बुधवार, 11 सितंबर 2013

हरा देना हमें ...

स्थिति  नियंत्रण  में  है
फ़िलहाल

लोग  केवल  रात  में
मर-मार  रहे  हैं
एक-दूसरे  को
वह  भी  आठ-दस…
औसतन  प्रति-दिन !

लगभग  दस  करोड़  की
जन-संख्या  में  इतनी  मौतें
यूं  भी  हो  ही  जाती  हैं
और  यह  अधिकार  मिलना  चाहिए
लोकतांत्रिक  रूप  से
चुनी  गई  सरकार  को
कि  इस  नाम-मात्र  की  मृत्यु-दर  को
सामान्य  कह  सके….

अब  संविधान  का  तो  ऐसा  है
भाई  जी
कि  जिसकी  लाठी,  उसी  की  भैंस….
क़ानून  भी

चलिए,  मान  लिया  कि
सरकार  असफल  हो  गई  है  हमारी
मगर  अभी  भी
बहुमत  है  हमारे  पास
और  केंद्रीय  सत्ता,  संविधान
और  सर्वोच्च  न्यायालय
सब  हमारे  पक्ष  में  हैं….

हम  कह  रहे  हैं  न
कि  नियंत्रण  में  है  स्थिति
आप  मानें  या  न  मानें

अगले  चुनाव  में  हरा  देना  हमें
यदि  संभव  है,  तो !

                                            ( 2013 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल 


मंगलवार, 10 सितंबर 2013

तीन छोटी कविताएं

               ( एक )

धर्म  भी  पीछा  छोड़  दे…

मैं  अपने  नाम  के  आगे
जाति  का  दुमछल्ला
नहीं  लगाता….

सोच  रहा  हूं
कि  कोई  ऐसा  नाम  रख  लूं
कि  मेरा  धर्म  भी
पीछा  छोड़  दे  मेरा….

               ( दो )

'ज़ेड  प्लस  सुरक्षा'

मैं  ऐसे  भगवान  को
नहीं  मानता
जो  हाथ  में  हथियार  लिए  बिना
घर  से  न  निकले

मैं  ऐसे  किसी  इमाम
या  शंकराचार्य  को  भी  नहीं  मानता
जो  'ज़ेड  प्लस  सुरक्षा'  के  सहारे
धर्म  का  प्रचार  करे

मैं  किसी  ऐसे  धर्म  को
नहीं  मानता
जो  मेरे  पड़ोसी  का  घर
जलाने  की  शिक्षा  दे….

मैं  ऐसे  धर्म  या  राष्ट्र  पर
थूकता  हूं
जो  अपने  ही  देश  में
अपने  ही  नागरिकों  को
सिर्फ़  धर्म  के  आधार  पर
दूसरे  दर्ज़े  का  बना  दे….

मैं  मनुष्य  हूं
मुझे  जीने  दो
एक   मनुष्य  की  तरह  !

                     ( तीन )

धर्म  और  समाज  के  ठेकेदारों  ! 

मुझे  हथियारों  का  डर
मत  दिखाओ
मुझे  मौत  का  भी  डर  नहीं  है…

मुझे  स्वर्ग  का  लालच  मत  दो
मैं  अपनी  मातृ-भूमि  में  ही
ख़ुश  हूं …

मुझे  जन्नत,  हूरों  और  शराब
के  झांसे  भी  मत  दो
मुझे  अपनी  मेहनत  से  कमाई  रोटी
के  सिवा  कुछ  भी  प्यारा  नहीं…

मेरे  सामने  से  हट  जाओ
धर्म  और  समाज  के  ठेकेदारों  !

