नहीं  देखते  तुम्हारे  बही-खाते
नहीं  ईर्ष्या  करते  स्वर्ग नुमा  साम्राज्य  पर

लेकिन  इसका  मतलब  यह  न  लिया  जाए
कि  हम  हमेशा  तुम्हारे  'वफ़ादार'  ही  रहेंगे
कि  हम  अपने  आत्म-सम्मान  को  भी  बेच  देंगे
चंद  रुपयों  की  ख़ातिर !

ख़रीदना-बेचना  तुम्हारा  शौक़  है
तुम  पुलिस  ख़रीद  सकते  हो
सरकारी  अफ़सर  और  बे-ईमान  नेता
यहां  तक  कि  पूरी  की  पूरी  सरकारें  भी

मगर  मज़दूर  का  ईमान  है,  मालिक
किसी  और  ही  मिट्टी  का  बना  हुआ

हम  तुम्हारे  अंगरक्षकों  से  नहीं  डरते
हम  तुम्हारी  ज़र-ख़रीद  पुलिस, सरकारी  अफ़सर, बे-ईमान  नेता
और  बिकाऊ  सरकारों  से  भी  नहीं  डरते
क्योंकि  हम  जानते  हैं  कि  हमारे  बिना
चार  दिन  भी  नहीं  टिक  पाएगा  तुम्हारा  साम्राज्य !

समय  बदल  चुका  है,  मालिक
हमें  चुनौती  मत  देना
हमारा  हाथ  जब  तक  श्रम  तक  उठे   तभी  तक  ठीक  है
बदला  लेने  के  लिए  उठा  तो  सह  नहीं  पाओगे  तुम !

हमारे  हाथ  की  चोट  कितनी  भारी  है
यह  अपने  आस-पास  पड़े  पत्थरों  से  पूछो !

                                                                                        ( 2013 )

                                                                                   -सुरेश  स्वप्निल 

*सद्यः रचित/ मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित। पूर्वानुमति पर प्रकाशनार्थ उपलब्ध।

बुधवार, 15 मई 2013

हम/ चल रहे हैं ...

हम/ चल  रहे  हैं
चलते  जा  रहे  हैं
बावजूद  इसके/ कि
हमारे  शरीर  थक  गए  हैं
और  मन/  हार  गए  हैं !

घिसटना/ लंगड़ा  कर  चलना
या/  चलने  की  सिर्फ़-कोशिश  भर  कर  पाना
क्या  सचमुच/  कोई  अर्थ  रखता  है ?
शायद  हां .../  या  शायद  नहीं ...
यह  सोचना/  या  सोचने  की  इच्छा  तक/  किए  बिना
हम  चल  रहे  हैं/  चलते  जा  रहे  हैं/  बावजूद  इसके/  कि
हमारे  शरीर  थक  गए  हैं/  और  मन/  हार  गए  हैं !

शायद/  पाण्डवों  का  महाप्रस्थान  भी/  कुछ  ऐसा  ही  रहा  होगा !
भीम,  अर्जुन,  नकुल,  सहदेव/  और  अबला  द्रौपदी
सबके-सब/  मार्ग-पतित
और  वह  एक मात्र  स्वर्गारोही - युधिष्ठिर !
और  उसका  सहयात्री  वह  श्वान !

अपने  आपको/  युधिष्ठिर  ( या  कहो  कि  उसका  श्वान  ही )
सिद्ध  करने  के  प्रयास  में
ख़ून-रिसते  तलुए/  और  कांटे-चुभे  पांव  लिए
हम  चल  रहे  हैं/  चलते  जा  रहे  हैं/  बावजूद  इसके/  कि /
हमारे  शरीर  थक  गए  हैं/  और  मन ....हार  गए  हैं  !

