गुरुवार, 12 सितंबर 2013

आतंक

काफ़ी  समय  बीत  गया
गिद्ध, चील, कौए
कुत्ते, भेड़िए, शेर….
और  तमाम  मांसाहारी  पशु-पक्षियों  को
मनुष्य  का  मांस  खाना  छोड़े  हुए

अब  उन्हें  उल्टी  आती  है
सड़कों  पर  बिखरे
मरे  हुए  मानव-शरीर  और  उनके
कटे-फटे, क्षत-विक्षत  अंग  देख  कर

वे  आतंकित  और  
परेशान  हैं
सब  के  सब…
मनुष्य  के  बदले  हुए
रूप, आदतें  और
व्यवहार  को  देख  कर  !

                                               ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल


बुधवार, 11 सितंबर 2013

हरा देना हमें ...

स्थिति  नियंत्रण  में  है
फ़िलहाल

लोग  केवल  रात  में
मर-मार  रहे  हैं
एक-दूसरे  को
वह  भी  आठ-दस…
औसतन  प्रति-दिन !

लगभग  दस  करोड़  की
जन-संख्या  में  इतनी  मौतें
यूं  भी  हो  ही  जाती  हैं
और  यह  अधिकार  मिलना  चाहिए
लोकतांत्रिक  रूप  से
चुनी  गई  सरकार  को
कि  इस  नाम-मात्र  की  मृत्यु-दर  को
सामान्य  कह  सके….

अब  संविधान  का  तो  ऐसा  है
भाई  जी
कि  जिसकी  लाठी,  उसी  की  भैंस….
क़ानून  भी

चलिए,  मान  लिया  कि
सरकार  असफल  हो  गई  है  हमारी
मगर  अभी  भी
बहुमत  है  हमारे  पास
और  केंद्रीय  सत्ता,  संविधान
और  सर्वोच्च  न्यायालय
सब  हमारे  पक्ष  में  हैं….

हम  कह  रहे  हैं  न
कि  नियंत्रण  में  है  स्थिति
आप  मानें  या  न  मानें

अगले  चुनाव  में  हरा  देना  हमें
यदि  संभव  है,  तो !

                                            ( 2013 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल 


मंगलवार, 10 सितंबर 2013

तीन छोटी कविताएं

               ( एक )

धर्म  भी  पीछा  छोड़  दे…

मैं  अपने  नाम  के  आगे
जाति  का  दुमछल्ला
नहीं  लगाता….

सोच  रहा  हूं
कि  कोई  ऐसा  नाम  रख  लूं
कि  मेरा  धर्म  भी
पीछा  छोड़  दे  मेरा….

               ( दो )

'ज़ेड  प्लस  सुरक्षा'

मैं  ऐसे  भगवान  को
नहीं  मानता
जो  हाथ  में  हथियार  लिए  बिना
घर  से  न  निकले

मैं  ऐसे  किसी  इमाम
या  शंकराचार्य  को  भी  नहीं  मानता
जो  'ज़ेड  प्लस  सुरक्षा'  के  सहारे
धर्म  का  प्रचार  करे

मैं  किसी  ऐसे  धर्म  को
नहीं  मानता
जो  मेरे  पड़ोसी  का  घर
जलाने  की  शिक्षा  दे….

मैं  ऐसे  धर्म  या  राष्ट्र  पर
थूकता  हूं
जो  अपने  ही  देश  में
अपने  ही  नागरिकों  को
सिर्फ़  धर्म  के  आधार  पर
दूसरे  दर्ज़े  का  बना  दे….

मैं  मनुष्य  हूं
मुझे  जीने  दो
एक   मनुष्य  की  तरह  !

                     ( तीन )

धर्म  और  समाज  के  ठेकेदारों  ! 

मुझे  हथियारों  का  डर
मत  दिखाओ
मुझे  मौत  का  भी  डर  नहीं  है…

मुझे  स्वर्ग  का  लालच  मत  दो
मैं  अपनी  मातृ-भूमि  में  ही
ख़ुश  हूं …

मुझे  जन्नत,  हूरों  और  शराब
के  झांसे  भी  मत  दो
मुझे  अपनी  मेहनत  से  कमाई  रोटी
के  सिवा  कुछ  भी  प्यारा  नहीं…

मेरे  सामने  से  हट  जाओ
धर्म  और  समाज  के  ठेकेदारों  !

                                                     ( 2013 )

                                               -सुरेश  स्वप्निल 




रविवार, 8 सितंबर 2013

धर्म, मात्र एक हथियार है

फिर  सफल  हो  गए  वे
दिलों  के  बीच  दीवार  बनाने  में
फिर रक्त  से  सींच  दिया
बूंद-बूंद  पानी  से  तरसती  धरती  को
फिर बिछा  दी  गईं  लाशें
निर्दोष  मनुष्यों  की
धर्म  के  नाम  पर…

वे  ध्रुवीकरण  चाहते  हैं
तथाकथित  धर्मों  के  नाम  पर
वे  चाहते  हैं  कि  मनुष्य
एक-दूसरे  की  आस्थाओं  को  नकार  दें
वे  सिद्ध  कर  देना  चाहते  हैं
कि  धर्म
मात्र  एक  हथियार  है
मनुष्यों  को  एक-दूसरे  के  विरुद्ध
खड़ा  करने  का
कि  अलग-अलग  धर्म  के  मनुष्यों  का
रक्त  भी  अलग-अलग  होता  है

कि  एक  धर्म  में  पैदा  हुए  मनुष्य
बेहतर  मनुष्य  होते  हैं
दूसरे  या  तीसरे  धर्म  के  मनुष्यों  से…

वे  उस  विचार  को  ही  मिटा  देना  चाहते  हैं
जिसे  सारा  संसार  जानता  है
'भारतीयता'  के  नाम  से

हमें  दुःख  है
बहुत-बहुत  दुःख
आपसे  यह  पूछते  हुए
कि  आप  मनुष्य  हैं
या  हिंदू
या  मुसलमान
या  बौद्ध,  या  सिख ,  ईसाई,  जैन
या  कोई  और ???

आप  मनुष्य  क्यों  नहीं  हैं,  महाशय  ?

                                                      ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल



शनिवार, 7 सितंबर 2013

प्रवचन की दूकान !

आओ  मिल  कर  लूट  मचाएं

अच्छी-ख़ासी  भीड़  लगी  है
अंधे-बहरे-गूंगे-काने
भक्त-जनों  को  मूर्ख  बनाएं
हाथ-सफाई  से  काग़ज़  को  नोट  बनाएं
ताज़े-ताज़े  लड्डू-पेड़े
आस्तीन  को  हिला-डुला  कर
मिट्टी  को  प्रसाद  बना  कर
अपनी  जय-जयकार  कराएं
ज्ञान-तर्क  की  धूल  उड़ा  कर
कीड़ों  को  भगवान  बनाएं

धर्म-ग्रंथ  में  क्या  लिक्खा  है
अच्छे-अच्छे  पढ़े-लिखे  भी  नहीं  जानते
चाहे  जो  भी  गढ़ो  कहानी
कुछ  भी  उल्टा-सीधा  बक  दो
भक्त-जनों  में  अक़्ल  कहां  है ?
तुम  मत  मांगो
लोग  मगर  फिर  भी  दे  देंगे
तुम  बस  उनको  शिष्य  बनाओ
चाहे  जैसी  दीक्षा  बांटो
चाहे  जो  गुरु-मंत्र  बता  दो  …

डायबिटीज़  की  दवा  बता  कर
रसगुल्ले  की  मांग  बढ़ाओ
लौकी-कद्दू  के  नुस्ख़े  से
जम  कर  अपनी  चांदी  काटो
दोनों  हाथों  लूट-लूट  कर
भक्तों  को  कंगाल  बनाओ
दाढ़ी-भगवा-पगड़ी  का  उपयोग  सीख  लो
'वैदिक'  का  बाज़ार  बनाओ
संस्कृति   में  आग  लगाओ…

उफ़ ! यह  इतना  छोटा  जीवन  !
करने  को  है  इतना-सारा
धर्म  और  ईमान  भूल  कर
नोट  कमाओ  ढेर  लगाओ
सात  पुश्त  की  करो  व्यवस्था
यहां-वहां  गुरुकुल  खुलवा  दो
नेताओं  को  शिष्य  बना  कर
क़ानूनों  को  धता  बताओ

कहां  लगे  हो ?
बच्चों  को  बाबा  बनने  के
गुर  सिखलाओ….