                                                     ( 2013 )

                                               -सुरेश  स्वप्निल 




रविवार, 8 सितंबर 2013

धर्म, मात्र एक हथियार है

फिर  सफल  हो  गए  वे
दिलों  के  बीच  दीवार  बनाने  में
फिर रक्त  से  सींच  दिया
बूंद-बूंद  पानी  से  तरसती  धरती  को
फिर बिछा  दी  गईं  लाशें
निर्दोष  मनुष्यों  की
धर्म  के  नाम  पर…

वे  ध्रुवीकरण  चाहते  हैं
तथाकथित  धर्मों  के  नाम  पर
वे  चाहते  हैं  कि  मनुष्य
एक-दूसरे  की  आस्थाओं  को  नकार  दें
वे  सिद्ध  कर  देना  चाहते  हैं
कि  धर्म
मात्र  एक  हथियार  है
मनुष्यों  को  एक-दूसरे  के  विरुद्ध
खड़ा  करने  का
कि  अलग-अलग  धर्म  के  मनुष्यों  का
रक्त  भी  अलग-अलग  होता  है

कि  एक  धर्म  में  पैदा  हुए  मनुष्य
बेहतर  मनुष्य  होते  हैं
दूसरे  या  तीसरे  धर्म  के  मनुष्यों  से…

वे  उस  विचार  को  ही  मिटा  देना  चाहते  हैं
जिसे  सारा  संसार  जानता  है
'भारतीयता'  के  नाम  से

हमें  दुःख  है
बहुत-बहुत  दुःख
आपसे  यह  पूछते  हुए
कि  आप  मनुष्य  हैं
या  हिंदू
या  मुसलमान
या  बौद्ध,  या  सिख ,  ईसाई,  जैन
या  कोई  और ???

आप  मनुष्य  क्यों  नहीं  हैं,  महाशय  ?

                                                      ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल



शनिवार, 7 सितंबर 2013

प्रवचन की दूकान !

आओ  मिल  कर  लूट  मचाएं

अच्छी-ख़ासी  भीड़  लगी  है
अंधे-बहरे-गूंगे-काने
भक्त-जनों  को  मूर्ख  बनाएं
हाथ-सफाई  से  काग़ज़  को  नोट  बनाएं
ताज़े-ताज़े  लड्डू-पेड़े
आस्तीन  को  हिला-डुला  कर
मिट्टी  को  प्रसाद  बना  कर
अपनी  जय-जयकार  कराएं
ज्ञान-तर्क  की  धूल  उड़ा  कर
कीड़ों  को  भगवान  बनाएं

धर्म-ग्रंथ  में  क्या  लिक्खा  है
अच्छे-अच्छे  पढ़े-लिखे  भी  नहीं  जानते
चाहे  जो  भी  गढ़ो  कहानी
कुछ  भी  उल्टा-सीधा  बक  दो
भक्त-जनों  में  अक़्ल  कहां  है ?
तुम  मत  मांगो
लोग  मगर  फिर  भी  दे  देंगे
तुम  बस  उनको  शिष्य  बनाओ
चाहे  जैसी  दीक्षा  बांटो
चाहे  जो  गुरु-मंत्र  बता  दो  …

डायबिटीज़  की  दवा  बता  कर
रसगुल्ले  की  मांग  बढ़ाओ
लौकी-कद्दू  के  नुस्ख़े  से
जम  कर  अपनी  चांदी  काटो
दोनों  हाथों  लूट-लूट  कर
भक्तों  को  कंगाल  बनाओ
दाढ़ी-भगवा-पगड़ी  का  उपयोग  सीख  लो
'वैदिक'  का  बाज़ार  बनाओ
संस्कृति   में  आग  लगाओ…

उफ़ ! यह  इतना  छोटा  जीवन  !
करने  को  है  इतना-सारा
धर्म  और  ईमान  भूल  कर
नोट  कमाओ  ढेर  लगाओ
सात  पुश्त  की  करो  व्यवस्था
यहां-वहां  गुरुकुल  खुलवा  दो
नेताओं  को  शिष्य  बना  कर
क़ानूनों  को  धता  बताओ

कहां  लगे  हो ?
बच्चों  को  बाबा  बनने  के
गुर  सिखलाओ….

अपने  दोनों  लोक  संवारो
सातों  जन्म  सफल  कर  डालो
काम-धाम  सब  छोड़-छाड़  कर
प्रवचन  की  दूकान  चलाओ
नोट  कमाओ
भारत  का  सम्मान  बढ़ाओ  !

