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बुधवार, 19 जून 2013

इन डरावनी उपत्यकाओं में....

मिट्टी  के  इन  ढूहों  को
ध्यान  से  देखिए
इन्हीं  में  कहीं  दबा  है
एक  शहर !

विध्वंस  की  महागाथा  छिपी  है
इन्हीं  टीलों  में  कहीं
आत्म-विनाश  की  प्रवृत्ति  के  प्रमाण
आत्म-घाती  विकास  की  अवधारणाएं
मनुष्य  के  अ-मनुष्य  होते  जाने
और  मूल्यों  के  पतन  की  कहानियां ....

यहीं  कहीं  दबे  पड़े  हैं
गर्वोन्नत  सभ्यता 
और  तथाकथित  महानतम  संस्कृति  के
नष्टप्राय  अवशेष ....!

प्रकृति  तो  बार-बार  चेताती  थी
हम  ही  अनसुना  करते  रहे ....

अंततः,  क्या  ढूंढने  आए  हैं  हम
इन  डरावनी  उपत्यकाओं  में  ?

                                                       ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल 


1 टिप्पणी:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी पोस्ट को आज के ब्लॉग बुलेटिन 20 जून विश्व शरणार्थी दिवस पर विशेष ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ...आभार।