मंगलवार, 27 अगस्त 2013

बस, हमारा कन्हैया !

हमें  चाहिए
बस,  हमारा  कन्हैया !

ज़रा  सांवला
मेघ  जैसा  सुयाचित
नयन  सूर्य  के  तेज  से  जगमगाते
वदन  चन्द्रमा  ज्यों
शरद  पूर्णिमा  का
स्निग्ध  स्नेह-अमृत  से
पूरित-प्रकशित…

बड़ी  देर  से  हम  उसे  ढूंढते  हैं
कहां  है,  कहां  है
हमारा  कन्हैया ???

बड़ा  प्यारा-प्यारा
सभी  का  दुलारा
यशोदा  की  आंखों  का  तारा  कन्हैया !

ज़रा  अपने  आंगन  में  उठ  कर  तो  आओ
वो  देखो,  वो  देखो
मचलता,  ठिठकता,  कभी  डगमगाता
न  जाने  कहां  से  ये  माखन  चुरा  के
हथेली  से  मुख  तक  सभी  अंग  साने
बड़े  ढीठपन  से
कभी  खिलखिलाता,  कभी  मुस्कुराता
चला  आ  रहा  है
हृदय  का  सहारा
हमारा  कन्हैया !

कोई  उसका  मुख,  हाथ-पांव  धुलाओ
ये  घुंघराली  अलकें  सहेजो-संवारो
मुकुट  मोरपंखी  धरो  शीश  पर
एक  छोटी  सी  दिठिया  लगाओ
फिर  हाथों  में  स्वर-धन्य  बंसी  थमाओ ….

ज़रा  यूं  सजाओ
कि  जब  वो  प्रकट  हो
तो  कहने  लगें
वृन्द-कानन  के  वासी
यही  है,  यही  है
हमारा  कन्हैया  !

हमारा  कन्हैया
तुम्हारा  कन्हैया  !

                                                       ( 2013 )

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 


सोमवार, 26 अगस्त 2013

आज है जन्माष्टमी !

आज  है  जन्माष्टमी !

श्रीकृष्ण-मंदिर  में
अर्द्ध-रात्रि  के  समय
होनी  है  पूजा
कराएंगे  पंडित जी !

जलेगी  अगरबत्ती
मंत्र  पढ़े  जाएंगे
घंटा-ध्वनि  होगी
फिर  शंख  भी  बजेगा
बजाएंगे  पंडित  जी !

नगर  की  कुमारियां
होंगी  एकत्र  वहां
गाएंगी  सोहर, और
नाचेंगी  घूमर 
नचाएंगे  पंडित  जी !

कृष्ण-प्रेम  विह्वल
किसी  कन्या  का
अंग  कोई
भूल  से  उघड़े
खिल  जाएंगे  पंडित जी !

और  कोई  सु-कुमारी
राधा  बन  आएगी
दधि-माखन  लाएगी
चीर  बेचारी  का
उड़ाएंगे  पंडित  जी !

आदत  तो  आदत  है
जा  सकती  है  भला ?
रात  में  टांगों  में
तकिया  दबा  कर
सो  पाएंगे  पंडित  जी !

                                     ( 1977 )

                            -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'देशबंधु', भोपाल ( 1977 ), 'अंतर्यात्रा' ( 1983 ) एवं अन्यत्र।

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

पुलिस सर्वशक्तिमान है !

कल  रात
सपने  में  आई  थी  पुलिस
और  छीन  ले  गई
अभिव्यक्ति  की   स्वतंत्रता

डंडे  मार-मार  कर
झड़ा  दिए  सारे  शब्द
खुरच-खुरच  कर
मिटा  गई  राजनैतिक  समझ
लूट  ले  गई
वैचारिक  चेतना  …


यह  जानते  हुए  भी
कि  यह  मौलिक  अधिकार  है
भारतीय  संविधान  में  …

मगर  पुलिस  को  कौन  समझा  सकता  है
सही  और  ग़लत  का  फ़र्क़
कौन  सिखा  सकता  है
मानवीय  व्यवहार ?

पुलिस  सर्वशक्तिमान  है
जब  तक  उसके  शरीर  पर
चिपकी  हुई  है
ख़ाकी  वर्दी
और  हाथ  में  है  डंडा !

शुक्र  है  कि  यह
स्वप्न  ही  था
बेहद  डरावना  …

मगर  यह  दु:स्वप्न
सत्य  में  बदल  सकता  है
किसी  भी  दिन  …

यह  भारत  है
मानवाधिकार  के  रखवालों !

                                           ( 2013 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल




शनिवार, 27 जुलाई 2013

विश्वास आम आदमी का !

बहुत  देर  से   ढूंढ  रहा  हूं
सारी  दिल्ली  छान  ली
कहीं  भी  मुझे  खाना  नहीं  मिला
एक,  पांच  या  बारह  रुपये  में  !

सरकार  क्या  यह  भी  नहीं  जानती
कि  खाना  खाना  बुनियादी  ज़रूरत  है
मनुष्य  की
और  निस्संदेह,  यह  परिहास  का
विषय  नहीं  है

और  क्या  सरकार
यह  भी  नहीं  जानती
कि  उसके  पास
नाम-मात्र  का  भी  समय  नहीं  है
सत्ता  के  मार्ग  पर
वापसी  का  ?

अब  एक  भी  भूल
सारी  संभावनाएं  नष्ट  कर  देगी
तुम्हारी
और  तुम्हारी  आने  वाली
कई  पुश्तों  की !

कैसे  मूर्ख  हो  तुम
इतना  भी  नहीं  जानते
कि  तुमने 
खो  दिया  है  विश्वास
आम  आदमी  का  !

                                         ( 2013 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल 


बुधवार, 24 जुलाई 2013

झूठ बोल रहे हैं प्रधानमंत्री

मैं  अमीर  हूं
क्योंकि  मैं  सौ  रुपये  प्रतिदिन  कमाता  हूं

मैं  अमीर  हूं
क्योंकि  मेरे  प्रधानमंत्री  कहते  हैं

सौ  रुपये  प्रतिदिन  में
क्या-क्या  करता  हूं
मेरे  घर  में  तीन  मोबाइल  फ़ोन  हैं
उन्हें  रिचार्ज  कराना
घर  में  फ़्रिज  है,  टी. वी.  है,  कंप्यूटर  है
पंखा  है,  तीन  बल्ब  हैं
उन  सबका  बिजली  का  बिल  जमा  करना
बेटी  निजी  स्कूल  में  पढ़ती  है
उसकी  पढ़ाई  और  बस  की  फ़ीस  चुकाना

सौ  रुपये  प्रति  लीटर  का
खाने  का  तेल
तीन  सौ  रुपये  प्रति  किलो  की
चाय  की  पत्ती
पचास  रुपये  प्रति  लीटर  का  दूध ….

आपको  आश्चर्य  हो  रहा  है  न  !
इतना  सब  करने  के  बाद
हम  तीन  प्राणी  खाना  भी  खाते  हैं
दोनों  समय
मकान  का  किराया  देते  हैं
दो  फ़िल्में  भी  देखते  हैं
तीज-त्यौहार  पर  नए  कपड़े  बनवाते  हैं
मेहमानों  की  आव-भगत  भी  करते  हैं …

मैं  यह  सब  करता  हूं
सौ  रुपये  प्रतिदिन  की  कमाई  में
क्योंकि  मैं  अमीर  हूं !

झूठ  बोल  रहे  हैं  प्रधानमंत्री
या  झूठ  बोल  रहा  है  सारा  देश !

                                                   ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल 


सोमवार, 22 जुलाई 2013

यह कैसा संविधान ?

देश  में  अब
भेड़िया-तंत्र  चाहते  हैं
सियार !

वर्ण-संकर  कुत्तों  की  सरकार
बहुत  चल  चुकी
शेर  विलुप्त  हो  चुके
वन-प्रांतर  से
हाथी  शाकाहारी  हैं  अब  भी

विकट  समय  है  !
समस्या  यह
कि  सुरक्षा  कौन  करेगा
देश  की  ?

मुर्दाख़ोर  कबरबिज्जू
लाशें  खोद-खोद  कर
ख़ाली  कर  चुके
क़ब्रस्तान
और  अब
दृष्टि  लगाए  बैठे  हैं
जीवित  मनुष्यों  पर  !

