शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

...तो अभिशप्त हैं आप !

आप  षड्यंत्रों  का  प्रतिकार  कैसे  करते  हैं ?
ख़ास  तौर  पर  वे
जो  सीधे  आपके
आपके  घर-परिवार
आपके  वर्ग,  आपकी  जाति,
आपका  समाज
या  देश  के  विरुद्ध  हों ?

आप  शायद  आवाज़  उठाते  हों
जोर-जोर  से
या  बुलाते  हों  अपने  साथियों,
समूहों   को  मदद  के  लिए
या  सिर्फ  प्रतीक्षा  करते  रह  जाते  हों
अगले  चुनाव  की….

हो  तो  यह  भी  सकता  है
कि  आप  कुछ  न   करते  हों
सह  जाते  हों
सारी   पीड़ा,  सारा  अपमान
चुप  रह  कर
और  अपने  बच्चों  को  भी
यही  शिक्षा  देते  हों
कि  सब-कुछ
नियति  का  खेल  है
भगवान  की  इच्छा…

अगर  ऐसा  है
तो  अभिशप्त  हैं  आप
कई-कई  पीढ़ियों  का  भविष्य
बर्बाद  करने  के  लिए !

                                           ( 2013 )

                                    - सुरेश  स्वप्निल

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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

कच्चे सूत पर मलखंभ !

कभी  देखे  हैं  आपने
कच्चे  सूत  पर  गुलांट  लगाने  वाले
बूढ़े-अधबूढ़े  बन्दर
भारत  के  बाहर
वह  भी  दस-पंद्रह  वर्ष  तक……?!

हमने  देखा,  पढ़ा  और  सुना  भी  नहीं  था
21 वीं  सदी  से  पहले  !

हम  मगर  इतना  अवश्य  जानते  हैं
के  किसी  भी  बन्दर  की  आयु
15-20  वर्ष  से
अधिक  नहीं  होती
भले   ही  वह  सरदार  हो
या  असरदार !

तथापि, 
ये  तो अद्भुत  बन्दर  हैं  दोनों
कच्चे  सूत  पर  मलखंभ
दिखाने  वाले  !

कुछ  भिन्नताएँ  भी  हैं  दोनों  में
पहला  जन्म-जात  सरदार 
दूसरा  अभी  बनने  की  प्रक्रिया  में
दोनों  को   अमेरिका  प्रिय  है
अपनी  मातृ-भूमि  से
मगर  एक   अमेरिका  की  नाक  का  बाल
दूसरा  अमेरिकी  आँखों  की  किरकिरी
पहला  मौन  कभी  न  तोड़ने  वाला
दूसरा  समय-असमय  कभी  भी
बोल  पड़ने  वाला
एक  इतना  विनम्र
कि  अधमरा  लगे
दूसरा  इतना  ख़ूंख़्वार
कि  सोते  बच्चे  जाग  जाएं  डर  कर ....

दोनों  के  दोनों 
पूंजीपतियों  के  ख़रीदे  हुए  गुलाम  …।

बहरहाल,  हैं  दोनों  ही 
शत-प्रतिशत  बन्दर
अपने-अपने  मदारियों  के  इशारों  पर
नाचने  वाले  !

आपका,   हमारा  और
सारे   देश  का  दुर्भाग्य
कि  चुनना  हमें  है  …

तो,   किसे  चुनेंगे   इस  बार
पहले  या  दूसरे  को
या  किसी  और  जानवर  को
जो  बन्दर  न  हो  कम  से  कम
पूंजीपतियों  के  तलुए  चाटने  वाला  !

                                                   ( 2013 )

                                           -सुरेश  स्वप्निल  

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बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

सितम्बर के शुरू में तितलियाँ

हो  सकता  है 
कुछ  लोग  इसे
मात्र  एक  अफ़वाह  समझें
मगर  यह  सच  है
शत-प्रतिशत
कि  हमारे  शहर  में  आज  भी
सितम्बर  के  शुरू  में  तितलियाँ
हर  साल   आती  हैं  !

वे  कभी   हमारे  शहर  से
नाराज़   नहीं   हुईं

हमारे  शहर में
कौव्वे  भी    आते   हैं
श्राद्ध-पक्ष  में  पूर्वजों   की  भाँति
और   ग्रहण  करते  हैं
अपना  अर्घ्य  !