अपने  दोनों  लोक  संवारो
सातों  जन्म  सफल  कर  डालो
काम-धाम  सब  छोड़-छाड़  कर
प्रवचन  की  दूकान  चलाओ
नोट  कमाओ
भारत  का  सम्मान  बढ़ाओ  !

                                          ( 2013 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल 


शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

वोटों के भिखारी

कुछ  लोग  जीवन-भर  भीख  मांगते  हैं
और  स्वीकार  भी  नहीं  करते
उन्हें  न  चोरी  से  परहेज़  होता  है
न  लूट  या  धोखाधड़ी  से
उन्हें  न  देश  की  चिंता
न  अपने  आत्म-सम्मान  की

वे  हर  क़ानून  को  अपनी  जेब  में  रखते  हैं
और  न्याय  को  जब  चाहे  ख़रीद  सकते  हैं
ऊंची  से  ऊंची  क़ीमत  दे  कर…

हां,  ईश्वर  से  उन्हें   बहुत  डर  लगता  है
और  उससे  भी  अधिक  उसके  दलालों  से
कम  से  कम  दिखाने  के  लिए

वे  दरअसल  ईश्वर  और  उसके  दलालों  की
वोट  खींचने  की  क्षमता  पहचानते  हैं

वे  चुनाव  लड़ते  हैं
और  जीत  कर
संसद  और  विधानसभाओं  में  बैठ  कर
मूंग  दलते  हैं
देश  की  छाती  पर  !

वे  फिर  आने  वाले  हैं
तुम्हारे  घर
वोटों  की  भीख  मांगने
ताकि  वह  सब  कुछ  लूट  लें
जो  अभी  तक  बचा  हुआ  है  तुम्हारे  पास !

                                                              ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 



गुरुवार, 5 सितंबर 2013

आप हत्यारे हैं !

सच-सच  बतलाइए
आप  उस  समय  कहां  थे
जब  कल  भीड़  एक  निर्दोष  को
बीच  सड़क  पर
लाठियों  से  पीट  कर
जान  ले  रही  थी  उसकी…

मुझे  मालूम  है  कि  आप  कहेंगे
'पुलिस  भी  तो  थी  वहां  पर  !'
आपने  क्या  किया  लेकिन  ?
पुलिस  को  याद  दिलाया  उसका  कर्त्तव्य  ?
जानना  चाहा  भीड़  से
उस  मरते  हुए  मनुष्य  का  दोष  ?
आंखें  गीली  हुईं  आपकी
मरते  हुए  मनुष्य  को  तड़पता  देख  कर
कुछ  तो  किया  होगा  आपने  !

याद  कीजिए
क्या  किया  सोच  रहे  थे  उस  समय  ?

मैं  बताऊँ  आप  क्या  कर  रहे  थे  ?
आप  मज़े  ले  रहे  थे  आंखें  फाड़-फाड़  कर !
मृत्यु  को  अपनी  सामने  घटित  होने  का
आनंद  उठा  रहे  थे  !

वह  जो  मरता  हुआ  मनुष्य  था
आप  परिचित  भी  थे  उससे  शायद
शहर  में  यहां-वहां  आते-जाते
दुआ-सलाम  भी  की  होगी  अक्सर
संभव  है  कहीं  कुछ  भावनाएं  भी  जुड़ी  रही  हों  आपकी

तो  भी  आप  मौन  रहे
आपने  सिर्फ़  आनंद  लिया
एक  जीवित  मनुष्य  को
मृत  शरीर  में  बदलते  देखने  का …

कल  यही  भीड़  आपको  घेर  ले
कल  आपका  छोटा  भाई
या  आपकी  संतान  या  आपके  माता-पिता
भीड़  के  हाथ  चढ़  गए  तो ???

आख़िर  किससे  मदद  मांगेंगे  आप  ?

नहीं,  न्याय  की  बात  मत  कीजिए
मत  दीजिए  दोष  पुलिस  को
पल-पल  नष्ट  होते  सामाजिक  मूल्यों  को

अपनी  आत्मा  को  छू  कर  देखिए
आप  हत्यारे  हैं  महाशय
स्वयं  अपने  ही  विवेक  के  !

                                                       ( 2013 )

                                                 -सुरेश  स्वप्निल

*झारखण्ड में एक छात्र-नेता की बीच  सड़क पर लाठियों से पीट-पीट कर की गई हत्या पर…



बुधवार, 4 सितंबर 2013

मूर्ख हैं हम और आप

कोई  प्रतिरोध  नहीं
कोई  प्रतिकार  नहीं
कहीं  कोई  विरोध  का  स्वर  नहीं

यदि  यही  रवैया  रहा  जनता  का
यदि  ऐसे  ही  चलती  रहीं  सरकारें
यदि  ऐसे  ही  बढ़ती  रही  मंहगाई
और  बेरोज़गारी
तो  इत्मीनान  रखिए
कोई  नहीं  बचा  सकता  देश  को
उसकी  स्वतंत्रता, संप्रभुता, एकता
और  अखंडता  को….

सरकारें  चाहती  हैं
सब  कुछ  चलता  रहे  यों  ही
सब  कुछ  सहती  रहे  जनता….

मूर्ख  हैं  हम  और  आप
या  कायर
कि  होने  दें  सरकार  की  सारी  इच्छाएं  पूरी ???

                                                               ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

 

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

बदल जाएंगे भूगोल !

फिर  रक्त-पिपासा  बढ़  गई
आदम ख़ोरों  की
फिर  ढूंढ  लिए  गए  निरीह,  बेबस  मनुष्य
नवीनतम  हथियारों  के  परीक्षण  के  लिए
गढ़  लिए  गए  नए  बहाने
शक्ति-प्रदर्शन  के  लिए
फिर  तलाश  लिए  गए
नए  तेल-क्षेत्र 
मुनाफ़ाखोर ख़ोर  व्यापारियों  की  मंशा  के  अनुरूप

दिल्ली  से  दमिश्क  तक
दलालों  के  तथा-कथित  समर्थन  के  दम  पर
कब  तक  सहेंगे  दुनिया  के  ग़रीब  लोग
सुनियोजित,  सु-संगठित   'मानवता  के  रक्षकों'  के  आतंक  ?
 दुखद  समाचार  है  वॉशिंगटन  के  लिए
मौत  की  पूर्व-सूचना  है
अमेरिका  के  चारण-भांडों  के  लिए
कि  इतना  आसान  नहीं  होगा  अब
झूठ  के  दम  पर  किसी  अन्य  ईराक़  को  गढ़ना
इतना  आसान   नहीं  होगा
तेल  के  भावों  को  मनमर्ज़ी  से
चढ़ाना-गिराना….

अबकी  बार 
सिर्फ़  अर्थ-व्यवस्था  ही  नहीं  बदलेगी
बदल  जाएंगे  भूगोल
दिल्ली  से  दमिश्क  तक  !

                                                              ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

*





सोमवार, 2 सितंबर 2013

बचो अमेरिकी चालों से, मूर्खों !

संसार  का  ठेका  ले  रखा  है
अमेरिका  ने  !

सीरिया  में  किसने  क्या  खाया
तुर्की  में  किसने  क्या  पिया
सऊदी  अरब  में  किसको  छींक  आई
भारत  ने  किससे  क्या  ख़रीदा
सब  का  हिसाब  चाहिए  अंकल  सैम  को…

आख़िर  किसने  बनाया  चौधरी  अमेरिका  को
सारी  दुनिया  का ?

अब  भी  समय  है
अपने-आप  को  स्वतंत्र,  स्वायत्त,  संप्रभु  देश
मानने  वाले
प्रबंध  कर  लें  अपनी  आज़ादी  बचाने  का

बचो,  अमेरिकी  चालों  से
मूर्खों  !

                                                                  ( 2013 )

                                                             -सुरेश  स्वप्निल 




रविवार, 1 सितंबर 2013

डर नहीं लगता आपको ?

आपको  डर  नहीं  लगता
तरह-तरह  की  दाढ़ी  वाले
बाबा,  संत,  महंतों  और  मौलानाओं  से

क्या  आपको  डर  नहीं  लगता
गाँधी-टोपी,  काली  टोपी  या   लाल
या  किसी  अन्य  रंग  की  टोपी  वाले
नेताओं  और  उनके  समर्थकों  से

क्या  लाल, पीली, नीली  बत्तियों  वाली
गाड़ियों  से  भी
डर  नहीं  लगता  आपको ????