                                          ( 2013 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल 


शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

वोटों के भिखारी

कुछ  लोग  जीवन-भर  भीख  मांगते  हैं
और  स्वीकार  भी  नहीं  करते
उन्हें  न  चोरी  से  परहेज़  होता  है
न  लूट  या  धोखाधड़ी  से
उन्हें  न  देश  की  चिंता
न  अपने  आत्म-सम्मान  की

वे  हर  क़ानून  को  अपनी  जेब  में  रखते  हैं
और  न्याय  को  जब  चाहे  ख़रीद  सकते  हैं
ऊंची  से  ऊंची  क़ीमत  दे  कर…

हां,  ईश्वर  से  उन्हें   बहुत  डर  लगता  है
और  उससे  भी  अधिक  उसके  दलालों  से
कम  से  कम  दिखाने  के  लिए

वे  दरअसल  ईश्वर  और  उसके  दलालों  की
वोट  खींचने  की  क्षमता  पहचानते  हैं

वे  चुनाव  लड़ते  हैं
और  जीत  कर
संसद  और  विधानसभाओं  में  बैठ  कर
मूंग  दलते  हैं
देश  की  छाती  पर  !

वे  फिर  आने  वाले  हैं
तुम्हारे  घर
वोटों  की  भीख  मांगने
ताकि  वह  सब  कुछ  लूट  लें
जो  अभी  तक  बचा  हुआ  है  तुम्हारे  पास !

                                                              ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 



गुरुवार, 5 सितंबर 2013

आप हत्यारे हैं !

सच-सच  बतलाइए
आप  उस  समय  कहां  थे
जब  कल  भीड़  एक  निर्दोष  को
बीच  सड़क  पर
लाठियों  से  पीट  कर
जान  ले  रही  थी  उसकी…

मुझे  मालूम  है  कि  आप  कहेंगे
'पुलिस  भी  तो  थी  वहां  पर  !'
आपने  क्या  किया  लेकिन  ?
पुलिस  को  याद  दिलाया  उसका  कर्त्तव्य  ?
जानना  चाहा  भीड़  से
उस  मरते  हुए  मनुष्य  का  दोष  ?
आंखें  गीली  हुईं  आपकी
मरते  हुए  मनुष्य  को  तड़पता  देख  कर
कुछ  तो  किया  होगा  आपने  !

याद  कीजिए
क्या  किया  सोच  रहे  थे  उस  समय  ?

मैं  बताऊँ  आप  क्या  कर  रहे  थे  ?
आप  मज़े  ले  रहे  थे  आंखें  फाड़-फाड़  कर !
मृत्यु  को  अपनी  सामने  घटित  होने  का
आनंद  उठा  रहे  थे  !

वह  जो  मरता  हुआ  मनुष्य  था
आप  परिचित  भी  थे  उससे  शायद
शहर  में  यहां-वहां  आते-जाते
दुआ-सलाम  भी  की  होगी  अक्सर
संभव  है  कहीं  कुछ  भावनाएं  भी  जुड़ी  रही  हों  आपकी

तो  भी  आप  मौन  रहे
आपने  सिर्फ़  आनंद  लिया
एक  जीवित  मनुष्य  को
मृत  शरीर  में  बदलते  देखने  का …

कल  यही  भीड़  आपको  घेर  ले
कल  आपका  छोटा  भाई
या  आपकी  संतान  या  आपके  माता-पिता
भीड़  के  हाथ  चढ़  गए  तो ???

आख़िर  किससे  मदद  मांगेंगे  आप  ?

नहीं,  न्याय  की  बात  मत  कीजिए
मत  दीजिए  दोष  पुलिस  को
पल-पल  नष्ट  होते  सामाजिक  मूल्यों  को

अपनी  आत्मा  को  छू  कर  देखिए
आप  हत्यारे  हैं  महाशय
स्वयं  अपने  ही  विवेक  के  !

                                                       ( 2013 )

                                                 -सुरेश  स्वप्निल

*झारखण्ड में एक छात्र-नेता की बीच  सड़क पर लाठियों से पीट-पीट कर की गई हत्या पर…



बुधवार, 4 सितंबर 2013

मूर्ख हैं हम और आप

कोई  प्रतिरोध  नहीं
कोई  प्रतिकार  नहीं
कहीं  कोई  विरोध  का  स्वर  नहीं

यदि  यही  रवैया  रहा  जनता  का
यदि  ऐसे  ही  चलती  रहीं  सरकारें
यदि  ऐसे  ही  बढ़ती  रही  मंहगाई
और  बेरोज़गारी
तो  इत्मीनान  रखिए
कोई  नहीं  बचा  सकता  देश  को
उसकी  स्वतंत्रता, संप्रभुता, एकता
और  अखंडता  को….

