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सोमवार, 21 जनवरी 2013

मुझे इंतज़ार है ...

किस क़दर ख़ामोश हैं ये पेड़ सब!
देखो/  हवा भी तो नहीं चलती!
परिंदे मौन हैं/ ख़रगोश सब दुबके हुए हैं झाड़ियों में

ये किस शेर के मौजूद होने का अहसास है/ जिसके .खूंख्वार जबड़ों से
आती कच्चे गोश्त की बू/ सारे जंगल में/ फैलती जाती है ?

एक अव्यक्त भय / सबकी रग़ों में दौड़ता है / कभी-कभी / सन्नाटे को तोड़ कर /
गूँज उठती हैं अचानक / चीख़ें / तिनकों की तलाश में निकले ख़रगोशों की।
सब/ पड़े रहते हैं चुपचाप / सुन कर भी नहीं सुनते / उन आवाज़ों को ....

अपनी आँतों में फंसे / आहार को चुभलाते / उसके ख़त्म होकर /
शरीर से बाहर निकलने तक / कोई नहीं हिलता !

फिर किसी दिन / आँतों की कुलबुलाहट से परेशान / आहार की तलाश में
निकलता है कोई जानवर।
फिर इसी तरह / गूंजती हैं चीख़ें ....
सब के सब / पड़े रहते हैं चुपचाप / पेड़ तक ख़ामोश।
और हवा ...नहीं चलती।

मुझे इंतज़ार है / हवा के उस झोंके का / जो / किसी के रोके नहीं रुकेगा
और जो / सब पेड़ों को हिलाएगा। / पक्षी गीत गाएंगे / और ख़रगोश
उछलेंगे-कूदेंगे / जिसके आने पर / और वह हवा का झोंका
जंगल के सभी जानवरों को / एक होने की / प्रेरणा देगा ....

उस दिन / शेरों को सूंघ जाएंगे सांप / और शहर के अख़बार
छापेंगे यह ख़बर : 'जंगल में क्रांति हो गई।'.....
                                                                                                      ( 1979 )

                                                                                            -सुरेश स्वप्निल 

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