गुरुवार, 14 मार्च 2013

स्वागत है, हे कला-साधकों..

स्वागत  है, हे  कला-साधकों
आगे  आएं
आप  सुनाएं  राग  कोई  भी
इस  महफ़िल  में
( पञ्चम  से  निषाद  तक
 सारे  स्वर  वर्जित  हैं! )
'दीपक' या  'दुर्गा',  चाहें  तो
गुनगुनाइए
लेकिन, पहले  चार  स्वरों  में
( आगे  के  सारे  स्वर
 'दरबारी' की  ख़ातिर  आरक्षित  हैं! )

ख़ुशफ़हमी  न  रखें,
विरोध  का  तो
ख़्याल  भी  नहीं  चलेगा
टप्पे, ठुमरी
सभी  समर्थन  के  ही  गाएं
वर्ना  धेला  नहीं  मिलेगा !

जल  में  रह कर
बैर  मगर  से  ठाने  रखना
कौन  अक्लमंदी  है  भाई ?
आश्चर्य है,
इतनी  सीधी  बात,  अभी  तक
कैसे  नहीं  समझ  में  आई!

सत्य  सदा  लाञ्छित  होता  है
इसका  रगड़ा  नहीं  पालना
यहां  दाम  अच्छे  मिलते  हैं
बेच  सको  तो
अपनी  स्वरलिपि  बेच  डालना!

                                          ( 1981 )

                                     -सुरेश  स्वप्निल 

*संदर्भ: भा .ज .पा . के पूर्व-अवतार 'भारतीय जनसंघ' का चुनाव-चिन्ह दीपक हुआ करता था, वहीं 1971 के भारत-पाक  युद्ध के पश्चात् पूर्व-प्रधानमंत्री अटल जी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री सुश्री इंदिरा गाँधी को 'दुर्गा' की उपमा दी थी। 'दरबारी' वस्तुतः म. प्र. में 1970-80 के दशक में तथाकथित रूप से घटित 'सांस्कृतिक क्रांति' के 
नायक एक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी की तानाशाही-प्रवृत्ति से संदर्भित है। 

बुधवार, 13 मार्च 2013

ज़िंदा दिल शहर का इतिहास

यह  कैसी  आग  है
जिसमें  जलते  हैं  दिल
ख़ाक  होते  हैं  जिस्म
बरसता  है  लहू-
उठते  हुए  शो'लों  को
और  भड़काने  के  लिए ?

ये  जलती  हुई  झोंपड़ियां
ये  ध्वस्त  होते  मकान
सुलगती  सड़कें-
और रह-रह  कर , घुट-घुट  कर
गूंजती  हुई  चीख़ें -

और  तुम्हारे  पैरों  में  उलझती  हुई
अधजली  लाश ..

यह  सरिता  है
कि  शबाना  है  ?
और  यह  शहर ,
यह  मुरादाबाद  है
कि  अलीगढ़  है
या  इलाहाबाद
कि  हैदराबाद ????

बता  सकते  हैं  मुझे,
श्रीमान ?
मुझे, 
इस  ज़िंदा दिल शहर  का
इतिहास  लिखना  है !

                                 ( 1976 )

                           -सुरेश  स्वप्निल 

*संभवतः, प्रकाशित। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

रस्सी कूदती हुई लड़कियां

सुबह-सबेरे
कोहरे  की  छाती  फोड़  कर
उग  आती  हैं  मैदान  में
रस्सी  कूदती  हुई  लड़कियां

एक  शोर  उभरता  है
एक  लय  बंधती  है
एक  गीत  मचलता  है
रस्सी  कूदती  हुई  लड़कियां
कुछ  गुनगुनाती  हैं
कोहरे  की  दीवारें  प्रतिध्वनित  करती  हैं
हिलती  हैं
टूट  जाती  हैं -
और  गीतों  के  बोल
हवाओं  के  पंखों   पर  बैठ  कर
उड़  जाते  हैं !

इस  समय
रस्सी  कूदती  हुई  लड़कियों  के  पांव
ज़मीन  से  काफ़ी  ऊपर  होते  हैं

फिर  लड़कियां  खिलखिलाती  भी  हैं
बात-बात  पर
उनकी  जेबों  में  रखे  हुए  पैसे
और  चोटियों  में  खुंसे  हुए  फूल
गिर  जाते  हैं

रस्सियां  ऊपर-नीचे-दाएं-बाएं
लहराती  हैं

धूप
धीरे-धीरे
दिन  की  लंबी  सड़क  नापती  हुई
काफ़ी  दूर  आ  जाती  है
छायाएं  बौनी  होती  जाती  हैं
और  लड़कियों  की  गति
तेज़, तेज़ तर  होती  जाती  है

माथों  पर  बूंदें  छलछलाती  हैं
चेहरों  पर  तमतमाहट
और  सांसों  में  तूफ़ान  उठते  हैं
रस्सियों  की  मूठों  कसे  हुए  हाथ
छिल  जाते  हैं
और  सूरज  के  सिर  पर  आते-आते
लड़कियां  मुरझा  जाती  हैं

उनके  पांव  रुकते  नहीं
हालांकि  बड़ी  मुश्किल  से  उठते  हैं

धूप  के  ढलने  का  समय  निश्चित  होता  है
सुबह  के  उड़े  हुए  बोल
अपना  अश्वमेध  पूरा  कर
लौट  आते  हैं
नई  कहानियां
नए  गीतों  की
संभावनाएं  ले  कर

और  लड़कियां  धूप  के  पटाक्षेप  के  साथ
इंच-इंच
धरती  में  समा  जाती  हैं।

कभी-कभी  लड़कियों  के  मां -बाप
उनकी  रस्सियां  छिपा  देते  हैं
लड़कियां  उस  दिन  उदास  होती  हैं
फिर  भी  मैदान  में  उगती  हैं
ख़ाली  हाथ
नंगे  पांव
और  खुले  हुए  बाल  ले  कर

उन्हें  अपना गीत
उसकी  स्वरलिपि
उसकी  ताल  और  लय
सब-कुछ  याद  है

वे  पूर्व-निश्चित  क्रम  में
गोल  घेरा  बनाती  हैं
और  अपने  सफ़ेद  होठों  से
अपना  गीत  गुनगुनाते  हुए
हाथों  को  गति  देती  हैं
खुले  हुए  बाल  हवाओं  में
लहराते  हैं
और  पांव
ज़मीन  से  ऊपर  उठ  जाते  हैं
अन्य  दिनों  की  अपेक्षा  कहीं  अधिक  ऊंचाई  तक

उस  दिन  लड़कियां  परवाह  नहीं  करतीं
मई-जून  के  साफ़  आकाश  की
जिनमें  पारे  की  लकीरें
थर्मामीटर  की  सीमाएं  तोड़  कर
चिलचिलाने  लगती  हैं

लड़कियां  थकती  नहीं
और  न  मुरझाती  हैं
उनके  कोमल  तलुओं  में  तिनके
अपनी  नोकें  गड़ा  देते  हैं
और  उनके  निश्चित  क्रम  में  घूमते  हुए  हाथ       फ्रा
दर्द  से  फटने  लगते  हैं
धूप  आंखों  में  पानी  भर  जाती  है।
और  हवाएं  उनकी फ्रॉकों  से  लिपट  कर
सरसराती  हैं
बालों  में  उलझ  जाती  हैं -
-एक  सिम्फ़नी
धीरे-धीरे
फ़िज़ाओं  में  घुलती  जाती  है

उस  दिन  शाम  के  बाद  भी
लड़कियां  धरती  में  नहीं  समातीं
सुनसान  अंधेरों  के  बीच
उनके  शरीर  झिलमिलाते  हैं
और  सारे  शहर  में  गूंजते  हैं
तब  लड़कियों  के  मां-बाप
अपने  छप्पर  टटोलते  हैं
और  उनकी  छिपाई  हुई  रस्सियां  निकाल  कर
वापस  दे  आते  हैं

एक  दिन

रस्सी  कूदती  हुई  लड़कियां                                                        

अपनी  रस्सियां  मैदान  में  छोड़  कर
तुम्हारे  घरों  में  आएंगी
और  मांएं  बन  जाएंगी
और  तुम्हारी  नन्हीं  लड़कियां
हर  सुबह  मैदान  में  ऊगेंगी
और  अपनी  मांओं  की  छोड़ी  हुई  रस्सियां
उठा  कर  कूदेंगी

मैदान  सब  लड़कियों  को  अच्छा  लगता  है
और  उनका  रस्सी  कूदना  मैदान  को।

                                                             ( 1982 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'साक्षात्कार', भोपाल ( 1983 ).   पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

 

सोमवार, 4 मार्च 2013

उस दिन के लिए कविता...

न  था  कुछ  भी, तो  थी  कविता
न होगा  कुछ, तब  भी  रहेगी  कविता

कि  कविता  मोहताज  नहीं  है
किसी  भाषा, किसी  लिपि
किसी  धर्म, राष्ट्र  या  सिद्धांत  की
या  समय, या  ब्रह्माण्ड  की

कविता  जानती  है
अपना  समय, अपना  संसार, अपना  मनुष्य  रचना
और  न्याय  करना
चमत्कारी  महापुरुषों  का
और  थोथी  आस्थाओं  के  व्यापारियों  का

कि  कविता  अकेली  है
जिसका  धर्म  है  ईश्वरत्व  धारण  करना
कि  वही  है  अनादि-अनंत-अछेद-अभेद
निर्गुण-निराकार  जल्व: ए नूर
अनहद  नाद

कविता  थी, है  और  रहेगी
किन्तु  वह  न्याय  अवश्य  करेगी
और  संहार  भी
अपने  अर्थ  खो  चुके  शब्दों
जैसे  ईश्वर और मनुष्य .... और  समय  का
फिर  रचेगी  वह  नए  शब्द
पंचतत्व  में  विलीन  शब्दों  की  राख़  से

उस  दिन  के  लिए
जब  कविता  अपना  धर्म  निभाने  लगे
अपनी  सच्ची  आस्थाओं  को  बचाए  रखना
कि  पा  सको  फिर  नया  जन्म
और  पहचान  सको  अपने  होने  का  अर्थ !

                                                         ( 26.02.2003 )

                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

* अप्रकाशित / अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु  उपलब्ध।

रविवार, 3 मार्च 2013

मसलन प्यार ...

कुछ  हथियार  ज़रूरी  हैं
इंसानियत  के  लिए
मसलन  आशा, आस्था, अमन
मसलन  प्यार ...

कैसे  भूल  जाते  हैं  लोग
सृष्टि  के  सुन्दरतम  शब्द
उनके  उच्चारण, उनके  भाव
उनके  अर्थ ?

क्यों  नहीं  भूल  पातीं  क़ौमें
मानव-रक्त  और  मांस  के  स्वाद
अपने  क्रूर, नृशंस, बर्बर
और  गर्हित  इतिहास !?

क्या  सचमुच
इतना  ज़रूरी  है  ज़िन्दा  रखना
गोरी  नस्लों  की  श्रेष्ठता  के  दंभ
आर्थिक-उपनिवेशवाद ...

कैसी  भयंकर  आग  है
कितनी  भीषण  ध्वनियां
कितनी  असहनीय  गंध
और  कितने  नज़दीक़ ...

कहीं  मर  तो  नहीं  रहा
तुम्हारे
और  मेरे  भीतर  का  मनुष्य ?

हां, कुछ  हथियार  ज़रूरी  हैं
दुनिया  को  जिलाए  रखने  के  लिए !

                                                      ( 22 मार्च , 2003 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

* अपनी जीवन-संगिनी, कविता जी के जन्मदिन पर।
** अप्रकाशित / अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध 

शनिवार, 2 मार्च 2013

मारे जाओगे, तानाशाह

वह  जो  जंगल  है  तुम्हारी  नज़र  में
वह  जिस  दिन  आगे  बढ़ेगा
तुम्हारे  क़िले-नुमां  महल  की  तरफ़
और  उतर  जाएगा  तुम्हारी  धमनियों  में
पारा  बन  कर
उस  दिन  मारे  जाओगे  तुम

मारे  जाओगे, तानाशाह
वैदिक  ऋचाओं  से  अग्नि  प्रज्ज्वलित  कर
निर्दोष  मानव-रक्त-मांस  की  आहुतियां
ब्रह्म-राक्षसों  को  जगाने  वाले
मद-अंध  अघोरी
तुम्हें  पता  है
जंगल  की  शक्ति ?

तय  है  कि  जंगल  आएगा  ही
तुम्हारे  दरवाज़े
तुम्हारी  'फ़ूल-प्रूफ़' सुरक्षा-प्रणालियों  को
नेस्त-नाबूद  करता
-उसकी  तेजाबी  तरलता  अबंध्य  है
गर्म  लावे  की  तरह

जंगल  एक  प्रश्न  है
चार वेद, अठारह  पुराण
और  असंख्य  स्मृति-संहिता-उपनिषद्
धर्म शास्त्रों  के  समक्ष
और  अकेला  जवाब
तुम्हारे  तीर-तलवार-त्रिशूल
तुम्हारी  परमाणु-क्षमता
और  नाभिकीय  बमों  का
-तुम्हारी  निर्लज्ज  राज्य-लिप्सा
तुम्हारी  वीभत्स  युयुत्सा  का

वह  जो  जंगल  है  तुम्हारे  सामने
वह  तुम्हें  छोड़ेगा  नहीं !

                                                       ( 03.03.2002 )

                                                     -सुरेश  स्वप्निल 

* गुजरात में  दंगों  के  बाद  लिखी गई। शेक्स्पियर   के  नाटक 'मैकबेथ' से प्रेरित।
** अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु  उपलब्ध।
 

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

मृत्युघोष

वक़्त  आ  गया  है  कि  मैं
प्रकट  हो  जाऊं
महाशून्य  के  गर्भ  से
और  नष्ट  कर  दूं  चेतना  के
सारे  सबूतों  को

वक़्त  आ  गया  है  कि
भूगर्भीय  चट्टानों  को  गति  दी  जाए
ताकि  समतल  हो  सकें
समृद्धि  के  वीभत्स  पर्वत
और  आकाश  पर  उड़ते  देवतागण                                           
ज़मीन  पर  रेंगती  हिकारतों  में
एक-मेक  हो  जाएं

वक़्त  आ  गया  है
कि  गुरुत्वाकर्षण  को
शब्दकोष  से  हटा  दिया  जाए
और  समानार्थी   दिया  जाए
ग्रह-उपग्रह-नक्षत्र  को

वक़्त  आ  गया  है  कि  तुम्हें
हक़ीक़त  बता  दी  जाए
कि  यह  कायनात  बख्शी  गई  थी  तुम्हें
इसलिए
कि  तुम  रच  सको
सौंदर्य  के  कालातीत  महाकाव्य
और  खड़े  हो  सको   मेरे  सामने
आंखों  में  आंखें  डाल  कर
निर्विकार  उल्लास  में  भरे  हुए

ओ  मेरी  व्यर्थतम  रचना
ओ  कपूत  अपात्र  !
अब  मैं  तुम से  सारी  विरासत
और  सारे  अल्फ़ाज़  वापस  लेता  हूं
और  तुम्हारा  वक़्त  भी  !

                                                    ( 2002 )

                                             -सुरेश  स्वप्निल 

* अप्रकाशित/ अप्रसारित  रचना। प्रकाशन  हेतु  उपलब्ध।
                                             -

बहुत पहले सुना हुआ गीत

अक्सर  ऐसा  होता  है
कि  नींद  के  पहले
याद  आता  है  उसे
बहुत  पहले  सुना  हुआ  गीत:
" सो  जा,  सो  जा  बारे  बीर
बीर  की  बलैयां  लै  लऊं
जमना  के  तीर "

और  नींद
पंख  फड़फड़ा  कर
उड़  जाती  है ....

बचपन  में
यही  गीत  सुन  कर
अपना  घोंसला  छोड़  कर
पता  नहीं  किस  खिड़की  से  आती  थी  नींद
और  उसके  सिरहाने  आ  कर
ढांप  लेती  थी  उसकी  आंखें
और  सुबह  तक  ठहरी  रहती  थी ..

उसे  याद  है  वह  धुंधला  चेहरा
ठीक  उसकी  पहली  कॉपी  के
धुंधलाए  चित्रों-जैसा
जिनमें  ही  कहीं  गड्ड-मड्ड  है
उसकी  मां  की  तस्वीर  !

अम्मां  की  थपकियों  में  जादू  था
या  कि  नींद  उनकी  सहेली
उसने  कभी  नहीं  सुनी
नींद  की  आहट
बस,  सहेजता  रहा  पलकों  की  संदूकची  में
सपनों  के  हीरे-मोती

सपनों  को  ओढ़े  कि  बिछाए
यह  समस्या  नहीं  थी  तब

जब  कभी
वह  कच्ची  नींद  से
चौंक  कर  जाग  उठता
अम्मां  बतियाती  मिलतीं
जाने   किसके  साथ
जबकि  वहां  कोई  नहीं  होता  था
अम्मां,  दिये  और  हवा  के  सिवा !

तब
अम्मां  की  उंगलियां
उसके  बालों  में  उलझने  लगतीं
और  अधूरे  छूटे  चित्र
पूरे  होने  लगते

बहुत  बार  सोचता  वह
कि  अम्मां  सोएं
और  वह  हवा  से,  दिये  से,
नींद  से   बतियाए
लेकिन  नहीं  आता  था  उसे
नींद  का  गीत
और  न  उसकी  धुन

और  अम्मां  जागती  रहीं
आख़िरी  बार  सोने  से  पहले  तक ...

अब  न  नींद  है
न  हवा,  न  नींद
और  न  अम्मां
बस  एक  गीत  है
बहुत  पहले  सुना  हुआ ...

अम्मां  कुछ  दिन  और  रुकतीं
तो  वह  उनसे  गीत  को  स्वर
और  स्वरों  को  अर्थ  देने  की  तरकीब
ज़रूर  पूछता !

                                                      ( 1984 )

                                               -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: 'वर्त्तमान  साहित्य', 1984 एवं  अन्य  कुछ  पत्र-पत्रिकाओं  में। पुनः प्रकाशन हेतु  उपलब्ध।

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

कुछ और छोटी कविताएं

                             सम  तक  पहुँचने  में 

                           ता   थेई 
                           त्राम  थेई 
                           तिक  धा  तिक  तिक  थेई  
                           तिक  धा  तिक  तिक  थेई 
                           तिक  धा  तिक  तिक  थेई 
                           सम तक पहुंचने  में 
                           ख़ासी  मेहनत 
                           और  देर  लगती  है ! 
                                                           ( 1983 )
                             रात  बिताने  के  लिए 
                        मेरी  बीड़ी 
                        बुझ  रही  है 
                        और  सुबह  बहुत  दूर  है 

                        अब  तुम्हें 
                        रात  बिताने  के  लिए 
                        अलाव  जलाना  चाहिए।
                                                          ( 1983 )

                      छिपकलियां 
                         छिपकलियां  रेंग  रही  हैं 
                      धीरे  धीरे 

                      वे  
                      मकड़ी  का  जाला 
                      तोड़  देंगी 
                      एक  दिन ! 
                                                    ( 1983 )
                               
                                           -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: 'नव भारत',  ( रविवासरीय ) रायपुर, 'आवेग', रतलाम एवं अन्यत्र। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।
 

 

                         

                            

                         

             

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

दो छोटी कविताएं

                 
                          1 . कोहरा 
                          बारूद  की  आग  से
                          सूख  रहा  है  जन-समुद्र

                          हवाओं  के  सीने  पर
                          जम  रही  है  धूल

                         रातों  को  ठंडा  तो  होने  दो
                         कोहरा  बन  कर  छा  जाएंगे  लोग

                         बारूद  से  सने  हाथों  को
                         नहीं  सूझेंगे  हाथ !

                                                                     ( 1984 )

                            2. पड़ेगा  तुषार 
                       रक्त  के  उबाल  को  ठंडा  करने  के  लिए
                       जब-जब
                       कम  किया  जाएगा  रात  का  तापमान

                       मौसम  के  इरादों  पर
                       पड़ेगा  तुषार !

                                                                    ( 1985 )

                                                                - सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'आकंठ', होशंगाबाद एवं अन्यत्र। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।







                   



मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

हवा बाज़ार से ग़ायब है !

गत  दिनों  किसी  एक  रात  को
जिसकी  तारीख़  मुझे  याद  नहीं
मैंने  एक  सपना  देखा।

सपना  देखा  कि  हवा
बाज़ार  से  ग़ायब  है
हवा  सारी  दुनिया  से  ग़ायब  है
हवा  किसी  मोल  पर  नहीं  मिलती
हवा  किसी  स्टॉक  में  नहीं  है
न  काले,  न  उजले ।

हवा  की  ऐसी  तंगी  हमने  कभी  नहीं  देखी  थी

हम  अपना  सब-कुछ  लुटा  देने  को
तैयार  थे
महज़  चंद  सांसों-भर  हवा  के  लिए
हमने  अपनी  तिजोरियां  तोड़ीं
और  सारे  गहने  निकाले
बैंकों  से  सारा  पैसा  भी
विदेशी  साड़ियों  और  घड़ियों  के  भंडार  भी
और  सच्चे-झूठे  राशन-कार्ड  भी।

ग़रज़  यह  कि  हम  अपना  सब-कुछ
चौराहों  पर  ले  आए
और  सरकारों  से  मांग  की: "हमारा  सब-कुछ  ले  लो
और  हमें  दे  दो
हमें  दे  दो
हवा, सिर्फ़  हवा!"

फिर   सबने  देखा,
सरकारें  भी
राज-काज  छोड़  कर  भीड़  में  मिल  गई  थीं

हम  बेबस  थे
सब  के  सब
सहनशील  शिक्षक  और  चाक़ू  तानने  वाले  छात्र
डॉक्टर,  इंजीनियर  और  ठेकेदार
अपराधी, वकील  और  न्यायाधीश
नेता,  मंत्री  और  उनके  दलाल
सभी  एक  आसमान  के  नीचे
एक  मुट्ठी  हवा  के  तलबगार
और  हवा,  किसी  के  भी  पास  नहीं।

हम  सबका  दम  घुटता  जा  रहा  था
और  चीख़ें  गूंज  रही   थीं
आर्त्त ,  विवश, भयाक्रांत  इंसानों  की

मृत्यु  हमारे  सामने  स्पष्ट  थी

तभी  अख़बार  वाले  की  आवाज़  ने
खिड़की  पर  दस्तक  दी
शायद,  सुबह  हो  चुकी  थी
दरवाज़े  की  दरार  से  अन्दर  आया  अख़बार
आँखों  के  आगे  फैले  समाचार
" तीन  दिन  में  तीसरी  सरकार  का  पतन "
"सोने-चांदी  के  भाव  नई  ऊंचाई  पर "

मैंने  अपने-आप  को  टटोला
सांस  चल  रही  थी
और  मैं- ज़िंदा  था !