सरकारें  चाहती  हैं
सब  कुछ  चलता  रहे  यों  ही
सब  कुछ  सहती  रहे  जनता….

मूर्ख  हैं  हम  और  आप
या  कायर
कि  होने  दें  सरकार  की  सारी  इच्छाएं  पूरी ???

                                                               ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

 

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

बदल जाएंगे भूगोल !

फिर  रक्त-पिपासा  बढ़  गई
आदम ख़ोरों  की
फिर  ढूंढ  लिए  गए  निरीह,  बेबस  मनुष्य
नवीनतम  हथियारों  के  परीक्षण  के  लिए
गढ़  लिए  गए  नए  बहाने
शक्ति-प्रदर्शन  के  लिए
फिर  तलाश  लिए  गए
नए  तेल-क्षेत्र 
मुनाफ़ाखोर ख़ोर  व्यापारियों  की  मंशा  के  अनुरूप

दिल्ली  से  दमिश्क  तक
दलालों  के  तथा-कथित  समर्थन  के  दम  पर
कब  तक  सहेंगे  दुनिया  के  ग़रीब  लोग
सुनियोजित,  सु-संगठित   'मानवता  के  रक्षकों'  के  आतंक  ?
 दुखद  समाचार  है  वॉशिंगटन  के  लिए
मौत  की  पूर्व-सूचना  है
अमेरिका  के  चारण-भांडों  के  लिए
कि  इतना  आसान  नहीं  होगा  अब
झूठ  के  दम  पर  किसी  अन्य  ईराक़  को  गढ़ना
इतना  आसान   नहीं  होगा
तेल  के  भावों  को  मनमर्ज़ी  से
चढ़ाना-गिराना….

अबकी  बार 
सिर्फ़  अर्थ-व्यवस्था  ही  नहीं  बदलेगी
बदल  जाएंगे  भूगोल
दिल्ली  से  दमिश्क  तक  !

                                                              ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

*





सोमवार, 2 सितंबर 2013

बचो अमेरिकी चालों से, मूर्खों !

संसार  का  ठेका  ले  रखा  है
अमेरिका  ने  !

सीरिया  में  किसने  क्या  खाया
तुर्की  में  किसने  क्या  पिया
सऊदी  अरब  में  किसको  छींक  आई
भारत  ने  किससे  क्या  ख़रीदा
सब  का  हिसाब  चाहिए  अंकल  सैम  को…

आख़िर  किसने  बनाया  चौधरी  अमेरिका  को
सारी  दुनिया  का ?

अब  भी  समय  है
अपने-आप  को  स्वतंत्र,  स्वायत्त,  संप्रभु  देश
मानने  वाले
प्रबंध  कर  लें  अपनी  आज़ादी  बचाने  का

बचो,  अमेरिकी  चालों  से
मूर्खों  !

                                                                  ( 2013 )

                                                             -सुरेश  स्वप्निल 




रविवार, 1 सितंबर 2013

डर नहीं लगता आपको ?

आपको  डर  नहीं  लगता
तरह-तरह  की  दाढ़ी  वाले
बाबा,  संत,  महंतों  और  मौलानाओं  से

क्या  आपको  डर  नहीं  लगता
गाँधी-टोपी,  काली  टोपी  या   लाल
या  किसी  अन्य  रंग  की  टोपी  वाले
नेताओं  और  उनके  समर्थकों  से

क्या  लाल, पीली, नीली  बत्तियों  वाली
गाड़ियों  से  भी
डर  नहीं  लगता  आपको ????