विडम्बना  यह  कि
सारी  समृद्धि  लूट  कर
बैंक-खातों  में  जमा  कर  चुके
यही  मुर्दाख़ोर  कबरबिज्जू
वित्त  जुटा  रहे  हैं
भेड़िये  के  राज्यारोहण  के  लिए...

उफ़ !  यह  कैसा  संविधान  है
इस  देश  का
जहां  केवल  मनुष्यभक्षी  ही
पा  सकते  हैं  सत्ता !!!!! ?????

                                        ( 2013 )

                                  -सुरेश  स्वप्निल




गुरुवार, 18 जुलाई 2013

तुम्हारे बच्चे नहीं थे न !

वे  जो  मार   डाले  गए
ज़हर  मिला  खाना  खिला  कर
वे  तुम्हारे  बच्चे  नहीं  थे  न  !

वे  तो  मनुष्य  भी  नहीं  थे  शायद
सड़े-गले  जानवरों  का  मांस
और  तुम्हारी  जूठन  पर
जीवित  रहने  वाले
चूहे  खाने  वाले
मुसहर  कहीं  के  !

तुम्हारी  कृपा  न  होती
तो  जान  पाते  क्या  वे
गेहूं  की  रोटी
और  अरहर  की  दाल  का  स्वाद  ?

हम  भी  कितने  कृतघ्न  हैं
कि  संदेह  कर  रहे  हैं
तुम्हारी  दयालुता  पर  !

अच्छा,  जो  बच्चे  मर  गए
एक  समय  के  भोजन  के  लालच  में
वे  जीवित  रहते  तो  क्या  करते  ?
अंततः,  बंधुआ  ही  तो  बनते  तुम्हारे  !

अच्छा  हुआ
जो  मार डाला  तुमने
ज़हर  खिला  कर
मुक्त  तो  हुए
जीवन-भर  की  दरिद्रता
और  रोज़ी-रोटी  की  चिंता  से  !

जो  कुछ  भी  हुआ
अच्छा  ही  हुआ
वे  क्या  पढ़-लिख  कर
प्रधानमंत्री  बन  जाते  !

मत  रोओ  उनके  नाम  पर
महा मूर्खों !

                                           ( 2013 )

                                    -सुरेश  स्वप्निल


बुधवार, 17 जुलाई 2013

दो-टके के भिखारी !

हम  'प्रजा'  नहीं  किसी  की
न  तुम  राजा  या  सम्राट  हमारे
हम  हैं  'लोक'
संप्रभु,  स्वायत्त  नागरिक  !

हम  पर  'राज'  करने  के  सपने
मत  देखो,  मूर्खाधिराज !
सिर्फ़  'सेवक'  हो  तुम  हमारे
वेतन-प्राप्त  करने  वाले
पांच  वर्ष  की संविदा  पर  नियुक्त
साधारण  कर्मचारी  !

संविदा  समाप्त
तुम्हारी  नौकरी  भी  समाप्त  !

अगली  बार
हमारा  'मत'  मांगने  आओ
तो  ध्यान  रखना
अगली  बार  तुम्हारे  वचन-भंग
तो  तुम्हारा  छत्र  भी  भंग !

जाओ,  ज़्यादा  शोर  मत  करो
दो  टके  के  भिखारी
मक्कारों !
बहुत-से  काम  करने  हैं  हमें
तुम्हारा  दोज़ख़  भरने  को  भी  !

                                           ( 2013 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल






मंगलवार, 16 जुलाई 2013

क्या कर लेंगे आप ?

मैं / जली-कटी  सुनाने  का  आदी  हूं !
चीखूंगा-चिल्लाऊंगा / सबको  दूंगा  अभिशाप
मेरा  क्या  कर  लेंगे  आप ?
पहले  दीपक  को  गाली  दी  थी
अब  सूरज  को  दूंगा / आप  रोकेंगे  मुझे ?
हिम्मत  है  तो  आ  जाइए / अपनी  मर्दानगी  आज़माइए
कम  से  कम/ चुप  तो  नहीं  कर  सकेंगे  मुझे  आप !
यह  तो / आपकी  ही  नज़रों  में  अवैध  है
बोलने  की  आज़ादी / दी  है  हमें / शायद / आपको  इसका  खेद  है
तो  छीन  लीजिए  यह  आज़ादी  भी /-
और  अपनी  मां  के  गटर  में / डाल  आइए  !
लेकिन / खाने-पीने  और  कमाने  से  वञ्चित  आदमी  का /
खुला  हुआ  मुंह
गालियां नहीं / तो  क्या / तुलसी  के  भजन  सुनाएगा ?

ग़रीबों  का  सूखता  लहू / एक  दिन / रंग  लाएगा।
क्या  तुम / क़यामत  के  उस  दिन  के  लिए / तैयार  हो ?

नफ़रत  की  आग / बुरी  होती  है / मेरे  यार ! / जल  जाओगे।
हमें  छुओ / हमें  जानो / हमारे  क़रीब  आओ
हमारे  दुःख-सुख  में / हाथ  बंटाओ / तो  जी  सकोगे।
वरना / याद  रखना- यार / वक़्त  के  सर  से / जब  पानी  गुज़र  जाएगा
तुम्हारे  अस्तित्व  का / कोई  भी  चिह्न / नहीं  नज़र  आएगा।

मेरी  आवाज़ / वक़्त  की  तरफ़  से / चेतावनी  है  तुम्हें
सुनो  न  सुनो / तुम्हारी  मर्ज़ी !
फिर  भी / मैं/ चीखूंगा-चिल्लाऊंगा / सबको  दूंगा  अभिशाप
मेरा  क्या  कर  लेंगे  आप ?

                                                                                                ( 1976 )

                                                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

*प्रकाशन: 'देशबंधु', भोपाल, 1976, 'अंतर्यात्रा'-13, 1983 एवं अन्यत्र। पुनः प्रकाशन  हेतु उपलब्ध।

सोमवार, 15 जुलाई 2013

तुम्हारा भावी राजाधिराज !

नमो-नमो !

इस  चेहरे  को  ध्यान  से  देखो
इसके  काया-कल्प  में
एक  सौ  पचास  करोड़  रुपये
ख़र्च  हो  गए
पूंजीपतियों  के  !

नमो-नमो  !

इस  चेहरे  को  और  ध्यान  से  देखो
सो  कर  उठने  से  लेकर
दर्शकों  के  सामने  लाने  तक
दर्ज़न-भर  दास-दासियां
लगे  रहते  हैं
घंटों  तक !

नमो-नमो  !

कुछ  और  ध्यान  से  देखो
इस  चेहरे  को
अभी  कुछ  देर  में
रक्त  छलकने  लगेगा  इसकी  आंखों  में
मुंह  से  बाहर  निकल  आएंगे
कुछ  दांत
निर्दोष  मनुष्यों  के
रक्त  से  सने

नमो-नमो  !

यह  मनुष्य  है  या  भेड़िया
या  आधा  मनुष्य  है
और  आधा  भेड़िया ...
यह  जो  कुछ  भी  है
यह  तुम  तय  करो
मगर  यह  तुम्हें  कुत्ते  का  पिल्ला
कहता  है !

नमो-नमो  !

इसे  स्वीकार  करो
मूर्ख  जनता !
यह  मनुष्य  हो  या  पशु
देव  हो  या  दानव
यही  है  तुम्हारा  मुक्तिदाता
तुम्हारा  भावी  राजाधिराज  !

नमो-नमो
नमो-नमो !

                                      ( 2013 )

                              -सुरेश  स्वप्निल 

 


शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

क्रांति के बाद !

दुर्भाग्य  यह  है  कि  जनता
सब  कुछ  याद  रखती  है
कई-कई  शताब्दियों
और  पीढ़ियों  के
गुज़र  जाने  के  बाद  भी

दुर्भाग्य  यह  भी  है
कि  जनता
अक्सर  विरोध  नहीं  करती
शासकों  का

मगर  सबसे  बड़ा  दुर्भाग्य
यह  है  कि
जनता  जब  उठ  खड़ी  होती  है
विद्रोह  के  लिए
तो  बड़े  से  बड़े  साम्राज्य  भी
मिल  जाते  हैं
धूल  में !

और  शासकों  को  यह  समझ  में
आता  तो  है,
मगर  क्रांति  के  बाद !