                                                             ( 1979 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

प्रकाशन:' इंदौर बैंक  परिवार', 1979, 'अंतर्यात्रा'-1 3, 1983 एवं अन्यत्र।
* पुनः  प्रकाशन  हेतु  उपलब्ध।


सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

आइसक्रीम बेचने वाले

कभी-कभी  कितना  सहज  लगता  है
धूप  का  तीख़ा पन
और  घूमते  फिरना
नंगे  पांव
नंगे  सिर ...

सड़क  बेहद  लम्बी  है
पेड़  बहुत  थोड़े
और  फिर  जगह-जगह  रुक  कर
क्यों  बिगाड़ें 
पांवों  की  आदत ?

छांव  महज़  धोखा  है
धूप  एक  कड़वा  सच
न  राह  आसान  है, न  मंज़िल !

जानी-पहचानी  आवाज़ें
सड़क, गली, आंगन , खिडकियां  पार  कर
घुस  आई  हैं  कमरे  में

आइसक्रीम  बेचने  वाले  आए  हैं
पूछो , किसी  को  पानी  चाहिए ?

                                                       ( 1982 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: 'आकंठ', होशंगाबाद एवं अन्यत्र। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

बताओ बुलडोज़र ...

आओ,  बुलडोज़र

आगे  बढ़ने  से  पहले
रुको  और  देखो
महानगर  की  छाती  पर  पसरे
इस  विशाल  फोड़े  को

देखो !
ऊँचाई  पर  खड़े  होकर
अपनी  चमकदार  आँखों  से
बौने  झोंपड़ों   के जंजाल
और  उनकी  छाती  पर
बिलबिलाते  नालों  को

देखो  गहन  अंधकार
कच्ची  दारू  के  समंदर
गांजा, भांग, अफ़ीम
हेरोइन, स्मैक, ब्राउन शुगर
देखो
हैजा, टी .बी ., नासूर
सिफ़लिस , सिरोसिस
अलसर, अमीबिओसिस

देखो  आदमी-नुमां  जीवाणु
ऐश्वर्यशालियों  की  अधनंगी  सेना
चूस  कर  फेंकी  गई  हड्डियाँ
देखो  बास  मारते  भात  को
ढकोसते  बच्चे
शर्म हीन , भय हीन
रक्त-मांस  विहीन
औरतों  के  कंकाल
ठर्रा  पी-पी  कर  घुलते  मर्द
पूँजी  के  अनमोल  उत्पादन ...

बताओ,  बुलडोज़र
इस  महासंसार  को
अपनी  ताक़तवर  भुजाओं  से
ध्वस्त  करने  से  पहले
बताओ !
क्या-क्या  देखती  हैं  तुम्हारी  आंखें ?

                                                   ( 1985 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: जून, 1985, दैनिक ' देशबंधु', रायपुर। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

इतिहास माफ़ नहीं करता ...

जहां  बोया  जाना  था  प्यार
वहां
तुमने  हथियार  बो  दिए !
और  अब 
जबकि  तुम्हारे  चारों  तरफ़
चप्पा-चप्पा  धरती  पर
उग  आई  हैं  संगीनें
तुम्हें  सालता  है
अपने  पांवों  का  नंगा पन ?

काश ! तुमने  देखी  होतीं  तुमने
पराजित  इंसानों  की  भयाक्रांत  आँखें
और  याद  किया  होता
अपना  ही  इतिहास
कि  आदम ख़ोर  जंगल  से
तुम  भी  तो  गुज़रे  थे  कभी !

अपने  हथियारों  की  दोहरी  मार  को  पहचानो
सिर्फ़  दूसरों  की  दीवारें  ही  नहीं
ढह  जाएगा  तुम्हारा -अपना  भी  साम्राज्य

इतिहास  की  छाती  पर  मूंग  मत  दलो
उसने  कभी  किसी  को  नहीं  किया  माफ़ !

                                                                     ( 1984 )

                                                              -सुरेश  स्वप्निल 

* अप्रकाशित / अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।



शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

लड़की कारचोब पर

लड़की  उठती  है  मुंह-अँधेरे
आँखों  पर  पानी  के  छींटे  मार  कर
जूझती  है  कुछ  देर
चूल्हे  और  गीली  लकड़ियों  से
फिर  आ  बैठती  है  कारचोब  पर
रीढ़  की  हड्डी  में  दर्द 
और  आँखों  में  जलन  लिए

दो  खड़ी  और  दो  आड़ी  लकड़ियों  के  अड्डे  पर
नायलॉन  के  धागों  से
तानती  है  नीले  मख़मल  का  आकाश
और  उतारती  है  उस  पर
ट्रेसिंग  पेपर  के  छेदों  में  से
उड़ते  हुए  पक्षियों  के  आकार

भोर  की  पहली  किरण  के  उजाले  में
सुई  में  धागा  पिरोती  है
और  आले  से  पोतों  की  तश्तरी  उठा  कर
घुटने  मोड़  कर  बैठ  जाती  है

लड़की  पोत  दर  पोत
मख़मल  पर  टंकती  चली  जाती  है

धूप
टाट  के  परदे  से  निकल  कर
पोतों  की  तश्तरी  से  टकराती  है
और  पोतों  के  रंग
सारे  कमरे  में  बिखर  जाते  हैं ...