यदि  सचमुच  आपको
इन  तरह-तरह  की  पहचान  वाले
अधि-मानवों  से  डर  नहीं  लगता
तो  वाक़ई  आप  बहादुर  भारतीय  हैं …

                                                    ( 2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल


शनिवार, 31 अगस्त 2013

नाश होगा पूंजीवाद का

अमेरिका  में  हवा  चलती  है
रुपया  गिर  जाता  है
अमेरिका  में  हवा  नहीं  चलती
रुपया  गिर  जाता  है
अमेरिका  में  सर्दी, गर्मी, बरसात …
कोई  भी  मौसम  आए  या  जाए
रुपया  गिर-गिर  पड़ता  है…

जब-जब  रुपया  ग़ोता  लगाता  है
निवेशक  ख़ुश  होते  हैं
टाटा-बिरला-अम्बानी-अडानी-नारायण  मूर्ति
सब  के  सब  जश्न  मनाते  हैं
प्रधानमंत्री  को  'मिठाई'  भेजते  हैं
और  सारे  दलों  को  चुनाव  के  लिए  चंदा …

वाह !  क्या  शानदार  लोकतंत्र  है
जहां  संसद  में  चिंता  होती  है
और  नेताओं  के  घर  में  जश्न…

चुनाव  हालांकि  बहुत  दूर  हैं  अभी
शायद  कई  बरस  या  दशक  दूर
मगर  जनता  का  धैर्य  चुकने  लगा  है

जिस  दिन  धैर्य  टूट  गया  अवाम  का
उस  दिन
किसी  को  नहीं  पता
कि  अमेरिका  की  नौकरी  बजाने  वाले
पूंजीपतियों  की  दलाली  करने  वाले
नेता-अभिनेता-डाकू-तस्करों-अफ़सरों  का
क्या  हाल  करेंगे  लोग…

अवाम  को  कमज़ोर  मत  समझो
जिस  दिन  अवाम  सर  उठाएगी
उस  दिन  दुनिया  की  तमाम  सरकारें
और  उनके  दलाल
भीख  मांगते  फिरेंगे  जान-माल  की

जिस  दिन  रुपया  अपनी  पर  आएगा
उस  दिन
डॉलर,  पौंड,  दीनार  और  दिरहम
सब  धूल  चाटते  नज़र  आएंगे

उस  दिन  नाश  होगा  पूंजीवाद  का
आर्थिक  आतंकवाद  और  उपनिवेश वाद  का…

वह  दिन  चाहे  जितना  दूर  लगे
बेहद  पास  है !

                                                                     ( 2013 )

                                                             -सुरेश  स्वप्निल 


मंगलवार, 27 अगस्त 2013

बस, हमारा कन्हैया !

हमें  चाहिए
बस,  हमारा  कन्हैया !

ज़रा  सांवला
मेघ  जैसा  सुयाचित
नयन  सूर्य  के  तेज  से  जगमगाते
वदन  चन्द्रमा  ज्यों
शरद  पूर्णिमा  का
स्निग्ध  स्नेह-अमृत  से
पूरित-प्रकशित…

बड़ी  देर  से  हम  उसे  ढूंढते  हैं
कहां  है,  कहां  है
हमारा  कन्हैया ???

बड़ा  प्यारा-प्यारा
सभी  का  दुलारा
यशोदा  की  आंखों  का  तारा  कन्हैया !

ज़रा  अपने  आंगन  में  उठ  कर  तो  आओ
वो  देखो,  वो  देखो
मचलता,  ठिठकता,  कभी  डगमगाता
न  जाने  कहां  से  ये  माखन  चुरा  के
हथेली  से  मुख  तक  सभी  अंग  साने
बड़े  ढीठपन  से
कभी  खिलखिलाता,  कभी  मुस्कुराता
चला  आ  रहा  है
हृदय  का  सहारा
हमारा  कन्हैया !

कोई  उसका  मुख,  हाथ-पांव  धुलाओ
ये  घुंघराली  अलकें  सहेजो-संवारो
मुकुट  मोरपंखी  धरो  शीश  पर
एक  छोटी  सी  दिठिया  लगाओ
फिर  हाथों  में  स्वर-धन्य  बंसी  थमाओ ….

ज़रा  यूं  सजाओ
कि  जब  वो  प्रकट  हो
तो  कहने  लगें
वृन्द-कानन  के  वासी
यही  है,  यही  है
हमारा  कन्हैया  !

