गुरुवार, 9 मई 2013

मित्रों की थाती से: पांच

गिद्ध जानते हैं

मुर्गे की बाँग से
निकलता हुआ सूरज
चूल्हे की आग से गुजरते हुए
बन्द हो जाता है
एल्यूमिनियम के टिफिन में
बाँटकर भरपूर प्रकाश
जीने के लिये ज़रूरी उष्मा
तकिये के पास रखकर
जिजीविषा के फूल
छोड़ जाता है
कल फिर आने का स्वप्न
यह शाश्वत सूरज
उस सूरज से भिन्न है
जो ऊगता है कभी-कभार
झोपडपट्टी को
महलों में तब्दील करने की
खोखली गर्माहट लिये हुए
भर लेता है वह
अपने पेट में
मुर्गे की बाँग क्या
समूचा मुर्गा ही
और चूल्हे की आग
रोटी का स्वप्न
नींद का चैन तक
वह छोड़ जाता है अपने पीछे
उसे आकाश की ऊँचाई तक पहुँचाने वाले गिद्धों को
जो जानते हैं
सूरज के संरक्षण में
जिस्मों से ही नहीं
कंकालों से भी
माँस नोचा जा सकता है ।

                        शरद कोकास 
 
*यह  कविता  शरद  के  1993 में प्रकाशित काव्य-संग्रह 'गुनगुनी धूप में बैठ कर' से, सप्रेम, साभार।
 
 


बुधवार, 8 मई 2013

मित्रों की थाती से: चार


आखेटकों  के  विरुद्ध

सागवानी  
सन्नाटे  को  तोड़  कर 
गूंजती  हैं  जब  बंदूकें 
गिर  पड़ता  है  हहराकर 
कोई  बेक़सूर  वनचर,

आखेटक  तब 
करते  हैं  अट्टहास 
बंदूकों  की  नलियों  से 
निकलते  धुएँ  को 
फूँक  मार  कर 
इत्मीनान  से।

ख़ुश  होते  हैं 
जीने  का  हक़  छीन  कर।

परंतु ...
देख  रहा  हूँ  मैं 
अब  जंगल  में 
माहौल  को  बदलते,
वनचरों  को 
अपने  सींग  पैने  करते ...

हाँ,  देख  रहा  हूँ  मैं 
उन्हें  एकजुट  होते 
आखेटकों  के  विरुद्ध !

                               -लक्ष्मी  नारायण  पयोधि 

*यह  कविता  श्री  पयोधि  के  'सोमारू' शीर्षक  से,  1997 में  राष्ट्रीय  प्रकाशन  मंदिर, भोपाल  द्वारा  प्रकाशित
कविता-संग्रह  से,  सादर, साभार।
 

मंगलवार, 7 मई 2013

मित्रों की थाती से: तीन

It  happened  slowly
this  conversion
angelic face  to  harlot  looks
the  lines  that  ravage  my  face
were  not  there  when  I  entered  the  temple

I  was  as  young  as  you
nimble  and  of  supple  linbs
gathering  flowers  of  trees
that  hung  their  branches  low

Today  as  you  go  in
eyes  averted
shrinking  to  circumvent  even  an  accidental  touch
of  me,  sitting  on  the  temple  steps
selling  garlands
for  men  to  drape  over  their  lord
I  speak  out  to  the  wind
" You  too  shall  become  a  whore  like  me
One,  will  play  with  you,  the  other  will  turn  you  to  stone.
Then,  The  Lord  will  release  you  with  his  touch.
And  you  will  be  condemned  to  redemption."

Its  not  a  curse  that  I  cast,
stung  though  I  am  by  your  revulsion
but  a  prophecy  that  I  state.
An  old  woman
sitting  on  the  temple  steps,  selling  garlands
for  men  to  drape  over  their  lord.

                                                                                     -Rinchin

*excerpts from the 'Original Edition', a joint collection of poems by different poets of Hindi, English, Urdu and Marathi languages; published by the 'Invisiblink', a non-profit motive publication, 2009.


शुक्रवार, 3 मई 2013

मित्रों की थाती से: दो

आकाश गंगा 

आकाश  गंगा 
दिव्य  श्मशान 
तुम्हारे  तट  पर/ आलोकित  अरण्य  से 
आता  होगा / पुरखों  का  पगपथ 
अंतिम  लोक  परमधाम  तक 

नक्षत्रों 
मुहूर्त्त  तुम्हारी  किरणें 
शकुन  तुम्हारा  वरदान 
नीचे  धरती  पर 
ऋतुएं  फिरती  हैं / उनके  आश्रय  में 
उग  आती  हैं 
खपरैलें  घास-फूस  के  छप्पर 
जिस  पर  पुरखों  का  श्राद्ध  पाने 
आते  हैं  काग 
आस्था-विश्वास  के  रिश्ते  बुनता 
लोक  संसार  परिवार 

ऋतुओं  की  फेरी  के / हर  मोड़  पर 
खड़े  हैं  उत्सव  तीज-त्यौहार 
सजी  फसलें  बागान  और  खलिहान 
घर  का  बूढ़ा 
पुरखा  होने  की  दहलीज  पर 
घर  आते  जाते 
कल्पता  है 
खूँटे  से  बँधी 
'गऊ  दान'  की।

                                                       -हरीश  वाढेर 

*यह कविता श्री हरीश वाढेर के काव्य संग्रह 'बनी है पगडंडी अपने आप' से, सादर, साभार।

गुरुवार, 2 मई 2013

मित्रों की थाती से: एक

पिता  की  मूंछें 

पिता  की  मूंछें  थीं  रौबदार 
पूरे  चेहरे  में 
तलवार-सी  तनी 

मूंछें  थीं  
तो  रौबीले  थे  पिता 
गर्वीले  थे  पिता 

हम  पांच  भाई-बहन 
पिता  की  तरह 
पिता  की  मूंछों  को  भी 
परिवार  का  सदस्य  मानते 
और  सेवा  करते 

एकाध  भी  दिखता  सफ़ेद  बाल 
तो  ऐसे  जुटते  निकालने 
जैसे  कोई  धब्बा 
पिता  के  चेहरे  पर 

जीवन-भर  पिता   ने  मूंछें  नहीं  काटीं 
जैसे  जीवन-भर  पिता 
झूठ  नहीं  बोले 

स्टालिन  की  तरह  थीं  पिता  की  मूंछें 
चौड़ी 
रौबीली 
अनुशासन  प्रिय।

                                                           -नासिर  अहमद  सिकन्दर 

*नासिर  के  संग्रह 'इस वक़्त मेरा कहा' से, सप्रेम।

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

विश्व मज़दूर दिवस : हमारा तराना

बोल  मजूरा  हल्ला  बोल
बोल  जवाना  हल्ला  बोल
बोल  किसाना  हल्ला  बोल
हल्ला  बोल  कि  हिल  जाए  धरती
डोले  आकाश ...

सदियों  से  तेरी  मेहनत  का  फल
औरों   ने  खाया  है
नहीं-नहीं  अब  सोना  कैसा
सूरज  सिर  पर  आया  है

हुआ  सबेरा  आँखें  खोल
बाज़ू  की  ताक़त  को  तौल
ले  अपनी  मेहनत  का  मोल
तू  सब-कुछ  है  अपने  मन  में
पैदा  कर  विश्वास ...

बोल  मजूरा  हल्ला  बोल

जाग  कि  दुनियां  को  बतला  दे
क्या  है  तेरी  क़ीमत
अपने  मेहनतकश  हाथों  से
लिख  दे  जग  की  क़िस्मत

तुझसे  आँख  मिलाए  कौन
आंधी  से  टकराए  कौन
अपनी  मौत  बुलाए  कौन
कब  तक  तुझसे  हार  न  मानेंगे
क़ातिल  एहसास ....

बोल  मजूरा  हल्ला  बोल
बोल  जवाना  हल्ला  बोल
बोल  किसाना  हल्ला  बोल  !

                                               (1 मई,1976 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल 


*मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु सर्वसुलभ, केवल सूचना आवश्यक।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

नमस्कार, मित्र गण !
मैं कुछ अत्यंत निजी कारणों से आपसे कुछ समय हेतु विदा ले रहा हूं। जैसे ही स्थितियां अनुकूल होंगी, पुनः आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊंगा। तब तक के लिए, मेरी शुभकामनाएं आपके साथ रहेंगी ही। संध्या-समय मैं अपने फ़ेस बुक पृष्ठ पर उपस्थित रहने का प्रयास करूंगा।
आप सब सुखी-स्वस्थ-सानंद रहें।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

गौरैयाएं और लड़कियां !

