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सोमवार, 25 मार्च 2013

यह समय जो शत्रु है...

जब  समय  ही  शत्रु  हो  जाए
तो  क्या  करे  मनुष्य  ?

नहीं, असंभव  है  मनुष्य  का
बिना  लड़े  हार  मान  लेना
मनुष्य  ही  है  जो  गढ़ता  है
समय  के  मापदण्ड
और  उसकी  तमाम  इकाइयां,
परिभाषाएं ...

समय  यदि  शत्रु  होने  लगे
तो  मनुष्य  किसी  भी  क्षण  उठा  सकता  है  हथियार
और  बदल  सकता  है  सारे  मापदण्ड,  इकाइयां
और  परिभाषाएं  समय  की
और  उखाड़  कर  फेंक  सकता  है  सारी  सत्ताएं
समय  के  तथाकथित  अधिनायकों  की

मनुष्य  कोई  व्यक्ति  या  समूह  नहीं
चोर-लुटेरों-अत्याचारियों  का

मनुष्य  एक  समग्रता  है
जिसे  आता  है
ख़ुद  अपने  ही  सड़े-गले  अंग  काट  कर  फेंक  देना
और  रच  देना  नई  क्रांतियां

यह  समय  जो  शत्रु  है
उसे  बदलना  ही  होगा  अपने-आप  को
मनुष्य  के  हित  में
इसके  पहले  कि  मनुष्य  सहेजने  लगे
अपने  हथियार
और  कृत-संकल्प  हो  बैठे
समय  को  बदल  डालने  के  लिए ...

सुन  लें  समय  के  तथाकथित  मालिकान
अब  अधिक  समय  नहीं  है  उनके  पास !

                                                             ( 2013 )

                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

* नितांत मौलिक/अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

2 टिप्‍पणियां:

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

खुद का खुद पर विश्वास होना ही सबसे बडी बात है
वक्त की चाल को आज तक कोई नहीं बदल सका है

Rajendra Kumar ने कहा…

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।