हमारा  कन्हैया
तुम्हारा  कन्हैया  !

                                                       ( 2013 )

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 


सोमवार, 26 अगस्त 2013

आज है जन्माष्टमी !

आज  है  जन्माष्टमी !

श्रीकृष्ण-मंदिर  में
अर्द्ध-रात्रि  के  समय
होनी  है  पूजा
कराएंगे  पंडित जी !

जलेगी  अगरबत्ती
मंत्र  पढ़े  जाएंगे
घंटा-ध्वनि  होगी
फिर  शंख  भी  बजेगा
बजाएंगे  पंडित  जी !

नगर  की  कुमारियां
होंगी  एकत्र  वहां
गाएंगी  सोहर, और
नाचेंगी  घूमर 
नचाएंगे  पंडित  जी !

कृष्ण-प्रेम  विह्वल
किसी  कन्या  का
अंग  कोई
भूल  से  उघड़े
खिल  जाएंगे  पंडित जी !

और  कोई  सु-कुमारी
राधा  बन  आएगी
दधि-माखन  लाएगी
चीर  बेचारी  का
उड़ाएंगे  पंडित  जी !

आदत  तो  आदत  है
जा  सकती  है  भला ?
रात  में  टांगों  में
तकिया  दबा  कर
सो  पाएंगे  पंडित  जी !

                                     ( 1977 )

                            -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'देशबंधु', भोपाल ( 1977 ), 'अंतर्यात्रा' ( 1983 ) एवं अन्यत्र।

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

पुलिस सर्वशक्तिमान है !

कल  रात
सपने  में  आई  थी  पुलिस
और  छीन  ले  गई
अभिव्यक्ति  की   स्वतंत्रता

डंडे  मार-मार  कर
झड़ा  दिए  सारे  शब्द
खुरच-खुरच  कर
मिटा  गई  राजनैतिक  समझ
लूट  ले  गई
वैचारिक  चेतना  …


यह  जानते  हुए  भी
कि  यह  मौलिक  अधिकार  है
भारतीय  संविधान  में  …

मगर  पुलिस  को  कौन  समझा  सकता  है
सही  और  ग़लत  का  फ़र्क़
कौन  सिखा  सकता  है
मानवीय  व्यवहार ?

पुलिस  सर्वशक्तिमान  है
जब  तक  उसके  शरीर  पर
चिपकी  हुई  है
ख़ाकी  वर्दी
और  हाथ  में  है  डंडा !

शुक्र  है  कि  यह
स्वप्न  ही  था
बेहद  डरावना  …

मगर  यह  दु:स्वप्न
सत्य  में  बदल  सकता  है
किसी  भी  दिन  …

यह  भारत  है
मानवाधिकार  के  रखवालों !

                                           ( 2013 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल




शनिवार, 27 जुलाई 2013

विश्वास आम आदमी का !

बहुत  देर  से   ढूंढ  रहा  हूं
सारी  दिल्ली  छान  ली
कहीं  भी  मुझे  खाना  नहीं  मिला
एक,  पांच  या  बारह  रुपये  में  !

सरकार  क्या  यह  भी  नहीं  जानती
कि  खाना  खाना  बुनियादी  ज़रूरत  है
मनुष्य  की
और  निस्संदेह,  यह  परिहास  का
विषय  नहीं  है

और  क्या  सरकार
यह  भी  नहीं  जानती
कि  उसके  पास
नाम-मात्र  का  भी  समय  नहीं  है
सत्ता  के  मार्ग  पर
वापसी  का  ?

अब  एक  भी  भूल
सारी  संभावनाएं  नष्ट  कर  देगी
तुम्हारी
और  तुम्हारी  आने  वाली
कई  पुश्तों  की !

कैसे  मूर्ख  हो  तुम
इतना  भी  नहीं  जानते
कि  तुमने 
खो  दिया  है  विश्वास
आम  आदमी  का  !