                                                     ( 2013 )


                                            -सुरेश  स्वप्निल


गुरुवार, 11 जुलाई 2013

शब्दों का समुचित मूल्य !

बहुत-से  शब्द  थे
स्मृति  की  पोटली  में
लगभग  अनगिनत
एक-एक  कर  झिर  गए
जीवन  के  पथ  पर ...

जाने  कब-कहां  छेद  हो  गया !

मैंने  तो
बहुत  सावधानी  से  सहेज  रखी  थी
शब्दों  की  पोटली
अपने  कंधे  पर !

मुझे  पता  नहीं
कि  संसार  के  किस  बाज़ार  में
बिकते  हैं  शब्द
कौन  चोर  ऐसा  हो  सकता  है
जिसे
दूसरे  के  शब्द  चाहिए
जीवन-यापन  के  लिए !
कौन  ग्राहक  होगा  इतना  समृद्ध
कि  चुका  सके
शब्दों  का  समुचित  मूल्य !

यह  भी  संभव  है
कि  सचमुच
मेरी  ही  असावधानी  से
फट  गई  हो  पोटली !


मेरे  शब्द
किसी  के  भी  काम  के  नहीं  हैं
यथार्थतः
और  वस्तुतः
केवल  अपने  ही  शब्द  हैं
जो  पार  करा  सकते  हैं
वैतरणी  जीवन  की !

जो  भी  हो
यदि  आप  में  से  किसी  को
मिले  हों  मेरे  शब्द
तो  लौटा  दें,  कृपया !
मेरा  पता  है ......

                                                ( 2013 )

                                        -सुरेश  स्वप्निल


शनिवार, 6 जुलाई 2013

सभ्य-जनों, सुनो !

अपने-अपने  घरौंदों  में  दुबके  हुए
शांति-प्रेमी  देश-भक्त  नागरिकों,  सुनो
सुनो  सभी
सुसंस्कृत,  सुशिक्षित
सभ्य-जनों,  सुनो
सुनो  हे  जन-गण-मन  गायकों
क़ानून  के  पालनहारो,  सुनो

सुनो,  क्योंकि  तुम
केवल  सुनना  ही  जानते  हो
तुम  रेडियो  सुनते  हो
और  सच  मान  लेते  हो
टी . वी .  देखते  हो
और  सच  मान  लेते  हो
अख़बार  पढ़ते  हो  और  छपे  हुए
हर  शब्द  को 
अकाट्य  प्रमाण  मान  लेते  हो ....

तुम्हें  केवल  मानना  ही  आता  है
प्रश्न  करना  तो  कब  का  भूल  चुके  हो  तुम
हर  कोई  ईश्वर  बन  जाता  है  तुम्हारा
यहां  तक  कि  नून-तेल-लकड़ी  बेचने  वाला  भी
और  शक्कर  से  मधुमेह  का
उपचार  करने  वाला  भी ....

जब  तुम्हारी  आंखों  के  आगे
सड़क  पर  पड़ी
घायल  महिला 
दम  तोड़  रही  होती  है
तब  तुम  बहरे  हो  जाते  हो
जब  तुम्हारे  विधर्मी  पड़ोसी  का  घर
आग  के  हवाले  कर  दिया  जाता  है
तुम  आंखों  पर  हाथ  रख  कर
अंधे  बन  जाते  हो
जब  कोई  अत्याचार  का  शिकार
न्याय  की  लड़ाई  में
तुम्हें  गवाह  बनाना  चाहता  है
तुम  गूंगे  हो  जाते  हो

जब  सत्ताधीश  और  पूंजीपतियों  की  सम्मिलित  सेनाएं
तुम्हारी  आने  वाली  पीढ़ियों  के  लिए
जीवित  रहने  के  सारे  मार्ग  बंद  कर  रही  होती  हैं
तुम  अंधे-बहरे-गूंगे
और  लंगड़े-लूले  बन  कर
समर्पण  कर  देते  हो ....

तुम  इसी  योग्य  हो
कि  बीच  सड़क  पर  रौंद  दिए  जाओ
और  दफ़न  हो  जाओ  एक  मृत  राष्ट्र  की  भांति

अब  कभी  जनपथ  पर
मत  आना  न्याय  की  पुकार  लगाने !
                               
                                                                  ( 2013 )

                                                           -सुरेश  स्वप्निल


गुरुवार, 4 जुलाई 2013

भेदने होंगे सारे चक्रव्यूह

शासकों  का 
हृदय-परिवर्त्तन  नहीं  होता
परिवर्त्तन  चाहिए
तो  मौन  असंतोष  से
कुछ  नहीं  होगा
और  न  छिट-पुट  विप्लवों  से

उखाड़  कर  फेंकने  होंगे
साम्राज्यों  के  स्मृति-चिह्न
तोड़ने  होंगे  सत्ताधारियों  के 
सारे  तिलिस्म
ध्वस्त  करने  होंगे
शत्रुओं  के  सुरक्षा-कवच
भेदने  होंगे
सारे  चक्रव्यूह
फाड़  कर  फेंकनी  होंगी  ध्वजाएं
गढ़ने  होंगे  नए  प्रतीक
और  प्रतिमान
तत्पर  रहना  होगा
किसी  भी  क्षण
बलिदान  के  लिए ....

क्रांति
कोई  बच्चों  का  खेल  नहीं  है !

                                                      ( 2013 )

                                               -सुरेश  स्वप्निल


मंगलवार, 2 जुलाई 2013

पता नहीं कब...

आपदा  मेरी  नहीं  थी
मैंने  वे  हिमखण्ड  नहीं  देखे
जो  धरती  का  तापमान  बढ़ने  पर
पिघल  गए
वे  पर्वत  भी  नहीं  देखे  मैंने
जहां  मेघ  फटे
और  बहा  ले  गए  गांव  के  गांव

जो  लोग  अदृश्य  हो  गए
भागीरथी-अलकनंदा  के  प्रवाह  में
उनमें  संभवतः  कोई  भी
परिचित  नहीं  था  मेरा

मगर  मैं  क्या  करूं
इतने  सारे  शव
और  भय  से  कांपते  मनुष्य,
पशु-पक्षी  और  पेड़-पौधे  देख  कर
संभवतः  उन्मादी  हो  गया  हूं  मैं
कोई  तर्क,  कोई  धारणा  मेरे  काम  नहीं  आते
कोई  अदृश्य  शक्ति  मुझे
सांत्वना  नहीं  दे  पाती
कोई  ईश्वर  तैयार  नहीं  कारण  समझाने  को ....

मुझे  पता  नहीं  कि  कब  तक
नींद  नहीं  आएगी  मुझे
पता  नहीं  कब  तक
वे  अपरिचित  चेहरे
भय  और  दुःख   में  डूबे  हुए
रुलाते  रहेंगे  मुझे

पता  नहीं  कब
मैं  लिख  पाऊंगा
नई  कविता  !

                                                 ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल




रविवार, 23 जून 2013

बोलते क्यों नहीं ? !

त्रासदी  यदि  वैयक्तिक  हो
तो  स्वयं  भुक्त-भोगी  भी  भूल  जाता  है
थोड़े-बहुत  समय   के  बाद
किंतु  इतनी  बड़ी,
सामूहिक  त्रासदी  ....

असंभव  है  कि  कोई  भूल  पाए !

क्या  कोई  भूल  सकता  है
बंगाल  का  दुर्भिक्ष
या  बर्मा  का  प्लेग
या,  भोपाल  गैस-त्रासदी ?

निश्चय  ही,
कई  शताब्दियों  तक
कई-कई  पीढ़ियों  तक
दोहराती  रहेंगी  केदारनाथ  का  जल-प्रलय
प्रकृति  के  भयंकर  प्रतिशोध
और  इस  त्रासदी  के  लिए  उत्तरदायी
व्यक्तियों  और  अ-नीतियों  की  महा-गाथाएं ...

आप  सुन  रहे  हैं
समझ  रहे  हैं  न ?

तो  कुछ  बोलते  क्यों  नहीं ? !

                                                          ( 2013 )

                                                   -सुरेश  स्वप्निल 




शनिवार, 22 जून 2013

अगले रण में जीतेगी जनता !

