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बुधवार, 29 मई 2013

विजयी भवः !

पता  नहीं  कि  मुक्ति
किस  द्वार  से  आएगी
किस  रथ  पर  चढ़  कर
मगर  आएगी  अवश्य

संभवतः
हमारे  जीवन-काल  में
न  आ  पाए
पर्याप्त  नहीं  हैं  हमारे  प्रयास
न  ही  संपूर्ण  है
हमारा  विश्वास ...

हां,  इस  बात  का  श्रेय  निश्चय  ही
हमारी  पीढ़ी  को  है
कि  हम  न  केवल  सचेत  हुए
बल्कि  हमने  प्रयास  भी  किए
भले  ही  आधे-अधूरे  मन  से
और  असफल  होते  रहे  बार-बार ...

ग़लती  न  करे  मनुष्य
और  सफल  हो  जाए
ऐसा  होता  तो  नहीं !

हम  अगली  पीढ़ी  को  सौंप  रहे  हैं
अपनी  संघर्ष-चेतना
अपनी  असफलताओं  के  इतिहास
और  छोटी-मोटी  सफलताओं  से  उपजा
यह  विश्वास 
कि  मुक्ति  कोई  असंभव  लक्ष्य  नहीं  है ...

कर्णधारों !
जहां  तक  हम  पहुंचे  हैं
वहां  से  शुरू  होती  है
तुम्हारी  यात्रा ...

विजयी भवः  !

                                                        ( 2013 )

                                                -सुरेश  स्वप्निल

1 टिप्पणी:

Kuldeep Thakur ने कहा…

मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
आप की ये रचना 31-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।


जय हिंद जय भारत...


कुलदीप ठाकुर...