गौरैयां ?
वे  तो  अब  भी
लगभग  हर  घर  के  आँगन  में
नज़र   आ  ही  जाती  हैं
दाने  मांगते  हुए
और   घोंसले   बनाते  हुए।

वैसे  मनुष्यता  भी  जीवित  है
हमारे  शहर  में
शहर-भर  में  फैली 
हरियाली  की  तरह …।

                                              ( 2013 )

                                         -सुरेश  स्वप्निल

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सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

शोर का सौन्दर्य-बोध !

यदि  उत्सव  वर्ष  चलते  रहते
तो  सोचिए
क्या  हाल  होता
आपके  कानों  का ?

मां  एक  भजन  गाती  थीं
तो  दिन-भर 
कोई  और  गीत  सुनने  का
मन  नहीं  होता  था

कभी  लता  दी  का  गाया  भजन 
ज़ुबान  पर  आ  जाता
तो  सारे  काम  छूट  जाते
अधूरे

कभी  रफ़ी  साहब  के  भजन 
सुनाई  दे  जाते
तो सारा  दिन  सफल  हो  जाता 

मन्ना  दा 
मुकेश  जी
सुधा  मल्होत्रा  जी
हरि  ओम  शरण ....
कितने  अनमोल  भजन-गायक  होते
एक  से  एक  अनुपम 
सीधे  आत्मा  तक  पहुंचते  शब्द...
छोड  कर 
लोग  हर  बे-सुरे,  बे-ताले 
फटे  बांस  जैसी  आवाज़ों  वाले
पैरोडी-भजन 
जबरन  आपके  कानों  में 
ठूंस  रहे  होते  हैं
तो  सच  बताइए, 
क्या  आपको  धर्म  के  नाम  से  ही 
घिन  नहीं  होने  लगती ???

                                                   ( 2013 )

                                             -सुरेश  स्वप्निल 

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शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

नवरात्र आ गए !

गर्भ  में  जो  पल  रही  है
वह  बेटी  है...

उसकी  पूजा  करोगे
या  मार  डालोगे ?

मारोगे  कैसे
क्या  जन्म  से  पहले
या  जन्म  के  बाद
गले  में  तम्बाकू  दबा  कर
या  जीती-जागती  ही  खेत  में
गाड़ डालोगे

ज़िंदा  रखोगे  तो  कब  तक
क्या  ब्याह  दोगे  बचपन  में  ही
या  ससुराल  वालों  को  सौंप  दोगे
जला  कर  मार  देने  के  लिए

मन-मर्ज़ी  से  ब्याह  कर  लिया
तो  क्या  बेटी-दामाद  को  स्वीकार  करोगे
या  दोनों  को  उतार  दोगे  मौत  के  घाट ?


अच्छा, पाल  कर  क्या  करोगे
शिक्षा  दिलाओगे
नौकरी  करने दोगे
आगे  बढ़ने  दोगे  उसे
कुल  का  नाम  ऊंचा  करने  के  लिए ?

तुम्हारे  लिए  केवल 
कुल  का  सम्मान  प्रासंगिक  है
तुम  क्या  करोगे  बेटी  को  जन्म  दिला  कर

तुम  तो  बस  देवी  पूजो
नवरात्र   आ  गए  !

                                                                     ( 2013 )

                                                               -सुरेश  स्वप्निल 

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गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

समय अंतिम न्यायाधीश है !

समय- न्यायाधीश ने
फिर  सान पर  रख  दी हैं
अपनी  तलवारें
फिर  छलछलाने लगा है रक्त
उस सर्व-शक्तिमान की आंखों  में

कुछ सिर  कट  गिरे  हैं 
बहुत  से  सिर
और  तख़्त-ताज  बाक़ी हैं  अभी
जिन्हें कट  कर  गिरना  है

देखते  जाइए
कल  किसकी  बारी  है
हम  भी  संभवत:  उसकी  सूची  में
होंगे  कहीं  न  कहीं
अपने  मौन  और  अकर्मण्यता  के  चलते...

समय  अंतिम  न्यायाधीश  है
जिससे  आशाएं  की  जा  सकती  हैं
अभी भी !

मौन  भयंकर  अपराध  है
समय  की  आंखों  में
और  अकर्मण्यता  भयंकरतम !