                                                                               ( 1976 )

                                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'देशबंधु', भोपाल, 1976 एवं  'अंतर्यात्रा', 1983। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

मंगलवार, 14 मई 2013

श्रद्धांजलि: डॉ . असग़र अली इंजीनियर

श्रद्धांजलि: डॉ . असग़र  अली  इंजीनियर

नहीं रहे बोहरा समाज के सामाजिक अभियंता असगर अली इंजीनियर

नहीं रहे बोहरा समाज के सामाजिक अभियंता असगर अली इंजीनियर

प्रख्यात विचारक असगर अली इंजीनियर का निधन


सुधारवादी बोहरा समुदाय के नेता, समाजकर्मी और चिंतक डॉ. असगर अली इंजीनियर का आज मुंबई में सुबह 8 बजे इंतकाल हो गया. 10 मार्च 1939 को जन्मे असगर अली इंजीनियर उदयपुर (राजस्थान) के सलुंबर तहसील के रहने वाले थे और उनका परिवार दाउदी बोहरा संप्रदाय का अनुयायी था. सत्तर के दशक में दाउदी बोहरा की कट्टरता और दकियानुसी परंपराओं के खिलाफ जो सुधारवादी आंदोलन शुरू हुआ इंजीनियर उसके एक प्रमुख स्तंभ थे. इस वैचारिक और खूनी संघर्ष के बाद ही बोहरा संप्रदाय दो भागों में विभाजित हुआ. सुधारवादी गुट ने खुद को प्रगतिशील बोहरा समुदाय कहा.

इस संघर्ष और विभाजन के बाद ही उदयपुर और मुंबई में बोहरा समुदाय, जहां कि उनकी सबसे ज्यादा आबादी है, ने खुल कर सांस ली, स्कूल-कॉलेज व अस्पताल खुले, लड़कियां स्कूल गई और कई सुधारवादी कार्यक्रम शुरू हुए.

असगर अली इंजीनियर भारत के उन प्रमुख लोगों में से थे जो देश में धार्मिक कट्टरता के खिलाफ थे और एक धर्मनिरपेक्ष देश का सपना रखते थे.

मुंबई। प्रख्यात मुस्लिम विद्वान, प्रतिशील चिंतक, लेखक और दाऊदी बोहरा समुदाय के सुधारवादी नेता, असगर अली इंजीनियर का लंबी बीमारी के बाद मंगलवार को निधन हो गया। वह 74 साल के थे। असगर की पत्नी का पहले ही निधन हो गया था। वह अपने पीछे पुत्र इरफान और बेटी सीमा इंदौरवाला को छोड़ गए हैं। असगर लंबे समय से बीमार चल रहे थे और मंगलवार सुबह आठ बजे के करीब मुंबई के सांताक्रूज पूर्व स्थित आवास पर उन्होंने आखिरी सांस ली। इरफान ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार बुधवार को हो सकता है।
राजस्थान के सलंबर में एक दाऊदी बोहरा आमिल परिवार में 10 मार्च 1939 को जन्मे असगर ने कम उम्र में ही कुरान की तफसीर, ताविल, फिक और हदीथ की शिक्षा पूरी कर ली थी। उन्होंने अपने पिता शेख कुरबान हुसैन आमिल थे। असगर ने अपने पिता से अरबी सीखी। बाद में उन्होंने प्रमुख विद्वानों की सभी प्रमुख धार्मिक रचनाओं और शास्त्रों का अध्ययन किया।
मध्य प्रदेश के इंदौर से सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा ग्रहण करने के बाद असगर ने लगभग 20 सालों तक बृहन्मुम्बई नगर निगम (बीएमसी) में अपनी सेवाएं दी। 1970 के दशक में बीएमसी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद वह दाऊद बोहरा समुदाय के सुधारवादी आंदोलन से जुड़ गए। उन्होंने आगे चलकर इंस्टीट्यूट ऑफ इस्लामिक स्टडीज (1980) और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म (1993) की स्थापना की। उन्होंने विभिन्न विषयों पर लगभग 50 पुस्तकें लिखी। वह सभी धर्मो को बराबर का सम्मान देने में विश्वास रखते थे।
सुधारवादियों के अनुसार, असगर कभी भी पहले से चली आ रही परंपरा और संस्कृति का अंधानुकरण करने में विश्वास नहीं रखते थे, बल्कि विभिन्न मुद्दों पर फिर से विचार करने और वर्तमान समय की जरूरतों के अनुसार इस्लाम की व्याख्या करने की कोशिश करते थे।
( पलाश बिस्वास, in ambedkaraction.com )

