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मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

यही वक़्त है ....

वे दिन गए 
जब आम आदमी भागता था 
कुर्सियों के पीछे 
अब आम आदमी आगे 
और पीछे-पीछे दौड़ रही हैं कुर्सियां 
जैसे  आगे  हों बिल्लियां
और  चूहे  उन्हें  छकाते  हुए 
जैसे  शेर  कांपने  लगे  थर-थर 
बकरियों  को  देख  कर ... 

अद्भुत  दृश्य  है  न 
न  कभी  देखा  न  सुना 

इसे  सहेज  कर  रख  लीजिए 
अपनी  स्मृतियों  में 
2011  में  जनपथ  की  चेतावनी  वाले 
दृश्यों  के  साथ  जोड़  कर 
अपनी  भावी  पीढ़ियों  के  
सामाजिक  संस्कार  के  लिए …

हां,  यही  वक़्त  है 
सही  वक़्त

इसके  पहले  
कि  पूंजीवाद  नष्ट  कर  दे 
मानवता  की  बची-खुची  निशानियां 
और  छिन्न-भिन्न  कर  दे 
संबंधों  के  ताने-बाने 
कुछ  आदर्श  रख  लीजिए  बचा  कर 
ताकि  कुछ  बच  रहे 
दिन-प्रतिदिन  जर्जर  होती 
मनुष्यता  की  उम्र  !

                                                (2011) 

                                        -सुरेश  स्वप्निल  



 

1 टिप्पणी:

Albela Khtari ने कहा…

sahi kaha , yahi wakt hai