                                                   ( 2013 )
                                       
                                         -सुरेश  स्वप्निल

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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

कितना कठिन होता है

होता तो बहुत कुछ है मन में
लेकिन  पूरा  कहां  होता  है  अक्सर
मन  का सोचा  हुआ  ?

मसलन,  देश  और  समाज  के  प्रति
अपना  कर्त्तव्य-बोध
माता-पिता  के  लिए
अपूरित  इच्छाओं  का  बोझ
संतान  के  लिए  चिंताएं
और  उनके  लिए  बनाई  गई

तमाम  योजनाएं....

एक  मध्यम-वर्गीय  भारतीय  के  लिए
कितना  कठिन  होता है
उम्र  भर  अपने-आप  को
नेक  रास्ते  पर 
चलाते  रहना...

काश !  सरकारें  समझ  पातीं
कि  यदि
जनता  के  मन  में  दबे  हुए  ज्वालामुखी 

फट  जाएं  किसी  दिन
तो  कैसी  प्रलय  आ  सकती  है
देश  में  !

                                                        (2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल 
                                                        

                                                 

बुधवार, 25 सितंबर 2013

सचमुच लोकतंत्र ....

सुना  आपने  ?
कुत्ते  चाहते  हैं सत्ता  हथियाना
वह  भी  भेडियों  के  हाथों  से...

अपने-अपने  भ्रम  हैं,  भाई !
भेडिए  भी सोच  रहे हैं
कि  फिर  आ  जाएंगे  सत्ता  में
भेड-बकरियों और  ख़रगोशों  के  सहारे
अपनी  'कल्याण कारी'  योजनाओं  के  दम  पर

चाहे  जो  हो,
शाकाहारी  पशुओं  को
दो  समय  की  घास  का  वादा  तो
दोनों  ही  कर  रहे  हैं....

लगता  है,  जंगल  में  सचमुच  लोकतंत्र
आ  कर  ही  रहेगा
इस  चुनाव  में  !

कोई  जानना  चाहेगा
कि  मतदाता  पशुओं  के  मन  में
क्या  है  अंतत:  ???

                                                                     ( 2013 )

                                                               -सुरेश  स्वप्निल 

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रविवार, 22 सितंबर 2013

मनुष्यता का क़ीमा

धर्म, जाति, दलित-सवर्ण,  स्त्री-पुरुष,
अमीर-ग़रीब….

राजनीति  के  क़साई
मनुष्यता  का  क़ीमा  बना  रहे  हैं
आजकल….

चुनाव  आते-आते
वे  इतने  टुकड़ों  में  बांट  चुके  होंगे
मनुष्यता  को
शक्ल  तक  न  पहचान  पाएं
आने  वाली  कई  पीढ़ियां !

अब  मेरी  लाश  को  ही  देखो
मेरा  कुत्ता  तक  असमंजस  में  है
कि  रोए 
या  भौंक-भौंक  कर
आसमान  उठा  ले  सर  पर  !

                                                       ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल


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शनिवार, 21 सितंबर 2013

मेरा समय

उम्र  उड़  रही  है
गर्म  तवे  पर  पड़ी
पानी  की  बूंद  की  तरह

स्वप्न  बदलते  जा  रहे  हैं
अति-कठोर  जीवाश्मों  में
जिन्हें  तोड़  पाना
असम्भव  है  नितांत

समय
इतना  निर्मम  कैसे  हो  सकता  है
किसी  मनुष्य  के  लिए….

मैं  जीना  चाहता  हूं
विशुद्ध  वर्त्तमान  में
जिसमें  शामिल  न  हो
अतीत  या  भविष्य  का  कोई  भी  चिह्न…

मेरा  समय  मुझे  पा  लेने  दो
मेरा  वर्त्तमान  !

                                                      ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल

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शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

तुम्हारा दिल नहीं होता ?!