सोमवार, 13 मई 2013

तो मत कहिएगा,,,

संसार  में
सबसे  कम  गति  से
बढ़ता  है  श्रम  का  मूल्य
वह  भी 
न  जाने  कितनी  क़ुर्बानियां  दे  कर !

आख़िर  कौन  है
जो  तय  कर  रहा  है
लागत-लाभ-पारिश्रमिक  के  समीकरण ?

कल  यदि  विद्रोह  पर  उतर  आएं  मज़दूर
तो  मत  कहिएगा  कि  सूचना  नहीं  थी

क्या  कभी  अनाज  का  मूल्य
पूर्व-सूचना  दे  कर  बढ़ाता  है  व्यापारी ?
क्या  कभी  कोई  सरकार सोचती है
कि  पारिश्रमिक  की  हर  वृद्धि  से  पहले  ही
कितनी  और  कैसे  बढ़  जाती  है  मंहगाई ?

एक  सीमा  तो  हो
जहां  समंजित  हो  सकें  स्वप्न,
शिक्षा, स्वास्थ्य  और  भविष्य  की  योजनाएं
जहां  बनी  रहें  तलवारें  म्यान  में ....

परिस्थितियां  बनाने  वाले
सोच  कर  देख  लें
पूंजी  और  श्रम  के  अवश्यंभावी  युद्ध  के  परिणाम

इसके  आगे  कुछ  नहीं  कहना  है  हमें।

                                                                       ( 2013 )

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

*सद्यः  रचित/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। पूर्व-सूचना पर प्रकाशनार्थ उपलब्ध।

रविवार, 12 मई 2013

विश्व मातृ-दिवस पर, अम्मां के लिए

मेरे  आस-पास  ही  रहना,  अम्मां  !

जैसे-जैसे बुढ़ा  रहा  हूं ,
तुम्हारी  ज़रूरत  भी बुढ़ा रही  है, अम्मां !

बेहद  कमज़ोर, असहाय  और  बीमार  हो  गया  हूं 
तुम्हारे  बिना 
बहुत  भुलक्कड़  भी 
अब  तो  यह  भी  याद  नहीं  रहता 
कि  तुम  तो  हो  ही  नहीं  संसार  में !

हर  छोटी-बड़ी  बात  पर  याद  आ  जाती  हो  तुम 
सशरीर, जैसे  एकदम  सामने  हो 
अभी  हाल  खींच  लोगी  अपने  पास 
सर  पर  हाथ  फेरोगी 
और  मिट  जाएंगी  मेरी  सारी  तकलीफ़ें 
सारी  ज़रूरतें 
अपने-आप !

ऐसा  जादू  सिर्फ़  तुम  ही  कर  सकती  हो 
अम्मां !
सिर्फ़  तुम  ही  हो  जो  आज  भी  समझ  लेती  हो 
कि  कहां  दर्द  है  मुझे 
और  क्या  दवा  काम  करेगी ?
वह  भी  तब 
जब  तुम  हो  ही  नहीं  संसार  में !

अम्मां,  मुझे  छोड़  कर  मत  जाना  कभी 
भले  ही  स्मृतियों  में  रहो ...

मेरे  आस-पास  ही  रहना,  अम्मां !
तब  भी, जब  मैं  आ  रहा  होऊं  
तुम्हारे पास  !

                                                               ( 2013 )

                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

*सद्यः रचित/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु मात्र  सूचना पर उपलब्ध।

शनिवार, 11 मई 2013

अपने ही लोग ...

आज  फिर  जेब  कट  गई
बस  में  चढ़ते
या  शायद
उतरते  समय

कुछ  कहा  नहीं  जा  सकता
कि  कौन  हो  सकता  है
मुझ  से  भी  ज़्यादा
ज़रूरतमंद !

समय  भी  तो  ऐसा  हो  गया  है
कि  ज़िंदा  रहने  के  सारे  विकल्प
ख़त्म  होते  जा  रहे  हैं
एक-एक  कर

क़तई  अस्वाभाविक  नहीं  है
मेरा
या  मेरी  तरह  किसी  का  भी
यूं  लुट-पिट  जाना
इस  शहर  में
तो  मैं  ही  क्यूं  इतना  चिंतित  हो  रहूं
कि  शाम  का  खाना
या  रात  की  नींद  छोड़  दूं  ?

हां,  अभी  भी  कुछ  दोस्त  हैं
शहर  में
जिनके  यहां  खाना  खाया  जा  सकता  है
बिना  किसी  संकोच  के…

पैसा  फिर  कमाया  जा  सकता  है
उतना,  जितना  निकल  गया  है  जेब  से
शायद  उतना  भी,  जितने  में
सारी  ज़रूरतें  पूरी  हो  सकें ...!

नहीं,  मैं  तैयार  नहीं  हूं
इतनी  सी  बात  पर  शहर  छोड़  देने  को

आख़िर  अपना  शहर  है
अपने  ही  लोग
बिना  मजबूर  हुए
कोई चोरी   करता  है  भला ?

कम  से  कम  मनुष्य  तो  नहीं !

                                               ( 2013 )

                                        -सुरेश  स्वप्निल 

* सद्य: रचित/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु  उपलब्ध।

शुक्रवार, 10 मई 2013

मित्रों की थाती से: छह

घर  से  दूर

कौन  जानता  है  मुझे 
पर  फिर  भी 
जाऊंगा  जब  इस  शहर  से 
कुछ  हैं 
जो  मुझे  याद  करेंगे 
एक  आम  का  पेड़ 
उस  पर  रहने  वाली  तीन  चिड़ियाँ 
और  उनके  दो  छोटे  बच्चे 

घर  में 
घर  की  शक्ल  का  आकाश 
छत  के  दरवाज़े  से  
टकराने  वाली  हवा 
बार-बार  खटकाएगी  कुण्डी 
इक  खिड़की 
जो  बेवजह  खुलती  है 
सामने  की  छत  पर,  वो 
कुछ  तारे 
जिनकी  शक्लें  भले  ही  हों  एक-सी 
पर  मैं  उन्हें  नाम  से  जानता  हूँ 

दरवाज़े  के  पास  की  ज़मीन 
बजा कर  घण्टी 
रस्ता  देखेगी 
पर  छत,  मेरे  बिना 
नीचे  कहाँ  आ  पाएगी 

मेरे  घर  से  दूर  
रहने  पर 
इन  सबको  रंज  होगा 
याद  करेंगे  मुझे   
ये  सब  मिल  कर 
मुश्किल  तो  मुझे  होगी 
जब  करनी  पड़ेगी 
मुझे  याद  इन  सबकी 
अकेले  ही !