                                         ( 2013 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल 


बुधवार, 24 जुलाई 2013

झूठ बोल रहे हैं प्रधानमंत्री

मैं  अमीर  हूं
क्योंकि  मैं  सौ  रुपये  प्रतिदिन  कमाता  हूं

मैं  अमीर  हूं
क्योंकि  मेरे  प्रधानमंत्री  कहते  हैं

सौ  रुपये  प्रतिदिन  में
क्या-क्या  करता  हूं
मेरे  घर  में  तीन  मोबाइल  फ़ोन  हैं
उन्हें  रिचार्ज  कराना
घर  में  फ़्रिज  है,  टी. वी.  है,  कंप्यूटर  है
पंखा  है,  तीन  बल्ब  हैं
उन  सबका  बिजली  का  बिल  जमा  करना
बेटी  निजी  स्कूल  में  पढ़ती  है
उसकी  पढ़ाई  और  बस  की  फ़ीस  चुकाना

सौ  रुपये  प्रति  लीटर  का
खाने  का  तेल
तीन  सौ  रुपये  प्रति  किलो  की
चाय  की  पत्ती
पचास  रुपये  प्रति  लीटर  का  दूध ….

आपको  आश्चर्य  हो  रहा  है  न  !
इतना  सब  करने  के  बाद
हम  तीन  प्राणी  खाना  भी  खाते  हैं
दोनों  समय
मकान  का  किराया  देते  हैं
दो  फ़िल्में  भी  देखते  हैं
तीज-त्यौहार  पर  नए  कपड़े  बनवाते  हैं
मेहमानों  की  आव-भगत  भी  करते  हैं …

मैं  यह  सब  करता  हूं
सौ  रुपये  प्रतिदिन  की  कमाई  में
क्योंकि  मैं  अमीर  हूं !

झूठ  बोल  रहे  हैं  प्रधानमंत्री
या  झूठ  बोल  रहा  है  सारा  देश !

                                                   ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल 


सोमवार, 22 जुलाई 2013

यह कैसा संविधान ?

देश  में  अब
भेड़िया-तंत्र  चाहते  हैं
सियार !

वर्ण-संकर  कुत्तों  की  सरकार
बहुत  चल  चुकी
शेर  विलुप्त  हो  चुके
वन-प्रांतर  से
हाथी  शाकाहारी  हैं  अब  भी

विकट  समय  है  !
समस्या  यह
कि  सुरक्षा  कौन  करेगा
देश  की  ?

मुर्दाख़ोर  कबरबिज्जू
लाशें  खोद-खोद  कर
ख़ाली  कर  चुके
क़ब्रस्तान
और  अब
दृष्टि  लगाए  बैठे  हैं
जीवित  मनुष्यों  पर  !

विडम्बना  यह  कि
सारी  समृद्धि  लूट  कर
बैंक-खातों  में  जमा  कर  चुके
यही  मुर्दाख़ोर  कबरबिज्जू
वित्त  जुटा  रहे  हैं
भेड़िये  के  राज्यारोहण  के  लिए...

उफ़ !  यह  कैसा  संविधान  है
इस  देश  का
जहां  केवल  मनुष्यभक्षी  ही
पा  सकते  हैं  सत्ता !!!!! ?????

                                        ( 2013 )

                                  -सुरेश  स्वप्निल




गुरुवार, 18 जुलाई 2013

तुम्हारे बच्चे नहीं थे न !

वे  जो  मार   डाले  गए
ज़हर  मिला  खाना  खिला  कर
वे  तुम्हारे  बच्चे  नहीं  थे  न  !

वे  तो  मनुष्य  भी  नहीं  थे  शायद
सड़े-गले  जानवरों  का  मांस
और  तुम्हारी  जूठन  पर
जीवित  रहने  वाले
चूहे  खाने  वाले
मुसहर  कहीं  के  !

तुम्हारी  कृपा  न  होती
तो  जान  पाते  क्या  वे
गेहूं  की  रोटी
और  अरहर  की  दाल  का  स्वाद  ?

हम  भी  कितने  कृतघ्न  हैं
कि  संदेह  कर  रहे  हैं
तुम्हारी  दयालुता  पर  !

अच्छा,  जो  बच्चे  मर  गए
एक  समय  के  भोजन  के  लालच  में
वे  जीवित  रहते  तो  क्या  करते  ?
अंततः,  बंधुआ  ही  तो  बनते  तुम्हारे  !