चुनाव  एक  षड्यंत्र  है
सियासत  करने  वालों  का
आम  आदमी  के  विरुद्ध…

एक  युद्ध  है
बे-ईमानों,  मुनाफ़ाखोर  व्यापारियों
रिश्वतख़ोर नौकरशाहों
और  देश-द्रोही  विदेशी  ताक़तों  के  दलालों  के
गठजोड़  की
सम्मिलित  सेनाओं  का
ग़रीब, मेहनतकश, निहत्थी  जनता पर
थोपा  हुआ…

जब  देश  की  अस्सी  प्रतिशत  आबादी
दाने-दाने  को  तरसती  हो
जब  दो-तिहाई  मनुष्यों  के  पास
रहने  को  घर  भी  न  हो
जब देश  की   नब्बे  प्रतिशत  आमदनी
ग़लत  हाथों  में  पहुंच  रही  हो
जब  न्याय 
खुले  आम  ख़रीदा-बेचा  जाता  हो
जब  पुलिस  और  सेनाएं
किसी  भी  जीते-जागते  मनुष्य  को
लाश  में  बदल  देते  हों
जब  हर  ओर  अन्याय  और  अत्याचार  का  ही
राज  हो….

सच  बताओ
क्या  तुम्हारा  दिल  नहीं  होता
कि  आग  लगा  दें
ऐसे  निज़ाम  को  ????

                                                               ( 2013 )

                                                         -सुरेश  स्वप्निल


गुरुवार, 19 सितंबर 2013

अपना मत फेंकते समय ...

सी. आई. ए. तय  करेगी
कौन  होगा  प्रधानमंत्री
'दुनिया  के  सबसे  बड़े  लोकतंत्र'  का

जैसे  किया  था  2004  में
और  2009  में  भी….

हमें  सिर्फ़  मत  फेंकना  है  अपना
बिना  कुछ  सोचे
या  समझे  बिना

इससे  अधिक 
कर  भी  क्या  सकते  हैं  हम
निरे  काठ  के  उल्लू  !

हम  कोई  मिस्र  या  सीरिया  के  नागरिक  हैं
जो  अन्यायी  सरकार  के  ख़िलाफ़
सड़क  पर  उतर  आएं
बिना  अपनी  जान  की  परवाह  किए….

अगली  बार 
अपना  मत  फेंकते  समय
'वॉयस  ऑफ़  अमेरिका'  सुनना
और  सी. एन. एन.  देखना
मत  भूलना  !

                                                         ( 2013 )

                                                 -सुरेश  स्वप्निल

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बुधवार, 18 सितंबर 2013

पूंजीवाद में लोकतंत्र

चलो,  अच्छा  हुआ
सारे  आदमख़ोर 
अपने-अपने  आवरण  उतार  कर
आ  गए  हैं  मैदान  में...

चुनाव  आ  रहे  हैं  न
अभी  अभ्यास  का  समय  है
एक-दूसरे  की  बोटियां  नोंच  लें
फिर  देख  लेंगे
जनता  को  भी….

यही  अर्थ  है
पूंजीवाद  में  लोकतंत्र  का  !

                                           ( 2013 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल 

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सोमवार, 16 सितंबर 2013

बबूल मत बोना !

लोग  चुन  लें
विकल्प  हैं  सामने

एक  ओर  शांति  है,  समृद्धि  है
भावी  पीढ़ियों  के  लिए
संभावनाएं  हैं.…
दूसरी  ओर  हिंसा  है, मार-काट  है
असभ्यता  और  बर्बरता  के  जंगल  हैं
पुनः  मनुष्य  से  पशु  बनने  की
शताब्दियों  लम्बी  प्रक्रिया  है….

हमारे  पास  समय  है
दोनों  विकल्पों  के  बारे  में
सोचने-समझने
और  निर्णय  लेने  का

कोई  जल्दी  नहीं  है  अभी
किंतु  एक  भी  ग़लती  पड़  सकती  है
बहुत  भारी
कई-कई  पीढ़ियों  के  लिए

बस  इतना  ही  करना
कि  समय  के  मार्ग  में
बबूल  मत  बोना  !

                                                       ( 2013 )

                                               -सुरेश  स्वप्निल 

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शनिवार, 14 सितंबर 2013

बहुत लम्बी कविता …

शून्य
शून्य
शून्य….

यही  मेरी  नियति  है
मैं  हिंदी  हूं
तुम्हारी  मातृ-भाषा  !