एक  सीधा-सपाट  बयान  है  यह
तुम्हारे  तथाकथित 
लोकतंत्र  के  अंतिम  छोर  पर  बैठे
आम  आदमी  का
वही  जिसके  नाम  पर
तुम्हारी  निर्बाध, निरंकुश  सत्ता  का  जाल
फैला  हुआ  है
पृथ्वी  से  आकाश  तक…

सुनो,  तानाशाह  !
हमने  अगर  चुना  भी  था  तुम्हें
तो  इसलिए 
कि  तुम्हारे  शब्द  और  वस्त्र
मनुष्यों  की  भांति  दीखते  थे
कि  तुम  वही  भाषा  बोल  रहे  थे
जो  सुनना  चाहते  थे  हम,
इस  लोकतंत्रात्मक  देश  के  असली  मालिक
हम  जो  चाहते  थे  कि
हमारा  प्रतिनिधि  हमारी  बात  सुने,
समझे  और  उसके  अनुरूप
नीतियां  बना  सके
और  नीतियों  को  कार्य-रूप  में
परिणत  कर  सके

हम  छले  गए
तुम  और  तुम्हारे  क्रीत  प्रचार-तंत्र  के  हाथों

तुमने  अपने  हर  वचन  को  भंग  किया
हर  वादे  को  तोड़ा
हर  बात  से  मुकर  गए
और  सेवक  से  अचानक  मालिक  बन  गए !

तुम  यह  भूल  गए
अत्यंत  सुविधाजनक  रूप  से
कि  यह
संसार  की  सबसे  विशाल  जनसंख्या  है
जिसने  हर  उस  तानाशाह  को
शिकस्त  दी  है
जिसके  राज  में  किम्वदंती  थी
सूरज  के  नहीं  डूबने  की ....

तुम  यदि  नहीं  जानते  तो  सुन  लो
तुम्हारा  सूर्यास्त  होने  को  है
कुछ  ही  क्षण  बाद ....

कल 
जब  तुम्हारी  अजेय  सेना
थके-हारे  क़दमों  से  लौटेगी
अपने  शिविर  में
तो  किस  तरह  तैयार  करोगे  उसे
अगले  रण  के  लिए ?

तुम  हार  गए,  तानाशाह !
स्वयं  अपनी  ही  ग़लतियों  से !

अगले  रण  में
जीतेगी  जनता
सिर्फ़  और  सिर्फ़  जनता !

                                                    ( 2013 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल 





शुक्रवार, 21 जून 2013

बाढ़: कुछ दृश्य

           एक 

रात-दिन  चल  रहे  हैं 
राहत  और  बचाव  के  प्रयास 

उड़  रहे  हैं  हेलिकॉप्टर 
भोजन  और  पानी  के  पैकेट 
गिराते  हुए 
लाशों  के  ढेरों  पर… 

जीवित  बचे  हुए 
भटक  रहे  हैं 
अबूझ  जंगलों  में 
जीवन  और  मृत्यु  दोनों  को 
छलते  हुए ....!

पता  नहीं 
पहुंच  भी  पाएंगे  
या  नहीं 
राहत  शिविरों  तक  !


                दो

दिल्ली  में  सब  के  सब 
चिंता-मग्न  हैं  
बाढ़  से  निबटने  के  तरीक़े 
ढूंढने  में 

केदारनाथ  में  गिद्ध  मंडरा  रहे  हैं 
नई-नई  लाशों  के  प्रकट  होने  की 
प्रतीक्षा  में  !


            तीन

कौन  कह  सकता  है  कि  कल  गंगा 
प्रतिगामिनी  हो  कर 
रायसीना  हिल्स और  लुट्येंस  ज़ोन  तक 
नहीं  पहुंचेगी  ?

कौन  कह  सकता  है  कि  दिल्ली 
नहीं  उजड़ेगी  फिर  से 
दस  से  अधिक  तीव्रता  के  
भूकंप  से  ?

क्षण-क्षण  मृत्यु  की  ओर 
बढ़ती  हुई 
राजधानी  के  लोग 
इतने  निश्चिंत  कैसे  हो  सकते  हैं 
उत्तराखंड  की  हालत 
देखने  के  बाद ?


                    चार 

देखते-देखते  
श्मशान  में  बदल  गए 
चार  सौ  गांव 

देखते-देखते 
मृत्यु  का  ग्रास  बन  गए 
हज़ारों  जीवित  मनुष्य 
पशु-पक्षी  और  पेड़-पौधे 
निरंतर  चेतावनियों  के  बावजूद ....

शर्म  से  मरे  नहीं  अब  तक 
बाढ़  को 
बस्तियों  तक  
लाने  वाले  !

                                                   ( 2013 )

                                           -सुरेश  स्वप्निल


बुधवार, 19 जून 2013

इन डरावनी उपत्यकाओं में....

मिट्टी  के  इन  ढूहों  को
ध्यान  से  देखिए
इन्हीं  में  कहीं  दबा  है
एक  शहर !

विध्वंस  की  महागाथा  छिपी  है
इन्हीं  टीलों  में  कहीं
आत्म-विनाश  की  प्रवृत्ति  के  प्रमाण
आत्म-घाती  विकास  की  अवधारणाएं
मनुष्य  के  अ-मनुष्य  होते  जाने
और  मूल्यों  के  पतन  की  कहानियां ....

यहीं  कहीं  दबे  पड़े  हैं
गर्वोन्नत  सभ्यता 
और  तथाकथित  महानतम  संस्कृति  के
नष्टप्राय  अवशेष ....!

प्रकृति  तो  बार-बार  चेताती  थी
हम  ही  अनसुना  करते  रहे ....

अंततः,  क्या  ढूंढने  आए  हैं  हम
इन  डरावनी  उपत्यकाओं  में  ?

                                                       ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल 


मंगलवार, 18 जून 2013

नदी का मार्ग मत रोको !

नदी  का  मार्ग  मत  रोको
उसे  आता  है
मार्ग  की  हर  बाधा  को  हटाना
और  नए  मार्ग  की  खोज  करना

नदी  का  मार्ग  मत  रोको
उसे  पता  है  कहां-कहां  सूराख़  हैं
तुम्हारी  योजनाओं  में
और  कितना  मैल  जमा  है
तुम्हारे  मन-मस्तिष्क  की  तलहटी  में

नदी  यूं  ही  नहीं  बहती  आ  रही  सदियों  से
वह  तुम्हारी  हर  चाल  से  परिचित  है
और  जानती  है
जीतने  के  सारे  गुर

नदी  से  बैर  मत  लो
वह  बहुत  शक्तिशाली  है  तुमसे

नदी  का  मार्ग  मत  रोको
उसे  बहना  आता  है
और   बहा  ले  जाना  भी  !

                                                           ( 2013 )

                                                    -सुरेश  स्वप्निल


रविवार, 16 जून 2013

शाह कियो बदजात !

( जनाब कलीम 'अव्वल' साहब की ख़िदमत में, बेहद ख़ुलूस और एहतराम के साथ )

                             दोहे
अल्लह   दीन्ही    आतमा    नजर  नवाजी  पीर
औरन    कोऊ    होइये    अपनो    शाह    कबीर

अंतर  बिच   झगड़ा  भया   को  जेठौ  को  छोट
मन  मूरख  अड़ियल  भया  आतम  काढ़े  खोट

जग  को  का  समझाइये    सब  मूरख  के  यार
का   कहिबो   का   बूझिबो   भै   जूतम    पैजार

साहिब    मेरौ    बावरो    दीन्हो    ज्ञान   लुटाय
जाकी    जेती    गाठरी   बांधि-बांधि   लै   जाय

काटि   कलेजा   लै   चले   का  खंजर  का  बात
कौन पाप कीन्हो  मुलुक  शाह  कियो  बदजात

साहिब   हम   मुरदा   भए   ठटरी   बांधो  कोय
माटी   की   पुतली   मुई   धाड़-धाड़  जग  रोय !

                                                               ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल


जंगल: दो कविताएं

जंगल: एक 


टूट  गया
शेर  और  भेड़िये  का 
गठबंधन !

इसमें  ख़ुश  होने-जैसी
कोई  बात  नहीं
ख़रगोशों !

वे  हिंस्र  थे
और  हिंस्र  ही  रहेंगे

वे  तो  अकेले  भी  बहुत  हैं
निरीह  शाकाहारियों  के  लिए !