                                                  -सुशील  शुक्ल 

* यह कविता 2009 में प्रकाशित 'Original Edition' से, सा-स्नेह, साभार।

गुरुवार, 9 मई 2013

मित्रों की थाती से: पांच

गिद्ध जानते हैं

मुर्गे की बाँग से
निकलता हुआ सूरज
चूल्हे की आग से गुजरते हुए
बन्द हो जाता है
एल्यूमिनियम के टिफिन में
बाँटकर भरपूर प्रकाश
जीने के लिये ज़रूरी उष्मा
तकिये के पास रखकर
जिजीविषा के फूल
छोड़ जाता है
कल फिर आने का स्वप्न
यह शाश्वत सूरज
उस सूरज से भिन्न है
जो ऊगता है कभी-कभार
झोपडपट्टी को
महलों में तब्दील करने की
खोखली गर्माहट लिये हुए
भर लेता है वह
अपने पेट में
मुर्गे की बाँग क्या
समूचा मुर्गा ही
और चूल्हे की आग
रोटी का स्वप्न
नींद का चैन तक
वह छोड़ जाता है अपने पीछे
उसे आकाश की ऊँचाई तक पहुँचाने वाले गिद्धों को
जो जानते हैं
सूरज के संरक्षण में
जिस्मों से ही नहीं
कंकालों से भी
माँस नोचा जा सकता है ।

                        शरद कोकास 
 
*यह  कविता  शरद  के  1993 में प्रकाशित काव्य-संग्रह 'गुनगुनी धूप में बैठ कर' से, सप्रेम, साभार।
 
 


बुधवार, 8 मई 2013

मित्रों की थाती से: चार


आखेटकों  के  विरुद्ध

सागवानी  
सन्नाटे  को  तोड़  कर 
गूंजती  हैं  जब  बंदूकें 
गिर  पड़ता  है  हहराकर 
कोई  बेक़सूर  वनचर,

आखेटक  तब 
करते  हैं  अट्टहास 
बंदूकों  की  नलियों  से 
निकलते  धुएँ  को 
फूँक  मार  कर 
इत्मीनान  से।

ख़ुश  होते  हैं 
जीने  का  हक़  छीन  कर।

परंतु ...
देख  रहा  हूँ  मैं 
अब  जंगल  में 
माहौल  को  बदलते,
वनचरों  को 
अपने  सींग  पैने  करते ...

हाँ,  देख  रहा  हूँ  मैं 
उन्हें  एकजुट  होते 
आखेटकों  के  विरुद्ध !

                               -लक्ष्मी  नारायण  पयोधि 

*यह  कविता  श्री  पयोधि  के  'सोमारू' शीर्षक  से,  1997 में  राष्ट्रीय  प्रकाशन  मंदिर, भोपाल  द्वारा  प्रकाशित
कविता-संग्रह  से,  सादर, साभार।
 

मंगलवार, 7 मई 2013

मित्रों की थाती से: तीन

It  happened  slowly
this  conversion
angelic face  to  harlot  looks
the  lines  that  ravage  my  face
were  not  there  when  I  entered  the  temple

I  was  as  young  as  you
nimble  and  of  supple  linbs
gathering  flowers  of  trees
that  hung  their  branches  low

Today  as  you  go  in
eyes  averted
shrinking  to  circumvent  even  an  accidental  touch
of  me,  sitting  on  the  temple  steps
selling  garlands
for  men  to  drape  over  their  lord
I  speak  out  to  the  wind
" You  too  shall  become  a  whore  like  me
One,  will  play  with  you,  the  other  will  turn  you  to  stone.
Then,  The  Lord  will  release  you  with  his  touch.
And  you  will  be  condemned  to  redemption."

Its  not  a  curse  that  I  cast,
stung  though  I  am  by  your  revulsion
but  a  prophecy  that  I  state.
An  old  woman
sitting  on  the  temple  steps,  selling  garlands
for  men  to  drape  over  their  lord.

                                                                                     -Rinchin

*excerpts from the 'Original Edition', a joint collection of poems by different poets of Hindi, English, Urdu and Marathi languages; published by the 'Invisiblink', a non-profit motive publication, 2009.