यदि  सचमुच  आपको
इन  तरह-तरह  की  पहचान  वाले
अधि-मानवों  से  डर  नहीं  लगता
तो  वाक़ई  आप  बहादुर  भारतीय  हैं …

                                                    ( 2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल


शनिवार, 31 अगस्त 2013

नाश होगा पूंजीवाद का

अमेरिका  में  हवा  चलती  है
रुपया  गिर  जाता  है
अमेरिका  में  हवा  नहीं  चलती
रुपया  गिर  जाता  है
अमेरिका  में  सर्दी, गर्मी, बरसात …
कोई  भी  मौसम  आए  या  जाए
रुपया  गिर-गिर  पड़ता  है…

जब-जब  रुपया  ग़ोता  लगाता  है
निवेशक  ख़ुश  होते  हैं
टाटा-बिरला-अम्बानी-अडानी-नारायण  मूर्ति
सब  के  सब  जश्न  मनाते  हैं
प्रधानमंत्री  को  'मिठाई'  भेजते  हैं
और  सारे  दलों  को  चुनाव  के  लिए  चंदा …

वाह !  क्या  शानदार  लोकतंत्र  है
जहां  संसद  में  चिंता  होती  है
और  नेताओं  के  घर  में  जश्न…

चुनाव  हालांकि  बहुत  दूर  हैं  अभी
शायद  कई  बरस  या  दशक  दूर
मगर  जनता  का  धैर्य  चुकने  लगा  है

जिस  दिन  धैर्य  टूट  गया  अवाम  का
उस  दिन
किसी  को  नहीं  पता
कि  अमेरिका  की  नौकरी  बजाने  वाले
पूंजीपतियों  की  दलाली  करने  वाले
नेता-अभिनेता-डाकू-तस्करों-अफ़सरों  का
क्या  हाल  करेंगे  लोग…

अवाम  को  कमज़ोर  मत  समझो
जिस  दिन  अवाम  सर  उठाएगी
उस  दिन  दुनिया  की  तमाम  सरकारें
और  उनके  दलाल
भीख  मांगते  फिरेंगे  जान-माल  की

जिस  दिन  रुपया  अपनी  पर  आएगा
उस  दिन
डॉलर,  पौंड,  दीनार  और  दिरहम
सब  धूल  चाटते  नज़र  आएंगे

उस  दिन  नाश  होगा  पूंजीवाद  का
आर्थिक  आतंकवाद  और  उपनिवेश वाद  का…

वह  दिन  चाहे  जितना  दूर  लगे
बेहद  पास  है !

                                                                     ( 2013 )

                                                             -सुरेश  स्वप्निल 


मंगलवार, 27 अगस्त 2013

बस, हमारा कन्हैया !

हमें  चाहिए
बस,  हमारा  कन्हैया !

ज़रा  सांवला
मेघ  जैसा  सुयाचित
नयन  सूर्य  के  तेज  से  जगमगाते
वदन  चन्द्रमा  ज्यों
शरद  पूर्णिमा  का
स्निग्ध  स्नेह-अमृत  से
पूरित-प्रकशित…

बड़ी  देर  से  हम  उसे  ढूंढते  हैं
कहां  है,  कहां  है
हमारा  कन्हैया ???

बड़ा  प्यारा-प्यारा
सभी  का  दुलारा
यशोदा  की  आंखों  का  तारा  कन्हैया !

ज़रा  अपने  आंगन  में  उठ  कर  तो  आओ
वो  देखो,  वो  देखो
मचलता,  ठिठकता,  कभी  डगमगाता
न  जाने  कहां  से  ये  माखन  चुरा  के
हथेली  से  मुख  तक  सभी  अंग  साने
बड़े  ढीठपन  से
कभी  खिलखिलाता,  कभी  मुस्कुराता
चला  आ  रहा  है
हृदय  का  सहारा
हमारा  कन्हैया !

कोई  उसका  मुख,  हाथ-पांव  धुलाओ
ये  घुंघराली  अलकें  सहेजो-संवारो
मुकुट  मोरपंखी  धरो  शीश  पर
एक  छोटी  सी  दिठिया  लगाओ
फिर  हाथों  में  स्वर-धन्य  बंसी  थमाओ ….

ज़रा  यूं  सजाओ
कि  जब  वो  प्रकट  हो
तो  कहने  लगें
वृन्द-कानन  के  वासी
यही  है,  यही  है
हमारा  कन्हैया  !

हमारा  कन्हैया
तुम्हारा  कन्हैया  !

                                                       ( 2013 )

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 


सोमवार, 26 अगस्त 2013

आज है जन्माष्टमी !

आज  है  जन्माष्टमी !

श्रीकृष्ण-मंदिर  में
अर्द्ध-रात्रि  के  समय
होनी  है  पूजा
कराएंगे  पंडित जी !

जलेगी  अगरबत्ती
मंत्र  पढ़े  जाएंगे
घंटा-ध्वनि  होगी
फिर  शंख  भी  बजेगा
बजाएंगे  पंडित  जी !

नगर  की  कुमारियां
होंगी  एकत्र  वहां
गाएंगी  सोहर, और
नाचेंगी  घूमर 
नचाएंगे  पंडित  जी !

कृष्ण-प्रेम  विह्वल
किसी  कन्या  का
अंग  कोई
भूल  से  उघड़े
खिल  जाएंगे  पंडित जी !

और  कोई  सु-कुमारी
राधा  बन  आएगी
दधि-माखन  लाएगी
चीर  बेचारी  का
उड़ाएंगे  पंडित  जी !

आदत  तो  आदत  है
जा  सकती  है  भला ?
रात  में  टांगों  में
तकिया  दबा  कर
सो  पाएंगे  पंडित  जी !

                                     ( 1977 )

                            -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'देशबंधु', भोपाल ( 1977 ), 'अंतर्यात्रा' ( 1983 ) एवं अन्यत्र।

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

पुलिस सर्वशक्तिमान है !

कल  रात
सपने  में  आई  थी  पुलिस
और  छीन  ले  गई
अभिव्यक्ति  की   स्वतंत्रता

डंडे  मार-मार  कर
झड़ा  दिए  सारे  शब्द
खुरच-खुरच  कर
मिटा  गई  राजनैतिक  समझ
लूट  ले  गई
वैचारिक  चेतना  …


यह  जानते  हुए  भी
कि  यह  मौलिक  अधिकार  है
भारतीय  संविधान  में  …

मगर  पुलिस  को  कौन  समझा  सकता  है
सही  और  ग़लत  का  फ़र्क़
कौन  सिखा  सकता  है
मानवीय  व्यवहार ?

पुलिस  सर्वशक्तिमान  है
जब  तक  उसके  शरीर  पर
चिपकी  हुई  है
ख़ाकी  वर्दी
और  हाथ  में  है  डंडा !

शुक्र  है  कि  यह
स्वप्न  ही  था
बेहद  डरावना  …

मगर  यह  दु:स्वप्न
सत्य  में  बदल  सकता  है
किसी  भी  दिन  …

यह  भारत  है
मानवाधिकार  के  रखवालों !

                                           ( 2013 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल




शनिवार, 27 जुलाई 2013

विश्वास आम आदमी का !

बहुत  देर  से   ढूंढ  रहा  हूं
सारी  दिल्ली  छान  ली
कहीं  भी  मुझे  खाना  नहीं  मिला
एक,  पांच  या  बारह  रुपये  में  !

सरकार  क्या  यह  भी  नहीं  जानती
कि  खाना  खाना  बुनियादी  ज़रूरत  है
मनुष्य  की
और  निस्संदेह,  यह  परिहास  का
विषय  नहीं  है

और  क्या  सरकार
यह  भी  नहीं  जानती
कि  उसके  पास
नाम-मात्र  का  भी  समय  नहीं  है
सत्ता  के  मार्ग  पर
वापसी  का  ?

अब  एक  भी  भूल
सारी  संभावनाएं  नष्ट  कर  देगी
तुम्हारी
और  तुम्हारी  आने  वाली
कई  पुश्तों  की !

कैसे  मूर्ख  हो  तुम
इतना  भी  नहीं  जानते
कि  तुमने 
खो  दिया  है  विश्वास
आम  आदमी  का  !