जंगल: दो 

 

 क्रांतियां  मनुष्यों  की  बस्तियों  में
होती  हैं
मूर्ख  खरगोशो !

यहां,  जंगल  में
शेर  ख़त्म  भी  हो  गए  तो  क्या ?
चीते,  भालू,  भेड़िये
लकड़बग्घे  कम  हैं  क्या ?

तुम  जब  तक
छिपते  रहोगे  अपनी  मांदों  में
मारे  जाते  रहोगे
यूं  ही  बेमौत  !

ज़िंदा  रहना  चाहते  हो
तो  लड़ना
और  जीतना  सीखो।

                                                      ( 2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल 




शनिवार, 15 जून 2013

समय के विरुद्ध

कुछ  लोग
सदा  समय  के  पीछे  चले
अत्यंत  विनम्र,  मौन
चींटियों  की  भांति  पंक्ति-बद्ध
समय  की  जूठन  पर
जीते  हुए
और  भुला  दिए  गए
मरी  हुई  चींटियों  की  भांति

कुछ  लोग  समय  के  आगे-आगे
दौड़  लगाते  रहे
और  थक  कर
सो  गए  बीच  राह  में
और  कुचले   गए
समय  के  पांवों  के  नीचे

कुछ  लोग  जो  अधिक  बुद्धिमान  थे
समय  के  साथ-साथ  चले
शरणागत  हो  कर
मिमियाते  हुए 
और  मारे  गए
क्रांति  के  प्रथम  शिकार  हो  कर

लेकिन  कुछ  लोग  थे
जो  समय  के  विरुद्ध
लोहा  ले  कर  खड़े  थे
चुनौती  बन  कर
वे  लड़े
अपनी  पूरी  चेतना  और  वीरता  के  साथ
कुछ  खेत  रहे
कुछ  जीत  गए
कुछ  हार  गए ....

वे  सब  के  सब
इतिहास  में  अपनी  जगह  बना  गए
नायकों  के  रूप  में !

                                                                 ( 2013 )

                                                          -सुरेश  स्वप्निल 


बुधवार, 12 जून 2013

बनी रहे शांति

हां, हम  जानते  हैं  कि  तुम
संकट  में  हो
और  ज़रूरत  है  तुम्हें
समर्थन  की ....

हम  भले  पुरुष
मिट्टी  के  माधव
और  तो  क्या  करें
आशीष  देते  हैं  तुम्हें
चाहे  जितनी  भी  सहनी  पड़ें
हमारी  ज़्यादतियां
हमारी  मजबूरियां
कि  बनी  रहे  शांति
घर  और  समाज  में

क्योंकि  सहना
सिर्फ़  तुम्हें  ही  आता  है
लड़कियों !

                                                       ( 2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल


सोमवार, 10 जून 2013

सपने डर गए हैं

सपनों  को  क्या  हो  गया  है  ?
आँखों  से  चलते  हैं
और  उड़  कर
मोबाइल  टॉवर  पर  बैठ  जाते  हैं

शायद  सपनों  की  दुनिया  सिकुड़  गई  है
वे  नहीं  चाहते
कि  पंखों  को  तकलीफ़  हो
वे  शायद  उड़ना  ही  नहीं  चाहते
या  उड़ें  भी  तो  वहीं  तक
जहां  से  घोंसला  दिखाई  पड़ता  हो ....

सपने  डर  गए  हैं
वैज्ञानिकों  के  बयानों  से
कहा  जाता  है  कि  सपनों  की
प्रजनन-क्षमता
कम  हो  गई  है
लगभग  शून्य  के  बराबर !

क्या  सपनों  की  सभी  प्रजातियां
नष्ट  हो  जाएंगी
गौरैयों  की  तरह  ?

                                                   ( 2013 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल 


रविवार, 9 जून 2013

मैं बड़ा होने लगा !

मैंने  पहाड़  की  ऊंचाई  देखी
और  डर  गया
मैंने  समुद्र  की  गहराई  देखी
और  भी  डर  गया
मैंने  मरुस्थल  का  विस्तार  देखा
और  उसमें  चलती  धूल-भरी  आंधियां  भी
और  बहुत  ज़्यादा  डर  गया ...

एक-एक  कर  चुनौतियां  मेरे  सामने  आती  रहीं
और  मैं  हर  चुनौती  से  डरता  रहा

धीरे-धीरे  चुनौतियां  बड़ी  होती  गईं
और  मैं  उतना  ही  छोटा ...

जिस  दिन  मैंने  अपने  छोटे  होते  जाने  को
महसूस  किया
उसी  दिन
मैं  बड़ा  होने  लगा !

आज मुझे  पता  नहीं 
कि  चुनौती  शब्द
किस  भाषा  का  है !

शनिवार, 8 जून 2013

जंगलियों का देश

पता  नहीं  कि  कब
देश  हुआ  करता  था
सोने  की  चिड़िया ...
हमने  जो  समय  देखा  है  उसमें
सिर्फ़  बदहाली  ही  रही  है
नागरिकों  की  नियति !

कहते  तो  हैं  कि  लोकतंत्र  है  यहां
'लोक'  का  अर्थ  संभवतः  वही  होता  है
जो  कभी  शिकारी  के  लिए
शिकार  का  होता  था

हर  पांच  वर्ष  में  निकलती  हैं
हांका  लेकर
शिकारियों  की  टोलियां
और  मार  लाती  हैं
अगले  हांके  तक  के  लिए
पर्याप्त  जानवर !

जब  देश  जंगलों  और  जंगलियों  का  देश  था
तो  शायद  कहीं  बेहतर  था
जब  देश  जंगलों  और  जंगलियों  का  देश  था
तो  लोग 
और  शासन  चलाने  वाले
कहीं  ज़्यादा  मनुष्य  होते  थे ....

                                                               -( 2013 )

                                                         -सुरेश  स्वप्निल

शुक्रवार, 7 जून 2013

भेड़िये: तीन लघु कविताएं

भेड़िये : एक 

भेड़िये  को  सौंप  दी  गई  है 
जंगल  की  कमान 

खरगोशों !
सावधान  रहो 
बहुत  सोच-समझ  कर  
निकलना 
मांद  से !

 

भेड़िये : दो 

भेड़ियों  से  कहो 
हुआ-हुआ   न  करें 
अभी  से 

बहुत  दूर  हैं  अभी 
चुनाव !

भेड़िये : तीन

भेड़िये  बहुत  कम  हैं  
संख्या  में
और  भेड़ें  असंख्य 

दस-दस  भेड़ें  काफ़ी  हैं 
एक-एक  भेड़िये  के  लिए 

तो  टूट  पड़ो 
भेड़ों !
देर  किस  बात  की  है  ?

                                             ( 2013 )

                                       -सुरेश  स्वप्निल


बुधवार, 5 जून 2013

कोई सपूत सुनता है ? ? ?

विश्व  पर्यावरण  दिवस  पर  विशेष

रोती  है 
माँ  रोती  है 
देखो,  धरती  माँ  रोती  है !

" ओ!  कहां  गए  मेरे  प्यारे 
वे  छैल-छबीले  नौजवान 
गबरू  बेटे 
चौड़ी  छाती,  बांहें  विशाल 
आकाश  चूमते  
होनहार 
चिकने  पत्तों  से  सजे  भाल 
वह  ओक, अशोक 
वह  अमलताश 
सागौन,  गुरज 
शीशम,  अर्जुन 
कमरख़,  करंज 
कुचले,  कवत्थ .....
तुम  कहां  गए 
सब  कहां  गए ? !"

भटकी,  सहमी,  डरती-डरती  
आई  है  बेटी  मलयानिल 
कहती  है  धरती  मैया  के  कानों  
में सब- कुछ  रो-रो  कर ...
"कल  आई  कपूतों  की  सेना 
कुछ  यंत्र,  कुल्हाड़े  ले-ले  कर 
निष्ठुर,  निर्दय,  निर्मम  हो  कर 
पिल  पड़ी  अचानक  पेड़ों  पर 
यह  वहां  गिरा 
वह  यहां  गिरा 
पल-भर  में  सब-कुछ  हुआ  साफ़ 
बेचारे,  बेबस,  बे-ज़ुबान 
कट  गए  सभी  वे  निरपराध ...