दो  ही  जीव  हैं  संसार  में
जो  विलुप्ति  की  कगार  पर  हैं
पहली  गौरैया, दूसरी  लड़कियां !

एक  समय  था  जब  दोनों घर-आंगन,
खेत-खलिहान, गांव-शहर…
हर  जगह  चहचहाती  नज़र  आ  जाती  थीं
यहां  तक  कि  स्वप्नों  और  कविताओं  में  भी !

अब  गौरैयाएं  केवल  गहरे  वनों  में
और  कभी-कभार  खेतों  में  ही  दिखती  हैं
और  लड़कियां ?
सिर्फ़  तस्वीरों  और  पुरातत्व  की  किताबों  में !

आख़िर  कौन  निगल  गया
दुनिया  की  आबादी  को ?

                                                                ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

*नवीनतम,पूर्णतः मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

वह/ और शब्द/ और खटमल !

"मैं/ मैं हूं/ एक  साधारण  शरीर !
एक  जोड़ी  आंखें/ और  एक-एक  जोड़ी/ हाथों  और  पांवों  के  अलावा
सञ्चित  है  जिसमें/ पांच-साढ़े  पांच  किलोग्राम/ गाढ़ा-लाल  रक्त
अपने  ढाई-ढाई  फ़ीट  के  पैरों  पर/ दिन  भर/ लुढ़कता-पुढ़कता  मैं
अपने  सञ्चित  रक्त-कोष  की  रक्षा की/ कोशिश  को/ रखे  हुए हूं  बरक़रार !

शब्द/ शब्द  हैं/ किसी  भी  व्यक्तित्व  पर  चिपक  कर/ संज्ञा  बन  जाने  को  आतुर
चारों  ओर  भटकते  हुए/ ढूंढते  फिरते  अपना  शिकार !
पतले,  धारदार  शब्द/ मोटे,  भोथरे  शब्द/ गंदे,  लिजलिजे  शब्द ....
बच्चों-जैसे  मासूम/ फूल-जैसे  सुंदर/ और  बकरियों-जैसे/ निरीह  शब्द ...
और  'समय'  और  'भाग्य'-जैसे/ निहायत  सड़े-बुसे  शब्द 
जैसे  इनके  बिना/ चल  ही  नहीं  सकता/ आदमी  का  कार-बार !

और  हैं  खटमल !
फूले-फूले,  गुलगुले/ संतृप्त  खटमल/ और  सूखे-सुखाए/ बेजान-से/ भूखे-प्यासे  खटमल
बिस्तरों  में/ अलमारियों  में/ दीवारों  पर  उभर  आई  दरारों  में/ और  किताबों  के  पन्नों  में/
दुबके  हुए/ अपने  न  कुछ-से  शरीर  की/ भूख  मिटाने को/
करते  हुए  रात  का  इंतज़ार !

अनपेक्षित  शब्दों  की  भीड़  से  बच  कर/ अपनी  फ़ैक्टरी  तक  पहुंचने  के  लिए/ मैंने  ढूंढ  ली  है/
एक  संकरी-सी,  गुमनाम-सी  गली/ जिससे  या  तो  मैं  गुज़रता  हूं/
या  नगर-निगम  के  सफ़ाई-कर्मचारी !
शब्दों  को/ मूर्ख  बना  कर/ इस  गली  से/ इत्मीनान  से/ बच  निकलता  हूं  मैं/ हर  बार !"

..............................................

यह  बयान  जिस  आदमी  का  है/ वह  मारा  गया/ मेरे  सामने !
न  जाने  उन्हें  किसने  दी  थी  ख़बर/ और  वे/ गली  में  उसके  घुसते  ही/
चेंट  गए  थे  उसके  शरीर  से/ मोटे-मोटे  होंठों/ फूली  हुई  तोंदों/ और  दरांतियों-जैसे  दांतों  वाले/
खूंख्वार  शब्द/ और  उसके  छटपटाने  पर/ मुंह  खोल  कर  हंसने  वाले  शब्द ....
धीरे-धीरे/ घुसते  गए  थे  वे/ उसके  शरीर  में/ और  निचुड़  कर  आता  रहा  बाहर
गाढ़ा-गर्म  और  लाल-सुर्ख़  ख़ून !

शब्दों  के  उस  शरीर  से/ अलग  हो  चुकने  के  बाद/ मैंने  छुआ  उसे/ और  सहलाता  रहा/ कुछ  देर
उसने  शायद/ मुझे  अपना  दोस्त  समझा/ और  सौंप  दी  मुझे/ अपनी  डायरी/
जिसमें  लिखा  था  यह  सब/ और  यह  भी/ कि/ उसे/ अपने  खटमलों  से  है  प्यार !

वह/ मेरे  हाथों  में  मर  कर/  छोड़  गया  है  एक  प्रश्न/ कि  रात  के  आने  पर/ क्या  होगा/
उन  खटमलों  का  ? ? ? !

                                                                                                       ( 1978 )

                                                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: 'अंतर्यात्रा', 1983

रविवार, 21 अप्रैल 2013

हम सूर्यत्व हैं !

हां,  हम  जिएंगे
जीते  रहेंगे
रचते  रहेंगे  अमरत्व  की
अपार  संभावनाएं

हम  विचार  हैं
विदेह

हम  न  दिन  में  मरते  हैं,  न  रात  में
और  न  संधि-काल  में
न  अस्त्र  से,  न  शस्त्र  से
न  किसी  ब्रह्मास्त्र  से

हम  सूर्यत्व  हैं,  हुज़ूर !

हम  मज़दूर  हैं
स्वतंत्र,  स्वायत्त,  संप्रभु
सरफ़रोश  सिरजनहार
हमें  क्या  देर  लगती  है
नई  दुनिया  रचने  में  !

                                                        ( 2004 )

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

*पूर्णतः मौलिक/अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु सानुमति  उपलब्ध।

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

सबसे उपयुक्त समय

कितना  भी  सम्हल  कर  चले  आदमी
हाथ  से  फिसल  कर
गिरता  है  समय
और  चूर-चूर  हो  जाता  है !

कितनी  सारी  किरचें  बिखरी  हुई  हैं
ज़मीन  पर !

समय  के  रेशे-रेशे  को  चुनना  होगा
अपनी   पलकों  से
कि  कोई  तस्वीर  बने

कोई  अक्स  मुकम्मल  नहीं
न  दुनिया,  न  समाज
न  एक  अकेला  आदमी
यहां  तक  कि  कोई  बाल  या  नाख़ून  तक  नहीं

अब
बहुत  मुमकिन  है  कि  बहुत  जल्द
पेड़,  नदी,  पहाड़
आस्थाएं  और  विचार
सब-कुछ
नाभिकों  में  बदल  जाएं

संक्षिप्ततः ,
यही,  यही  सबसे  उपयुक्त  समय  है
सारी  कायनात  को  एक  बाज़ार  में  बदलने  के  लिए !

कोई  बचा  सकता  है  समय  को
बिकाऊ  जिन्स  में  बदलने  से  ? !

                                                                         ( 1986 )

                                                                  -सुरेश  स्वप्निल 

*पूर्णतः मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु सानुमति उपलब्ध।

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

जब अमेरिका नहीं था !

ओह !  कितनी  सुखी  थीं
आकाशगंगाएं
जब  अमेरिका  नहीं  था  !
कितने  सुखी  थे  प्रकृति,  पृथ्वी
और  मनुष्य  !

तब
सारा  संसार  कितनी  आसानी  से
एकदम  सही  जगह  पर
सम  पर  आ  जाता  था  !

तब
नीली  छतरी  में  'ब्लैक  होल'  नहीं  था
ग्लेशियर  यूं  ही  नहीं  पिघलते  थे
मॉनसून 
कुसमय  नहीं  आते  थे
और  'काला  हांडी'  में  भी
चावल  पकते  थे
और  नदियां
अपना  रास्ता  नहीं  बदलती  थीं
अचानक  और  अकारण  !

बेशक़,  अख़बार  भी  नहीं  थे
उन  दिनों
न  पहाड़-जैसी  मशीनें
न  स्मार्ट-फ़ोन
न  'वेपन्स  ऑफ़  मॉस  डिस्ट्रक्शन'.....

किन्तु,  शब्द  थे,
स्वप्न  थे  भरपूर
और  ढेर-सारी  फ़ुर्सत
अनगिनत  स्वप्न  देखने  की
और  थे  संकल्प,  साहस,  ऊर्जाएं
एक-एक  स्वप्न  को  साकार  करते
सर्व-सामर्थ्यवान्  मानवीय  हाथ

तब  स्वप्न
एक  संस्कार  था
और  कोई  भी  आकाशगंगा
नि:स्वप्न  नहीं  थी।

सचमुच,  बेहद  सहज-सरल  था
सब-कुछ
जब  अमेरिका  नहीं  था  !

                                            ( 2002 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल 

* पूर्णतः मौलिक/ अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन  हेतु उपलब्ध।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

मेरी चुप्पी के साथ

हां ,  मैं  ख़ामोश  हूं
अपने  झरोखे  बैठ  कर
सबका  मुजरा  लेता  हुआ
बहुत  देर  से  !

मैं  जानता  हूं ,  खल  रही  है  तुम्हें
यह  चुप्पी
यह  धैर्य,  यह  संयम
दु:खी  कर  रही  हैं  घटनाएं
आस-पास  की
और  खीझ  हो  रही  है
नेपथ्य  में  खड़े  होने  से

किंतु ,  क्या  करे
बिना  किसी  भूमिका  के  ?

जब  कुछ  भी
न  सुनिश्चित  हो,  न  सुस्पष्ट
तो  क्या  बेहतर  है
तुम्हारी  दृष्टि  में
मेरे  लिए ?

हां,  मैं  ख़ामोश  हूं
क्योंकि  मेरा  नहीं  है  यह  रंगमंच
यह  रंग-समय  भी  नहीं  है  मेरा

बोलूंगा  अवश्य
जब  ज़रूरत  होगी
समय  को
जब  मिट  चुकेंगी  सारी  दूरियां
तुम्हारे  और  मेरे  बीच  की
जब  ख़त्म  हो  जाएगा
वैचारिक  ऊसरपन

उस  दिन  जब  मैं  बोलूंगा
तब  शब्द  नहीं
बरसेंगे  बीज  !


और  निभा  लो
कुछ  दिन
मेरी  चुप्पी  के  साथ  !

                                     ( 2013 )

                             -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम  रचना। पूर्णतः मौलिक/ अप्रकाशित/अप्रसारित। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

                                               

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

मोक्षयिष्यामि मा शुचः ...

बहुत  पहले
बहुsssत  पहले
गंगाधर  पंडित  के  द्वारे  पर
गूंजे  थे  सोहरे
बँटी  थीं  मिठाइयाँ
जी-भर  कर।

कथा  सत्यनारायण  की
भोज  कन्याओं  का
नेग  दाई-नाई  का
सभी  कुछ  हुआ  था

चाचा  ने, ताऊ  ने
चौधरी-पटेल  ने
गाँव-गली-गैल  ने
दी  थीं  बधाइयाँ

वेत्रवती  के  तट  पर
महकी  थी  मौलिश्री
बेला  की  नई-नई
कलियाँ  मुस्काई  थीं। 

दूध  और  केसर  के
मिश्रण-सा  गौर-वर्ण
कस्तूरी  हिरनी  के
छौने-से  चपल  अंग
पूनम-सी  छटा  थी
अमावस-से  गहन  भाव
पंडित  की  कन्या  थी
साक्षात्  पार्वती .....

दूध  में  ऋचाएं  मिलीं
घूंटी  में  चौपाई
वेद-शास्त्र-ज्ञान  मिला
पिता  के  स्नेह  में

क्वाँर  के  महीनों  में
सुअटा  के  गीत  गाए
अकती  पर  गुड़ियों  के
ब्याह  भी  रचा  डाले
कदम्ब  की  डालों  पर
श्रावण  के  झूलों  की 
पींगों-सी  पल-पल
बड़ी  हुई  पार्वती ...

पंडित  की  छाती  पर
जाने  कब  बोझ  हुई
चम्पे-सी  महक  भरी
बिटिया  सयानी  !

विन्ध्यगिरि  पर्वत-से
माथे  को  झुका  गई
किस-किस  की  देहरी
किस-किस  के  चरण  छुए ..
जोग  नहीं  बैठा
अभाव  का  समृद्धि  से
शीशम-सी  काया  भी
सूख  हुई  दुहरी  !

... सुना  एक  दिन  यूं  ही
पनघट  पर  बातों  में
मुंह  काला  कर  गई
कलंकिनी  किसी  के  संग ....

बात  क्या  हुई  आख़िर
किसी  को  नहीं  पता
कोई  कुछ  कहता  है
कोई  कुछ  कहता ....

वही  वेत्रवती  का  तट  है
वही  गाँव,  घर  वही
सुना  है  कि  मौलिश्री
अब  नहीं  महकती

बस, गंगाधर  पंडित
बौराया-सा  फिरता  है
"दीनबंधु, शरण  लो!"
गुहार  लगाता  हुआ

भूल  गए  गिरधारी
क्या  तुम  अपना  ही  स्वर
"अहं  त्वां  सर्व पापेभ्यम्
मोक्षयिष्यामि  मा  शुचः " ????? !!!

                                                ( 1979 )

                                       -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'साक्षात्कार', भोपाल, 1983 । पुनः प्रकाशन हेतु सानुमति उपलब्ध।




एक ग़ज़ल

क्या  करेगा  अब  किसी  का  आदमी
नाम    है    जब    बेबसी  का  आदमी

छल   रहे   हैं   आज   सारे  इस  तरह
हो   नहीं   पाता   किसी   का   आदमी

चक्रव्यूहों    में    उलझ    कर    रास्ता
ढूंढता      है     वापसी     का    आदमी

औपचारिकता      निभाना     शेष    है
बिक  चुका  तो  है  कभी  का   आदमी

आत्महत्या  की    बना  कर  भूमिका
मुन्तज़िर  है    ज़िंदगी  का     आदमी

आदमी     के    वेश   में     हैं    भेड़िये
हाथ  थामे   क्या   किसी  का   आदमी  ?

                                                   ( 1975 )

                                             -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: दैनिक 'देशबंधु', भोपाल, 1975 एवं  अन्यत्र।

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

पूंजीवाद को गरियाओ मत !

जितने  में  पोस्टर  छपे
उतने  में
घर-घर  में  नज़र  आने  लगती
गौरैया !

यही  कहानी  है  बाघ  की
और  लुप्त  होती  जानवरों
और  वनस्पतियों  की
तमाम  प्रजातियों  की  !

पूंजीवाद  पहले  नष्ट  करता  है
फिर  संरक्षित  करता  है
नमूने  के  लिए
प्रजातियों  को !

इस  नेक  काम  में  कुछ  व्यक्ति
और  संस्थाएं
तो  कमा  ही  लेती  हैं  पुण्य
और  पैसा  भी  !

पूंजीवाद  को  गरियाओ  मत
उसकी  मदद  करो
प्रकृति  को  संग्रहालय  बनाने  में  !

                                                 ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम/ मौलिक / अप्रकाशित / अप्रसारित रचना। प्रकाशनार्थ उपलब्ध।

रविवार, 14 अप्रैल 2013

जो कभी सो नहीं पाते

जो  सो  सकते  हैं  आराम  से
इतने  वाहियात  समय  में
उनसे  कुछ  नहीं  कहना  मुझे

मुझे  उनसे  भी
कुछ  नहीं  कहना
जो  कारण  हैं
दिनों  दिन  मंडराते  युद्ध  के
और  नाभिकीय  हथियारों  के
निर्माता  और  उनके  वित्तीय  मालिकों  के

मुझे  जो  भी  कहना  है
मैं  कहूंगा  उनसे
जो  कभी  सो  नहीं  पाते
अफ़ग़ानिस्तान  से  ज़ाम्बिया  तक  फैले
पूँजी  के  अभागे  शिकारों  से

मुझे  कहना  है  महमूद  अहमदीनेजाद  से

पीछे  मत  हटना  दोस्तों
इससे  पहले  कि
शत्रु  फिर  एक  नया  ईराक़  गढ़  दे
या  फिर  कोई  इज़राइल  तैयार  कर  दे
साबित  करना  ही  होगा
कि  ज़िंदा  हैं  हम
अपने  अस्तित्व  की  सुरक्षा  को
हर  तरह  से  चाक-चौबंद !

किसी  न  किसी  को  तो
मिटना  ही  होगा
मनुष्यता  के  सबसे  बड़े  शत्रुओं  को
या  मनुष्यता  को !

                                                 ( 2013 )

                                         -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम/ मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

                                                      

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

सिर्फ़ एक कोशिश ..

चलो,  एक  और  कोशिश
करके  देखते  हैं
ज़िंदा  रहने  की
इसी  दुनिया,  इसी  देश
और  इसी  शहर  में  !

करते  हैं  कोशिश
अपनी  खाने, सोने, पहनने,
पढ़ने-लिखने  और  बात-बात  पर
असंतुष्ट  होने  की  आदत
बदल  डालने  की

कोशिश  करते  हैं
दिन  पर  दिन  बढ़ती  मंहगाई  से
तालमेल  बैठाने  की
और  सब-कुछ  को
नियति  मान  कर  चुपचाप
स्वीकार  कर  लेने  की

या
सिर्फ़  एक  कोशिश  करते  हैं
अपनी  आवाज़  को
इतना  बुलंद  बनाने  की
कि  मनुष्य-विरोधी  व्यवस्थाओं  के  सूत्रधारों  के
कान  के  परदे  फटने  लगें
हमारे  एक-एक  शब्द  से

दुनिया  बदलनी  है
तो  अपने  को  बदलने  की  शुरुआत
करनी  ही  होगी।
                                                                 ( 2013 )

                                                          -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम/अप्रकाशित/अप्रसारित/मौलिक रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

बाज़ार के हवाले...

सदियों  से
एक  ही  खेल  चल  रहा  है
निरंतर ...

जो  डरता  है
उसे  इतना  डराओ
कि  डर  के  मारे  आत्म-हत्या  कर  ले

जिसे  दबाया  जा  सकता  है
उसे  इतना  दबाओ
कि  उसका  स्वाभिमान
चूर-चूर  हो  जाए

जो  असहाय  है
उसे  घेर  लो  हर  ओर  से
और  उसकी  ज़ुबान   काट  लो
कि  पुकार  भी  न  सके  किसी  को
मदद  के  लिए !

जो  डरता  नहीं  है  किसी  से
जिसे  दबाया  नहीं  जा  सकता  किसी  भी  तरह
जो  इतना  असहाय  नहीं  कि  प्रतिकार  न  कर  सके
उसे  खींच  कर  बाहर  ले  आओ  घर  से

और उसे

बाज़ार  के  हवाले  कर  दो  !

                                                                       ( 2013 )

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम, मौलिक / अप्रकाशित / अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

सुरक्षित जीना चाहते हो ,,,

कार  टकराती  है
दूसरी  कार  से
या  किसी ट्रक  या  किसी  पेड़  से
नेताजी  बच  जाते  हैं

ट्रेन  उतर  जाती  है
पटरी  से
नेता जी  बच  जाते  हैं

हवाई  जहाज़  गिर  जाता   है
ज़मीन  पर
नेताजी  फिर  बच  जाते  हैं

नेताजी  तो  तब  भी  बच  जाते  हैं
जब  उनकी  सभा  में  बम-विस्फोट  होता  है !

नेता  की  जान  है
इतनी  सरलता  से  निकलती  है  कहीं  ?

सुरक्षित  जीना  चाहते  हो  न ?
तो  नेताजी  के  आगे-पीछे  घूमो
यही  नियति  है
यही  प्रारब्ध  !

                                                                  ( 2013 )

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

तीन नन्हीं कविताएं

              1.

आप
किस  दिल  की  बात  करते  हैं  ?

वो, जिसे  दे  के
आप  ही  को  हम
रोज़  जीते  हैं
रोज़  मरते  हैं  !

             2.

छोड़िये  भी,
कहां  की  ले  बैठे  ?

हम  तो  अपने  ही  दिल  से
हैरां  हैं
आप  अपना  भी  हमें  दे  बैठे !

          3.
ख़त्म
हो  जाएगा  सफ़र  अपना

राह  में  रूठ  गए
आप  अगर,
चाक  कर  लेंगे  हम  जिगर  अपना !

                                                  ( 1978 )

                                           -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: दैनिक 'नव-भारत', रायपुर, रविवासरीय। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।


मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

अंधी आस्थाओं के नाम पर !

अच्छी  तरह  से  सोचिए
और  तय  कीजिए
कि  कितने  ईश्वर  हैं  हमारे  इर्द-गिर्द !

ऐसा  क्या  अपराध  करते  हैं  हम
कौन-सी  आवश्यकताएं  हैं  जो  केवल
ईश्वर  ही  पूरी  करते  हैं ?

कौन  हैं  वे  लोग
जो  ईश्वर  के  प्रतिनिधि  बने  हुए  हैं
क्या  कल  इन्हीं  में  से  कुछ  ईश्वर  के  अवतार
फिर  कुछ  समय  बाद  स्वयं  ये  ही
ईश्वर   नहीं  बन  जाएंगे ?

एक  सूची  बनाइये  इन  सब  की
और  उन  सामानों  की  जो  ये  आधुनिक  ईश्वर
बेच  रहे  हैं  आपको
बाज़ार  से  चौगुने  दामों  पर
और  तुलना  कीजिए  मूल्य  और  गुणवत्ता  की !

ठीक, अब  जवाब  ढूंढिए  उन  प्रश्नों  के
जो  इस  अभ्यास  से  उभरे  हैं
आपके  मन-मस्तिष्क  में

ईश्वर  ने  किस  को  नियुक्त  किया  है
अपने  प्रतिनिधि  के  रूप  में
किस  के  पास  है  ईश्वर  का  अनुमति-पत्र  ?
किस  ने  घोषित  किया  कि  अमुक  व्यक्ति  अवतार  है
ईश्वर  का ?
यदि  ये  लोग
जो अपने-आप को  ईश्वर का प्रतिनिधि,
अवतार  अथवा  स्वयं  ईश्वर  ही
मानते  और  मनवाते  हैं
ये  लोग जो  योग, भागवत-कथा से  लेकर
साबुन, तेल, दाल-दलिया  तक  बेच  रहे  हैं
क्या  अंतर  है  इनमें  और  आपके
किराना-व्यापारी  में ?

प्रश्न  हजारों  होने  चाहिए
आपके  मन-मस्तिष्क  में
और  हर  प्रश्न  के  उत्तर  की  आवश्यकता  भी ....

यदि  आपके  मन-मस्तिष्क  में
न  कोई  प्रश्न  ही  है
न  उत्तर  पाने  की  ललक
तो  आप  इसी  योग्य  हैं
कि  हर  व्यापारी  को  आप  ईश्वर  मानें
और  ठगे  जाते  रहें  अनंतकाल  तक
अंधी  आस्थाओं  के  नाम  पर !

                                                                  ( 2013 )

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

*नवीनतम रचना। पूर्णतः मौलिक, अप्रकाशित/अप्रसारित। प्रकाशन हेतु सभी के लिए उपलब्ध।

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

नई दिल्ली के कुत्ते

यदि  आप  कुत्ते  हैं
नई  दिल्ली  के  कुत्ते  हैं 

'लुट्येन्स  ज़ोन' में
रहते  हैं
अपने  गले  में  अपने  मालिक  के  नाम  का
पट्टा  पहनते  हैं
ख़ानदानी  'पेडिग्री'  हैं
सौ  फ़ीसद  विदेशी  नस्ल  के,
और  लाल  बत्ती  वाली  गाड़ियों  में
घूमते  हैं
अपने  मालिक  की  इच्छा  पर  ही  भौंकते  हैं 
तो  निश्चय  ही
आप  वी .वी .आई .पी . हैं
परम-सम्माननीय !
कहीं  भी  घूमिये
बेरोक-टोक
सारा  देश  आपका  है !

यदि  आप  कुत्ते  हैं
ख़ानदानी  'पेडिग्री'  हैं
सौ  फ़ीसद  विदेशी  नस्ल  के,
नई  दिल्ली  के
'लुट्येन्स  ज़ोन' में  भी
रहते  हैं
मगर  अपने  मालिक  के  नाम  का  पट्टा
नहीं  पहनते
न  ही  लाल  बत्ती  वाली  गाड़ियों  में
घूमते  हैं
आज़ाद ख़याल और आज़ाद ज़ुबान हैं
और  भौंकते  समय
अपने  मालिक  की  इच्छा  की
चिंता  नहीं  करते,
तब  भी  वी .आई .पी . हैं
और  कहीं  भी  घूम  सकते  हैं 
मगर  एक  हद  तक  ही !

दिल्ली  पुलिस
किसी  भी  दिन  आपको  अपनी  निगरानी  में
ले  सकती  है
और  बेहतर  क़ीमत  पर
आपको  नए  मालिक  को
सौंप  सकती  है !

यदि  आप  कुत्ते  हैं
अपने  गले  में  अपने  मालिक  के  नाम  का
पट्टा  नहीं  पहनते
ख़ानदानी आवारा   हैं
सौ  फ़ीसद  देसी  नस्ल  के,
मगर  तब  भी
नई  दिल्ली  के
'लुट्येन्स  ज़ोन' में
रहते  हैं
और  लाल  बत्ती  वाली  गाड़ियों  में
घूमते  की  कल्पना  भी
नहीं  कर  सकते 
भौंकना  आपका  संवैधानिक
और  मौलिक  अधिकार  तो  है
किंतु  क्षमा  कीजिये, श्रीमान !
आप  कभी  भी
नई  दिल्ली  महानगर  पालिका  के
कुत्ता-अतिथि  गृह  में
बलात् भेजे  जा  सकते  हैं
बधिया-करण  अथवा  ज़हर  के  इंजेक्शन  के  लिए !

यदि  आप  कुत्ते  नहीं  हैं
भारत  के  एक  सामान्य  नागरिक  हैं
सौ  फ़ीसद  खांटी  भारतीय
अभिव्यक्ति  की  आज़ादी  के
अपने  अधिकार  को
सार्वभौमिक  मान  कर
'लुट्येन्स ज़ोन'  में
भौंकने - माफ़  कीजिये  श्रीमान,
नारे  लगाने  की  जुर्रत  करते  हैं
तो  सावधान  !
किसी  भी  दिन, किसी  भी  समय
किसी  भी  जगह
आपका  'एनकाउंटर' हो  सकता  है  !

                                                  ( 2013 )

                                           -सुरेश  स्वप्निल 

* पूर्णतः मौलिक, अप्रकाशित/अप्रसारित, नवीनतम रचना। सभी के लिए, 
   पूर्वसूचना एवं यथासंभव पारिश्रमिक पर, प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

 

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

और बस, आकाश हो !

सीने  में
असहनीय  चुभन
सर्दियों  की  हवा-से  पैने
समय  के  चाक़ुओं  की
दर्द; उठ-उठ  वेधता  है  ह्रदय  !

प्राण
तोड़ते  हैं  सीमाएं
तन  की
तन  अवश,  चुपचाप  है
यह  सोचता  है  मन, करें  क्या ?
बोझ  है  जीवन,
बड़ा  अभिशाप  है !

काश ! पतझड़  ही  मिले
मन-सुमन  की  पांखुरियां
मुक्त  हों  निर्जीव  बंधन  से
ह्रदय  हो,
और  बस, आकाश  हो !

                                             ( 1975 )

                                      -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: दैनिक 'देशबंधु', भोपाल एवं अन्यत्र। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

कुछ नन्ही कविताएं


                 1.

ढूंढ  कर  लाए  तो
जवाब  कोई !

महका-महका  सा  है  चमन
शायद
छू  गए  वो  खिला  गुलाब  कोई !

              2.

देखो
कितने  शरीर  हैं  बादल

उसने  खोली  कहीं
ज़ुल्फ़ें  अपनी
जा  के  टकरा  गए  वहीं  बादल !

           3.

ख़त  पे  औरों  का  नाम
लिक्खा   है

कितनी  मासूमियत  से
आख़िर  में
उसने  मुझको  सलाम  लिक्खा  है ! 

         4.

अब  भी
कुछ  इंतज़ार  बाक़ी  है ?

महफ़िलें  ख़त्म
उठ  गए  हैं  रिंद
बस  दिल-ए-दाग़दार  बाक़ी  है !

                                                  ( 1975 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: दैनिक 'नव-भारत', समस्त संस्करण ( रविवासरीय ), 1975


बुधवार, 3 अप्रैल 2013

हिंदी रंगमंच दिवस : सोई है सरकार ..

दिन-दिन  दूना  रात  चौगुना  फैले  भ्रष्टाचार
जागे  न  जागे  न  जागे  सोई  है  सरकार

अजब  दिन  आए  रे  भैया ..

पुल  टूटा  पहली  वर्षा  में  नहर  न  देती  पानी
राहत  के  चावल  भी  सड़ियल  किसकी  कारस्तानी
चोर-सिपाही-अफ़सर-तस्कर-डाकू-थानेदार
सब  के  सब  मौसेरे  भाई  इनसे  क्या  दरकार
जागे  न  जागे  न  जागे  सोई  है  सरकार

अजब  दिन  आए  रे  भैया !

राजा  मांगे  शाल-दुशाले  रानी  मांगे  सोना
जनता  भूखी  मांगे  दाना  सबका  अपना  रोना
डिग्री  माथे   पर  चिपकाए  फिरते  हैं  बेकार
बिना  घूस  के  घास  न  मिलती  घोड़े  तक  बेज़ार
जागे  न  जागे  न  जागे  सोई  है  सरकार

अजब  दिन  आए  रे  भैया
अजब  दिन  आए  रे  भैया
अजब  दिन  आए  रे  भैया !

                                                                           ( 1988 )

                                                                     -सुरेश  स्वप्निल 

* नोबेल पुरस्कार-प्राप्त  इटैलियन नाटक-कार डारियो-फ़ो  के विश्व-विख्यात नाटक ' नेकेड किंग ' के 
  श्री सतीश शर्मा द्वारा किये  गए बघेली रूपांतरण ' ठाढ़ दुआरे  नंगा ' के कवि द्वारा निर्देशित मंचन हेतु 
  विशेष रूप से लिखा गया गीत। प्रकाशन हेतु  अनुपलब्ध।

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

यह रक्त है, महाशय !

यह  रक्त  है, महाशय !
शत-प्रतिशत  शुद्ध  और  प्राकृतिक
मानव-रक्त  !

जब  तक  यह  बहता  है  शिराओं  में
केवल  तभी  तक  संवाहक  है  यह
तुम्हारी  सदा-अतृप्त  पूंजीवादी  लिप्सा
और  तथाकथित  सुधारवादी  अवधारणाओं
और  सर्वग्रासी  प्रगति  का !

ओ  पूंजी  के  निरंतर  वर्द्धमान  पर्वतों  के  स्वामियों  !
तुम्हें  स्मरण  नहीं  संभवतः
कि  इसका  यथोचित  मूल्य  भी  चुकाना  होता  है
किसी  भी  अन्य  भौतिक  संसाधन  की  भांति ...!
इसके  स्वर  को  कुचलने  का  विचार  भी  न  लाना
अपने  मस्तिष्क  में
यह  मत  सोचना  कि  तुम्हारे  दमन  के  तमाम  उपकरण
काम  में  आएंगे
तुम्हारी  निर्द्वन्द, निरंकुश  सत्ता  को
शास्वत  बनाए  रखने  में !

यह  रक्त  है,  महाशय
विशुद्ध  मानव-रक्त
इसकी  एक-एक  बूँद  में  समाहित  है
हज़ारों  नाभिकीय  बमों  की  शक्ति

यह  रक्त  है,  महाशय
जब  तक  शिराओं  में  है  तभी  तक  सुरक्षित  हो  तुम
और  तुम्हारे  आर्थिक  साम्राज्य !
शिराओं  से  बाहर  आते  ही
यह  विनाश  की  अकल्पनीय  लीला  भी  रच  सकता  है !
सैकड़ों  ज्वालामुखियों  से  निःसृत
लावे  की  अबाध्य, अबंध्य  नदियों  से  अधिक  प्रलयकारी !

समय  है, संभल  जाओ
अगली  बार
अपनी  सशस्त्र  सेनाओं  को
मनुष्यों  के  समूह  पर  फ़ायर  का  आदेश  देने  से  पहले
सोच  लेना  अवश्य
कि  भूमि  पर  गिरी  प्रत्येक  मानव-रक्त  का  मूल्य  क्या  है
और  चुकाओगे  कैसे ????

                                                                                  ( 2013 )

                                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम, पूर्णतः मौलिक/ अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

तीस लाख बुझे हुए दिल

तीस  लाख
उठे  हुए  हाथ
तीस  लाख
झुके  हुए  सिर
तीस  लाख
बुझे  हुए  दिल
तीस  लाख  कंठों  से
निकलते  जयघोष ...

मेरे  मासूम  सिपहसालार !
विजय  से  मदांध
अपना  माथा  गर्व  से  उठाते  हुए
अधरों  पर  मुस्कान  लाने  से  पहले 
सोचना  होगा  तुम्हें !

सोचना  होगा
कि
इन  तीस  लाख  शरीरों  के  साथ
अनिवार्यतः, शामिल  हैं
तीस  लाख  पेट
और  धधकते  उनमें
तीस  लाख  आग  के  पहाड़ !

मेरे  यार !
अपनी  चेतना  के  समस्त  तंतुओं  को
प्रेरित  करो
कि  जानें
सत्य  के  अर्थ  को
और
अपनी  दोनों  आँखों  में
समेटो
दुःख, करुणा , असहायता
और  ऐसे  ही  नाम  वाले
उन  तमाम  सागरों  की  विशालता
जो
इन  तीस  लाख  निर्विकार  चेहरों  पर
लटकती
साठ  लाख  आँखों  में
जीवित  हैं
युग-युग  से ...
और, इस  अपार  वैभवशाली
जल-राशि  से
लो, केवल  एक  बूंद
और  उसे  ढलने  दो
अपनी  आँखों  के  किनारों  से ...

यार, बस  काफ़ी  है  इतना  ही
साठ  करोड़  पेटों  में
धधकती  आग  को
एक  और  भागीरथी  में
बदलने  के  लिए  !

मेरे  दोस्त !
उठेंगे  फिर
अनगिनत  जयघोष -
साठ  करोड़ ,
एक  सौ  बीस  करोड़
दो  सौ  चालीस  करोड़
और  वे  तमाम  संख्याएं
जो  काग़ज़ों  पर  आती  हैं
उतने  ही  कंठों  से  !
और  उन  सब  आवाज़ों  से
ऊपर  की  दुनिया  में
होगी
सिर्फ़  तुम्हारी  शास्वत  मुस्कान
नए  अर्थ ,
नई  दृष्टि ,
नई  संवेदनाओं  के  साथ !

                                   ( 1979 )

                           -सुरेश  स्वप्निल 

*पूर्व-प्रधानमंत्री चौ. चरण सिंह के स्वागत में 1979 में दिल्ली में आयोजित किसान रैली पर एक प्रतिक्रिया।
** प्रकाशन: 'अंतर्यात्रा'-13 ( 1983 ) तथा अन्यत्र। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

                                          

रविवार, 31 मार्च 2013

... प्रसव में देर है अभी !

मेरा  बेटा
ज़िद  करता  है
कहानी  सुनाने  की
मैं  उसे  सुनाता  हूं : " एक  दयालु  राजा  था ..."
" और  उसने  किसी  ग़रीब  पर
अहसान  किया !"
उसके  लहज़े  में  व्यंग्य
और  आंखों  में  प्रश्न
देख  कर
मैं  दूसरी  कहानी  छेड़ता  हूं:
" एक  ग़रीब  लड़का  था
और  एक  राजकुमारी .."
" और  उन  दोनों  की  शादी  हो  गई ! "
उसका  व्यंग्य  और  मुखर  होता  है -
" आपके  इन  दोनों  ध्रुवों  के  बीच
ऐसी  जगह  नहीं  कोई
जहां  एक  आदमी
अपने  पांव  जमा  सके ?"

अब
मैं  उसे  एकदम  नई  कहानी
सुनाना  चाहता  हूं
एक  ऐसे  आदमी  की
जिसके  तीन  पैर  हैं !
उसकी  मुद्रा  आक्रामक  होती  है
और  वह
अपनी  नाक  की  सीध  में
अंगुली  खड़ी  कर
चेतावनी  के  स्वर  में
बोल  उठता  है ;
" देखो, डैडी !
कहानियों  के  बहाने
इस  तरह  सरासर  झूठ
क्यों  पेलना  चाहते  हैं  आप ?
कहीं  आप  भी
उन  लोग  की  साज़िश  में
शरीक़  तो  नहीं
जो  सारी  की  सारी  पीढ़ी  को
अपनी  टांगों  के  बीच  से
निकाल  देना  चाहते  हैं ?
कभी  तो  सुनाइए
किसी  अत्याचारी  शासक  के  ख़िलाफ़
जनता-जनार्दन  के
जाग  उठने  की  कहानी
ज़ारों  के  पतन  के  इतिहास
हिटलर  की  मौत
किसी  फ़िलिस्तीनी / वियतनामी  की
संघर्ष-गाथा
किसी  भारतीय  बेरोज़गार  के  पिता  की  व्यथा
किसी  शहीद  की  बेटी  के  ब्याह  की  कथा-
क्या  सचमुच
ऐसी  कोई  कहानी  नहीं  है  आपके  पास ? "

मैं  शर्मिंदा  हूं/ कहना  चाहता  हूं,
" सॉरी  बेटे
ऐसी  कोई  कहानी
नहीं  आती  मुझे… ! "

मेरी  पीड़ा 
मेरी  आंखों  से  छलकती  होगी ..
आप  महसूस  कर  सकते  हैं  उसे
कहानी
मेरे  अंतर  में  कुलबुलाती  है
करवट  लेती  है
लेकिन .... प्रसव  में  देर  है  अभी !

                                           ( 1985 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल 

* संभवतः, अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशनार्थ उपलब्ध।

शनिवार, 30 मार्च 2013

दिल्ली का ऊंट !

कल  यदि  शुरू  ही  हो  जाए
तीसरा  विश्वयुद्ध
तो  क्या  आशा  करते  हैं  आप
कि  किस  करवट  बैठेगा
दिल्ली  का  ऊंट  !

क्या  करेंगे  हम  और  आप
यदि  सरकार  अमेरिका  की  क़तार  में  हो
और  सारा  देश
न्याय  की  ओर
क्या  बिक  जाने  देंगे  हम  निहत्थे
अपनी  संप्रभुता  को
वित्तीय  घाटे  की  आड़  में  ?

यह  कोरी  अफ़वाह  नहीं  है
और  न  कोई  आकाशीय  भविष्यवाणी
न  ही  कोई  व्यापारिक  हथकंडा
बेहद  भयानक  और  क्रूर  आशंका  है  यह
जो  किसी  भी  क्षण  सत्य  हो  सकती  है ...

अपने  स्वर  को  आकार  दो
मांज  कर  रखो  अपने  गले
तैयार  कर  लो  अपने  सारे  तर्क-वितर्क
इसके  पहले  कि  महंगे  डॉलर्स  की  आड़  में
फिर  ग़लत  करवट  ले  बैठे
दिल्ली  का  ऊंट
साबित  करना  होगा  कि  ज़िंदा  हैं  हम
हम,  आज़ाद  देश  के  आज़ाद  नागरिक
हम  हिंदुस्तानी

( 30 मार्च, 2013 )                                                                            - सुरेश  स्वप्निल 


* नवीनतम, नितांत मौलिक/अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशनार्थ उपलब्ध।

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

जो मारे गए दोनों ओर से

यह  क्या  किया , कॉमरेड ?
इतनी  लाशें ! ! !

अच्छी  तरह  से  देख  लो
उलट-पलट  कर
एक-एक  लाश  का  चेहरा  ग़ौर  से  जांच  लो
चाहो  तो  रक्त  के  नमूने  सहेज  लो
और  सुनिश्चित  होना  है  तो  कुछ-एक
बाल  भी  नोच  लो  सब  लाशों  के
देख  लो  DNA  मिला  कर
क्या  सचमुच  वर्ग-शत्रु  थे  वे
जो  मारे  गए  दोनों  ओर  से
या  वर्ग-द्रोही  या  सिर्फ़
व्यक्ति-शत्रु  ? ! !

कॉमरेड ,
इतनी  अपेक्षा  तो  है  तुमसे
कि  तुम  पुलिस  या  फ़ौज  की  तरह
पेश  न  आओ
अपने  ही  केडर  से ....