शुक्रवार, 3 मई 2013

मित्रों की थाती से: दो

आकाश गंगा 

आकाश  गंगा 
दिव्य  श्मशान 
तुम्हारे  तट  पर/ आलोकित  अरण्य  से 
आता  होगा / पुरखों  का  पगपथ 
अंतिम  लोक  परमधाम  तक 

नक्षत्रों 
मुहूर्त्त  तुम्हारी  किरणें 
शकुन  तुम्हारा  वरदान 
नीचे  धरती  पर 
ऋतुएं  फिरती  हैं / उनके  आश्रय  में 
उग  आती  हैं 
खपरैलें  घास-फूस  के  छप्पर 
जिस  पर  पुरखों  का  श्राद्ध  पाने 
आते  हैं  काग 
आस्था-विश्वास  के  रिश्ते  बुनता 
लोक  संसार  परिवार 

ऋतुओं  की  फेरी  के / हर  मोड़  पर 
खड़े  हैं  उत्सव  तीज-त्यौहार 
सजी  फसलें  बागान  और  खलिहान 
घर  का  बूढ़ा 
पुरखा  होने  की  दहलीज  पर 
घर  आते  जाते 
कल्पता  है 
खूँटे  से  बँधी 
'गऊ  दान'  की।

                                                       -हरीश  वाढेर 

*यह कविता श्री हरीश वाढेर के काव्य संग्रह 'बनी है पगडंडी अपने आप' से, सादर, साभार।

गुरुवार, 2 मई 2013

मित्रों की थाती से: एक

पिता  की  मूंछें 

पिता  की  मूंछें  थीं  रौबदार 
पूरे  चेहरे  में 
तलवार-सी  तनी 

मूंछें  थीं  
तो  रौबीले  थे  पिता 
गर्वीले  थे  पिता 

हम  पांच  भाई-बहन 
पिता  की  तरह 
पिता  की  मूंछों  को  भी 
परिवार  का  सदस्य  मानते 
और  सेवा  करते 

एकाध  भी  दिखता  सफ़ेद  बाल 
तो  ऐसे  जुटते  निकालने 
जैसे  कोई  धब्बा 
पिता  के  चेहरे  पर 

जीवन-भर  पिता   ने  मूंछें  नहीं  काटीं 
जैसे  जीवन-भर  पिता 
झूठ  नहीं  बोले 

स्टालिन  की  तरह  थीं  पिता  की  मूंछें 
चौड़ी 
रौबीली 
अनुशासन  प्रिय।

                                                           -नासिर  अहमद  सिकन्दर 

*नासिर  के  संग्रह 'इस वक़्त मेरा कहा' से, सप्रेम।

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

विश्व मज़दूर दिवस : हमारा तराना

बोल  मजूरा  हल्ला  बोल
बोल  जवाना  हल्ला  बोल
बोल  किसाना  हल्ला  बोल
हल्ला  बोल  कि  हिल  जाए  धरती
डोले  आकाश ...

सदियों  से  तेरी  मेहनत  का  फल
औरों   ने  खाया  है
नहीं-नहीं  अब  सोना  कैसा
सूरज  सिर  पर  आया  है

हुआ  सबेरा  आँखें  खोल
बाज़ू  की  ताक़त  को  तौल
ले  अपनी  मेहनत  का  मोल
तू  सब-कुछ  है  अपने  मन  में
पैदा  कर  विश्वास ...

बोल  मजूरा  हल्ला  बोल

जाग  कि  दुनियां  को  बतला  दे
क्या  है  तेरी  क़ीमत
अपने  मेहनतकश  हाथों  से
लिख  दे  जग  की  क़िस्मत

तुझसे  आँख  मिलाए  कौन
आंधी  से  टकराए  कौन
अपनी  मौत  बुलाए  कौन
कब  तक  तुझसे  हार  न  मानेंगे
क़ातिल  एहसास ....

बोल  मजूरा  हल्ला  बोल
बोल  जवाना  हल्ला  बोल
बोल  किसाना  हल्ला  बोल  !

                                               (1 मई,1976 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल 


*मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु सर्वसुलभ, केवल सूचना आवश्यक।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

नमस्कार, मित्र गण !
मैं कुछ अत्यंत निजी कारणों से आपसे कुछ समय हेतु विदा ले रहा हूं। जैसे ही स्थितियां अनुकूल होंगी, पुनः आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊंगा। तब तक के लिए, मेरी शुभकामनाएं आपके साथ रहेंगी ही। संध्या-समय मैं अपने फ़ेस बुक पृष्ठ पर उपस्थित रहने का प्रयास करूंगा।
आप सब सुखी-स्वस्थ-सानंद रहें।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

गौरैयाएं और लड़कियां !

दो  ही  जीव  हैं  संसार  में
जो  विलुप्ति  की  कगार  पर  हैं
पहली  गौरैया, दूसरी  लड़कियां !

एक  समय  था  जब  दोनों घर-आंगन,
खेत-खलिहान, गांव-शहर…
हर  जगह  चहचहाती  नज़र  आ  जाती  थीं
यहां  तक  कि  स्वप्नों  और  कविताओं  में  भी !

अब  गौरैयाएं  केवल  गहरे  वनों  में
और  कभी-कभार  खेतों  में  ही  दिखती  हैं
और  लड़कियां ?
सिर्फ़  तस्वीरों  और  पुरातत्व  की  किताबों  में !

आख़िर  कौन  निगल  गया
दुनिया  की  आबादी  को ?

                                                                ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

*नवीनतम,पूर्णतः मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

वह/ और शब्द/ और खटमल !

"मैं/ मैं हूं/ एक  साधारण  शरीर !
एक  जोड़ी  आंखें/ और  एक-एक  जोड़ी/ हाथों  और  पांवों  के  अलावा
सञ्चित  है  जिसमें/ पांच-साढ़े  पांच  किलोग्राम/ गाढ़ा-लाल  रक्त
अपने  ढाई-ढाई  फ़ीट  के  पैरों  पर/ दिन  भर/ लुढ़कता-पुढ़कता  मैं
अपने  सञ्चित  रक्त-कोष  की  रक्षा की/ कोशिश  को/ रखे  हुए हूं  बरक़रार !

शब्द/ शब्द  हैं/ किसी  भी  व्यक्तित्व  पर  चिपक  कर/ संज्ञा  बन  जाने  को  आतुर
चारों  ओर  भटकते  हुए/ ढूंढते  फिरते  अपना  शिकार !
पतले,  धारदार  शब्द/ मोटे,  भोथरे  शब्द/ गंदे,  लिजलिजे  शब्द ....
बच्चों-जैसे  मासूम/ फूल-जैसे  सुंदर/ और  बकरियों-जैसे/ निरीह  शब्द ...
और  'समय'  और  'भाग्य'-जैसे/ निहायत  सड़े-बुसे  शब्द 
जैसे  इनके  बिना/ चल  ही  नहीं  सकता/ आदमी  का  कार-बार !

और  हैं  खटमल !
फूले-फूले,  गुलगुले/ संतृप्त  खटमल/ और  सूखे-सुखाए/ बेजान-से/ भूखे-प्यासे  खटमल
बिस्तरों  में/ अलमारियों  में/ दीवारों  पर  उभर  आई  दरारों  में/ और  किताबों  के  पन्नों  में/
दुबके  हुए/ अपने  न  कुछ-से  शरीर  की/ भूख  मिटाने को/
करते  हुए  रात  का  इंतज़ार !

अनपेक्षित  शब्दों  की  भीड़  से  बच  कर/ अपनी  फ़ैक्टरी  तक  पहुंचने  के  लिए/ मैंने  ढूंढ  ली  है/
एक  संकरी-सी,  गुमनाम-सी  गली/ जिससे  या  तो  मैं  गुज़रता  हूं/
या  नगर-निगम  के  सफ़ाई-कर्मचारी !
शब्दों  को/ मूर्ख  बना  कर/ इस  गली  से/ इत्मीनान  से/ बच  निकलता  हूं  मैं/ हर  बार !"