कौए,  कोयल,  तीतर,  बटेर 
भैंसे,  भालू,  सारंग,  शेर 
चीखे,  गरजे,  फिर  हुए  मौन 
जंगल  की  पीड़ा  सुने  कौन  ?"

मलयानिल  लौट  गई  कब  की 
दिन,  रात,  महीने,  मौसम  भी 
आए,  ठहरे,  फिर  बीत  गए 
लेकिन  अब  भी  वह  रोती  है 
देखो,  धरती  माँ  रोती  है  !

सुनता  है 
कोई  सुनता  है 
कोई  सपूत  यह  सुनता  है ? ? ?

                                          ( 1994 )

                                     -सुरेश  स्वप्निल

मंगलवार, 4 जून 2013

कुछ देर के लिए

उफ़ ! कितनी  तेज़ी  से  भाग  रहा  है  समय  !
जैसे  प्रलय  आ  रही  हो  !

पूंजी  प्रलय  ही  तो  है
जो  दौड़ा  रही  है  समय  को
चाबुक  ले  कर

वीभत्स  है  पूंजी  का  कारोबार
न  जाने  कब  तक
और  कहां  तक  दौड़ाएगा  समय  को
क्या  शेष  रह  पाएगी  समय  की  अस्मिता  ?

गति  चाहे  मनुष्य  की  हो
या  ग्रह-नक्षत्रों  की
अथवा  समय  की
कम  से  कम  इतनी  अमानवीय  न  हो
कि  सब-कुछ  गड्ड-मड्ड  होने  लगे
मनुष्य  मशीनों  में  बदल  जाएं
और  पशु-पक्षी  चित्रों  में  !

सुगंध  फूलों  की  बजाय
बोतलों  में  क़ैद  हो  जाए
निश्चय  ही
उचित  नहीं  है  यह
प्रकृति
और  सृष्टि  के  तमाम  उपादानों  के  लिए

क्या  यह  बेहतर  नहीं  होगा
कि  रोक  दिया  जाए
तमाम  गतिवान  चीज़ों  को
कुछ  देर  के  लिए  ही  सही ? !

                                                           ( 2013 )

                                                     -सुरेश  स्वप्निल

रविवार, 2 जून 2013

फिर सफ़र में...

अंधेरा ! अंधेरा !
अमावस  की  रात !

अपनी  राह  अंधेरे  को  सौंप  कर
थक-हार  कर  बैठा  मुसाफ़िर
खण्डित  विश्वास !

मुसाफ़िर  के  कांधे  पर
मार्मिक  स्पर्श
बर्फ़ीले  हाथ !

यंत्रणा मय  सांसों  की  टकराहट
पास,  फिर  पास ,  और  पास

फिर  उठा  तूफ़ान

मुसाफ़िर  जो  थक  गया  था
मुसाफ़िर  जो  रुक  गया  था
अब  फिर  सफ़र  में  है !

और  वह  अकेला  भी  नहीं

ख़ामोश  सफ़र  ज़ारी  है !

रौशनियों  के  जंगल  से  दूर
गुमसुम  रात  के  अंधेरे  में
दो  साये ....!
मौन  चले  जाते  हैं
हाथों  में  लिए  हाथ  !

उनके  क़दमों  तले  कुचल  कर
सूखे  पत्ते
टूटते  हैं, चिटख़ते हैं

सन्नाटा  बिंध  गया  है

और  मौन,  अवश
कहीं  भाग  जाने  की  हड़बड़ाडाहट  में
विकल  है
अमावस  की  रात  !

                                                                             ( 1976 )

                                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

प्रकाशन: 'देशबंधु' भोपाल, 1976 एवं 'अंतर्यात्रा-13', 1983 ।

शुक्रवार, 31 मई 2013

अगले चुनाव में ....

बात  जब  किसी  और  की 
कमाई  की  हो
और  सैकड़ों  लाख-करोड़  सामने  हों
तो  देश  का  बजट  भी
हंसते-मुस्कुराते  बना  ले  कोई

लेकिन
जब  अपने  ख़ून-पसीने  की
कमाई  की  बात  हो
अपने  घर  की  ज़रूरतें  सामने  हों
तो
बजट  बनाते  हुए
रूह  कांप  जाती  है
रातों  की  नींद  ग़ायब  हो  जाती  है
हाथों  से  क़बूतर  उड़  जाते  हैं ....

तो,  अगले  चुनाव  में
किसे  वोट  देंगे  आप ? !

या  चुनाव  लड़ेंगे  इस  बार  ?

                                                ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल



गुरुवार, 30 मई 2013

जंगल की आग

यह  जंगल  की  आग  है,  महाशय !
पहले  तो  लगती  नहीं  आसानी  से
और  कहीं  लग  जाए
तो  सुलगती  रहती  है
बरसों-बरस  !

यह  जंगल  है,  महाशय
आपका  शहर  नहीं
यह  सहिष्णुता  का  ज्वलंत  उदहारण  है
यहां  हिंसा  भी  होती  है
तो  सिर्फ़  जीवन  के  लिए
यहां  कोई  नहीं  खाता  अपनी  भूख  से  ज़्यादा
और  न  कोई  सहेज  कर  रखता  है
अपनी  आवश्यकता  से  अधिक 

यह  जन्म-स्थली  है
तुम्हारी  तमाम  संस्कृतियों  की
पाठशाला  है  उस  मनुष्यता  की
जिसका  नाम  ले-ले  कर
तुम  करते  हो  बर्बरतम  अत्याचार
अपने  ही  स्वजातियों  पर
और  अपने  स्वदेशियों  पर !

हमारे  जंगल  में  तो  नहीं  होता  ऐसा
क्या  सिर्फ़  इसीलिए
तुम  मिटा  देना  चाहते  हो
जंगलों  के  नामो-निशान ?

चलो,  कर  देखो  यह  भी
मिटा  दो  स्वयं  ही
अपने  अस्तित्व  के  श्रेष्ठतम  प्रमाणों  को
बदल  दो  सारी  पृथ्वी  को
कंक्रीट  के  जंगल  में !

याद  रखना  मगर
कि  अगर  आग  लग  गई  एक  बार
जंगल  में
तो  शताब्दियां  भी  कम  पड़  जाएंगी
बुझाने  में !

                                                          ( 2013 )

                                                   -सुरेश  स्वप्निल

बुधवार, 29 मई 2013

विजयी भवः !

पता  नहीं  कि  मुक्ति
किस  द्वार  से  आएगी
किस  रथ  पर  चढ़  कर
मगर  आएगी  अवश्य

संभवतः
हमारे  जीवन-काल  में
न  आ  पाए
पर्याप्त  नहीं  हैं  हमारे  प्रयास
न  ही  संपूर्ण  है
हमारा  विश्वास ...

हां,  इस  बात  का  श्रेय  निश्चय  ही
हमारी  पीढ़ी  को  है
कि  हम  न  केवल  सचेत  हुए
बल्कि  हमने  प्रयास  भी  किए
भले  ही  आधे-अधूरे  मन  से
और  असफल  होते  रहे  बार-बार ...

ग़लती  न  करे  मनुष्य
और  सफल  हो  जाए
ऐसा  होता  तो  नहीं !

हम  अगली  पीढ़ी  को  सौंप  रहे  हैं
अपनी  संघर्ष-चेतना
अपनी  असफलताओं  के  इतिहास
और  छोटी-मोटी  सफलताओं  से  उपजा
यह  विश्वास 
कि  मुक्ति  कोई  असंभव  लक्ष्य  नहीं  है ...

कर्णधारों !
जहां  तक  हम  पहुंचे  हैं
वहां  से  शुरू  होती  है
तुम्हारी  यात्रा ...

विजयी भवः  !

                                                        ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल

मंगलवार, 28 मई 2013

फिर उठ खड़े होंगे लोग

सेनाएं  भेज  दी  गई  हैं
विद्रोह  को  कुचलने  के  लिए
और  दो-चार  सौ  लाशों  का  इंतज़ार  कीजिए

कुछ  दिन  कहीं-कोई  आवाज़  नहीं  उठेगी
बंदूक़ों  के  डर  से
सेना  के  जवान
खुले  घूमेंगे
अपने  आक़ाओं  के  हुक्म  बजाने  के  लिए
कम  होती  रहेगी  जनसंख्या
युवा  स्त्री-पुरुषों  की
नज़र  आते  ही
मार  दिए  जाते  रहेंगे
निर्दोष  मनुष्य

सरकारें  ख़ुद  ही  पीठ  थपथपाती  रहेंगी  अपनी
चिल्लाते  रहेंगे  मानवाधिकार-कार्यकर्त्ता ....