                                        ( 2013 )

                                  -सुरेश  स्वप्निल 


गुरुवार, 12 सितंबर 2013

आतंक

काफ़ी  समय  बीत  गया
गिद्ध, चील, कौए
कुत्ते, भेड़िए, शेर….
और  तमाम  मांसाहारी  पशु-पक्षियों  को
मनुष्य  का  मांस  खाना  छोड़े  हुए

अब  उन्हें  उल्टी  आती  है
सड़कों  पर  बिखरे
मरे  हुए  मानव-शरीर  और  उनके
कटे-फटे, क्षत-विक्षत  अंग  देख  कर

वे  आतंकित  और  
परेशान  हैं
सब  के  सब…
मनुष्य  के  बदले  हुए
रूप, आदतें  और
व्यवहार  को  देख  कर  !

                                               ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल


बुधवार, 11 सितंबर 2013

हरा देना हमें ...

स्थिति  नियंत्रण  में  है
फ़िलहाल

लोग  केवल  रात  में
मर-मार  रहे  हैं
एक-दूसरे  को
वह  भी  आठ-दस…
औसतन  प्रति-दिन !

लगभग  दस  करोड़  की
जन-संख्या  में  इतनी  मौतें
यूं  भी  हो  ही  जाती  हैं
और  यह  अधिकार  मिलना  चाहिए
लोकतांत्रिक  रूप  से
चुनी  गई  सरकार  को
कि  इस  नाम-मात्र  की  मृत्यु-दर  को
सामान्य  कह  सके….

अब  संविधान  का  तो  ऐसा  है
भाई  जी
कि  जिसकी  लाठी,  उसी  की  भैंस….
क़ानून  भी

चलिए,  मान  लिया  कि
सरकार  असफल  हो  गई  है  हमारी
मगर  अभी  भी
बहुमत  है  हमारे  पास
और  केंद्रीय  सत्ता,  संविधान
और  सर्वोच्च  न्यायालय
सब  हमारे  पक्ष  में  हैं….

हम  कह  रहे  हैं  न
कि  नियंत्रण  में  है  स्थिति
आप  मानें  या  न  मानें

अगले  चुनाव  में  हरा  देना  हमें
यदि  संभव  है,  तो !

                                            ( 2013 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल 


मंगलवार, 10 सितंबर 2013

तीन छोटी कविताएं

               ( एक )

धर्म  भी  पीछा  छोड़  दे…

मैं  अपने  नाम  के  आगे
जाति  का  दुमछल्ला
नहीं  लगाता….

सोच  रहा  हूं
कि  कोई  ऐसा  नाम  रख  लूं
कि  मेरा  धर्म  भी
पीछा  छोड़  दे  मेरा….

               ( दो )

'ज़ेड  प्लस  सुरक्षा'

मैं  ऐसे  भगवान  को
नहीं  मानता
जो  हाथ  में  हथियार  लिए  बिना
घर  से  न  निकले

मैं  ऐसे  किसी  इमाम
या  शंकराचार्य  को  भी  नहीं  मानता
जो  'ज़ेड  प्लस  सुरक्षा'  के  सहारे
धर्म  का  प्रचार  करे

मैं  किसी  ऐसे  धर्म  को
नहीं  मानता
जो  मेरे  पड़ोसी  का  घर
जलाने  की  शिक्षा  दे….

मैं  ऐसे  धर्म  या  राष्ट्र  पर
थूकता  हूं
जो  अपने  ही  देश  में
अपने  ही  नागरिकों  को
सिर्फ़  धर्म  के  आधार  पर
दूसरे  दर्ज़े  का  बना  दे….

मैं  मनुष्य  हूं
मुझे  जीने  दो
एक   मनुष्य  की  तरह  !

                     ( तीन )

धर्म  और  समाज  के  ठेकेदारों  ! 

मुझे  हथियारों  का  डर
मत  दिखाओ
मुझे  मौत  का  भी  डर  नहीं  है…

मुझे  स्वर्ग  का  लालच  मत  दो
मैं  अपनी  मातृ-भूमि  में  ही
ख़ुश  हूं …

मुझे  जन्नत,  हूरों  और  शराब
के  झांसे  भी  मत  दो
मुझे  अपनी  मेहनत  से  कमाई  रोटी
के  सिवा  कुछ  भी  प्यारा  नहीं…

मेरे  सामने  से  हट  जाओ
धर्म  और  समाज  के  ठेकेदारों  !