                                         ( 2013 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल 


बुधवार, 24 जुलाई 2013

झूठ बोल रहे हैं प्रधानमंत्री

मैं  अमीर  हूं
क्योंकि  मैं  सौ  रुपये  प्रतिदिन  कमाता  हूं

मैं  अमीर  हूं
क्योंकि  मेरे  प्रधानमंत्री  कहते  हैं

सौ  रुपये  प्रतिदिन  में
क्या-क्या  करता  हूं
मेरे  घर  में  तीन  मोबाइल  फ़ोन  हैं
उन्हें  रिचार्ज  कराना
घर  में  फ़्रिज  है,  टी. वी.  है,  कंप्यूटर  है
पंखा  है,  तीन  बल्ब  हैं
उन  सबका  बिजली  का  बिल  जमा  करना
बेटी  निजी  स्कूल  में  पढ़ती  है
उसकी  पढ़ाई  और  बस  की  फ़ीस  चुकाना

सौ  रुपये  प्रति  लीटर  का
खाने  का  तेल
तीन  सौ  रुपये  प्रति  किलो  की
चाय  की  पत्ती
पचास  रुपये  प्रति  लीटर  का  दूध ….

आपको  आश्चर्य  हो  रहा  है  न  !
इतना  सब  करने  के  बाद
हम  तीन  प्राणी  खाना  भी  खाते  हैं
दोनों  समय
मकान  का  किराया  देते  हैं
दो  फ़िल्में  भी  देखते  हैं
तीज-त्यौहार  पर  नए  कपड़े  बनवाते  हैं
मेहमानों  की  आव-भगत  भी  करते  हैं …

मैं  यह  सब  करता  हूं
सौ  रुपये  प्रतिदिन  की  कमाई  में
क्योंकि  मैं  अमीर  हूं !

झूठ  बोल  रहे  हैं  प्रधानमंत्री
या  झूठ  बोल  रहा  है  सारा  देश !

                                                   ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल 


सोमवार, 22 जुलाई 2013

यह कैसा संविधान ?

देश  में  अब
भेड़िया-तंत्र  चाहते  हैं
सियार !

वर्ण-संकर  कुत्तों  की  सरकार
बहुत  चल  चुकी
शेर  विलुप्त  हो  चुके
वन-प्रांतर  से
हाथी  शाकाहारी  हैं  अब  भी

विकट  समय  है  !
समस्या  यह
कि  सुरक्षा  कौन  करेगा
देश  की  ?

मुर्दाख़ोर  कबरबिज्जू
लाशें  खोद-खोद  कर
ख़ाली  कर  चुके
क़ब्रस्तान
और  अब
दृष्टि  लगाए  बैठे  हैं
जीवित  मनुष्यों  पर  !

विडम्बना  यह  कि
सारी  समृद्धि  लूट  कर
बैंक-खातों  में  जमा  कर  चुके
यही  मुर्दाख़ोर  कबरबिज्जू
वित्त  जुटा  रहे  हैं
भेड़िये  के  राज्यारोहण  के  लिए...

उफ़ !  यह  कैसा  संविधान  है
इस  देश  का
जहां  केवल  मनुष्यभक्षी  ही
पा  सकते  हैं  सत्ता !!!!! ?????

                                        ( 2013 )

                                  -सुरेश  स्वप्निल




गुरुवार, 18 जुलाई 2013

तुम्हारे बच्चे नहीं थे न !

वे  जो  मार   डाले  गए
ज़हर  मिला  खाना  खिला  कर
वे  तुम्हारे  बच्चे  नहीं  थे  न  !

वे  तो  मनुष्य  भी  नहीं  थे  शायद
सड़े-गले  जानवरों  का  मांस
और  तुम्हारी  जूठन  पर
जीवित  रहने  वाले
चूहे  खाने  वाले
मुसहर  कहीं  के  !

तुम्हारी  कृपा  न  होती
तो  जान  पाते  क्या  वे
गेहूं  की  रोटी
और  अरहर  की  दाल  का  स्वाद  ?

हम  भी  कितने  कृतघ्न  हैं
कि  संदेह  कर  रहे  हैं
तुम्हारी  दयालुता  पर  !

अच्छा,  जो  बच्चे  मर  गए
एक  समय  के  भोजन  के  लालच  में
वे  जीवित  रहते  तो  क्या  करते  ?
अंततः,  बंधुआ  ही  तो  बनते  तुम्हारे  !

अच्छा  हुआ
जो  मार डाला  तुमने
ज़हर  खिला  कर
मुक्त  तो  हुए
जीवन-भर  की  दरिद्रता
और  रोज़ी-रोटी  की  चिंता  से  !

जो  कुछ  भी  हुआ
अच्छा  ही  हुआ
वे  क्या  पढ़-लिख  कर
प्रधानमंत्री  बन  जाते  !

मत  रोओ  उनके  नाम  पर
महा मूर्खों !

                                           ( 2013 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल


बुधवार, 17 जुलाई 2013

दो-टके के भिखारी !

हम  'प्रजा'  नहीं  किसी  की
न  तुम  राजा  या  सम्राट  हमारे
हम  हैं  'लोक'
संप्रभु,  स्वायत्त  नागरिक  !

हम  पर  'राज'  करने  के  सपने
मत  देखो,  मूर्खाधिराज !
सिर्फ़  'सेवक'  हो  तुम  हमारे
वेतन-प्राप्त  करने  वाले
पांच  वर्ष  की संविदा  पर  नियुक्त
साधारण  कर्मचारी  !

संविदा  समाप्त
तुम्हारी  नौकरी  भी  समाप्त  !

अगली  बार
हमारा  'मत'  मांगने  आओ
तो  ध्यान  रखना
अगली  बार  तुम्हारे  वचन-भंग
तो  तुम्हारा  छत्र  भी  भंग !

जाओ,  ज़्यादा  शोर  मत  करो
दो  टके  के  भिखारी
मक्कारों !
बहुत-से  काम  करने  हैं  हमें
तुम्हारा  दोज़ख़  भरने  को  भी  !

                                           ( 2013 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल






मंगलवार, 16 जुलाई 2013

क्या कर लेंगे आप ?

मैं / जली-कटी  सुनाने  का  आदी  हूं !
चीखूंगा-चिल्लाऊंगा / सबको  दूंगा  अभिशाप
मेरा  क्या  कर  लेंगे  आप ?
पहले  दीपक  को  गाली  दी  थी
अब  सूरज  को  दूंगा / आप  रोकेंगे  मुझे ?
हिम्मत  है  तो  आ  जाइए / अपनी  मर्दानगी  आज़माइए
कम  से  कम/ चुप  तो  नहीं  कर  सकेंगे  मुझे  आप !
यह  तो / आपकी  ही  नज़रों  में  अवैध  है
बोलने  की  आज़ादी / दी  है  हमें / शायद / आपको  इसका  खेद  है
तो  छीन  लीजिए  यह  आज़ादी  भी /-
और  अपनी  मां  के  गटर  में / डाल  आइए  !
लेकिन / खाने-पीने  और  कमाने  से  वञ्चित  आदमी  का /
खुला  हुआ  मुंह
गालियां नहीं / तो  क्या / तुलसी  के  भजन  सुनाएगा ?

ग़रीबों  का  सूखता  लहू / एक  दिन / रंग  लाएगा।
क्या  तुम / क़यामत  के  उस  दिन  के  लिए / तैयार  हो ?

नफ़रत  की  आग / बुरी  होती  है / मेरे  यार ! / जल  जाओगे।
हमें  छुओ / हमें  जानो / हमारे  क़रीब  आओ
हमारे  दुःख-सुख  में / हाथ  बंटाओ / तो  जी  सकोगे।
वरना / याद  रखना- यार / वक़्त  के  सर  से / जब  पानी  गुज़र  जाएगा
तुम्हारे  अस्तित्व  का / कोई  भी  चिह्न / नहीं  नज़र  आएगा।

मेरी  आवाज़ / वक़्त  की  तरफ़  से / चेतावनी  है  तुम्हें
सुनो  न  सुनो / तुम्हारी  मर्ज़ी !
फिर  भी / मैं/ चीखूंगा-चिल्लाऊंगा / सबको  दूंगा  अभिशाप
मेरा  क्या  कर  लेंगे  आप ?

                                                                                                ( 1976 )

                                                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'देशबंधु', भोपाल, 1976, 'अंतर्यात्रा'-13, 1983 एवं अन्यत्र। पुनः प्रकाशन  हेतु उपलब्ध।

सोमवार, 15 जुलाई 2013

तुम्हारा भावी राजाधिराज !