..............................................

यह  बयान  जिस  आदमी  का  है/ वह  मारा  गया/ मेरे  सामने !
न  जाने  उन्हें  किसने  दी  थी  ख़बर/ और  वे/ गली  में  उसके  घुसते  ही/
चेंट  गए  थे  उसके  शरीर  से/ मोटे-मोटे  होंठों/ फूली  हुई  तोंदों/ और  दरांतियों-जैसे  दांतों  वाले/
खूंख्वार  शब्द/ और  उसके  छटपटाने  पर/ मुंह  खोल  कर  हंसने  वाले  शब्द ....
धीरे-धीरे/ घुसते  गए  थे  वे/ उसके  शरीर  में/ और  निचुड़  कर  आता  रहा  बाहर
गाढ़ा-गर्म  और  लाल-सुर्ख़  ख़ून !

शब्दों  के  उस  शरीर  से/ अलग  हो  चुकने  के  बाद/ मैंने  छुआ  उसे/ और  सहलाता  रहा/ कुछ  देर
उसने  शायद/ मुझे  अपना  दोस्त  समझा/ और  सौंप  दी  मुझे/ अपनी  डायरी/
जिसमें  लिखा  था  यह  सब/ और  यह  भी/ कि/ उसे/ अपने  खटमलों  से  है  प्यार !

वह/ मेरे  हाथों  में  मर  कर/  छोड़  गया  है  एक  प्रश्न/ कि  रात  के  आने  पर/ क्या  होगा/
उन  खटमलों  का  ? ? ? !

                                                                                                       ( 1978 )

                                                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: 'अंतर्यात्रा', 1983

रविवार, 21 अप्रैल 2013

हम सूर्यत्व हैं !

हां,  हम  जिएंगे
जीते  रहेंगे
रचते  रहेंगे  अमरत्व  की
अपार  संभावनाएं

हम  विचार  हैं
विदेह

हम  न  दिन  में  मरते  हैं,  न  रात  में
और  न  संधि-काल  में
न  अस्त्र  से,  न  शस्त्र  से
न  किसी  ब्रह्मास्त्र  से

हम  सूर्यत्व  हैं,  हुज़ूर !

हम  मज़दूर  हैं
स्वतंत्र,  स्वायत्त,  संप्रभु
सरफ़रोश  सिरजनहार
हमें  क्या  देर  लगती  है
नई  दुनिया  रचने  में  !

                                                        ( 2004 )

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

*पूर्णतः मौलिक/अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु सानुमति  उपलब्ध।

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

सबसे उपयुक्त समय

कितना  भी  सम्हल  कर  चले  आदमी
हाथ  से  फिसल  कर
गिरता  है  समय
और  चूर-चूर  हो  जाता  है !

कितनी  सारी  किरचें  बिखरी  हुई  हैं
ज़मीन  पर !

समय  के  रेशे-रेशे  को  चुनना  होगा
अपनी   पलकों  से
कि  कोई  तस्वीर  बने

कोई  अक्स  मुकम्मल  नहीं
न  दुनिया,  न  समाज
न  एक  अकेला  आदमी
यहां  तक  कि  कोई  बाल  या  नाख़ून  तक  नहीं

अब
बहुत  मुमकिन  है  कि  बहुत  जल्द
पेड़,  नदी,  पहाड़
आस्थाएं  और  विचार
सब-कुछ
नाभिकों  में  बदल  जाएं

संक्षिप्ततः ,
यही,  यही  सबसे  उपयुक्त  समय  है
सारी  कायनात  को  एक  बाज़ार  में  बदलने  के  लिए !

कोई  बचा  सकता  है  समय  को
बिकाऊ  जिन्स  में  बदलने  से  ? !

                                                                         ( 1986 )

                                                                  -सुरेश  स्वप्निल 

*पूर्णतः मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु सानुमति उपलब्ध।