                                                     ( 2013 )

                                               -सुरेश  स्वप्निल 




रविवार, 8 सितंबर 2013

धर्म, मात्र एक हथियार है

फिर  सफल  हो  गए  वे
दिलों  के  बीच  दीवार  बनाने  में
फिर रक्त  से  सींच  दिया
बूंद-बूंद  पानी  से  तरसती  धरती  को
फिर बिछा  दी  गईं  लाशें
निर्दोष  मनुष्यों  की
धर्म  के  नाम  पर…

वे  ध्रुवीकरण  चाहते  हैं
तथाकथित  धर्मों  के  नाम  पर
वे  चाहते  हैं  कि  मनुष्य
एक-दूसरे  की  आस्थाओं  को  नकार  दें
वे  सिद्ध  कर  देना  चाहते  हैं
कि  धर्म
मात्र  एक  हथियार  है
मनुष्यों  को  एक-दूसरे  के  विरुद्ध
खड़ा  करने  का
कि  अलग-अलग  धर्म  के  मनुष्यों  का
रक्त  भी  अलग-अलग  होता  है

कि  एक  धर्म  में  पैदा  हुए  मनुष्य
बेहतर  मनुष्य  होते  हैं
दूसरे  या  तीसरे  धर्म  के  मनुष्यों  से…

वे  उस  विचार  को  ही  मिटा  देना  चाहते  हैं
जिसे  सारा  संसार  जानता  है
'भारतीयता'  के  नाम  से

हमें  दुःख  है
बहुत-बहुत  दुःख
आपसे  यह  पूछते  हुए
कि  आप  मनुष्य  हैं
या  हिंदू
या  मुसलमान
या  बौद्ध,  या  सिख ,  ईसाई,  जैन
या  कोई  और ???

आप  मनुष्य  क्यों  नहीं  हैं,  महाशय  ?

                                                      ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल



शनिवार, 7 सितंबर 2013

प्रवचन की दूकान !

आओ  मिल  कर  लूट  मचाएं

अच्छी-ख़ासी  भीड़  लगी  है
अंधे-बहरे-गूंगे-काने
भक्त-जनों  को  मूर्ख  बनाएं
हाथ-सफाई  से  काग़ज़  को  नोट  बनाएं
ताज़े-ताज़े  लड्डू-पेड़े
आस्तीन  को  हिला-डुला  कर
मिट्टी  को  प्रसाद  बना  कर
अपनी  जय-जयकार  कराएं
ज्ञान-तर्क  की  धूल  उड़ा  कर
कीड़ों  को  भगवान  बनाएं

धर्म-ग्रंथ  में  क्या  लिक्खा  है
अच्छे-अच्छे  पढ़े-लिखे  भी  नहीं  जानते
चाहे  जो  भी  गढ़ो  कहानी
कुछ  भी  उल्टा-सीधा  बक  दो
भक्त-जनों  में  अक़्ल  कहां  है ?
तुम  मत  मांगो
लोग  मगर  फिर  भी  दे  देंगे
तुम  बस  उनको  शिष्य  बनाओ
चाहे  जैसी  दीक्षा  बांटो
चाहे  जो  गुरु-मंत्र  बता  दो  …

डायबिटीज़  की  दवा  बता  कर
रसगुल्ले  की  मांग  बढ़ाओ
लौकी-कद्दू  के  नुस्ख़े  से
जम  कर  अपनी  चांदी  काटो
दोनों  हाथों  लूट-लूट  कर
भक्तों  को  कंगाल  बनाओ
दाढ़ी-भगवा-पगड़ी  का  उपयोग  सीख  लो
'वैदिक'  का  बाज़ार  बनाओ
संस्कृति   में  आग  लगाओ…

उफ़ ! यह  इतना  छोटा  जीवन  !
करने  को  है  इतना-सारा
धर्म  और  ईमान  भूल  कर
नोट  कमाओ  ढेर  लगाओ
सात  पुश्त  की  करो  व्यवस्था
यहां-वहां  गुरुकुल  खुलवा  दो
नेताओं  को  शिष्य  बना  कर
क़ानूनों  को  धता  बताओ

कहां  लगे  हो ?
बच्चों  को  बाबा  बनने  के
गुर  सिखलाओ….

अपने  दोनों  लोक  संवारो
सातों  जन्म  सफल  कर  डालो
काम-धाम  सब  छोड़-छाड़  कर
प्रवचन  की  दूकान  चलाओ
नोट  कमाओ
भारत  का  सम्मान  बढ़ाओ  !

                                          ( 2013 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल