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मंगलवार, 16 जुलाई 2013

क्या कर लेंगे आप ?

मैं / जली-कटी  सुनाने  का  आदी  हूं !
चीखूंगा-चिल्लाऊंगा / सबको  दूंगा  अभिशाप
मेरा  क्या  कर  लेंगे  आप ?
पहले  दीपक  को  गाली  दी  थी
अब  सूरज  को  दूंगा / आप  रोकेंगे  मुझे ?
हिम्मत  है  तो  आ  जाइए / अपनी  मर्दानगी  आज़माइए
कम  से  कम/ चुप  तो  नहीं  कर  सकेंगे  मुझे  आप !
यह  तो / आपकी  ही  नज़रों  में  अवैध  है
बोलने  की  आज़ादी / दी  है  हमें / शायद / आपको  इसका  खेद  है
तो  छीन  लीजिए  यह  आज़ादी  भी /-
और  अपनी  मां  के  गटर  में / डाल  आइए  !
लेकिन / खाने-पीने  और  कमाने  से  वञ्चित  आदमी  का /
खुला  हुआ  मुंह
गालियां नहीं / तो  क्या / तुलसी  के  भजन  सुनाएगा ?

ग़रीबों  का  सूखता  लहू / एक  दिन / रंग  लाएगा।
क्या  तुम / क़यामत  के  उस  दिन  के  लिए / तैयार  हो ?

नफ़रत  की  आग / बुरी  होती  है / मेरे  यार ! / जल  जाओगे।
हमें  छुओ / हमें  जानो / हमारे  क़रीब  आओ
हमारे  दुःख-सुख  में / हाथ  बंटाओ / तो  जी  सकोगे।
वरना / याद  रखना- यार / वक़्त  के  सर  से / जब  पानी  गुज़र  जाएगा
तुम्हारे  अस्तित्व  का / कोई  भी  चिह्न / नहीं  नज़र  आएगा।

मेरी  आवाज़ / वक़्त  की  तरफ़  से / चेतावनी  है  तुम्हें
सुनो  न  सुनो / तुम्हारी  मर्ज़ी !
फिर  भी / मैं/ चीखूंगा-चिल्लाऊंगा / सबको  दूंगा  अभिशाप
मेरा  क्या  कर  लेंगे  आप ?

                                                                                                ( 1976 )

                                                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'देशबंधु', भोपाल, 1976, 'अंतर्यात्रा'-13, 1983 एवं अन्यत्र। पुनः प्रकाशन  हेतु उपलब्ध।

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