सदियों  से  यही  होता  आया  है
अपनी  मनुष्यता  बचाए  रखने  की
कोशिश  करने  वालों  के  साथ

जब  फिर  अति  हो  जाएगी
बंदूक़ों  के  'न्याय'  की
तो  फिर  उठ  खड़े  होंगे  लोग
तेलंगाना  से  छत्तीसगढ़  तक…

हर  बार  सेनाएं  ही  जीतें
यह  ज़रूरी  नहीं !

                                                   ( 2013 )

                                            -सुरेश  स्वप्निल

सोमवार, 27 मई 2013

व्हाइट हाउस के प्रेत

व्हाइट  हाउस  में  घुस  आए  हैं  अचानक
सैकड़ों  प्रेत  !

विश्वास  नहीं  होता  न  ?
संसार  के  सबसे  अधिक  उन्नत  देश  के
सबसे  सुरक्षित  स्थान  पर
रहने  वाले
ओझाओं  को  निमंत्रण  देने  लगें
और  अपने  द्रोन-जैसे  सर्वनाशी  हथियार  भूल  जाएं
धरी  की  धरी  रह  जाए  एफ़ . बी .आई .
और  सी .आई .ए .
हाथ-पांव  फूल  जाएं  फ़ेडरल  सेनाओं  के
'शत्रु'  का  नाम  सुन  कर  ही  कांपने  लगें
बहादुरी  की  मिसाल  माने  जाने  वाले  सैनिक ...

कोई  विश्वास  करे  या  न  करे
क्या  फ़र्क़  पड़ता  है ?
हिरोशिमा  से  काबुल  तक
एक  करोड़  निर्दोष, असमय  मारे  गए
मनुष्यों  की  व्याकुल  आत्माएं
कभी  न  कभी  तो  पहुंचनी  ही  थीं  यहां  तक !

जो  यह  मानते  हैं
कि  पैसे  से  सब  कुछ  ख़रीदा   जा  सकता  है
वे  आगे  आएं
और  मुक्ति  दिलाएं  व्हाइट  हाउस  को
भूत-प्रेतों  से
चाहे  अरबों  डॉलर्स  क्यूं  न  ख़र्च  हो  जाएं !

आख़िर  संसार  के  सबसे  शक्तिशाली,
वैज्ञानिक  रूप  से  सर्वोन्नत
आर्थिक  और  सैनिक  महाशक्ति  माने  जाने  वाले  देश  के
प्रथम  नागरिक  की  सुरक्षा
और  सबसे  बढ़  कर
छवि  का  प्रश्न  है !

जो  लोग  भारत-जैसे  सुसंस्कृत  देश  का
ईमान  ख़रीद  सकते  हैं
वे  चार-छह  देशों  के  आवारा  भूत-प्रेत
नहीं  ख़रीद  सकते  भला  ?

ठहाका  लगा  कर  हंस  रहे  हैं
व्हाइट  हाउस  के  प्रेत
थर-थर  कांप  रहा  है
संसार  का  सबसे  शक्तिशाली  मनुष्य  !

                                                            ( 2013 )

                                                      -सुरेश  स्वप्निल

रविवार, 26 मई 2013

मौन कोई विकल्प नहीं !

जहां  तंत्र
दिन-प्रतिदिन  षड्यंत्र  रचता  हो
लोक  के  विरुद्ध
वहां 
मौन  कोई  विकल्प  नहीं !

जहां  लोक  का  अस्तित्व
कीड़ों-मकोड़ों  से  अधिक  नहीं
और  तंत्र  तैनात  हो
अपनी  तमाम  सशस्त्र  सेनाओं  के  साथ
धरती  के  चप्पे-चप्पे  पर
जहां  लोक  को  हिंस्र  पशुओं  की  भांति
घर-घर, गली-गली
और  वनों-कंदराओं  से
बिलों  से  खींच-खींच  कर
मृत्यु  के  हवाले  किया  जाने  लगे
जहां  तंत्र  की  निरंकुशता  के  विरुद्ध
आवाज़  उठाना
'राज-द्रोह'  घोषित  कर  दिया  जाए
वहां  मौन  कोई  विकल्प  कैसे  हो  सकता  है  भला ?

युद्ध  तो  युद्ध  है
जब  एक  पक्ष  संवाद  के  लिए
चुनता  हो  बंदूक़
वहां  दूसरे  पक्ष  के  लिए
मौन  कोई  विकल्प  नहीं !

                                                                          ( 2013 )

                                                                   -सुरेश  स्वप्निल

शनिवार, 25 मई 2013

हम ही बेदख़ल नहीं होते !

बस  करो,  बहुत  हुआ
हम  समझ  गए  हैं  विकास  के  सारे  अर्थ !
जान  चुके  हैं  तुम्हारी  सब  तरक़ीबें
हमें  शहर  से  बेदख़ल  करने  की
और  फिर  से
शहर  का  समाजशास्त्र, भूगोल  और  पर्यावरण
बदलने  की !

तुम  हमें  चैन  से  क्यों  नहीं  जीने  देते
एक  जगह ?

तुम  क्या  जानो  पचास  वर्ष  पुराने
आम  का  पेड़  कटने  की  व्यथा
और  उस  पर  रहने  वाली  गिलहरियों  के  कोटर
नष्ट  करने  के  पाप  का  अर्थ
और  पक्षियों  के  घोंसले  और  उनमें  फंसे
नवजातों  को  तितर-बितर  करने  का  दंश ?

सिर्फ़  हम  ही  बेदख़ल  नहीं  होते  शहर  से
हमारे  साथ  ही  बेदख़ल  हो  जाते  हैं
पूर्वजों  के  तमाम  पुण्य
और  तुम्हारी  तथाकथित  समझदारी
और  मनुष्यता !

                                                              ( 2013 )    
                                                      
                                                      -सुरेश  स्वप्निल

                                                 

शुक्रवार, 24 मई 2013

शायद हम बहुत सुखी हैं

चलो,  ऐसा  करके  देखते  हैं
कि  आज  पूरी  तरह  से  मनुष्य  बनें
और  अपने  सारे  सुख
सारी  संपत्तियां  उनमें  बांट  दें
जिन्हें  उनकी  सचमुच  ज़रूरत  है
एक  दिन,  केवल  एक  दिन
निर्गुण-निर्विकार  रह  कर
अनुभव  करें
उन  अभागे  मनुष्यों  की  पीड़ा
जो  संभवतः  हमसे  भी  कठिन
परिस्थितियों  में  जी  रहे  हैं

शायद  हम  बहुत  सुखी  हैं
करोड़ों-अरबों  मनुष्यों  की तुलना  में
लेकिन  इसका  अर्थ  यह  नहीं  कि  हम
कोशिश  छोड़  दें
अपना  और  अपने  से  अधिक  दुखी  मनुष्यों  का 
जीवन
बेहतर  बनाने  की ...!

                                                                     ( 2013 )

                                                               -सुरेश  स्वप्निल

बुधवार, 22 मई 2013

मर्दों को ज़्यादा दिक़्क़त है ...

पानी  ख़त्म  हो  गया  है
नदी  में,  अम्मां !
बहुत  दूर  जाना  पड़े  शायद
शाम  भी  हो  सकती  है  लौटने  में

नहीं,  अकेले  नहीं
गांव  की  चार-छह  लड़कियां
मिल  कर  ही  जाएंगी  हम
ढाढ़स  बंधा  रहता  है
एक-दूसरे  के  साथ  से ...

अम्मां,  पानी  तो  सभी  को  चाहिए
और  अब  कौन  सोचता  है
जात-बिरादरी  की  बातें ?

अम्मां,  प्यासे  बच्चों  को  देखें
कि  दीन-धरम  को  रोएं
ढोर-डंगर  को  किसके  भरोसे  छोड़  दें ?
तुलसी  के  पौधे  एक  ही  दिन  में  मर  जाते  हैं,
अम्मां !

मर्दों  को  ज़्यादा  दिक़्क़त  है
तो  वे  ख़ुद  क्यों  नहीं  चले  जाते
गगरे-घड़े  उठा  कर ?