नमो-नमो !

इस  चेहरे  को  ध्यान  से  देखो
इसके  काया-कल्प  में
एक  सौ  पचास  करोड़  रुपये
ख़र्च  हो  गए
पूंजीपतियों  के  !

नमो-नमो  !

इस  चेहरे  को  और  ध्यान  से  देखो
सो  कर  उठने  से  लेकर
दर्शकों  के  सामने  लाने  तक
दर्ज़न-भर  दास-दासियां
लगे  रहते  हैं
घंटों  तक !

नमो-नमो  !

कुछ  और  ध्यान  से  देखो
इस  चेहरे  को
अभी  कुछ  देर  में
रक्त  छलकने  लगेगा  इसकी  आंखों  में
मुंह  से  बाहर  निकल  आएंगे
कुछ  दांत
निर्दोष  मनुष्यों  के
रक्त  से  सने

नमो-नमो  !

यह  मनुष्य  है  या  भेड़िया
या  आधा  मनुष्य  है
और  आधा  भेड़िया ...
यह  जो  कुछ  भी  है
यह  तुम  तय  करो
मगर  यह  तुम्हें  कुत्ते  का  पिल्ला
कहता  है !

नमो-नमो  !

इसे  स्वीकार  करो
मूर्ख  जनता !
यह  मनुष्य  हो  या  पशु
देव  हो  या  दानव
यही  है  तुम्हारा  मुक्तिदाता
तुम्हारा  भावी  राजाधिराज  !

नमो-नमो
नमो-नमो !

                                      ( 2013 )

                              -सुरेश  स्वप्निल 

 


शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

क्रांति के बाद !

दुर्भाग्य  यह  है  कि  जनता
सब  कुछ  याद  रखती  है
कई-कई  शताब्दियों
और  पीढ़ियों  के
गुज़र  जाने  के  बाद  भी

दुर्भाग्य  यह  भी  है
कि  जनता
अक्सर  विरोध  नहीं  करती
शासकों  का

मगर  सबसे  बड़ा  दुर्भाग्य
यह  है  कि
जनता  जब  उठ  खड़ी  होती  है
विद्रोह  के  लिए
तो  बड़े  से  बड़े  साम्राज्य  भी
मिल  जाते  हैं
धूल  में !

और  शासकों  को  यह  समझ  में
आता  तो  है,
मगर  क्रांति  के  बाद !

                                                     ( 2013 )


                                            -सुरेश  स्वप्निल


गुरुवार, 11 जुलाई 2013

शब्दों का समुचित मूल्य !

बहुत-से  शब्द  थे
स्मृति  की  पोटली  में
लगभग  अनगिनत
एक-एक  कर  झिर  गए
जीवन  के  पथ  पर ...

जाने  कब-कहां  छेद  हो  गया !

मैंने  तो
बहुत  सावधानी  से  सहेज  रखी  थी
शब्दों  की  पोटली
अपने  कंधे  पर !

मुझे  पता  नहीं
कि  संसार  के  किस  बाज़ार  में
बिकते  हैं  शब्द
कौन  चोर  ऐसा  हो  सकता  है
जिसे
दूसरे  के  शब्द  चाहिए
जीवन-यापन  के  लिए !
कौन  ग्राहक  होगा  इतना  समृद्ध
कि  चुका  सके
शब्दों  का  समुचित  मूल्य !

यह  भी  संभव  है
कि  सचमुच
मेरी  ही  असावधानी  से
फट  गई  हो  पोटली !


मेरे  शब्द
किसी  के  भी  काम  के  नहीं  हैं
यथार्थतः
और  वस्तुतः
केवल  अपने  ही  शब्द  हैं
जो  पार  करा  सकते  हैं
वैतरणी  जीवन  की !

जो  भी  हो
यदि  आप  में  से  किसी  को
मिले  हों  मेरे  शब्द
तो  लौटा  दें,  कृपया !
मेरा  पता  है ......

                                                ( 2013 )

                                        -सुरेश  स्वप्निल


शनिवार, 6 जुलाई 2013

सभ्य-जनों, सुनो !

अपने-अपने  घरौंदों  में  दुबके  हुए
शांति-प्रेमी  देश-भक्त  नागरिकों,  सुनो
सुनो  सभी
सुसंस्कृत,  सुशिक्षित
सभ्य-जनों,  सुनो
सुनो  हे  जन-गण-मन  गायकों
क़ानून  के  पालनहारो,  सुनो

सुनो,  क्योंकि  तुम
केवल  सुनना  ही  जानते  हो
तुम  रेडियो  सुनते  हो
और  सच  मान  लेते  हो
टी . वी .  देखते  हो
और  सच  मान  लेते  हो
अख़बार  पढ़ते  हो  और  छपे  हुए
हर  शब्द  को 
अकाट्य  प्रमाण  मान  लेते  हो ....

तुम्हें  केवल  मानना  ही  आता  है
प्रश्न  करना  तो  कब  का  भूल  चुके  हो  तुम
हर  कोई  ईश्वर  बन  जाता  है  तुम्हारा
यहां  तक  कि  नून-तेल-लकड़ी  बेचने  वाला  भी
और  शक्कर  से  मधुमेह  का
उपचार  करने  वाला  भी ....

जब  तुम्हारी  आंखों  के  आगे
सड़क  पर  पड़ी
घायल  महिला 
दम  तोड़  रही  होती  है
तब  तुम  बहरे  हो  जाते  हो
जब  तुम्हारे  विधर्मी  पड़ोसी  का  घर
आग  के  हवाले  कर  दिया  जाता  है
तुम  आंखों  पर  हाथ  रख  कर
अंधे  बन  जाते  हो
जब  कोई  अत्याचार  का  शिकार
न्याय  की  लड़ाई  में
तुम्हें  गवाह  बनाना  चाहता  है
तुम  गूंगे  हो  जाते  हो

जब  सत्ताधीश  और  पूंजीपतियों  की  सम्मिलित  सेनाएं
तुम्हारी  आने  वाली  पीढ़ियों  के  लिए
जीवित  रहने  के  सारे  मार्ग  बंद  कर  रही  होती  हैं
तुम  अंधे-बहरे-गूंगे
और  लंगड़े-लूले  बन  कर
समर्पण  कर  देते  हो ....

तुम  इसी  योग्य  हो
कि  बीच  सड़क  पर  रौंद  दिए  जाओ
और  दफ़न  हो  जाओ  एक  मृत  राष्ट्र  की  भांति

अब  कभी  जनपथ  पर
मत  आना  न्याय  की  पुकार  लगाने !
                               
                                                                  ( 2013 )

                                                           -सुरेश  स्वप्निल


गुरुवार, 4 जुलाई 2013

भेदने होंगे सारे चक्रव्यूह

शासकों  का 
हृदय-परिवर्त्तन  नहीं  होता
परिवर्त्तन  चाहिए
तो  मौन  असंतोष  से
कुछ  नहीं  होगा
और  न  छिट-पुट  विप्लवों  से

उखाड़  कर  फेंकने  होंगे
साम्राज्यों  के  स्मृति-चिह्न
तोड़ने  होंगे  सत्ताधारियों  के 
सारे  तिलिस्म
ध्वस्त  करने  होंगे
शत्रुओं  के  सुरक्षा-कवच
भेदने  होंगे
सारे  चक्रव्यूह
फाड़  कर  फेंकनी  होंगी  ध्वजाएं
गढ़ने  होंगे  नए  प्रतीक
और  प्रतिमान
तत्पर  रहना  होगा
किसी  भी  क्षण
बलिदान  के  लिए ....

क्रांति
कोई  बच्चों  का  खेल  नहीं  है !

                                                      ( 2013 )

                                               -सुरेश  स्वप्निल


मंगलवार, 2 जुलाई 2013

पता नहीं कब...