लड़की  चाहे  तो  इस  वक़्त
सपने  देख  सकती  है।

लेकिन  उसकी  पतली  उंगलियां
रुकना  नहीं  जानतीं
और  न  आँखें  बहकना
हवा  की  तरह  सरसराती  उंगलियों  के  बीच  से
एक  शाहीन  सर  उठाता  है
और  अपने  पंख  पसार  कर
अड्डे  पर  बैठ  जाता  है

लड़की  उसके  पंखों  को  छू-छू  कर  देखती  है
और  उन  पर  बैठ  कर  उड़  जाना  चाहती  है
बदनसीबी, क़र्ज़  और  जहेज़  के  कमरों  की
दीवारें  तोड़  कर

लेकिन  कारख़ानेदार  का  दूकानी  चेहरा
लड़की  पर  हावी  होता  चला  जाता  है
और  अपनी  झुर्रियों  से  उसके  चारों  ओर
जाल  बुन  देता  है

लड़की  अड्डे  को  अपनी  बांहों  में  समेट  कर
छटपटाती  है
और  शाहीन 
स्तब्ध  हो  कर  लड़की  को  देखता  है

तभी  कारख़ानेदार  का  बालों  भरा  हाथ
जाल  के  भीतर  आता  है
और  शाहीन  को  अड्डे  से  उतार  कर
अपने  कंधे  पर  डाल  कर  चल  देता  है

लड़की  जब  होश  में  आती  है
तो  शाहीन  के  पंख  नहीं
उसकी  हथेलियों  में  फड़फड़ाते  हैं
हरे-हरे  दो  नोट ....

कारख़ानेदार
लड़की  के  ज़ेहन  में  जब-जब  उभरता  है
उसकी  आँखें  बहकती  हैं
और  सुई  उंगली  में  धंसती  चली  जाती  है
लड़की  कांपते  हुए  हाथ  से  सुई  निकालती  है
और  सिर  झटक  कर
दोबारा  काम  में  जुट  जाती  है

उसकी  उंगली  से  रिसता  हुआ  ख़ून
याक़ूत  की  तरह
शाहीन  के  पंखों  पर  टंकता  चला  जाता  है ....

एक  दिन
सूखे  हुए  ख़ून  में  दोबारा  चमकेगी  लाली
कारख़ानेदार  के  सारे  शो-केस
टूट  कर  बिखर  जाएंगे
और  लड़की  के  हाथों  से  निकले
सारे  शाहीन
झुण्ड  बना  कर  वापस  लौट  आएंगे

वे  लड़की  कारख़ानेदार  का  चेहरा 
सामने  आते  ही
टूट  पड़ेंगे  उस  पर
और  अपनी  चोंचों  से
जाल  के  एक-एक  फंदे  को
काट  डालेंगे

वे  कारचोब  की  पालकी  पर
लड़की  को  बैठाएंगे
और  अपने  पंखों  पर  लाद  कर
उड़ा  ले  जाएंगे ....

लड़की  बैठी  है  कारचोब  पर
शाहीन  के  पंखों  में  पोत  भरती  हुई।

                                                        ( 1981 )

                                                   -सुरेश  स्वप्निल 

* अब तक  अप्रकाशित/अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध। समुचित पारिश्रमिक अपेक्षित।

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

अपने ही बेटों से ....

फटी  गुदड़िया
ढेर   चिथड़िया
धागे  और  सुई  में
कब  तक  जान  खपाओगी, अम्माँ ?

होंठों  पर  आने  से  पहले  ही
रुक  जाती  राम कहानी 
भर  आता  आँखों  में  पानी

मूड़  झुका  कर
यूँ  ही  कब  तक  बात  उड़ाओगी , अम्माँ ?

अच्छा, लो  यह  सुरमेदानी
चार  रुपैये  की  आई  है
एक  रुपैया  कम  दे  देना
चाहो  तो  यूँ  ही  रख  लेना

अपने  ही  बेटों  से
कब  तक  शान  दिखाओगी, अम्माँ  !