पूछ  लो  दादी  सा  से
उनके  लाड़लों  को  रोटी  खानी  है  कि  नहीं ?

                                                             ( 2013 )

                                                     -सुरेश  स्वप्निल 

                                                                 

मंगलवार, 21 मई 2013

सहेज लो डैने !

मुक्ति  का  कोई  बीज-मंत्र  नहीं  होता
कि  जिसका  उच्चारण  करते  ही
टूट  जाएं  पिंजरे  की  सलाखें
और  सो  जाएं  सारे  पहरेदार ...

मुक्ति  की  कामना  सफल  हो
इसके  लिए  ज़रूरी  है
कि  पंख  खुल  सकें  सही  समय  पर
और  आंखें  और  दिमाग़  रहें
एकदम  चौकन्ने
कि  दाना-पानी  के  लिए
पिंजरे  का  दरवाज़ा  खुलते  ही
सारी  चेतना  और  शक्ति  सहेज  कर
टूट  पड़ा  जाए
सामने  पड़ने  वाले  शत्रु
या  उसके  सहायकों  पर

समय  का  एक  तिनका  भी  व्यर्थ  होने  का  अर्थ  है
अपनी  परतंत्रता  को  शाश्वत  बना  लेना !

हो  सकता  है  कि  मुक्त  होने  के  प्रयास  में
घायल  हो  जाएं
चोंच  और  पंख
साथ  न  दे  पाएं  फेफड़े
या  बीच  राह  में  ही
भरभरा  कर  ढह  जाए
इच्छा-शक्ति  का  सुरक्षा-कवच ...

कुछ  भी  हो  सकता  है
भटक  जाने  से  लेकर  प्राण  जाने  तक…

मुक्ति  मुफ़्त  में  नहीं  मिलती,  दोस्तों !
दाम  चुकाने  को  तैयार  हो
तो  सहेज  लो  डैने  !

                                                     ( 2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल

सोमवार, 20 मई 2013

मनुष्य होने के बारे में

देश  है
तो  नागरिक  भी  होंगे

नागरिक  होंगे

तो  सरकार  भी  होगी

सरकार  होगी
तो  सेना  भी  होगी
और  पुलिस  भी

सवाल  यह  है  कि
नागरिक,  सरकार, सेना
और  पुलिस  के  अंतर्संबंध
कौन  परिभाषित  करता  है ?

यदि  ये  सम्बंध  पूँजी  निर्धारित  करती  है
तो  समझ  लें,  जनता  की  ख़ैर  नहीं
यदि  पूँजी  विदेशी  भी  है
तो  जनता  के  साथ-साथ
प्राकृतिक  संसाधनों  की  भी  ख़ैर  नहीं

और  यदि  किसी  देश  में  लोकतंत्र  है
और  नागरिक,  सरकार,  सेना  और  पुलिस  के
अंतर्संबंध  पूँजी  निर्धारित  करती  है
और  वह  पूँजी  अमेरिकी  है

तो  समझ  लें,
उस  देश  की  ही  ख़ैर  नहीं
और  साथ-साथ
पास-पड़ोस  के  देशों  की  भी  ख़ैर नहीं !

अमेरिकी  पूँजी  के  आक़ाओं  के  इशारों  पर
आपकी-अपनी  सरकार
आपकी-अपनी  सरकार  की  सेनाएं
और  पुलिस
कब  आप  पर  गोलियां  चलवा  दे
कुछ  नहीं  कहा   जा  सकता ,,,,

यदि  आप  एक  लोकतांत्रिक  देश  के  नागरिक  हैं
जिसकी  सरकार  अमेरिकी  आक़ाओं  के  इशारों  पर 
काम  करती  है
और  अपने  ही  नागरिकों  पर  दमन-चक्र  चलाती  है
आप  दमन  के  शिकार  होते  रहते  हैं
निरंतर
और  कभी  विरोध  में  उठ  कर
खड़े  नहीं  होते
तो  क्षमा  करें  श्रीमान

अपने  मनुष्य  होने  के  बारे  में
फिर  सोचें  एक  बार…. !

                                                                      ( 2013 )

                                                              -सुरेश  स्वप्निल

                                                                          

रविवार, 19 मई 2013

मौसम क्या इसीलिए आते-जाते हैं ?

सिर्फ  किसानों, मजदूरों
और  ग़रीबों  के  बस  की  है
यह  प्रचण्ड  धूप  !
यह  तन  झुलसाती  लू
और  गर्म  हवाएं ...!
क्योंकि  वे  जानते  हैं
धूप  का  तीखापन  संकेत  है
भरपूर  बारिश  का ....

बारिश  का  पर्याप्त  होना  जगा  देता  है
किसान, मज़दूर और  ग़रीब   के  मन  में  नई  आशाएं
अच्छे  समय  की
और  भर  देती  है  धरती  के  कण-कण  में  नया  उछाह
हालांकि  कभी  बाढ़  बहा  ले  जाती  है
सारे  स्वप्न ...और  डरा  देती  है
हर  किसान  और  मज़दूर  और  ग़रीब  को

हर  किसान
हर  मज़दूर
हर  ग़रीब  सहन  कर  ले  जाता  है
धूप , लू  और  गर्मी  के  तीखेपन  को
न  करे
तो  खाएंगे  क्या  बेचारे !

हर  अफ़सर
हर  शासक
डरता  है  मौसम  की  मार  से
और  ख़ुश  भी  होता  है
मौसम  के  बदलते  मिज़ाज  के  साथ
बढ़ती  महंगाई  की  संभावनाओं  के  साथ

मौसम  और  जीवनोपयोगी  वस्तुओं के  भावों  का 
हर  परिवर्त्तन
बढ़ा  देता  है  आर्थिक  असमानता
अमीर  और  ग़रीब  के  बीच !

मौसम  क्या  इसीलिए  आते-जाते  हैं
साल  दर  साल ?

                                                                     ( 2013 )

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

                                                               

शुक्रवार, 17 मई 2013

सुबह मेरी मुट्ठी में !

आम  का  एक  धीर-गंभीर  पेड़/ उसके  नीचे/ बेतरतीब-से
बिखरे  हुए/ सूर्यमुखी  के  अनगिनत  पौधे
और  एक  खिले  हुए  सूर्यमुखी  के / चेहरे  को  छूता /
अपने  कंधे  पर / बकरे  के  बच्चे  को / लादे  हुए /
माली  का  लड़का !

यह  दृश्य  है  मेरे  घर  के  सामने  वाले / बंगले  की  एक  ख़ुशनुमां  सुबह  का !

मैंने  चाहा, सुबह  को  अपनी  मुट्ठी  में / क़ैद  कर  लूं !/ यह  नहीं  हो  सका ....
तब  मैंने / अपना  कैमरा  टटोला / उसमें / फ़िल्म  नहीं  थी !
मैंने  फिर  सोचा,  मुझे  क्या  करना  चाहिए ?...

सामने  की  सड़क  पर / अपनी  यूनिफ़ॉर्म  शरीर  पर  लादे / कुछ  बच्चे /
बस्ते  उठाए / स्कूल  जाने  को / खड़े  थे  तैयार ....
मैंने  देखा- उनकी  तरफ़, माली  के  लड़के  की  तरफ़ /
पूछना  चाहा  उससे- " तुम / स्कूल  नहीं  जाते  क्या ?"
फिर,  अपने  इस  अनपूछे  प्रश्न  की  निरर्थकता  पर /
मैं  स्वयं  लज्जित  हो  गया / सोचता  रहा  कुछ  क्षण / कि  मुझे /
क्या  करना  चाहिए ?

" मैं /  माली के  इस  लड़के  को  स्कूल  भेज  कर  ही  रहूंगा"-मैंने  संकल्प  लिया !

लड़का / मेरी  ही  ओर  देख  रहा  था / मुस्कुराता  हुआ !
मैंने / उसे / अपने  पास  बुला  लिया ...
अब / मुझे  लग  रहा  था / सुबह  मेरी  मुट्ठी  में  है !

                                                                                                                   ( 1978 )

                                                                                                             -सुरेश  स्वप्निल 

* प्रकाशन : 'इंदौर बैंक परिवार', 1978, 'अंतर्यात्रा'-13, 1983।