अच्छा  हुआ
जो  मार डाला  तुमने
ज़हर  खिला  कर
मुक्त  तो  हुए
जीवन-भर  की  दरिद्रता
और  रोज़ी-रोटी  की  चिंता  से  !

जो  कुछ  भी  हुआ
अच्छा  ही  हुआ
वे  क्या  पढ़-लिख  कर
प्रधानमंत्री  बन  जाते  !

मत  रोओ  उनके  नाम  पर
महा मूर्खों !

                                           ( 2013 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल


बुधवार, 17 जुलाई 2013

दो-टके के भिखारी !

हम  'प्रजा'  नहीं  किसी  की
न  तुम  राजा  या  सम्राट  हमारे
हम  हैं  'लोक'
संप्रभु,  स्वायत्त  नागरिक  !

हम  पर  'राज'  करने  के  सपने
मत  देखो,  मूर्खाधिराज !
सिर्फ़  'सेवक'  हो  तुम  हमारे
वेतन-प्राप्त  करने  वाले
पांच  वर्ष  की संविदा  पर  नियुक्त
साधारण  कर्मचारी  !

संविदा  समाप्त
तुम्हारी  नौकरी  भी  समाप्त  !

अगली  बार
हमारा  'मत'  मांगने  आओ
तो  ध्यान  रखना
अगली  बार  तुम्हारे  वचन-भंग
तो  तुम्हारा  छत्र  भी  भंग !

जाओ,  ज़्यादा  शोर  मत  करो
दो  टके  के  भिखारी
मक्कारों !
बहुत-से  काम  करने  हैं  हमें
तुम्हारा  दोज़ख़  भरने  को  भी  !

                                           ( 2013 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल






मंगलवार, 16 जुलाई 2013

क्या कर लेंगे आप ?

मैं / जली-कटी  सुनाने  का  आदी  हूं !
चीखूंगा-चिल्लाऊंगा / सबको  दूंगा  अभिशाप
मेरा  क्या  कर  लेंगे  आप ?
पहले  दीपक  को  गाली  दी  थी
अब  सूरज  को  दूंगा / आप  रोकेंगे  मुझे ?
हिम्मत  है  तो  आ  जाइए / अपनी  मर्दानगी  आज़माइए
कम  से  कम/ चुप  तो  नहीं  कर  सकेंगे  मुझे  आप !
यह  तो / आपकी  ही  नज़रों  में  अवैध  है
बोलने  की  आज़ादी / दी  है  हमें / शायद / आपको  इसका  खेद  है
तो  छीन  लीजिए  यह  आज़ादी  भी /-
और  अपनी  मां  के  गटर  में / डाल  आइए  !
लेकिन / खाने-पीने  और  कमाने  से  वञ्चित  आदमी  का /
खुला  हुआ  मुंह
गालियां नहीं / तो  क्या / तुलसी  के  भजन  सुनाएगा ?

ग़रीबों  का  सूखता  लहू / एक  दिन / रंग  लाएगा।
क्या  तुम / क़यामत  के  उस  दिन  के  लिए / तैयार  हो ?

नफ़रत  की  आग / बुरी  होती  है / मेरे  यार ! / जल  जाओगे।
हमें  छुओ / हमें  जानो / हमारे  क़रीब  आओ
हमारे  दुःख-सुख  में / हाथ  बंटाओ / तो  जी  सकोगे।
वरना / याद  रखना- यार / वक़्त  के  सर  से / जब  पानी  गुज़र  जाएगा
तुम्हारे  अस्तित्व  का / कोई  भी  चिह्न / नहीं  नज़र  आएगा।

मेरी  आवाज़ / वक़्त  की  तरफ़  से / चेतावनी  है  तुम्हें
सुनो  न  सुनो / तुम्हारी  मर्ज़ी !
फिर  भी / मैं/ चीखूंगा-चिल्लाऊंगा / सबको  दूंगा  अभिशाप
मेरा  क्या  कर  लेंगे  आप ?

                                                                                                ( 1976 )

                                                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'देशबंधु', भोपाल, 1976, 'अंतर्यात्रा'-13, 1983 एवं अन्यत्र। पुनः प्रकाशन  हेतु उपलब्ध।