बंदूक़ों  की  आंखें  नहीं  होतीं, कॉमरेड  !

हम, जो  शहर  में  हैं
तुम्हारे  सहानुभूतिक
क्या  जवाब  दें  सारी  दुनिया  को
और  अपने-आप  को  ?

कॉमरेड ,
युद्ध  से  इनकार  नहीं
मगर  क्यों
और  किससे  ?

                                                     ( 28 मार्च, 2013 )

                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

* छतरा, झारखण्ड में 27 मार्च, 2013 को मारे गए माओवादी सैनिकों के नाम। प्रकाशन हेतु नहीं।



गुरुवार, 28 मार्च 2013

योद्धा हुए बिना ...

हारने  की  क़सम  खाई  है  क्या  ?
तो  शोक  किस  बात  का  है !

जैसा  बोया,  वही  उगेगा  भी
बीज  महंगे  थे ,  फ़सल  और  भी
महंगी  होगी
दाल-चावल  को  तरस  जाएंगे
क्या  तो  ओढ़ेंगे ,  क्या  बिछाएंगे
कौन  जाने , विकास  किसका  है

हम  जहां  थे, वहां  से  और  पिछड़  जाएंगे
और  कुछ  लोग
हर  एक  स्वप्न  छीन  लेंगे  हमसे
हम  ही  नाकारा  हैं, क्या  किसी  से  कहें
हमें  तो  चीखना  तक  नहीं  आता ...

आख़िर  ज़िन्दा  ही  क्यूं  हैं  हम  लोग ?
हक़  न  मांगें, तो  शिकायत  कैसी  ?

बेवक़ूफ़  कहीं  के !
सरकार  सुनती  नहीं  तो  बदल  क्यूं  नहीं  देते  ?
नई  तहरीर  लिखो
मारे  तो  वैसे  भी  जाओगे
लड़  कर  मरोगे  तो  जीत  जाओ  शायद
हार  भी  जाओ  तो  कहीं  कुछ  तो
निज़ाम  बदलेगा, बदलना  ही  होगा
तुम  असफल  रहे  तो  पीछे  खड़ी  है
नई  और  युवा  पीढ़ी !

लड़ो, लड़ो, लड़ते रहो  पीढ़ी  दर  पीढ़ी
हमारा  इतिहास  विजेताओं  का  है
भविष्य  अलग  हुआ  भी  तो  कितना  होगा ?

योद्धा  हुए  बिना  विकल्प  नहीं  है, कॉमरेड !

                                                            ( 2013 )

                                                     -सुरेश  स्वप्निल 

* नवीनतम/अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

मंगलवार, 26 मार्च 2013

त्यौहार देख कर डर लगता है !

रंगों  की  बौछार  देख  कर  डर  लगता  है
व्यर्थ  गई  जल-धार  देख  कर  डर  लगता  है

पीने  के  पानी  से    होली     खेल  रहे  हैं
संतों  के  दरबार  देख  कर  डर  लगता  है

बूंद-बूंद  को  तरस   रहे  हैं  कंठ  करोड़ों
पानी  का  व्यापार  देख  कर  डर  लगता  है

धरती  के  चप्पे-चप्पे  पर  पड़ी  दरारें
अंधों  की  सरकार  देख  कर  डर लगता है

सब-कुछ  गिरवी  है  पूंजी-पतियों  के  हाथों
अब  तो  हर  त्यौहार  देख  कर  डर  लगता  है !

                                                                  ( 2013 )

                                                           -सुरेश  स्वप्निल

* नवीनतम/मौलिक/अप्रकाशित/अप्रसारित रचना।

सोमवार, 25 मार्च 2013

यह समय जो शत्रु है...

जब  समय  ही  शत्रु  हो  जाए
तो  क्या  करे  मनुष्य  ?

नहीं, असंभव  है  मनुष्य  का
बिना  लड़े  हार  मान  लेना
मनुष्य  ही  है  जो  गढ़ता  है
समय  के  मापदण्ड
और  उसकी  तमाम  इकाइयां,
परिभाषाएं ...

समय  यदि  शत्रु  होने  लगे
तो  मनुष्य  किसी  भी  क्षण  उठा  सकता  है  हथियार
और  बदल  सकता  है  सारे  मापदण्ड,  इकाइयां
और  परिभाषाएं  समय  की
और  उखाड़  कर  फेंक  सकता  है  सारी  सत्ताएं
समय  के  तथाकथित  अधिनायकों  की

मनुष्य  कोई  व्यक्ति  या  समूह  नहीं
चोर-लुटेरों-अत्याचारियों  का

मनुष्य  एक  समग्रता  है
जिसे  आता  है
ख़ुद  अपने  ही  सड़े-गले  अंग  काट  कर  फेंक  देना
और  रच  देना  नई  क्रांतियां

यह  समय  जो  शत्रु  है
उसे  बदलना  ही  होगा  अपने-आप  को
मनुष्य  के  हित  में
इसके  पहले  कि  मनुष्य  सहेजने  लगे
अपने  हथियार
और  कृत-संकल्प  हो  बैठे
समय  को  बदल  डालने  के  लिए ...

सुन  लें  समय  के  तथाकथित  मालिकान
अब  अधिक  समय  नहीं  है  उनके  पास !

                                                             ( 2013 )

                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

* नितांत मौलिक/अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

शनिवार, 23 मार्च 2013

मौन है फागुन बहुत

मौन  है  फागुन  बहुत
इस  साल
जाने  क्या  हुआ  है
फाग  के  अब  सुर  नहीं  मिलते
बयारों  में

कोई  तो  होगा  सबब
शायद
किसी  ने  फिर  किया  विश्वास
झूठे  प्यार  पर
या, दर्द  जागा
फिर  किसी  विरही  हृदय  में

वसंतों  में
किसी  का  प्यार  न  यूं  चोट  खाए
मीत  मेरे
प्रीत  के  प्यासे  सभी  मन  एक  हैं
वादा  करे  कोई  किसी  से, तोड़  दे
वह  दर्द  उसका , सिर्फ़  उसका  ही  नहीं
जिसका  हृदय  घायल  हुआ  है ....

प्रीत  का  उपवन  अगर  ख़ामोश  है
ओ  मीत  मेरे
आओ, इन  टूटे  दिलों  को  जोड़  दें
हम  बांट  दें  अपने  हृदय  की  प्रीत  सबको !

                                                             ( 2 मार्च, 1977 )

                                                             -सुरेश  स्वप्निल 

प्रकाशन: 'देशबंधु', भोपाल, मार्च, 1977

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

मेज़ नंबर नौ

मेज़  नंबर  नौ
रिज़र्व  है  बरसों  से  उनके  लिए
जो  रोज़  सात  बजे  आते  हैं
और  कॉफ़ी  के  दो-तीन  प्याले  पी  कर
रात  को  दस  बजे  जाते  हैं !

कॉफ़ी  हाउस  के  वेटर  जानते  हैं  उन  सब  को
कि  सिर्फ़  उनके  इरादे  ख़तरनाक  हैं,
वे  ख़ुद  नहीं !

वे  आते  हैं
कंधों  पर  झोले  लटकाए
अपनी  बेतरतीब  दाढ़ी  में  उंगलियां  फंसाते
और  अपने  मैले  कुरतों  की
जेबें  टटोलते
अपनी  पीली-पीली  आंखों  में
तैरते  सवाल  लिए
मेज़  नंबर  नौ  पर  जम  जाते  हैं
अक्सर  सबसे  सस्ती  बीड़ियां  सुलगा  कर
बहस  में  जुट  जाते  हैं
पता  नहीं  कब  ग़ुस्सा  उनके  सर  पर  सवार  हो  जाता  है
और  उनकी  आंखें  लाल  होती  चली  जाती  हैं !

वे  बहस  करते  हैं
कभी  खेत, कभी  खलिहान
कभी  पत्थरों  की  खान
कभी  कपड़ा-मिलों
और  कभी  बीड़ी-मज़दूरों , उनकी  बीवी-बेटियों
और  शोषण  के  बारे  में
और  हर  बार
उन्हें  कविताओं  में  खींच  लाते  हैं !

वे  हड़ताल, प्रदर्शन  और  विद्रोह  की  बातें  करते
खांसते  हैं, खंखारते  हैं
मुट्ठियां  बांधते-खोलते  हैं
और  मेज़  नंबर  नौ
थरथराने  लगती  है !