आपदा  मेरी  नहीं  थी
मैंने  वे  हिमखण्ड  नहीं  देखे
जो  धरती  का  तापमान  बढ़ने  पर
पिघल  गए
वे  पर्वत  भी  नहीं  देखे  मैंने
जहां  मेघ  फटे
और  बहा  ले  गए  गांव  के  गांव

जो  लोग  अदृश्य  हो  गए
भागीरथी-अलकनंदा  के  प्रवाह  में
उनमें  संभवतः  कोई  भी
परिचित  नहीं  था  मेरा

मगर  मैं  क्या  करूं
इतने  सारे  शव
और  भय  से  कांपते  मनुष्य,
पशु-पक्षी  और  पेड़-पौधे  देख  कर
संभवतः  उन्मादी  हो  गया  हूं  मैं
कोई  तर्क,  कोई  धारणा  मेरे  काम  नहीं  आते
कोई  अदृश्य  शक्ति  मुझे
सांत्वना  नहीं  दे  पाती
कोई  ईश्वर  तैयार  नहीं  कारण  समझाने  को ....

मुझे  पता  नहीं  कि  कब  तक
नींद  नहीं  आएगी  मुझे
पता  नहीं  कब  तक
वे  अपरिचित  चेहरे
भय  और  दुःख   में  डूबे  हुए
रुलाते  रहेंगे  मुझे

पता  नहीं  कब
मैं  लिख  पाऊंगा
नई  कविता  !

                                                 ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल




रविवार, 23 जून 2013

बोलते क्यों नहीं ? !

त्रासदी  यदि  वैयक्तिक  हो
तो  स्वयं  भुक्त-भोगी  भी  भूल  जाता  है
थोड़े-बहुत  समय   के  बाद
किंतु  इतनी  बड़ी,
सामूहिक  त्रासदी  ....

असंभव  है  कि  कोई  भूल  पाए !

क्या  कोई  भूल  सकता  है
बंगाल  का  दुर्भिक्ष
या  बर्मा  का  प्लेग
या,  भोपाल  गैस-त्रासदी ?

निश्चय  ही,
कई  शताब्दियों  तक
कई-कई  पीढ़ियों  तक
दोहराती  रहेंगी  केदारनाथ  का  जल-प्रलय
प्रकृति  के  भयंकर  प्रतिशोध
और  इस  त्रासदी  के  लिए  उत्तरदायी
व्यक्तियों  और  अ-नीतियों  की  महा-गाथाएं ...

आप  सुन  रहे  हैं
समझ  रहे  हैं  न ?

तो  कुछ  बोलते  क्यों  नहीं ? !

                                                          ( 2013 )

                                                   -सुरेश  स्वप्निल 




शनिवार, 22 जून 2013

अगले रण में जीतेगी जनता !

एक  सीधा-सपाट  बयान  है  यह
तुम्हारे  तथाकथित 
लोकतंत्र  के  अंतिम  छोर  पर  बैठे
आम  आदमी  का
वही  जिसके  नाम  पर
तुम्हारी  निर्बाध, निरंकुश  सत्ता  का  जाल
फैला  हुआ  है
पृथ्वी  से  आकाश  तक…

सुनो,  तानाशाह  !
हमने  अगर  चुना  भी  था  तुम्हें
तो  इसलिए 
कि  तुम्हारे  शब्द  और  वस्त्र
मनुष्यों  की  भांति  दीखते  थे
कि  तुम  वही  भाषा  बोल  रहे  थे
जो  सुनना  चाहते  थे  हम,
इस  लोकतंत्रात्मक  देश  के  असली  मालिक
हम  जो  चाहते  थे  कि
हमारा  प्रतिनिधि  हमारी  बात  सुने,
समझे  और  उसके  अनुरूप
नीतियां  बना  सके
और  नीतियों  को  कार्य-रूप  में
परिणत  कर  सके

हम  छले  गए
तुम  और  तुम्हारे  क्रीत  प्रचार-तंत्र  के  हाथों

तुमने  अपने  हर  वचन  को  भंग  किया
हर  वादे  को  तोड़ा
हर  बात  से  मुकर  गए
और  सेवक  से  अचानक  मालिक  बन  गए !

तुम  यह  भूल  गए
अत्यंत  सुविधाजनक  रूप  से
कि  यह
संसार  की  सबसे  विशाल  जनसंख्या  है
जिसने  हर  उस  तानाशाह  को
शिकस्त  दी  है
जिसके  राज  में  किम्वदंती  थी
सूरज  के  नहीं  डूबने  की ....

तुम  यदि  नहीं  जानते  तो  सुन  लो
तुम्हारा  सूर्यास्त  होने  को  है
कुछ  ही  क्षण  बाद ....

कल 
जब  तुम्हारी  अजेय  सेना
थके-हारे  क़दमों  से  लौटेगी
अपने  शिविर  में
तो  किस  तरह  तैयार  करोगे  उसे
अगले  रण  के  लिए ?

तुम  हार  गए,  तानाशाह !
स्वयं  अपनी  ही  ग़लतियों  से !

अगले  रण  में
जीतेगी  जनता
सिर्फ़  और  सिर्फ़  जनता !

                                                    ( 2013 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल 





शुक्रवार, 21 जून 2013

बाढ़: कुछ दृश्य

           एक 

रात-दिन  चल  रहे  हैं 
राहत  और  बचाव  के  प्रयास 

उड़  रहे  हैं  हेलिकॉप्टर 
भोजन  और  पानी  के  पैकेट 
गिराते  हुए 
लाशों  के  ढेरों  पर… 

जीवित  बचे  हुए 
भटक  रहे  हैं 
अबूझ  जंगलों  में 
जीवन  और  मृत्यु  दोनों  को 
छलते  हुए ....!

पता  नहीं 
पहुंच  भी  पाएंगे  
या  नहीं 
राहत  शिविरों  तक  !


                दो

दिल्ली  में  सब  के  सब 
चिंता-मग्न  हैं  
बाढ़  से  निबटने  के  तरीक़े 
ढूंढने  में 

केदारनाथ  में  गिद्ध  मंडरा  रहे  हैं 
नई-नई  लाशों  के  प्रकट  होने  की 
प्रतीक्षा  में  !


            तीन

कौन  कह  सकता  है  कि  कल  गंगा 
प्रतिगामिनी  हो  कर 
रायसीना  हिल्स और  लुट्येंस  ज़ोन  तक 
नहीं  पहुंचेगी  ?

कौन  कह  सकता  है  कि  दिल्ली 
नहीं  उजड़ेगी  फिर  से 
दस  से  अधिक  तीव्रता  के  
भूकंप  से  ?

क्षण-क्षण  मृत्यु  की  ओर 
बढ़ती  हुई 
राजधानी  के  लोग 
इतने  निश्चिंत  कैसे  हो  सकते  हैं 
उत्तराखंड  की  हालत 
देखने  के  बाद ?


                    चार 

देखते-देखते  
श्मशान  में  बदल  गए 
चार  सौ  गांव 

देखते-देखते 
मृत्यु  का  ग्रास  बन  गए 
हज़ारों  जीवित  मनुष्य 
पशु-पक्षी  और  पेड़-पौधे 
निरंतर  चेतावनियों  के  बावजूद ....

शर्म  से  मरे  नहीं  अब  तक 
बाढ़  को 
बस्तियों  तक  
लाने  वाले  !

                                                   ( 2013 )

                                           -सुरेश  स्वप्निल


बुधवार, 19 जून 2013

इन डरावनी उपत्यकाओं में....

मिट्टी  के  इन  ढूहों  को
ध्यान  से  देखिए
इन्हीं  में  कहीं  दबा  है
एक  शहर !

विध्वंस  की  महागाथा  छिपी  है
इन्हीं  टीलों  में  कहीं
आत्म-विनाश  की  प्रवृत्ति  के  प्रमाण
आत्म-घाती  विकास  की  अवधारणाएं
मनुष्य  के  अ-मनुष्य  होते  जाने
और  मूल्यों  के  पतन  की  कहानियां ....

यहीं  कहीं  दबे  पड़े  हैं
गर्वोन्नत  सभ्यता 
और  तथाकथित  महानतम  संस्कृति  के
नष्टप्राय  अवशेष ....!

प्रकृति  तो  बार-बार  चेताती  थी
हम  ही  अनसुना  करते  रहे ....

अंततः,  क्या  ढूंढने  आए  हैं  हम
इन  डरावनी  उपत्यकाओं  में  ?

                                                       ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल 


मंगलवार, 18 जून 2013

नदी का मार्ग मत रोको !