                                                             ( 2 1 दिस . 1 9 8 7 )

                                                                  - सुरेश  स्वप्निल

* उस दौर  की  अंतिम  हिंदी  कविता।  अपनी  अम्माँ, स्व. श्रीमती रतन बाई खड़ग के लिए।
** प्रकाशन: 'वर्त्तमान साहित्य' एवं अन्यत्र। पुनः प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

मुझे चाहिए जो जीवन

मुझे  चाहिए  जीवन
छल-छल  कल-कल
बहते  झरने-सा  उद्दाम
और  उन्मुक्त  !

चाहिए  अपने  आंगन  में
किलकारी
अपने  छौनों  की
मुस्कानें
जी-भर  दूध
भूख-भर  रोटी
तन-भर  कपड़ा
जीवन-भर  जीवन
बेरोकटोक  आवाजाही
दुःख-सुख  की ...

मुझे  चाहिए  धूप
और  गेहूं  के  दानों  में
अपने  लोहू  का  हिस्सा  पूरा
मुझे  चाहिए
अपने  हाथों  सींचे -
दुलराए  फूलों  और  फलों  में
अपने  हिस्से  के  कोठी-भर
गंध-स्वाद अब

मुझे  चाहिए
अपने  जल, अपनी  माटी
अपने  खेतों  पर
अपना  ही  अधिकार

मुझे  चाहिए  जो  जीवन
मैं  बीज  बो  रहा  हूँ  उसके
ललछौहें
अपने  हाड़-मांस  की
खाद  मिला  कर !

                                   ( 1 9 8 6 )

                              -सुरेश  स्वप्निल 

* संभवतः, अभी तक अप्रकाशित। प्रकाशन हेतु उपलब्ध।

                                            

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

दुनिया की बेहतरी के लिए

लड़कियां  उतरें  ज़मीन  में
अपनी  आज़ादी
और  दुनिया  की  बेहतरी  के  लिए

लड़कियां  अंकुरित  हों
बढ़ें
फलें-फूलें
निरोग, सुंदर  और  हंसमुख
गेहूं  की  बालियों-जैसी

लड़कियां  बढ़ें  आगे
सागर, मैदान, पर्वतों  को  लांघती
अन्न-गंध  बन
फैलें  दुनिया  के  कोने-कोने  में
हारे-टूटे  हुओं  में
प्राण  फूंकती

दुनिया  को  मनचाहा  आकार  देने
लड़कियां  उठ  रही  हैं  आंधी  बन  कर
वह  देखो
रख  दिए  उन्होंने  पांव
खेत  के  भीतर !

                                                   ( 1 9 8 7 )
                                            -
                                             -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन: संभवतः, 'वर्तमान साहित्य'. पुनः प्रकाशन हेतु  उपलब्ध।

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

सरकार क्या करे ! ! !

ओले  गिरने  थे
गिरे

लोट  गईं  धरती  पर
खड़ी  फ़सलें
पेड़ों  से  पत्ते  झरे

टूट  गए  कच्ची  मढ़इयों  के  खपरैल
चार-छह  लोग  भी  मरे

सरकार  आख़िर  क्या  करे ? !

रोक  दे  पानी  का  भाप  में  बदलना
हवा  और  आंधी  का  बेरोक-टोक  चलना
वायु-धाराओं  का  बर्फ़  बन  कर  जमना
ओलों  का  धरती  पर  बरसना ? ? ?

असंभव  है, श्रीमान !
सरकार  के  लिए  ऐसा  कुछ  भी  करना ...

जिन्हें  गिरना  था,  गिरे
जिन्हें  झरना  था,  झरे
जिन्हें  मरना  था,  मरे
सरकार  क्या  करे ! ! !

                                                        ( 1983 )

                                                  -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: आकंठ, होशंगाबाद एवं अन्यत्र। पुनः प्रकाशन  हेतु  उपलब्ध।

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

कर्फ़्यू-3/4

कर्फ़्यू - 3

शक्कर
दूध
चाय  की  पत्ती ...

कर्फ़्यू  में  छूट  की  अवधि 
ख़त्म  होने  तक
दूकान  पर  बहुत  भीड़  थी

माँ
तेल  की  आख़िरी  बूँद  चुकने  तक
स्टोव  जलाए
इंतज़ार  करती  रही .....

                                             ( 1984 )

कर्फ़्यू-4

बच्चे 
अपनी  गेंद  पकड़ने 
सड़क  पर  दौड़े  थे 

वे 
लाल  गोलों  में  तब्दील  होने  से  पहले 
'शूट  एट  साईट '  का  अर्थ 
नहीं  जानते  थे।

                                         ( 1984 )

                                 -सुरेश  स्वप्निल 

प्रकाशन: ' आवेग ', रतलाम एवं अन्यत्र।