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रविवार, 16 जून 2013

जंगल: दो कविताएं

जंगल: एक 


टूट  गया
शेर  और  भेड़िये  का 
गठबंधन !

इसमें  ख़ुश  होने-जैसी
कोई  बात  नहीं
ख़रगोशों !

वे  हिंस्र  थे
और  हिंस्र  ही  रहेंगे

वे  तो  अकेले  भी  बहुत  हैं
निरीह  शाकाहारियों  के  लिए !

जंगल: दो 

 

 क्रांतियां  मनुष्यों  की  बस्तियों  में
होती  हैं
मूर्ख  खरगोशो !

यहां,  जंगल  में
शेर  ख़त्म  भी  हो  गए  तो  क्या ?
चीते,  भालू,  भेड़िये
लकड़बग्घे  कम  हैं  क्या ?

तुम  जब  तक
छिपते  रहोगे  अपनी  मांदों  में
मारे  जाते  रहोगे
यूं  ही  बेमौत  !

ज़िंदा  रहना  चाहते  हो
तो  लड़ना
और  जीतना  सीखो।

                                                      ( 2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल 




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