नदी  का  मार्ग  मत  रोको
उसे  आता  है
मार्ग  की  हर  बाधा  को  हटाना
और  नए  मार्ग  की  खोज  करना

नदी  का  मार्ग  मत  रोको
उसे  पता  है  कहां-कहां  सूराख़  हैं
तुम्हारी  योजनाओं  में
और  कितना  मैल  जमा  है
तुम्हारे  मन-मस्तिष्क  की  तलहटी  में

नदी  यूं  ही  नहीं  बहती  आ  रही  सदियों  से
वह  तुम्हारी  हर  चाल  से  परिचित  है
और  जानती  है
जीतने  के  सारे  गुर

नदी  से  बैर  मत  लो
वह  बहुत  शक्तिशाली  है  तुमसे

नदी  का  मार्ग  मत  रोको
उसे  बहना  आता  है
और   बहा  ले  जाना  भी  !

                                                           ( 2013 )

                                                    -सुरेश  स्वप्निल


रविवार, 16 जून 2013

शाह कियो बदजात !

( जनाब कलीम 'अव्वल' साहब की ख़िदमत में, बेहद ख़ुलूस और एहतराम के साथ )

                             दोहे
अल्लह   दीन्ही    आतमा    नजर  नवाजी  पीर
औरन    कोऊ    होइये    अपनो    शाह    कबीर

अंतर  बिच   झगड़ा  भया   को  जेठौ  को  छोट
मन  मूरख  अड़ियल  भया  आतम  काढ़े  खोट

जग  को  का  समझाइये    सब  मूरख  के  यार
का   कहिबो   का   बूझिबो   भै   जूतम    पैजार

साहिब    मेरौ    बावरो    दीन्हो    ज्ञान   लुटाय
जाकी    जेती    गाठरी   बांधि-बांधि   लै   जाय

काटि   कलेजा   लै   चले   का  खंजर  का  बात
कौन पाप कीन्हो  मुलुक  शाह  कियो  बदजात

साहिब   हम   मुरदा   भए   ठटरी   बांधो  कोय
माटी   की   पुतली   मुई   धाड़-धाड़  जग  रोय !

                                                               ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल


जंगल: दो कविताएं

जंगल: एक 


टूट  गया
शेर  और  भेड़िये  का 
गठबंधन !

इसमें  ख़ुश  होने-जैसी
कोई  बात  नहीं
ख़रगोशों !

वे  हिंस्र  थे
और  हिंस्र  ही  रहेंगे

वे  तो  अकेले  भी  बहुत  हैं
निरीह  शाकाहारियों  के  लिए !

जंगल: दो 

 

 क्रांतियां  मनुष्यों  की  बस्तियों  में
होती  हैं
मूर्ख  खरगोशो !

यहां,  जंगल  में
शेर  ख़त्म  भी  हो  गए  तो  क्या ?
चीते,  भालू,  भेड़िये
लकड़बग्घे  कम  हैं  क्या ?

तुम  जब  तक
छिपते  रहोगे  अपनी  मांदों  में
मारे  जाते  रहोगे
यूं  ही  बेमौत  !

ज़िंदा  रहना  चाहते  हो
तो  लड़ना
और  जीतना  सीखो।

                                                      ( 2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल 




शनिवार, 15 जून 2013

समय के विरुद्ध

कुछ  लोग
सदा  समय  के  पीछे  चले
अत्यंत  विनम्र,  मौन
चींटियों  की  भांति  पंक्ति-बद्ध
समय  की  जूठन  पर
जीते  हुए
और  भुला  दिए  गए
मरी  हुई  चींटियों  की  भांति

कुछ  लोग  समय  के  आगे-आगे
दौड़  लगाते  रहे
और  थक  कर
सो  गए  बीच  राह  में
और  कुचले   गए
समय  के  पांवों  के  नीचे

कुछ  लोग  जो  अधिक  बुद्धिमान  थे
समय  के  साथ-साथ  चले
शरणागत  हो  कर
मिमियाते  हुए 
और  मारे  गए
क्रांति  के  प्रथम  शिकार  हो  कर

लेकिन  कुछ  लोग  थे
जो  समय  के  विरुद्ध
लोहा  ले  कर  खड़े  थे
चुनौती  बन  कर
वे  लड़े
अपनी  पूरी  चेतना  और  वीरता  के  साथ
कुछ  खेत  रहे
कुछ  जीत  गए
कुछ  हार  गए ....

वे  सब  के  सब
इतिहास  में  अपनी  जगह  बना  गए
नायकों  के  रूप  में !

                                                                 ( 2013 )

                                                          -सुरेश  स्वप्निल 


बुधवार, 12 जून 2013

बनी रहे शांति

हां, हम  जानते  हैं  कि  तुम
संकट  में  हो
और  ज़रूरत  है  तुम्हें
समर्थन  की ....

हम  भले  पुरुष
मिट्टी  के  माधव
और  तो  क्या  करें
आशीष  देते  हैं  तुम्हें
चाहे  जितनी  भी  सहनी  पड़ें
हमारी  ज़्यादतियां
हमारी  मजबूरियां
कि  बनी  रहे  शांति
घर  और  समाज  में

क्योंकि  सहना
सिर्फ़  तुम्हें  ही  आता  है
लड़कियों !

                                                       ( 2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल


सोमवार, 10 जून 2013

सपने डर गए हैं

सपनों  को  क्या  हो  गया  है  ?
आँखों  से  चलते  हैं
और  उड़  कर
मोबाइल  टॉवर  पर  बैठ  जाते  हैं

शायद  सपनों  की  दुनिया  सिकुड़  गई  है
वे  नहीं  चाहते
कि  पंखों  को  तकलीफ़  हो
वे  शायद  उड़ना  ही  नहीं  चाहते
या  उड़ें  भी  तो  वहीं  तक
जहां  से  घोंसला  दिखाई  पड़ता  हो ....

सपने  डर  गए  हैं
वैज्ञानिकों  के  बयानों  से
कहा  जाता  है  कि  सपनों  की
प्रजनन-क्षमता
कम  हो  गई  है
लगभग  शून्य  के  बराबर !

क्या  सपनों  की  सभी  प्रजातियां
नष्ट  हो  जाएंगी
गौरैयों  की  तरह  ?

                                                   ( 2013 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल 


रविवार, 9 जून 2013

मैं बड़ा होने लगा !

मैंने  पहाड़  की  ऊंचाई  देखी
और  डर  गया
मैंने  समुद्र  की  गहराई  देखी
और  भी  डर  गया
मैंने  मरुस्थल  का  विस्तार  देखा
और  उसमें  चलती  धूल-भरी  आंधियां  भी
और  बहुत  ज़्यादा  डर  गया ...

एक-एक  कर  चुनौतियां  मेरे  सामने  आती  रहीं
और  मैं  हर  चुनौती  से  डरता  रहा

धीरे-धीरे  चुनौतियां  बड़ी  होती  गईं
और  मैं  उतना  ही  छोटा ...

जिस  दिन  मैंने  अपने  छोटे  होते  जाने  को
महसूस  किया
उसी  दिन
मैं  बड़ा  होने  लगा !

आज मुझे  पता  नहीं 
कि  चुनौती  शब्द
किस  भाषा  का  है !

शनिवार, 8 जून 2013

जंगलियों का देश

पता  नहीं  कि  कब
देश  हुआ  करता  था
सोने  की  चिड़िया ...
हमने  जो  समय  देखा  है  उसमें
सिर्फ़  बदहाली  ही  रही  है
नागरिकों  की  नियति !

कहते  तो  हैं  कि  लोकतंत्र  है  यहां
'लोक'  का  अर्थ  संभवतः  वही  होता  है
जो  कभी  शिकारी  के  लिए
शिकार  का  होता  था

हर  पांच  वर्ष  में  निकलती  हैं
हांका  लेकर
शिकारियों  की  टोलियां
और  मार  लाती  हैं
अगले  हांके  तक  के  लिए
पर्याप्त  जानवर !

जब  देश  जंगलों  और  जंगलियों  का  देश  था
तो  शायद  कहीं  बेहतर  था
जब  देश  जंगलों  और  जंगलियों  का  देश  था
तो  लोग 
और  शासन  चलाने  वाले
कहीं  ज़्यादा  मनुष्य  होते  थे ....

                                                               -( 2013 )

                                                         -सुरेश  स्वप्निल

शुक्रवार, 7 जून 2013

भेड़िये: तीन लघु कविताएं

भेड़िये : एक 

भेड़िये  को  सौंप  दी  गई  है 
जंगल  की  कमान 

खरगोशों !
सावधान  रहो 
बहुत  सोच-समझ  कर  
निकलना 
मांद  से !