फिर  वे  कविताएं  सुनाते  हैं
जिनमें  पेड़  होते  हैं, नदियां  होती  हैं, चिड़ियें  भी  होती  हैं
और  आतंक  होता  है
और  अवश्यंभावी  क्रांति  होती  है

कॉफ़ी  हाउस  के  वेटर  नहीं  जानते
कि  दुनिया  की  किस  भाषा  में
मज़दूर  का  अर्थ  पेड़, नदी  और  चिड़िया  होता  है।
 दरअसल  उन्हें  कविता  की  समझ  नहीं  है
वे  बहुत  जल्दी  ऊब  जाते  हैं
और  मेज़  नंबर  नौ  से  बेहद  कतराते  हैं
उन्हें  यह  भी  नहीं  मालूम
कि  मेज़  नंबर  नौ  के  ख़ुफ़िया  तहख़ाने  में
एक  अदद  दिल  है
और  दिमाग़  भी !
उसे  कविताओं  की  ख़ासी  समझ  है
और  वह  भी
मज़दूरों  के  विश्वव्यापी  शोषण  के  ख़िलाफ़  है।

जब  वे  सब
व्यवस्था  के  निकम्मेपन  पर
ग़ुस्से  से  कांपते  हैं
और  अपनी  मुट्ठियां  मेज़  पर  दे  मारते  हैं
तो  मेज़  नंबर  नौ
उनके  समर्थन  में  चरमराती  है !
हालांकि, कवि-गण  उसकी  भावनाओं  को  नहीं  समझ  पाते !
वे  तो  बस, पौने  दस  बजते  ही  अपनी  बहस  ख़त्म  करते  हैं
और  कॉफ़ी  की  आख़िरी  प्याली  पी  कर
हड़बड़ी  में  बाहर  निकलते  हैं
क्योंकि  शहर  के  किसी  भी  हिस्से  को
जाने  वाली  आख़िरी  बसें
सवा  दस  तक  चली  जाती  हैं।

मेज़  नंबर  नौ  के  पास
सिर्फ़  ज़ुबान  और  होती
तो  वह  ज़रूर  पूछती  उनसे
कि  कॉफ़ी  हाउस  के  वेटरों  का  ज़िक्र
कब  आएगा  कविताओं  में ? !

                                                                                     ( 1986 )

                                                                              -सुरेश  स्वप्निल 

* संभवतः, अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

गुरुवार, 21 मार्च 2013

औरतों को अखरता है...

बादल  फिर  नहीं  छाए  इस  साल
बीत  चुका  आषाढ़  कब  का

मुंह-अंधेरे
निकल  पड़ती  हैं  औरतें
नंग-धड़ंग  बच्चों  की  उंगलियां  थामे
गागर  उठाए

गांव  से  तीन  कोस  दूर
आता  है
राजधानी  से
पानी  का  टैंकर
सबेरे  सात  से  साढ़े  सात  के  बीच

आठ  बजे
मज़दूर  अपने  घरों  से  निकलते  हैं
फ़ैक्ट्रियों  और  खेतों  के  लिए
रात  की  बासी  रोटियां  खा  कर ...

औरतों  को  नहीं  अखरता
इतनी  दूर  तक  घिसट कर
पानी  लाना
उन्हें  अखरता  है  सिर्फ़
अपने  पतियों  का  बासी  रोटियां  खा  कर
मज़दूरी  पर  जाना  !

                                                           ( 1985 )

                                                     -सुरेश  स्वप्निल 

*अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन  हेतु  उपलब्ध।

बुधवार, 20 मार्च 2013

हमारे लहू के दाग़ ...

हमने
अपने  ख़ून-पसीने  से  लिखा  इतिहास
उनका  जाम  छलका
और  सब  मिट  गया !

शक्ति ? हां, हममें  है- श्रम-शक्ति, नैतिकता, ईमानदारी
शक्ति  उनमें  भी  है- वाक्-शक्ति, छल-कपट, चतुराई
हमने  नहीं  जाना  अपना  मूल्य
उन्होंने  जाना  है।
इसीलिए  तो  वे  लाभ  उठाते  हैं
हमारे  खून-पसीने  की  कमाई  रोटी
छीन  खाते  हैं !

उनके  हाथों  में  है  हमारी  रोटी
उनकी  आस्तीन  पर
हमारे  लहू   के  दाग़ ...

हम  क्यों  नहीं  कुछ  कर  पाते
चुप  रह  जाते  हैं ?
क्या  वे
और  हिंसक  हो  गए  हैं ?
या  हम  ही  नपुंसक  हो  गए  हैं ?!!

कुछ  तो  करना  ही  होगा
न  सही  वर्त्तमान,
भविष्य  के  लिए  मरना  ही  होगा
ताकि
हमारी  अगली  पीढ़ी
अपना  कमाया  ख़ुद  खा  सके
और  धो  सके
हमारी  नपुंसकता  के  गुनाह  को।

                                                ( 1976 )

                                           -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: 'देश बंधु', भोपाल ( 1976 ), 'अंतर्यात्रा'-13, ( 1983 ). पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।



मंगलवार, 19 मार्च 2013

नई बस्ती की शाम

शाम  हुई
रोया  रमतूला  कोरी  का
लौटे  डंगर
डकराते

उठती  है  आवाज़  अखाड़े  से
आओ ! आओ !
निकले  पट्ठे  ले कर  लंगोट
टकराते  गबरू  सांड़ों  से
दे  पीठ
उठा  कर  पल्लू
दाबा  दांतों  से  लल्ली  ने
फिर  लेकर  हिलोर
थामे  गगरे  हाथों  में

खपरैलों  के  नीचे
धुंधुआते  चूल्हे  में
फूंक  मारती  अम्मां
बहती  नाक
आंख  में  पानी
कंथरी  ओढ़े  तकते  बच्चे
सिंकती  रोटी  की  गोलाई
थूथन  उठा-उठा  कर
टोह  लगाते  कुत्ते ...

कैसे  थके-थके  आते  हैं
रेलवई  के  बाबू
माथे  पर  टांके
हिसाब  के  चिह्न
झुकी  आंखों  के  नीचे
काले  गड़हे 
पांवों  में  जैसे  बांट  बंधे  हों
मन-मन  भर  के

और  खलासी ?
बेशर्मी  से  ठी-ठी  करते
बहन-मतारी  को  गरियाते
एक-दूसरे  की
पीठों  पर  धौल  जमाते
कभी  थकन  आती  है  इनको ?

नई  बस्ती  के  पूत
अजब  सुर  में  गाते  हैं
और  हांक  कर  आते  हैं  हर  रात
शाम  को  भिनसारे  के
दरवाज़े  तक !

                                                         ( 1987 )

                                                  -सुरेश  स्वप्निल 

* 'नई बस्ती', उत्तर प्रदेश के झांसी  शहर का एक मोहल्ला। कवि का जन्म इसी मोहल्ले में हुआ था।
** अप्रकाशित/ अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

सोमवार, 18 मार्च 2013

और कुछ छोटी कविताएं

संदिग्ध 

तिरुपति  देवस्थानम  के  दान-पात्र  में 
डाल  गया  है  कोई  भक्त 
बीस  हज़ार  पौंड्स  के  नोट 
और  एक  स्वचालित  विदेशी  पिस्तौल 

दिल्ली  की  रिपोर्ट  है 
सांसद  की  हत्या  के  आरोप  में 
जमना-पार  की  बस्ती  से  पकड़ा  गया 
संदिग्ध  हत्यारा 
रिक्शे वाला !

मनौती 

सरकारी  वैज्ञानिक  के  घर  में 
सत्य साईं  बाबा  के  चित्र  से 
टपकता  है 
शहद  और  सिन्दूर 

अभी-अभी  निकले  हैं  मुख्य-मंत्री 
दर्शन  करके 
और  मनौती  मांग  कर 
सूखा-ग्रस्त  क्षेत्रों  के  दौरे  पर !

आधारशिला 

आज  भूमि-पूजन  हुआ 

कंप्यूटर-सेंटर  की 
आधारशिला  पर 
शंकराचार्य  का  नाम  खुदा !

                                           ( 1983 )

                                     -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: सभी कविताएं विभिन्न लघु-पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।