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रविवार, 3 मार्च 2013

मसलन प्यार ...

कुछ  हथियार  ज़रूरी  हैं
इंसानियत  के  लिए
मसलन  आशा, आस्था, अमन
मसलन  प्यार ...

कैसे  भूल  जाते  हैं  लोग
सृष्टि  के  सुन्दरतम  शब्द
उनके  उच्चारण, उनके  भाव
उनके  अर्थ ?

क्यों  नहीं  भूल  पातीं  क़ौमें
मानव-रक्त  और  मांस  के  स्वाद
अपने  क्रूर, नृशंस, बर्बर
और  गर्हित  इतिहास !?

क्या  सचमुच
इतना  ज़रूरी  है  ज़िन्दा  रखना
गोरी  नस्लों  की  श्रेष्ठता  के  दंभ
आर्थिक-उपनिवेशवाद ...

कैसी  भयंकर  आग  है
कितनी  भीषण  ध्वनियां
कितनी  असहनीय  गंध
और  कितने  नज़दीक़ ...

कहीं  मर  तो  नहीं  रहा
तुम्हारे
और  मेरे  भीतर  का  मनुष्य ?

हां, कुछ  हथियार  ज़रूरी  हैं
दुनिया  को  जिलाए  रखने  के  लिए !

                                                      ( 22 मार्च , 2003 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

* अपनी जीवन-संगिनी, कविता जी के जन्मदिन पर।
** अप्रकाशित / अप्रसारित रचना। प्रकाशन हेतु उपलब्ध 

1 टिप्पणी:

MANU PRAKASH TYAGI ने कहा…

बढिया रचना