 

भेड़िये : दो 

भेड़ियों  से  कहो 
हुआ-हुआ   न  करें 
अभी  से 

बहुत  दूर  हैं  अभी 
चुनाव !

भेड़िये : तीन

भेड़िये  बहुत  कम  हैं  
संख्या  में
और  भेड़ें  असंख्य 

दस-दस  भेड़ें  काफ़ी  हैं 
एक-एक  भेड़िये  के  लिए 

तो  टूट  पड़ो 
भेड़ों !
देर  किस  बात  की  है  ?

                                             ( 2013 )

                                       -सुरेश  स्वप्निल


बुधवार, 5 जून 2013

कोई सपूत सुनता है ? ? ?

विश्व  पर्यावरण  दिवस  पर  विशेष

रोती  है 
माँ  रोती  है 
देखो,  धरती  माँ  रोती  है !

" ओ!  कहां  गए  मेरे  प्यारे 
वे  छैल-छबीले  नौजवान 
गबरू  बेटे 
चौड़ी  छाती,  बांहें  विशाल 
आकाश  चूमते  
होनहार 
चिकने  पत्तों  से  सजे  भाल 
वह  ओक, अशोक 
वह  अमलताश 
सागौन,  गुरज 
शीशम,  अर्जुन 
कमरख़,  करंज 
कुचले,  कवत्थ .....
तुम  कहां  गए 
सब  कहां  गए ? !"

भटकी,  सहमी,  डरती-डरती  
आई  है  बेटी  मलयानिल 
कहती  है  धरती  मैया  के  कानों  
में सब- कुछ  रो-रो  कर ...
"कल  आई  कपूतों  की  सेना 
कुछ  यंत्र,  कुल्हाड़े  ले-ले  कर 
निष्ठुर,  निर्दय,  निर्मम  हो  कर 
पिल  पड़ी  अचानक  पेड़ों  पर 
यह  वहां  गिरा 
वह  यहां  गिरा 
पल-भर  में  सब-कुछ  हुआ  साफ़ 
बेचारे,  बेबस,  बे-ज़ुबान 
कट  गए  सभी  वे  निरपराध ...

कौए,  कोयल,  तीतर,  बटेर 
भैंसे,  भालू,  सारंग,  शेर 
चीखे,  गरजे,  फिर  हुए  मौन 
जंगल  की  पीड़ा  सुने  कौन  ?"

मलयानिल  लौट  गई  कब  की 
दिन,  रात,  महीने,  मौसम  भी 
आए,  ठहरे,  फिर  बीत  गए 
लेकिन  अब  भी  वह  रोती  है 
देखो,  धरती  माँ  रोती  है  !

सुनता  है 
कोई  सुनता  है 
कोई  सपूत  यह  सुनता  है ? ? ?

                                          ( 1994 )

                                     -सुरेश  स्वप्निल

मंगलवार, 4 जून 2013

कुछ देर के लिए

उफ़ ! कितनी  तेज़ी  से  भाग  रहा  है  समय  !
जैसे  प्रलय  आ  रही  हो  !

पूंजी  प्रलय  ही  तो  है
जो  दौड़ा  रही  है  समय  को
चाबुक  ले  कर

वीभत्स  है  पूंजी  का  कारोबार
न  जाने  कब  तक
और  कहां  तक  दौड़ाएगा  समय  को
क्या  शेष  रह  पाएगी  समय  की  अस्मिता  ?

गति  चाहे  मनुष्य  की  हो
या  ग्रह-नक्षत्रों  की
अथवा  समय  की
कम  से  कम  इतनी  अमानवीय  न  हो
कि  सब-कुछ  गड्ड-मड्ड  होने  लगे
मनुष्य  मशीनों  में  बदल  जाएं
और  पशु-पक्षी  चित्रों  में  !

सुगंध  फूलों  की  बजाय
बोतलों  में  क़ैद  हो  जाए
निश्चय  ही
उचित  नहीं  है  यह
प्रकृति
और  सृष्टि  के  तमाम  उपादानों  के  लिए

क्या  यह  बेहतर  नहीं  होगा
कि  रोक  दिया  जाए
तमाम  गतिवान  चीज़ों  को
कुछ  देर  के  लिए  ही  सही ? !

                                                           ( 2013 )

                                                     -सुरेश  स्वप्निल

रविवार, 2 जून 2013

फिर सफ़र में...

अंधेरा ! अंधेरा !
अमावस  की  रात !

अपनी  राह  अंधेरे  को  सौंप  कर
थक-हार  कर  बैठा  मुसाफ़िर
खण्डित  विश्वास !

मुसाफ़िर  के  कांधे  पर
मार्मिक  स्पर्श
बर्फ़ीले  हाथ !

यंत्रणा मय  सांसों  की  टकराहट
पास,  फिर  पास ,  और  पास

फिर  उठा  तूफ़ान

मुसाफ़िर  जो  थक  गया  था
मुसाफ़िर  जो  रुक  गया  था
अब  फिर  सफ़र  में  है !

और  वह  अकेला  भी  नहीं

ख़ामोश  सफ़र  ज़ारी  है !

रौशनियों  के  जंगल  से  दूर
गुमसुम  रात  के  अंधेरे  में
दो  साये ....!
मौन  चले  जाते  हैं
हाथों  में  लिए  हाथ  !

उनके  क़दमों  तले  कुचल  कर
सूखे  पत्ते
टूटते  हैं, चिटख़ते हैं

सन्नाटा  बिंध  गया  है

और  मौन,  अवश
कहीं  भाग  जाने  की  हड़बड़ाडाहट  में
विकल  है
अमावस  की  रात  !

                                                                             ( 1976 )

                                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

प्रकाशन: 'देशबंधु' भोपाल, 1976 एवं 'अंतर्यात्रा-13', 1983 ।

शुक्रवार, 31 मई 2013

अगले चुनाव में ....

बात  जब  किसी  और  की 
कमाई  की  हो
और  सैकड़ों  लाख-करोड़  सामने  हों
तो  देश  का  बजट  भी
हंसते-मुस्कुराते  बना  ले  कोई

लेकिन
जब  अपने  ख़ून-पसीने  की
कमाई  की  बात  हो
अपने  घर  की  ज़रूरतें  सामने  हों
तो
बजट  बनाते  हुए
रूह  कांप  जाती  है
रातों  की  नींद  ग़ायब  हो  जाती  है
हाथों  से  क़बूतर  उड़  जाते  हैं ....

तो,  अगले  चुनाव  में
किसे  वोट  देंगे  आप ? !

या  चुनाव  लड़ेंगे  इस  बार  ?

                                                ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल



गुरुवार, 30 मई 2013

जंगल की आग

यह  जंगल  की  आग  है,  महाशय !
पहले  तो  लगती  नहीं  आसानी  से
और  कहीं  लग  जाए
तो  सुलगती  रहती  है
बरसों-बरस  !

यह  जंगल  है,  महाशय
आपका  शहर  नहीं
यह  सहिष्णुता  का  ज्वलंत  उदहारण  है
यहां  हिंसा  भी  होती  है
तो  सिर्फ़  जीवन  के  लिए
यहां  कोई  नहीं  खाता  अपनी  भूख  से  ज़्यादा
और  न  कोई  सहेज  कर  रखता  है
अपनी  आवश्यकता  से  अधिक 

यह  जन्म-स्थली  है
तुम्हारी  तमाम  संस्कृतियों  की
पाठशाला  है  उस  मनुष्यता  की
जिसका  नाम  ले-ले  कर
तुम  करते  हो  बर्बरतम  अत्याचार
अपने  ही  स्वजातियों  पर
और  अपने  स्वदेशियों  पर !

हमारे  जंगल  में  तो  नहीं  होता  ऐसा
क्या  सिर्फ़  इसीलिए
तुम  मिटा  देना  चाहते  हो
जंगलों  के  नामो-निशान ?

चलो,  कर  देखो  यह  भी
मिटा  दो  स्वयं  ही
अपने  अस्तित्व  के  श्रेष्ठतम  प्रमाणों  को
बदल  दो  सारी  पृथ्वी  को
कंक्रीट  के  जंगल  में !

याद  रखना  मगर
कि  अगर  आग  लग  गई  एक  बार
जंगल  में
तो  शताब्दियां  भी  कम  पड़  जाएंगी
बुझाने  में !

                                                          ( 2013 )

                                                   -सुरेश  स्वप्निल